संजना की सगाई - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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बुधवार, 26 अक्तूबर 2016

संजना की सगाई

एक कहानी 

                                                                                                           -संजीव श्रीवास्तव
(स्केच गूगल इमेज से साभार)
गाई के दो दिन बाद ही संजना ने घर में हंगामा खड़ा कर दिया-यह तुम लोगों ने कैसा रिश्ता तय कर लिया। लगता है, तुम लोगों को मेरी जिंदगी की जरा भी परवाह नहीं है। जब संजना चीखती तो घर के सारे लोग नि:शब्द हो जाते। टीवी बंद कर दिया जाता। घर के बाकी सदस्य दूसरे कमरे में चले जाते। सिर्फ सीलिंग फैन अपनी जगह नाचता और घिन्न्-घिन्न् की आवाजें करता रहता। वह कमरे में अकेली हो जाती। मम्मी किचन में। छोटी बहन स्टडी रूम में। सिर्फ छोटा भाई कभी-कभी दरवाजे से कमरे के अंदर झांक लेता याकि किताबें, अखबार लेने के बहाने कमरे के अंदर चला जाता। फिर तुरंत ही वह भी बाहर निकल आता। संजना अकेली होकर अपने आप ही चुप हो जाती। दीवारों पर उसे गुस्सा करना पसंद नहीं था। अगले ही पल मौका देखकर मम्मी के पास मायूसी ओढकर बैठ जाती और बहुत ही धीरे से कहती-तुम लोगों ने मुझे लड़के के बारे में सब कुछ बताया क्यों नहीं”?
    मम्मी चुप। चेहरे पर केवल खीज आकर रह जाती। धीरे-धीरे बड़बड़ाती-पापा देखने और बातें करने गए थे, उन्हीं से पूछो। और अपने काम में लग जातीं। फिर थोड़ी देर बाद कहतीं-लेकिन अब इस तरह हल्ला मचाने से क्या हो सकता है! वैसे भी लड़का तो ठीक-ठाक ही है। लेकिन संजना को यह जवाब प्रभावित नहीं कर पाया। वह सोचती-लगता है, मम्मी भी पापा की ही बातों में आ गई। जबकि मम्मी तो अक्सर उसके विचारों के साथ रही हैं। लगता है, सभी मिलकर जल्दी से मुझसे मुक्त होने चाहते हैं
    दिनेश बाबू करीब छै, साढ़े छै बजे घर आ गए। संजना अपनी चुप्पी पर गुस्सा काढ़े बैठी थी। मन में ख्वाहिशों के हरे पेड़ धराशाई हो रहे थे। टूटन की आवाजें आंखों से आंसू बनकर पिघल रही थीं। दिनेश बाबू उसे देखकर सीधे अपनी पत्नी सविता के पास चले गए। पूछा -‘’आज क्या हुआ इसको?’’
‘’कहती है, लड़के के बारे में उसे ठीक से कुछ नहीं मालूम।‘’
उस दिन शाम को पार्क में दो घंटे तक क्या करती रही ? ऐंsss? कल होकर फिल्म देखने गई। रात दस बजे घर आई। इतने में भी समझ में नहीं आया“? दिनेश बाबू जोर से बोलने लगे थे। और गुस्से में पसीने से पटी कमीज को निकालकर एक कोने में फेंक दिया। दूसरी तरफ बैठी संजना को सबकुछ सुनाई दे रहा था। लेकिन वह इस बहस से बेपरवाह थी। और पूरी तल्लीनता के साथ पाजेब को उंगली मार-मार बजाए जा रही थी छन-छनsss’
कहती है-“लड़का बहुत पतला-दुबला और दिखने में बच्चों जैसा लगता है”-सविता ने कहा था।
दिनेश बाबू यह सुनकर सहमे, अपनी जगह से उठे फिर थोड़ा खिसककर बैठ गए। मानो किसी ने तीर चला दिया हो। बोले-यह तो कोई बड़ी बात नही है। पतला-दुबला तो मैं भी था। बस, स्वरूप अच्छा होना चाहिए। हिम्मतवाला और समझदार होना चाहिए। लेकिन इसके बाद दिनेश बाबू इत्मीनान से सो नहीं सके। इस लड़की ने नाक में दम कर दिया है। वह सोचते रहे-इसे कोई लड़का पसंद क्यों नहीं आता? अपने को पता नहीं क्या समझती है? खुद भी तो कोई रानी रूपमती तो नहीं है। क्या इसे इस बात का मलाल नहीं है कि एक लड़के ने इसे देखकर छांट दिया था-यह कहकर कि लड़की का चेहरा नजदीक से देखने में थोड़ा टेढ़ा लगता है। तलहथी की नसें दिखाई देती हैं गाल पिचके हुए हैं। उंगलियां सूखी हुई हैं। हाइट चार फुट दस इंच है। उम्र करीब तीस साल होने को आई। मुहल्लेवाले और रिश्तेदार अजीब-अजीब सी बातें करते रहते हैं
    लेकिन संजना की जिद को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं था। दिनेश बाबू के ऑफिस चले जाने के बाद वह दिन भर ममी को विश्वास में लेने में लगी रहती। वह कहती-लड़का दिल्ली में पता नहीं कैसे रहता होगा, किसके साथ घूमता होगा, कितना कमाता होगा, कभी उससे किसी ने यह सब पूछा? वह मम्मी से ऐसे अनेक सवाल करती।
     ममी चुपचाप सुनती रहती। उसे कभी लगता कि वह ठीक कह रही है और कभी लगता बस यूं ही बकवास कर रही है। भला ऐसे सवाल भी कोई लड़का से करता है! संजना फिर कहती-अभी मुझे दो साल शादी करने की इच्छा नहीं है। पीएच.डी. करने के बाद। कभी फिर कहती-मुझे पटना छोड़कर बाहर जाने की इच्छा नहीं है। और कभी कहती-मैं यहां स्कूल खोलना चाहती हूं। मैं उसकी प्रिंसीपल बनूंगी और जोर से कहकर उठ जाती-मम्मी यह सगाई तोड़ दोsss। मम्मी उसे पीछे से अवाक् देखती रह जाती। उन्हें बड़ा असहज लगता कि तीस साल की एक लड़की अपनी शादी ना होने देने के लिए कैसी-कैसी बातों का बहाना कर रही हैं।
दिनेश बाबू संजना से बेहद परेशान होने लगे। पत्नी सविता भी कम दुखी नहीं थीं। बड़ी की शादी हो तो अगले साल छोटी के बारे में सोचा जाए। 
    छोटी लड़की लवली को वैसे इन सब बातों से ज्यादा मतलब नहीं था। वह अपने कैरियर और सर्किल के दोस्तों के बीच ज्यादा संलग्न रहती थी। ऐसे मामले में वह अपने विचार कम ही प्रकट किया करती थी। उसका सिर्फ इतना ही कहना था-क्या पटना में कोई अच्छा लड़का नहीं मिल सकता”? लेकिन दिनेश बाबू कुछ महत्वाकांक्षी थे। वह चाहते थे-बड़े शहर में रहने वाले किसी नामधन्य किस्म के लड़के से उनकी बेटी की शादी हो। परिवार का एकमात्र मुखिया होने का उन्हें दंभ भी था। लेकिन उन्हें दिल खोलकर बातें करना नहीं आता था। ज्यादातर समय उन्हें जोशीले अंदाज में गप्पें हांकते की आदम थी। जब मूड मेम रहते तो शहंशाह से कम नहीं होते। किसी भी फैसले का निर्णय तुरत झट से लेते थे। घर में पत्नी और बच्चों से सलाह लेने की उनकी परवाह जरा कम थी। परंतु अक्सर होता वही था, जो पत्नी और बच्चे चाहते थे। वह ज्यादातर काम जितने शौक से शुरू करते थे, उतने ही दुखी होकर उसे खत्म कर देते थे। यही उनके इरादों की फितरत थी। जब वह लड़का देखने दिल्ली गए थे, घर में किसी को बताया तक नहीं। जब लड़के की मां ने संजना को मौर्यलोक परिसर में देखा, तब भी वह अन्यमनस्क-सी थी, जैसे उसे कुछ मालूम ही ना हो। वह ढंग के कपड़े भी नहीं पहन सकी थी। बालों को ठीक से संवारा तक नहीं था। मेकअप की तो बात छोड़ दें। उस रात भी संजना घर लौटकर काफी चीखी थी-मुझे बताया क्यों नहीं, मैं जरा ढंग से तैयार तो हो लेती। परिणामस्वरुप उसने रात का खाना भी नहीं खाया। लोगों ने काफी समझाया, परंतु वह नहीं मानी।
   बहुत जिद्दी स्वभाव की लड़की थी संजना। जल्दी से किसी की बातों में नहीं आती थी। खासकर पापा की बातों पर उसे भरोसा कम ही रहा करता था। पसोपेश में वह मम्मी का सहारा लेती थी। लेकिन यह क्या, इस शादी के मुद्दे पर तो ममी भी पापा का ही साथ दे रही थी। यहां तक कि लवली भी जैसे सब कुछ जान-समझकर चुपचाप रह गई थी। लिहाजा संजना में इ दिनों बहुत खीज बढ़ गई थी। वह खुद से अनेक सवाल करती। आखिर उसके साथ इस तरह साजिश क्यों की गई? उस पर रहस्य का पर्दा क्यों डाला गया? जब लड़के की मां ने उसे देखा था और जब सगाई की तारीख तय हुई, उसे साफ-साफ क्यों नहीं बताया गया? उसका स्कूल ग्रुप सत्रह जून को वैष्णों देवी से आया और उसे मालूम हुआ-बीस जून को उसकी सगाई तय हुई है। उसने घर में काफी शोर मचाया कि वह पहले लड़के को देखना चाहती है। परंतु दिनेश बाबू ने डांटकर चुप करा दिया कि लड़के ने तो परिवार के लोगों की बात मानकर तुम्हें देखने का इरादा छोड़ दिया। उल्टा तुम ही उसे देखना चाहती हो?”
संजना को इस बात का भी गुस्सा था कि उसके बारे में पापा ने लड़के को कई बातें गलत क्यों बताई? सगाई के बाद जब लड़के से मिली, तो वह उन सारी बातें पूछ रहा था। और पापा की बातें झूठ साबित हो रही थीं। ऐसे में संजना शर्मिदा हो रही थी। लग रहा था- धीरे-धीरे उसके बदन से कोई कपड़े खींच रहा है और वह भींग रही है। सबकुछ साफ-साफ नहीं बताने के चलते ही संजना सगाई के दिन जिद्द ठानकर बैठ गई थी कि वह नहीं जाएगी। जहर खा लेगी, मर जाएगी, लेकिन नहीं जाएगी। परंतु परिवार के लोगों ने जब काफी समझाया-तब वह रोते-रोते तैयार हुई। शायद इसीलिए समारोह के दौरान वह सबके ध्यान का केंद्र बनी रही कि संजना आखिर इतना रो क्यों रही है! रोते-रोते उसकी आंखों के काजल धुलकर गालों पर फिसलने लगे थे, जो कि होठों के जुड़ाव पर जाकर फैल गए थे। वह उस समय थोड़ी संभली, जब लड़के ने पलकें उठाकर उसकी हालत को देखा था तो उसका सिसकना थोड़ी देर के लिए बंद हुआ था।
लेकिन घर आकर फिर चालू-मेरी जिंदगी को तुमलोग कूड़े के ढेर में डालने जा रहे हो। मैं यह शादी नहीं करूंगी। घर के सारे लोग अचंभित! क्या कमी है लड़के में”? यह सब उसने एक–एककर मम्मी को बताना शुरू किया। सबसे पहले तो उसने यह बताया कि लड़का बड़ा ही क्यूट किस्म का है। मम्मी ने कहा- यह तो कोई बीमारी नहीं होती।   
संजना ने जोर से पैर जमीन पर पटका और कहा-लेकिन इतना भी क्यूट नहीं होना चाहिए। वह फास्ट नहीं है
तुम भी तो ज्यादा फास्ट नहीं हो। सविता ने तपाक से जवाब दिया।
मम्मी, तुम मेरी बातें समझने की कोशिश क्यों नहीं करती ?” संजना खीजकर कमरे के अंदर।
   फिलहाल संजना की एक ही हमराज है,वह है- उससे सिर्फ तीन साल बड़ी उसकी छोटी मौसी, आशियाना नगरवाली। मौसी से किसी भी तरह की बात करने में उसे कोई संकोच नहीं होता था। जब वह लड़के से मिलकर आई थी तो उसने मौसी को सारी बातें घर आते समय कार में ही बता दी थीं। मौसी ने कहा भी-तू अच्छे नसीबों वाली है, तुझे इतना सीधा-सादा लड़का मिला है
परंतु कितना दुबला है, हाइट भी एवरेज है। इतनी देर तक पार्क में रहा, सिर्फ मेरी पतली उंगलियों को ही छूकर रह गया। संजना ने नाक और भवें चढाते हुए कहा था।
  तू ही पकड़ लेती अगर तुझे इतनी जल्दी पड़ी थी तो...-मौसी ने चुटकी ली। सुनकर संजना ने मौसी  की गोद में अपना सिर रख दिया।      
  दिनेश बाबू की तकलीफ का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था। अब वह इस बात का विश्लेषण करने लगे थे कि आखिर संजना क्यों नहीं यह शादी करना चाहती है। यह चिंता करने के समय उन्होंने संजना की आदतों की पष्ठभूमि को याद करने का प्रयास किया। उन्हें तत्काल जो महसूस हुआ, वह सविता को बता दिया-दरअसल तुम्हारी बेटी अभी तक उस अशोक वर्मा के चंगुल से बाहर नहीं निकल पाई है। उन्होंने फिर कहा- तुम्हें पता है अशोक का एक दोस्त दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी कर रहा है, जो इसका भी परिचित है। वही इसको लड़के के बारे में ना जाने क्या-क्या लिख-लिखकर भेजता रहता है, जिसे पढ़कर इसका दिमाग खराब हुआ जा रहा है
 सविता कुछ भी नहीं बोल सकी थी।
तुम भी तो जानती हो, उस लड़के को
दिनेश बाबू ने सविता से मुखातिब होते हुए कहा।
बस, दो-एक बार ही तो देखा है। सविता खुद में फंसती हुई-सी महसूस कर रही थी।
दो-एक बार ही क्यों, कई बार घर पर आया है, और पच्चीसों बार तुम्हारी बेटी से मिला, घूमा-फिरा है, अनजान मत बनो। दिनेश बाबू का गुस्सा थोड़ा बढ़ गया था।
अब उसकी पिछली जिंदगी उधेड़ने से क्या फायदा,सविता ने सहमते हुए दिनेश बाबू के हाथों पर अपना हाथ रख दिया। दिनेश बाबू ने अपना हाथ हटा लिया। थोड़ा परे हटते हुए कहा- यदि इस बार भी यह शादी नहीं हुई तो तुम दोनों मिलकर दूसरा लड़का ढूंढ लेना। अब मैं कुछ नहीं करूंगा
दिनेश बाबू चले गए। सविता घर में अकेली बच गई। संजना स्कूल और लवली कालेज। घर में सन्नाटा....।
    अचानक तेज हवा आई। खिड़की का पर्दा फड़फड़ाया। टेबुल पर शीशे के कप फर्श पर गिर कर चकनाचूर हो गए। कप टूटने की आवाज के साथ ही दरवाजे की घंटी बजी। जब घंटी दुबारा बजी तो सविता ने दरवाजा खोला। तेज हवा के झटकेदार झोंके के साथ संजना अंदर प्रविष्ट हुई। और अपने कमरे में धड़ाम से बेड पर फैल गई। खिड़की के बाहर जोरों की हवा गों-गों की आवाजें कर रही थी। संजना को बंद शीशे के भीतर से यह देखने में रोमांचक लग रहा था।
आज इतनी देर कैसे हो गई?” सविता ने धीमे कदम कमरे में घुसते हुए कहा और उसके उलझे हुए बालो में उंगलियां फंसा दी। संजना अब खिड़की के पार देखना बंद कर मम्मी के चेहरे को देखने लगी। उसकी छोटी- छोटी आंखें इस समय विस्फारित हो गई थीं। मम्मी, आज अशोक ने रोक लिया। उसी के साथ थी। संजना मम्मी के आंचल के छोर को अपनी उंगली में लपेटने लगी।
अब तुम उससे क्यों मिलती हो ? पापा नाराज हो रहे हैं। मम्मी ने थपकी देते हुए कहा।
छुट्टी होने के बाद उसी ने रोक लिया। फिर उधर से ही कंप्यूटर सेंटर चली गई। क्या करती!” संजना अपनी आवाज में भरपूर मासूमियत लाने की चेष्टा करने लगी। फिर उसने चेहरे को दूसरी तरफ घुमा लिया। और बड़े शीशे के सामने जाकर खड़ी हो गई। मम्मी ने पीछे से संजना का शरीर देखा-वह पहले से भारी लग रही थी। मम्मी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा–एक बात पूछूं”? बड़े शीशे में संजना की आंखें मम्मी की आंखों से मिल गई। उसने शीशे में मम्मी की आंखों के भीतर झांका और कहा-क्या?” उसके होंठ खुले रह गए।
अशोक, अब क्या करता  है?”
हमारे ही स्कूल में आ गया। एक ही साथ काउंटर पर बैठते हैं। संजना तेजी से बोल गई।
रहता कहां है ?”...मम्मी ने फिर सवाल किया।
यहीं कंकड़बाग में, स्टैंट के पीछे। संजना के चेहरे से अब मायूसी खत्म होने लगी थी, जिसे मम्मी ने अच्छी तरह से भांप लिया था।
तुमने भी तो देखा है न उसे?” इस बार संजना ने मम्मी से सवाल किया। मम्मी हां कहकर कमरे से बाहर निकल गई।
   रात के बारह बज गए परंतु दिनेश बाबू को नींद नहीं आई। वह चुपचाप थे। उन्हें कुछ बोलना अब पसंद नहीं था। सविता ने दिनेश बाबू के सीने पर हाथ रखा और कहा-एक बात कहूं?” क्या?” दिनेश बाबू ने अनमने ढंग से कहा। क्यों न इस शादी को रोक दिया जाए
यह तो होना ही है। क्योंकि लड़के वालों को भी लड़की के बारे में कुछ बातें मालूम हो गई हैं
कौन-सी बात मालूम हो गई है ?”  सविता  का स्वर आतंकग्रस्त हो गया। दिनेश बाबू बोलते गए-आज ही आफिस में लड़के का बहनोई आया था। शिकायत कर रहा था –स्कूल में आप की लड़की टीचर नहीं है, वह रिसेप्शन पर बैठती है। यह भी कह रहा था कि उसका बैकग्राउंड बहुत पूअर है।
इसका मतलब... ? सविता की धड़कनें बढीं और वह झट से उठकर बैठ गई। इसका मतलब, यह हुआ कि तुम्हारी बेटी की यह दूसरी सगाई भी ब्रेक। समझी। दिनेश बाबू जोर से बोलकर बिस्तर से उतर गए। जब उन्हें कुछ नहीं सूझा तो बालकनी में बैठकर सिगरेट पीने लगे। जैसे उन्हें धीरज बांधने के लिए सविता भी पास आ गई। अब तक दिनेश बाबू आधी सिगरेट पी चुके थे। सविता को देखते ही दिनेश बाबू गरज उठे-
दरअसल तुम्हारी बेटी जरूरत से ज्यादा सुविधाभोगी प्रवृति की है। खुद संघर्ष और मेहनत करना नहीं चाहती। पति नाम के खंभे के सहारे जिंदगी जीना चाहती है। अब वो जमाना लद गया। पति-पत्नी दोनों मिलकर अपने घर की तरक्की के साथ-साथ मेहनत करते हैं। लेकिन लगता है उसे पति के रूप में सेना का जवान चाहिए। जरा पूछो अपनी लाडली से-शादी के बाद गृहस्थी बसानी है या बॉर्डर पर जाकर जंग लड़नी है। खुद की भी तो उस लायक पर्सनेलिटी नहीं है
संजीव श्रीवास्तव
  पाsss....पाsss... पर्दे के पीछे से संजना का यह तेज स्वर था-इतनी रात गए इस तरह से चीखिए मत। मेरी जिंदगी है, फैसला मैं करूंगी। आप लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है
   संजना अब पर्दे के बाहर आ गई। बोलती गई-एक बाप को ऐसी टिप्पणी करते हुए शोभा नहीं देता। आप ही तो बताते हैं- जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है। फिर क्यों न मैं इस संघर्ष में सेना के जवान जैसा पति चाहूं। पापा, इसका जवाब नहीं दे पाए।  संजना मम्मी के पास खिसक गई। मम्मी ने उसे थपकी दी। दिनेश बाबू जैसे अकेले रह गए। बालकनी में आधी रात का अंधेरा था। उस अंधेरे में फैला था दूधिया बल्ब का मटमैला प्रकाश। वह प्रकाश पापा के फीके पड़े चेहरे को और भी विद्रूप बना रहा था। 
                                                                                              
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