गर्मी में गरम मसाला? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

रविवार, 16 अक्तूबर 2016

गर्मी में गरम मसाला?

बड़ा सवाल, बड़ी बहस  

फिजां की हवेली में किसने चिंगारी सुलगा दी है,

क्यों धरती पर गर्म हवाओं का समंदर उमड़ आया है?

मॉनसून के आने से पहले प्रकृति तो धरती पर कहर ढाती ही है, सिल्वर स्क्रीन भी इन दिनों धधकने लगता है। ग्लैमर की लू चलने लगती है। शोले और बर्फ के कॉकटेल का सुरूर छा जाता है। ज्यादातर कहानियों का रास्ता देह के गलियारे से होकर गुजरने लगता है। आखिर क्यों? साल भर का गुबार इस लू के थपेड़ों से भरे मौसम में आकर क्यों फूटता है? हाल के सालों में सिल्वर स्क्रीन पर कुछ यूं ही नया चलन देखने को मिला है। मई का महीना लगते ही टीवी पर अनेकश: ऐसी-ऐसी फिल्मों के प्रोमो देखने को मिलने लगते हैं, जिनमें अत्यंत हल्के-फुल्के मनोरंजन, सेक्स-कॉमेडी या सी-ग्रेड जैसे मसालों की भरमार होती है। आखिर ये मौसम इन जैसी फिल्मों के लिए क्यों मुफीद होने लगा है? क्या यह इसलिए कि पिछले कुछ सालों में सारे त्योहारों की तारीखों को बड़े स्टार्स ने अपने-अपने नाम बुक कर लिये हैं? अगर यही वजह है तो वाकई छोटे प्रोड्यूसर्स आखिर कब रिलीज करे अपनी-अपनी फिल्में? दूसरा सवाल भी कम अहम नहीं है। एक तरफ साफ-सुथरी या कहें संदेश आधारित पारिवारिक मनोरंजन की कहानी लेकर खड़े किसी नए फिल्मकार को प्रमोटर या फायनेंसर नहीं मिल पाते तो दूसरी तरफ ऐसी सेक्स मसालों से भरपूर फूहड़ कहानी, गैर पेशेवर लोग या सी-ग्रेड सरीखी फिल्मों के लिए पैसे कहां से आ जाते हैं? इनके अर्थशास्त्र का आधार क्या हैइसी से जुड़ा तीसरा सवाल कि क्या फिल्म व्यवसाय के संजीदा लोगों को इसके प्रति गंभीर पहल करते हुए आगे नहीं आना चाहिए ताकि फिल्म निर्माण को ऐसे गैर-पेशेवर लोगों के चंगुल से दूर ही रखा जा सके?


पिक्चर प्लस के प्रवेशांक में  बड़ा सवाल, बड़ी बहस में यही विषय रखा। प्रस्तुत है, सिनेमा से जुड़े कुछ नामचीन हस्तियों की राय। अगर आप भी इस विषय पर अपनी कोई टिप्पणी या राय भेजना चाहते हैं, तो उसका स्वागत है। हम उसे सेल्फी प्लस स्तंभ में प्रकाशित करेंगे।   
                
ऐसी फिल्मों से डरने की जरूरत नहीं है
 -अजय ब्रह्मात्मज / वरिष्ठ फिल्म समीक्षक


पिछले कुछ सालों से ऐसा देखने को मिल रहा है। खासतौर पर आईपीएल के आने के बाद से ऐसा होने लगा है। इस मौसम में आईपीएल, टी-ट्वंटी या बड़े क्रिकेट मैच होते रहते हैं, उस वजह से बड़ी फिल्मों की रिलीज खिसक जाती है। वहीं दूसरी तरफ ये वक्त परीक्षाओं का भी रहता है। कुछेक राज्यों में इस वक्त बच्चों के पेपर भी हो रहे होते हैं, तो इसे देखते हुए भी बड़ी फिल्में रिलीज नहीं होतीं।  बड़ी फिल्मों की रिलीज खिसक जाने से जिसे हम बी-ग्रेड, सी-ग्रेड या इंडिपेंडेंट सिनेमा कहते हैं उन्हें रिलीज का शुक्रवार मिल जाता है। हालांकि यह कोई पैटर्न नहीं है। कई बार इस बीच भी बड़ी फिल्में आ जाती हैं। लेकिन अमूमन ऐसा अब बन गया है, ऐसा कह सकते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि जो हमारे बड़े स्टार्स हैं उनकी फिल्मों के रिलीज के लिए बड़े त्योहार और बड़ी छुट्टियां रिजर्व कर दी जाती हैं। आप को बता दूं कि दो हजार अट्ठारह की होली में कौन आएगा, दीवाली पर कौन आएगा, ईद पर कौन आएगा, इंडिपेंडेंट्स डे पर कौन आएगा, इसके लिए अभी से लोग ताक में लगे हैं। असल में ज्यादातर बड़े स्टार्स यही चाहते हैं कि उनकी रिलीज को लंबा वीकेंड मिल जाए जिसके लिए वो बड़ी छुट्टियों की ताक में रहते हैं। ऐसे में उस वक्त तो कम बजट की फिल्में नहीं आ सकतीं ना, तो यही सीजन उनके लिए उचित समझा जाता है।
जहां तक हल्की फिल्मों के बिजनेस और थीम की बात है तो मैं यही कहना चाहूंगा कि हमें अपनी सोच और धारणा बदलने की भी जरूरत है। फिल्में चैरिटी शो नहीं होतीं, फिल्में समाज उद्धार के लिए नहीं बनाई जातीं, फिल्म बनाना शुद्ध बिजनेस है। और बिजनेस में जिसको जहां फायदा दिखता है, वहां वैसा काम करता है। ये कहना कि सार्थक फिल्में क्यों नहीं बनतीं, कंटेंट वाली फिल्में क्यों नहीं बनती, ये सवाल आर्थिक उदारीकरण के बाद अब खत्म हो गए हैं। इस संबंध में फिल्म से जुड़ी सरकारी संस्थाओं मसलन एनएफडीसी या राज्य सरकारों की भूमिका बड़ी हो सकती है लेकिन इनकी उदासीनता जगजाहिर है, वहां से कोई पहल नहीं होती। ऐसे में जो युवा लेखक या निर्माता अच्छी फिल्में बनाना चाहते हैं उनको सपोर्ट करने वाला कोई नहीं मिलता, उनके सपनों को निवेश नहीं मिलते। लिहाजा ज्यादा धन लेकर जो लोग इस काम में आते हैं वो और ज्यादा धन कमाने की अपेक्षा रखते हैं तो उनके सामने ऐसे ही विषय होते हैं, जिसे हम चालू कहते हैं।
इस बीच इंडस्ट्री में संजीदा लोग अपना रास्ता निकाल लेते हैं। अब जैसे मनीश मुंदड़ा जैसे निर्माता आ गए हैं, जिन्होंने कई अच्छी फिल्में बनाई हैं। फैंटम कंपनी द्वारा अच्छी फिल्मों को बढ़ावा मिल रहा है। कई बार अच्छी फिल्मों को अगर बड़े नाम सपोर्ट कर देते हैं तो कई कॉरपोरेट हाउसेस भी आगे आ जाते हैं। तो सारा गेम इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी फिल्म कैसी है, आपकी नेटवर्किंग कैसी है। अगर आप रिलीज से पहले अपनी इन फिल्मों के मैसेज को वहां तक पहुंचा देते हैं जहां रिलीज के बाद पहुंचाना चाहते हैं तो ऐसी फिल्में रिलीज के बाद वाकई अच्छी चल जाती हैं। हाल के सालों में ऐसा खूब देखा गया है। वहां नुकसान भी कम होता है।
मुझे लगता है सी-ग्रेड फिल्मों की संख्या अब कम हो गई है। सी-ग्रेड पहले काफी बना करती थीं। इन फिल्मों में सेक्स या जिन दृश्यों को दिखाया जाता था, अब वह इंटरनेट के जरिए सब जगह उपलब्ध है। लिहाजा इन फिल्मों का मार्केट कम हो गया है। हां, इसी बीच कुछ लचर किस्म की फिल्में जरूर आ जाती हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। असल में ऐसी फिल्में बनाने वाले जल्दबाजी में थोड़ी बहुत कमाई कर लेना चाहते हैं। यानी तात्कालिक कमाई के लिए ऐसी फूहड़, सेक्स कॉमेडी वाली फिल्में रिलीज होती हैं। लेकिन इससे डरने या घबराने की जरूरत नहीं है। यह हर दौर में होता था। ऐसा आजादी के समय और सिनेमा के स्वर्ण युग में भी होता था। लेकिन कहते हैं कि वक्त एक ऐसी छलनी है जिससे हर कोई छनता है। बुरी चीज़ें हमेशा दब जाती हैं, अच्छी चीजें हमेशा छन कर आगे निकल जाती हैं। कई साल पहले की अच्छी फिल्मों की जब हम बात करते हैं तो उस एक साल के भीतर तीन या चार बड़ी फिल्मों की ही चर्चा करके रह जाते हैं। तो क्या उस साल केवल तीन या चार ही फिल्में बनीं? नहीं। सैकड़ों फिल्में बनीं। लेकिन हमने उनको याद रखा जो अच्छी थीं। इसी तरह साल दो हजार सोलह की कुछ ही अच्छी फिल्मों को लोग सालों बाद याद रखेंगे।
इस बीच डिजीटल फॉर्म से नई उम्मीद बनी है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें लागत कम होती है, इसलिए लोग इसमें प्रयोग ज्यादा कर रहे हैं। उसमें सीरीज भी आ रही हैं, शॉर्ट फिल्में आ रही हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि अब आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं, आप कहीं भी रहकर डिजीटल फिल्में बना सकते हैं। वहीं से ऑनलाइन पोस्ट कर सकते हैं। अगर अच्छी लगेंगी तो लोग देखेंगे, अच्छी नहीं लगेंगी तो लोग नहीं देखेंगे। इससे क्रिएटिव लोगों को मौका मिल रहा है। मैं तो हमेशा कहता हूं कि डिजीटल फॉर्म आने से सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि अब नए युवा निर्माताओं को मुंबई आने की जरूरत नहीं रही। देश में कहीं भी अगर दस उत्साही युवा मिल जाएं तो फिल्म बना सकते हैं।  

ऐसी फिल्में गैर-पेशेवर लोग बनाते हैं
-पीयूष सिंह
(फिल्म प्रोड्यूसर एवं फाउंडर-सीओओ,मूवीज.कॉम)


साल के बावन हफ्तों में आमतौर पर त्योहारों के समय मसलन ईद, होली, दीवाली, दशहरा पर ज्यादातर बड़े स्टारकास्ट की फिल्में रिलीज होती हैं। बड़े निर्माता घराने पहले से ही इन अवसरों के लिए सिनेमा हॉल को बुक करा लेते हैं। लिहाजा कम बजट वाले, मध्यम या छोटे निर्माता ऐसे मौकों पर अपनी फिल्म रिलीज करने से कतराते हैं। सामान्य दिनों में भी इन निर्माताओं को ऐसे शुक्रवार की ही तलाश रहती है, जब किसी बड़े स्टारकास्ट की फिल्म रिलीज ना हो रही है। एक तो यह कारण है। दूसरा बड़ा कारण यह भी है कि जिस सीजन को लेकर सवाल है उस दौरान आमतौर पर बड़े निर्माता घराने की बड़े स्टारकास्ट की फिल्में कम ही रिलीज होती हैं। लिहाजा छोटे निर्माता इस मौके का फायदा उठाते हैं। क्योंकि ये वक्त स्कूल, कॉलेज में छुट्टियों का होता है। पिछले कुछ सालों में यह सीजन अब आईपीएल का भी दौर होने लगा है। कोई निर्माता इस दौरान बड़े बजट की फिल्म रिलीज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहते क्योंकि सिनेमा के ज्यादातर दर्शक क्रिकेट देखने में मशगूल रहते हैं। गंभीर फिल्में भी इसी कारण इस दौरान कम ही रिलीज होती हैं। ऐसे में ले-देकर कम बजट वाली हल्के-फुल्के मनोरंजन की फिल्में रिलीज होती हैं, जो छुट्टियां मना रहे युवा वर्ग को आकर्षित करने के लिए होती हैं।
एक अहम सवाल सी-ग्रेड की फिल्म को लेकर भी है। संभव है इस दौरान ऐसी फिल्में भी ज्यादा रिलीज होती होंगी लेकिन मैं इसे निहायत ही गैर-पेशेवर सिनेमा मानता हूं। ये फिल्में किसी भी जरूरत को पूरा नहीं करती हैं। सिनेमा में अपना एक कथानक होता है, सुनने लायक गीत-संगीत होता है, कैमरा वर्क होता है, कुशल निर्देशन होता है, जिन्हें गंभीर फिल्म निर्माता रचनात्मक और पूरे समाज के मनोरंजन को ध्यान रखकर बनाते हैं लेकिन सी-ग्रेड के फिल्मकार सिनेमा फील्ड के पेशेवर नहीं होते हैं। उन्हें इनका ज्ञान नहीं होता है। ये बिल्डर और माफिया से लेकर सामान्य व्यापारी वर्ग या कुछ और फील्ड के काम करने वाले लोग होते हैं जिनका सिनेमा से कोई लेना-देना नहीं होता, इनका इरादा बस तात्कालिक लाभ कमाना होता है। इस काम में लगे कुछ लोग हमेशा नए-नए मुर्गे भी पकड़ के लाते रहते हैं और सी-ग्रेड की फिल्मों का निर्माण करते हैं। यही इनका अर्थशास्त्र है। ये तड़पती जवानी, भटकती आत्मा टाइप शीर्षक से जो फिल्में बनाते हैं, वह वास्तव में सिनेमा का मजाक है। इन फिल्मों के प्रदर्शन के लिए जगहें यानी सिनेमा हॉल भी फिक्स्ड हैं और इनके दर्शक भी वही के वही सारे होते हैं।
फिल्म बिरादरी ऐसी फिल्मों का विरोध करती रही है और अब भी करती है। दिक्कत बॉलीवुड के गैर-संगठित क्षेत्र होने से है। सरकार ने इसे इंडस्ट्री का स्टेटस तो दे दिया लेकिन अब भी बहुत कुछ बिखराव का शिकार है। इसीलिए ऐसा हो रहा है। हालांकि बहुत कुछ पहले से बदला है। डिजिटल माध्यम के आने के बाद तमाम फिल्मकारों के हौसले बुलंद हुए हैं। जो लोग बड़े बजट की फिल्म बनाने में असमर्थ थे, वे इस माध्यम को अपना रहे हैं। सार्थक सोच और दिशा देने वाली फिल्मों का बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहा है। सी-ग्रेड या हल्के-फुल्के मनोरंजन की निरुद्देश्य फिल्में हमारी इंडस्ट्री को कभी प्रभावित नहीं कर सकती। इसे केवल सीजनल ही समझना चाहिए।
सरकारों ने साज़िश की, अच्छी फ़िल्में न बनें!
-सलिल सुधाकर, अभिनेता / लेखक

अक्सर ये सवाल उठाये जाते रहे हैं कि फिल्मों का सामाजिक सरोकार क्यों नहीं सामने आता या बेहतर सोच वाली अच्छी फिल्मों को प्रोत्साहन क्यों नहीं मिलता?..आदि..आदि पर दिक्क़त ये है कि फिल्म उद्योग की आर्थिक चुनौतियों की बारीकियों को समझे बगैर मीडिया में लॉन्ग शॉट में बैठे कथित बुद्धिजीवी जो कयास और टिप्पणियां दाग रहे होते हैं, उनका यहां के वास्तविक धरातल पर कोई मायने नहीं होता।
    बात बहुत सरल लेकिन बेहद जोखिम से भरी है। सिनेमा सिर्फ और सिर्फ ढेर सारे पैसों से बनता है और इसका सीधा रिश्ता जनजीवन और मनोरंजन से है। निर्माता जब तक समझ नहीं लेता कि अमुक विषय भीड़ खींच सकता, वह पैसे नहीं लगता। कारण कि यह पैसा उसका निजी होता है न कि सरकारी या किसी खैरात का। फिल्म डूबेगी, निर्माता आत्महत्या कर लेगा और मीडिया में बैठे लोग इसे बॉलीवुड का स्याह अंधेरा लिख कर टी.आर.पी. की मलाई खाते रहेंगे।
     कोई निर्माता अच्छी सार्थक फ़िल्में बनाने का जोखिम तभी उठा सकता है, जब सिनेमा निर्माण की लागत कम से कम हो। पर विडम्बना यही है कि पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में सरकारों ने सिर्फ सिनेमा उद्योग से टैक्स का दोहन किया, लेकिन फिल्म निर्माण की लागत को इतना दुरूह बना दिया कि अब सिनेमा बनाना किसी अकेले आदमी के बस का नहीं रहा। नतीजा आज कॉरपोरेट कम्पनियां फ़िल्में बना रही हैं, जिनमें कई-कई लोगों का पैसा लगा हुआ होता है। इन कंपनियों को तो फिल्म के फ्लॉप होने पर आशंकित घाटे का इतना भय रहता है कि वह कोई भी प्रयोगधर्मी रिस्क लेने को तैयार ही नहीं होते! उन्हें बड़ा से बड़ा सितारा चाहिए, विशाल ताम-झाम चाहिए, एक साथ सैकड़ों थियेटर में रिलीज़ चाहिए, भरपूर चकाचौंध और ग्लैमर चाहिए, न्यूज़ चैनलों पर 200 करोड़ और 300 करोड़ के बिज़नेस वाली फिल्म का टैग चाहिए, तो फिर इन फिल्मों से किस जनसरोकार की अपेक्षा की जा सकती है?
    ये सरकारों की टैक्स नीति का ही खामियाजा है कि अब बिना सितारों वाली फिल्मों को न तो वितरक लेता है न ही प्रदर्शक, क्योंकि इनके जरिये वह सरकार द्वारा तय न तो कर दे पायेगा और न ही अपनी लागत निकाल पायेगा। इसलिए छोटे बजट की परन्तु अर्थपूर्ण फ़िल्में बनाने का सिलसिला लगभग मृतप्राय ही हो गया। इसके बावजूद यदि किसी ने इस तरह के निर्माण का जोखिम उठा लिया तो लंबे अरसे तक उसकी फिल्म ना तो बिकती है ना ही सिनेमा घर का मुंह देखती है। यही कारण है कि समानांतर फिल्मों के कई महत्वपूर्ण निर्माता-निर्देशक इन वर्षों में या तो घर बैठ कर मुफलिसी झेल रहे या फिर किसी और तरीके से अपनी रोज़ी-रोटी चला रहे हैं।
     रही बात सी ग्रेड फिल्मों की, तो आलोचना की दृष्टि से भले आप उसे कुछ भी कह लें, पर बनाना उसे भी आसान नहीं। अब जो लोग फ़िल्में बनाने में रुचि तो रखते हैं, पर उनके पास ना तो पर्याप्त संसाधन है ना ही कोई सुलझी हुई दृष्टि, तो वे अपनी सीमित शक्ति और कल्पना के कारण हलकी-फुलकी, सेक्सी फिल्मों को ही व्यवसाय की गारंटी मान लेते हैं। ऐसी फिल्मों का भी एक कुंठित दर्शक वर्ग तो बैठा ही है इंतज़ार में? जब बुद्धिजीवी लोग पॉर्न को व्यक्तिगत पसंद कह कर देश भर में बंद न करने की मुहिम छेड़ सकते हैं, सनी लियोनी को ज़बरन फिल्म उद्योग के माथे बतौर अभिनेत्री थोपने की सुनियोजित चेष्टाओं का स्वागत कर सकते हैं, तो फिर तो इस देश में अच्छी–बुरी फिल्मों की सारी बहस ही बेमानी है।


सिनेमा का यह रंग भी चलता है
                         -आनंद मिश्रा (नाट्य निर्देशक, अभिनेता, मुंबई)

फिल्म उद्योग में बढ़ते बजट तथा मल्टीप्लैक्स  की टिकट दर ने दर्शकों का विभाजन कर दिया है। सिंगल स्क्रीन में सस्ता मनोरंज परोसने वाले बढ़े हैं महानगरों से लेकर कस्बों तक, बस्तियों में बेहद लोकप्रिय छोटे छोटे केंद्र हैं। जहां मज़दूर वर्ग कम कीमतों पर मनोरंजन करता है। कामुक दृश्यों से भरी , कहानीहीन  फि़ल्मों का निर्माण उन्हीं स्थलों को बिजनेस का केंन्द्र मानकर किया जाता है।
आज फ़िल्म बनाने के उपरांत, प्रचार प्रसार  बहुत महंगा  है। कम लागत की इन फ़िल्मों को सिंगल स्क्रीन आसानी से मिल जाते हैं। सबसे अहम, शहरों में रहने वाले बच्चों की परीक्षाओं के पश्चात गांव जाते हैं वहां के सिनेमाघरों में इन्हीं दिनों सबसे अधिक दर्शकों को देखा जाता है।
इन फिल्मों में ज़्यादातर नये कलाकारों को ही देखा गया है। न्यूनतम वेतन में अभिनेता अभिनेत्रियों को लेकर इन फिल्मों का निर्माण हो जाता है।  इन फ़िल्मों में फाइनेंस करने वाले ज़्यादातर मुंबई से बाहर के लोग होते हैं। जिन्हें फ़िल्मों के व्यवसाय का ज्ञान नहीं होता है।
एक सार्थक सिनेमा बनाने की जद्दोजहद में तमाम उम्र लेखक, निर्देशक को भटकते देखा गया है। प्रत्येक  निर्माता के पास अपनी एक कहानी होती है। मुंबई में अमीर घरों के नौजवान लड़के हीरो बनने आते हैं। कम लागत में इस तरह की फिल्मों के निर्माण का प्रपोजल उन्हें दिया जाता है। अधिक आय की लालसा तथा हीरो बनने की चाहत भी इन फिल्मों के निर्माण का एक कारण है। गरमी के मौसम में सिनेमा का यह रंग भी चल जाता है।   

ये फिल्में भी कइयों के लिए
दो वक्त की रोटी है
अतुल गंगवार, स्क्रीन राइटर, मुंबई  

भारत में सिनेमा को आए 100 साल से अधिक हो गया है। पहले दिन से ही सिनेमा का गणित पैसा कमाना था और आज भी है। विषय, कहानी, कलाकार सबका चयन सिर्फ लाभ कमाने के लिए किया जाता है। सिनेमा की मायावी दुनिया के अपने भगवान हैं जिसे गढ़ने वाले भी सिनेमा के शातिर व्यवसायी हैं। ये एक ऐसा बाज़ार है जो सिर्फ उनकी शर्तों पर चलता है। सिनेमा की सफलता का फार्मूला ये तय करते हैं और यही तय करते हैं किसी भी फिल्म का बाज़ार। इनके लिए पैसा भगवान है। हालांकि अपवादस्वरूप ऐसे भी लोग हुए हैं जिन्होंने सिनेमा को सार्थक बनाने की कोशिश की लेकिन कुछेक अवार्ड्स को छोड़ दें तो उनके हिस्से में व्यावसायिक सफलता नही आई। वो कला सिनेमा के नाम पर सरकारी तंत्र के रहमो-करम पर गुजर-बसर करते रहे। सिनेमा के अर्थशास्त्र से उनका बैर सदैव बना रहा।
विरोध करना आज किसी के भी लिए बहुत समान्य बात है लेकिन किसी विषय पर चर्चा करना बहुत मुश्किल। भारत में हल्के स्तर की फिल्में हमेशा से बनती रही हैं और समाज का एक खास वर्ग उनका बाज़ार भी है। हिंदी सिनेमा बहुत तेजी से डेवलप हो रहा है। इसका भी देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान है। समाज के हर वर्ग, तबके के लोगों को ये सालों से अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जिनका सपना फिल्मों से जुड़ना है। कुछ लोगों के सपने पूरे होते हैं कुछ लोग अधूरे सपनों के साथ इस दुनिया से इस आस के साथ चले जाते हैं कि शायद अगले जन्म में वो अपनी ख्वाहिश पूरी कर सकें।
सिनेमा को शुरुआत से ही A B C ग्रेड में बांटा गया है। एक दौर था सामाजिक फिल्में, समाज में क्योंकि अधिक स्वीकार्य होती थी, लिहाजा A ग्रेड की मानी जाती थी, उस दौर में बनने वाली स्टंट फिल्में B ग्रेड की मानी जाती थी। भक्ति फिल्मों का भी अपना एक दर्शक वर्ग था। बजट, सितारों के स्तर से फिल्मों का स्तर तय होता था। सिनेमा उद्योग अपनी बनाई लीक पर चल रहा था। वक्त के साथ फिल्मों की कहानियों में बदलाव आया, फिल्मों का दायरा बढ़ा और एक विशेष वर्ग के लिए कुछ ऐसी फिल्में बनाई जाने लगीं...जिसमें नायिका का जिस्म दिखाया जा सके। सबसे पहले तो हॉरर फिल्मों की आड़ में नग्नता परोसी जाने लगी। ऐसी फिल्मों को भी दर्शक मिलने लगे तो निर्माताओं ने फिल्मों का एक और ग्रेड तैय्यार किया जिसे C ग्रेड का सिनेमा कहा गया। ये सिनेमा सीधी सपाट भाषा में मोहब्बत के नाम पर नग्नता परोसने लगा। एक बड़ा दर्शक वर्ग इन फिल्मों को भी मिलने लगा। कम लागत में अधिक मुनाफा इन फिल्मों की विशेषता थी। जब इन लोगों को मेन स्ट्रीम सिनेमा जैसी मान्यता नहीं मिली तो इन्होंने नग्नता को लेकर एक बहस छेड़ दी। मुख्यधारा के फिल्ममेकर्स पर उंगलियां उठायी जाने लगीं, इन निर्माताओं का कहना था कि अगर बड़ा निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्मों में नग्नता परोसे तो उसे कलात्मकता कहते हैं और अगर वो लोग ऐसा करें तो अश्लीलता। खैर, इस बहस के बावजूद C ग्रेड का सिनेमा बनता रहा और अपनी लागत से कहीं अधिक पैसे कमाकर अपने निर्माताओं की जेबें भरता रहा।
आज के परिवेश में हमें इस तरह के सिनेमा पर बहस करते हुए ये अवश्य सोचना होगा कि किस हक से हम इन फिल्म निर्माताओं पर उंगली उठा सकते हैं। आज भी अगर भट्ट कैम्प की फिल्म सेक्स की चाशनी में डूबी हुई रिलीज़ होती है तो वो A ग्रेड की मानी जाती है और छोटे सितारों के साथ बनी एक छोटी फिल्म उसी तरह की कहानी के साथ अश्लील हो जाती है!
सिनेमा एक व्यवसाय है। इसमें पैसा लगाकर सिर्फ कमाने के बारे में सोचा जाता है। अब जब कोई व्यवसायी इसमें पैसा लगाता है तो अपनी जेब और उससे होने वाला मुनाफा देखता है। उसे छोटे बजट की फिल्में बनाकर कम समय में ज़्यादा लाभ कमाना ठीक लगता है। उसके पास 100 करोड़ रुपये नहीं होते फिल्म बनाने के लिए। उसे 100 करोड़ के क्लब में भी शामिल नहीं होना है। वो 40-50 लाख रुपये लगाकर 70-75 लाख की रिकवरी करना चाहता है। उसे अपने दर्शकों की रुचि मालूम है। उसका गणित कभी फेल नहीं होता। सच कहा जाये तो C ग्रेड की मूवी बहुत सारे लोगों के लिए दो वक्त की रोटी है। हम इसका विरोध तो कर सकते हैं कि इन फिल्मों की आड़ में जो गलत काम हो रहे हैं उन पर रोक लगें, लेकिन इनको बंद कर देना फिल्म इंडस्ट्री औऱ सरकार के हक में नही होगा।
(पिक्चर प्लस जून 2016 से साभार)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad