भारत भूषण:सिल्वर स्क्रीन का सम्राट - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

भारत भूषण:सिल्वर स्क्रीन का सम्राट

पुण्य तिथि : 10 अक्टूबर                                                        

राय बहादुर के परिवार में जन्म लेने वाले और सिल्वर स्क्रीन पर हमेशा राज दरबार की पोशाक में सम्राट का अभिनय करने वाले भारत भूषण ने बाद के दिनों में बॉलीवुड में गुमनाम और तंगहाल जिंदगी गुजारी...      

                                      



अपने जमाने में हिन्दी सिनेमा के पर्दे पर दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद का सिक्का चलता था। भारत भूषण की गिनती इस त्रिकोण से अलग के अभिनेताओं में हुआ करती थी। हालांकि वह हिंदी फ़िल्मों के एक प्रतिभासंपन्न अभिनेता, उच्च कोटि के कहानीकार और फ़िल्म निर्माता थे मगर उनका निजी जीवन उनकी फ़िल्मों के पात्रों के समान बेहिसाब उत्थान पतन का शिकार रहा।
    भारत भूषण 14 जून 1920 को मेरठ में पैदा हुए थे और उनकी परवरिश अलीगढ़ में हुई थी | उनके पिता राय बहादुर मोतीलाल अग्रवाल मेरठ के एक सरकारी वकील थे | उनके परिवार में अधिकतर लोग पेशे से वकील और जज थे जिन के सामने नाटक, सिनेमा या गीत संगीत का नाम लेना भी महा पाप समझा जाता था | जब भारत भूषण की आयु मात्र दो वर्ष थी तो उनकी माता का स्वर्गवास हो गया और वह अपने दादा के साथ रहने के लिए अलीगढ़ चले आए थे | यहां उन्होंने मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बी.ए. की डिग्री प्राप्त की | उनके पिता की अभिलाषा थी की वह पढ़ लिखकर किसी सम्मानजनक नौकरी में लग जाएं या फिर वकालत करके अपने परिवार का नाम रोशन करें | अपने बुज़ुर्गों के अरमानों को अनदेखा करके वह सिनेमा की ओर आकर्षित हुए | पहले वह न्यू थियेटर्स में क़िस्मत आज़माने के लिए कलकत्ता गए | वहां सफ़लता हाथ न आने पर बम्बई में आकर पैर जमाने के संघर्ष में लग गए |
      उनकी शादी लखनऊ के राय बहादुर बुद्ध प्रकाश की बेटी श्रध्दा देवी से हुई थी | भाग्य विधाता ने उनके नसीब में पहले दिन से ही गर्दिशें लिख रखी थीं और वह पूरा जीवन एक के बाद एक मुश्किलों में घिरे रहे | उनकी पहली बेटी अनुराधा को पोलियो जैसे नामुराद रोग ने जकड़ लिया | दूसरी बेटी अपराजिता के जन्म पर उनकी पत्नी  श्रध्दा देवी प्रसव से संबंधित पेचीदगियों के कारण 12 नवम्बर 1954 को चल बसीं | उनके कोई बेटा नहीं था | उनकी अधिकतर फ़िल्में ट्रेजिक कहानियों पर आधरित होती थीं | दुर्भाग्य से उनका निजी जीवन भी उनके पर्दे के जीवन का जीता जागता प्रतिबिम्ब था जहां समय के उलट फेर ने उन्हें आसमान की बुलंदियों से उठाकर पाताल की गहराई में फेंक दिया था | इस तमाम उहापोह में उनकी अर्धांगिनी श्रध्दा और उज्जवल भविष्य दोनों उनसे दूर चले गए |
      उन्होंने अपने फ़िल्मी जीवन की यात्रा 1941 में निर्माता केदार शर्मा (पूरा नाम केदार नाथ शर्मा) के ऐतिहासिक चलचित्र चित्रलेखा से आरंभ की थी परन्तु इस फ़िल्म में नायिका महताब ही दर्शकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी रहीं | इसके बाद उन के पास फ़िल्मों में काम करने के अनगिनत प्रस्ताव आने लगे और वह छोटे मोटे रोल करते भी रहे मगर इन सब से उन्हें स्टार के रुतबे तक पहुँचने में कोई सहायता नहीं मिली | सुनहरे पर्दे पर अपनी सफ़ल नायक की पहचान बनाने में उन्हें एक लम्बा समय लग गया और लगभग एक दशक के भीषण जद्दोजहद के पश्चात् उन्हें सफ़लता का पहला मज़ा चखना नसीब हुआ | निर्माता केदार शर्मा के बाद में आने वाले चलचित्र सुहाग रात (1948) में उन्हें पहले से बेहतर रोल में पेश किया गया था | इस फ़िल्म में उन्होंने दो नायिकाओं गीता बाली और बेगम पारा के साथ काम करने का अवसर मिला | फ़िल्म सुहाग रात से उन्हें गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकलने में सहायता मिली |
      भारत भूषण अपने समय के एक सुशिक्षित व्यक्ति थे और उनकी निजी लायब्रेरी में हज़ारों किताबें मौजूद थीं | अपनी जीवन गाथा का वह बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से विशलेषण करते थे कि मैं जन्म से तो बनिया हूँ, स्वभाव से ब्राह्मण परन्तु अपने कर्मों से शूद्रों से भी नीच हूँ क्योंकि सिनेमा व्यवसाय तथा शरीर बेचने के धंधे में कोई विशेष अंतर नहीं है | साहित्य का अच्छा ज्ञान होने के साथ साथ वह फ़िल्म लेखन में भी दक्ष थे | उन्होंने कई कामयाब फ़िल्मों की कहानियां लिखी थीं जिन में बरसात की रात, नई उमर की नई फ़सल, बसंत बहार और दूज का चांद उल्लेखनीय हैं | भारत भूषण हिंदी के प्रसिद्ध कवि गोपाल दास नीरज की विश्व विख्यात कविता कारवां गुज़र गया ग़ुबार देखते रहे की काव्य शैली से बड़े प्रभावित थे और उन्होंने इसे अपनी फ़िल्म नई उमर की नई फ़सल (1964) में मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में गवा कर अति प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर पेश किया था | 
      उनके बड़े भाई का नाम श्री आर चंद्रा था जोकि एक सफ़ल व अनुभवी फ़िल्म निर्माता थे और भारत भूषण के साथ फ़िल्में बनाया करते थे | उनकी फ़िल्मों में भारत भूषण ही मुख्य भूमिका में होते थे | चन्द्रा जी ने कई मशहूर फ़िल्में बनाई थीं जिन में फ़िल्म बेबस, मीनार और बसंत बहार मुख्य हैं | उन्होंने लखनऊ में एक भव्य संस्था आईडियल फ़िल्म स्टूडियो बनाई थी |
      भारत भूषण हिंदी फ़िल्मों के पहले चाकलेटी हीरो थे और उन पर फ़िल्माए गए गीत उस समय के प्रथम श्रेणी के गायकों मोहम्मद रफ़ी, तलत महमूद, मन्ना डे, मुकेश इत्यादि से गवाए जाते थे | वह उन अभिनेताओं में से थे जिन्हें संगीत का अच्छा ज्ञान था और साहित्य की अच्छी समझ रखते थे इसलिए उनकी फ़िल्मों में उत्तम संगीत व दिल को छू लेने वाले गीत रचे जाते थे | उस दौर में फ़िल्मों में नायक के बाल सजे संवरे और हेयर क्रीम से माथे पर जमे हुए होते थे मगर भारत भूषण के बालों की लटें हमेशा उनके चौड़े माथे पर उलझी रहती थीं और हर प्रकार के बनाव श्रृंगार से आज़ाद होती थीं | उनकी प्रशंसक नवयुवतियां उनकी इसी अदा पर क़ुर्बान होती थीं |
      एक ज़माने में अभिनेत्री मधुबाला के साथ भारत भूषण की रोमानी जोड़ी बहुत लोकप्रिय हुई थी | दोनों कलाकारों ने विभिन्न फ़िल्मों में उच्च कोटि के रोमानी अभिनय का परिचय दिया था जिन में कुछ  संगीत प्रधान फ़िल्में जैसे फागुन,बरसात की रात तथा गेटवे ऑफ़ इंडिया शामिल हैं | उन्होंने अपने ज़माने की सभी चोटी की अभिनेत्रियों के साथ काम किया था | फ़िल्म बैजू बावरा (1952) में उनके विपरीत मीना कुमारी, मिर्ज़ा ग़ालिब (1953) में सुरैया और निगार सुल्ताना, बसंत बहार (1956) में निम्मी, फागुन (1958) में मधुबाला, रानी रूपमती (1959) में निरूपा राय, बरसात की रात (1960) में मधुबाला व श्यामा, संगीत सम्राट तानसेन (1962) में अनिता गुहा और फ़िल्म जहां आरा (1964) में माला सिन्हा ने काम किया था |
      भारत भूषण चाहे अपने ज़माने के चोटी के कलाकार न रहे हों मगर फ़िल्मी कहानियों में एक दुखी कवि या अप्रसन्न संगीतकार के पात्रों के लिए सबसे उचित चुनाव समझे जाते थे | फ़िल्म बैजू बावरा, मिर्ज़ा ग़ालिब, बसंत बहार, कवि कालिदास और संगीत सम्राट तानसेन के अमर पात्रों के साथ केवल उन जैसा प्रतिभाशाली और गुणवान कलाकार ही न्याय कर सकता था | ऐसी ऐतिहासिक हस्तियों की छवि चित्रांकन के लिए उन से उत्तम किसी दूसरे कलाकार के लिए सोच पाना कठिन है |
निर्माता विजय भट्ट ने उन्हें अपनी जग प्रसिद्ध कृति बैजू बावरा में टाईटिल रोल करने का अवसर दिया | 1950 में जब भट्ट साहब फ़िल्म बैजू बावरा के लिए कलाकारों के चयन में लगे हुए थे तो संगीतकार नौशाद उनके मुख्य सलाहकार थे | विजय भट्ट मुख्य भूमिकाओं में उस समय की सुप्रसिद्ध जोड़ी दिलीप कुमार व नर्गिस को लेना चाहते थे परन्तु नौशाद ने भट्ट जी को कम जाने पहचाने चेहरे लेने की सलाह दी और इस तरह भारत भूषण और मीना कुमारी का चयन किया गया | फ़िल्म बैजू बावरा में बैजू के रोल के लिए भारत भूषण के चुने जाने का कारण उनकी एक घायल कलाकार की छवि थी जिस ने फिर उम्र भर उनका पीछा नहीं छोड़ा और उन्हें बार बार इसी प्रकार के रोल करने पड़े | इस फ़िल्म में दूसरे कलाकारों जैसे मुहम्मद रफ़ी, मीना कुमारी और संगीतकार नौशाद ने भी अपनी अपनी कला में कमाल कर दिखाया था | फ़िल्म बैजू बावरा को हिंदी सिनेमा की 100 बेहतरीन फ़िल्मों में गिना जाता है |
फ़िल्म बैजू बावरा में भारत भूषण का रोल एक होनहार संगीतकार बैजू का है | जोकि सम्राट अकबर के दरबार के नवरतन संगीतकार मियां तानसेन को अपने पिता की मृत्यु का ज़िम्मेदार समझता है और इस अन्याय के प्रतिशोध को ही अपने जीवन का ध्यय बना लेता है | इस उद्देश्य के लिए वह तानसेन को संगीत प्रतियोगिता का आह्वान देता है और उससे गायन के मुक़ाबले की बाज़ी जीत लेने के बाद ही अपनी प्रेयसी गोरी को अपनाना चाहता है |
      इस फ़िल्म में मोहम्मद रफ़ी की मन लुभावनी आवाज़ और नौशाद के सुमधुर संगीत पर आधारित गीतों मन तड़पत हरि दर्शन को आज, तू गंगा की मौज मैं जमना का धारा, डोले में पवन के आई बहार ने भारत भूषण की छवि में चारचाँद लगा दिए थे | फ़िल्म में मोहम्मद रफ़ी के गाए भजन ओ दुनिया के रखवाले के अंत में जब भारत भूषण भावुक दृश्यों में रखवाले रखवाले के शब्दों पर अभिनय प्रदर्शन करते हैं तो पर्दे पर विशालकाय पत्थर की मूर्ति के साथ साथ हाल में बैठे हुए सैकड़ों भावुक दर्शकों की आँखें भी भीग जाती हैं |
कहा जाता है कि नौशाद अली के संगीत से सुसज्जित फ़िल्म बैजू बावरा के जवाब में एक संगीत प्रधान फ़िल्म बसंत बहार बनाई गई थी जिस में शंकर जयकिशन की संगीतकार जोड़ी ने अपनी उत्कृष्ट  संगीत कला का प्रदर्शन किया था | इस फ़िल्म में भी मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ का जादू छाया हुआ था तथा मुख्य भूमिका में भारत भूषण की छवि जलवागर थी | बसंत बहार में भी मोहम्मद रफ़ी का गाया एक बेमिसाल गीत दुनिया ना भाए मुझे अब तो बुला ले चरनों में चरनों में बनाया गया था मगर इस फ़िल्म को बैजू बावरा जैसी सफ़लता नसीब नहीं हो पाई |
फ़िल्म बैजू बावरा के एक साल बाद निर्देशक विजय भट्ट ने भारत भूषण के साथ अपनी नई फ़िल्म श्री चेतन्य महाप्रभु (1953) बनाई और इस फ़िल्म के लिए भारत भूषण को फ़िल्म फ़ेयर का बेहतरीन अभिनेता का पुरस्कार मिला |
      निर्माता सोहराब मोदी की ऐतिहासिक फ़िल्म मिर्ज़ा ग़ालिब (1953) में उन्होंने उन्नीसवीं सदी के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब का टाइटल रोल किया था और उनके विपरीत पत्नि की भूमिका में निगार सुल्ताना और प्रेयसी डोमनी के रूप में सुरैया थीं | इस फ़िल्म ने साल की भारत सरकार का बेहतरीन फ़िल्म का नेशनल फ़िल्म एवार्ड प्राप्त किया था |
साठ के दशक का उदय होते होते भारत भूषण चालीस वर्ष की आयु पार कर चुके थे तथा उनके मनमोहक मुख्पटल से सौन्दर्य और आकर्षण का जादू समाप्त होने लगा था | जग की रीत के अनुसार नए और सुंदर मुखड़ों वाले अन्य नवयुवक अभिनेताओं ने सुनहरे परदे पर जलवे बखेरने आरम्भ कर दिए थे | इसी पृष्ठ भूमि में उनकी 1964 की रंगीन फ़िल्म जहां आरा और दूज का चाँद फ़्लाप हो गईं और उनके लिए सौभाग्य का कोई संदेसा नहीं ला सकीं |1969 में निर्माता नासिर हुसेन की रंगीन फ़िल्म प्यार का मौसम में उन्होंने हीरो शशि कपूर के वृद्ध पिता का रोल किया था परन्तु यह फ़िल्म भी उनकी गिरती हुई व्यवसायिक साख को सहारा देने में सहायक सिद्ध न हुई |
      भारत भूषण ने फ़िल्म बरसात की रात अपनी निजी पूंजी से बनाई थी तथा उसमे अपनी उम्र भर की तमाम कमाई झोंक दी थी लेकिन अंजाम पर विचार किए बिना ही निर्माता की जगह अपने बड़े भाई श्री आर चंद्रा का नाम लिखवा दिया था | साहिर लुधियानवी की लाजवाब शायरी तथा संगीतकार रोशन (पूरा नाम रोशन लाल नागरथ) की सुरीली धुनों और बेमिसाल क़व्वालियों की बदौलत यह एक बेइन्तहा सफ़ल फ़िल्म सिद्ध हुई | इस फ़िल्म की अप्रत्याशित सफ़लता और उससे होने वाली अपार आमदनी के कारण उनके भाई की नियत डांवाडोल हो गई और लाभ में से भारत भूषण का हिस्सा अदा किए बग़ैर ही वह सारी कमाई अकेले हज़म कर गए | फ़िल्म में पैसा तो सारा भारत भूषण का लगा और उनकी जेब ख़ाली हो गई मगर सारी दूध मलाई किसी और के खाते में चली गयी क्योंकि क़ानूनी तौर पर भारत भूषण  उस आमदनी के हक़दार नहीं थे | सारी उम्र की कमाई लगा कर फ़िल्म तो उन्होंने पूरी कराई मगर जब वह सोने की खान सिद्ध हुई तो दूसरे की जायदाद कहलाई | इस मुद्दे पर दोनों भाईयों के आपसी संबंधों में गहरे मतभेद पैदा हो गए | यही ज़बरदस्त आर्थिक धक्का भारत भूषण के पतन का कारण बना | उम्र बढ़ने के साथ साथ उन्हें फ़िल्मों में काम मिलना कम होता गया और वह छोटे मोटे रोल करने पर मजबूर हो गए | अच्छे दिनों में उन्होंने जुआ और शराब जैसे कुछ शाहाना शौक़ पाल रखे थे इस लिए सीमित आमदनी में उनका गुज़ारा मुश्किल होता गया | धीरे धीरे मित्रों के उधार पर काम चलने लगा और वह दोस्तों के देनदार होते चले गए | क़र्ज़े के बोझ से पीछा छुड़ाने के लिए उन्हें अपना बांद्रा वाला आलीशान बंगला नए उभरते अभिनेता और फ़िल्म फ़र्ज़ के हीरो, जितेन्द्र के हाथों बेचना पड़ा | बंगला ख़ाली करने से पहले उन्होंने अपनी निजी लाएब्रेरी की हज़ारों पुस्तकें मुंबई की पब्लिक लायेब्रेरियों को उपहार स्वरूप दान में दे दीं | बाक़ी दो बंगले भी सुपर स्टार राजेश खन्ना और जूबली स्टार राजेन्द्र कुमार ने ख़रीद लिये | वह अपना थोड़ा सा सामान बांधकर बांद्रा में वाटर फ़ील्ड रोड पर एक कमरे के छोटे से फ़्लैट में आकर रहने लगे | बाक़ी ज़िंदगी का बोझ अकेले ढोने के बजाए 1976 में उन्होंने फ़िल्म बरसात की रात की एक सह अभिनेत्री रत्ना (असली नाम रतन माला) से विवाह कर लिया जिस के साथ उनका लम्बे समय से प्रेम प्रसंग चल रहा था | फ़िल्म बरसात की रात में रत्ना ने सह-नायिका श्यामा की छोटी बहन का रोल किया था | परन्तु इस पर भी पत्थर दिल आसमान के ज़ुल्मों में कोई कमी नहीं आई | अपने राजसी लाइफ़स्टाइल के कारण वह इस बार भी दोस्तों के और अधिक देनदार हो गए और क़र्ज़े के बोझ से अपनी गर्दन छुड़ाने के लिए उनके सामने अपना छोटा सा एक कमरे वाला रिहायशी फ़्लैट बेचने के अलावा और कोई चारा बाक़ी नहीं था | अंत में वह मलाड उपनगर में एक छोटा सा कमरा किराये पर लेकर रहने लगे |
      अपनी दो फ़िल्मों चांदी की दीवार और दूज का चांद में उन्होंने काफ़ी बड़ी बड़ी रक़में निवेश कर डाली थीं परन्तु दोनों ही फ़्लाप हो गईं और वह बहुत घाटे में आगए | मदिरा सेवन और जुए की लत के कारण उन्हें कभी आर्थिक ख़ुशहाली देखनी नसीब नहीं हुई और अपने जीवन का अधिकतर भाग उन्होंने भारी क़र्ज़ों के बोझ तले गुज़ारा | नई फ़िल्मों में काम न मिलने के साथ जुए की पुरानी आदत उन्हें ले डूबी | भारत भूषण के मुंबई में बांद्रा तथा अन्य संभ्रांत इलाक़ों में तीन बंगले थे मगर समय की उलट फेर के हाथों तीनों गौरवमयी बंगले एक एक करके बिक गए | बुरे दिनों में उन्हें फ़िल्मों में चरित्र अभिनेता व एक्स्ट्रा की भूमिकाएं भी करनी पड़ीं | अंतिम दिनों में दो वक़्त की रोटी का प्रबंध करने के लिए उन्हें एक फ़िल्म स्टूडियो के चौकीदार की नौकरी भी करनी पड़ी |
      अभिनय के क्षेत्र में वह नव्वे के दशक तक सक्रिय रहे | अपने समकालीन कलाकारों से कठोर व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा और ज़िंदगी की जद्दोजहद में घटी विभिन्न अप्रिय घटनाओं के बावजूद उन्होंने फ़िल्मों में लाजवाब अभिनय के नमूने पेश किये और अपने प्रशंसकों को कभी निराश नहीं किया | उन्होंने कुल 60 फ़िल्मों में नायक का रोल किया था तथा 120 फ़िल्मों में चरित्र रोल किये थे | नायक के रूप में उनकी अंतिम फ़िल्म जहां आरा (1964) थी तथा चरित्र अभिनेता के रूप में देवानंद की फ़िल्म सौ करोड़ (1992) उनकी आखरी फ़िल्म थी |
      भारत भूषण की शाहकार फ़िल्म बैजू बावरा के कुछ सीन बोरिवली नेशनल पार्क के समीप फ़िल्माए गए थे | 10 अक्तूबर 1992 को एक राहगीर ने बोरिवली नेशनल पार्क के पास एक फटेहाल शख्स को एक आटो रिक्शा चालक की ख़ुशामद करते सुना कि उसे निकट के सरकारी अस्पताल तक पहुंचा दे | उस राहगीर ने शकल देखते ही पहचान लिया कि यह परेशान हाल व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि हिंदी सिने जगत का विख्यात अभिनेता भारत भूषण है और श्रद्धा भाव से उन्हें आटो रिक्शा का किराया अर्पण किया मगर वह ऑटो अस्पताल के परिसर में प्रवेश कर पाता इस से पहले ही उनके प्राण पखेरू मिटटी के पिंजरे को छोड़ कर आकाश में उड़ गए |       
     मेरठ के वकीलों और जजों के सम्मानित परिवार में चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने वाला और नाज़ नख़रों में पला शख्स फ़िल्मी दुनिया के मायाजाल में फंस कर कैसी दर्दनाक मौत मरा, यह एक खुला सबक़ है| -जावेद हमीद 

(लेखक सिनेमा के गहरे जानकार हैं नोएडा में निवास। पिक्चर प्लस के लिए नियमित लिखते हैं।)

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