स्टार केंद्रित हो गई फिल्म पत्रकारिता - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 8 अक्तूबर 2016

स्टार केंद्रित हो गई फिल्म पत्रकारिता

फिल्म पत्रकारिता : कहां से चले, कहां पे रुके...

फिल्म पत्रकारिता की शुरुआत कहां से होती है; और भारत में कैसे-कैसे पड़ावों से गुजरी है फिल्म पत्रकारिता; बता रहे हैं वरिष्ठ फिल्म विश्लेषक जयप्रकाश चौकसे
  


सिनेमा के आविष्कार के साथ ही उसका प्रदर्शन रूस के कुछ शहरों में हुआ। नोवगोरोड में आयोजित एक उत्सव में मैक्सिम गोर्की ने फिल्म देखकर अपने कॉलम में उसका वर्णन किया-कल रात मैं छायाओं के साम्राज्य में था और इन बिम्बों का असाधारण प्रभाव, विलक्षण, जटिल और बहुआयामी है जिसकी पूर्ण व्याख्या आज संभव नहीं...बिंब देखकर अद्भुत कल्पनाएं दिमाग में उभरने लगती हैं।इस तरह फिल्म समीक्षा का जन्म हुआ। भारत में भालजी पेंढ़ारकर लोकमान्य तिलक की पत्रिका केसरी के सह-संपादक थे और उन्होंने अनेक फिल्में भी बनाईं। भालजी पेंढ़ारकर ने सन् उन्नीस सौ बाईस में सिनेमा समाचार का संपादन और प्रकाशन किया तथा इसे ही भारत में फिल्म पत्रकारिता का प्रारंभ माना जाना चाहिए। इसी तथ्य में भारतीय फिल्म पत्रकारिता का दुखद पहलू भी छुपा है कि कालांतर में प्रकाशित हुए फिल्म आलोचकों को फिल्म विधा का ज्ञान नहीं था और कथा का सारांश लिख देने को ही फिल्म समीक्षा का नाम भी दिया गया ! यह सिलसिला आज भी जारी है और प्राय: अच्छे लोकेशन को अच्छी फोटोग्राफी माना जाता है तथा ताली बजवाने की क्षमता वाले संवाद बोलने वाले को प्रवीण कलाकार माना जाता है। भारतीय फिल्मों की तरह भारतीय समीक्षा भी सितारे केंद्रित होकर रह गई है।
      जब भारत में रेल का उदय हुआ तब कहा जाता था कि जिसे कहीं नौकरी न मिले उसे रेल में काम मिल जाता है और इस तर्ज पर कहें कि फिल्म पत्रकारिता में वे ही लोग आए जो साहित्य और समाज पर लिखने में अक्षम थे। फिल्म पर लिखने वालों की एक और श्रेणी भी रही है। हॉलीवुड फिल्म पत्रकारिता के टेड़ हौपर की तर्ज पर देवयानी जैसी महिलाओं ने गॉसिप लिखकर फिल्म के गंभीर छात्रों को हाशिये पर धकेल दिया। अपने शिखर समय में देवयानी चौवल खुद एक सितारा थी उन दिनों के सुपर स्टार राजेश खन्ना की अंतरंग मित्र होने के नाते उन्हें सितारा ख्याति भी प्राप्त थी। भारत का पाठक भी चटखारे लेकर गॉसिप का लुत्फ़ उठाता है। और इसी कारण चमकदार फिल्म पत्रिकाओं की लोकप्रियता बढ़ती गई। भारत में शोधपरक सामग्री प्रकाशित नहीं हुई। फिल्म समीक्षक होने के लिए फिल्मकार होना आवश्यक नहीं है परंतु विधा के व्याकरण की साधारण जानकारी के भी अभाव के कारण भारत में प्रकाशित फिल्म सामग्री का कोई महत्व नहीं है।
     बाबूराव पटेल ने चौथे दशक में आर्ट पेपर पर प्रकाशित फिल्म इंडिया का संपादन और प्रकाशन प्रारंभ किया  और उनकी फिल्म पर दी गई टिप्पणियों का महत्व उस समय तक बना रहा जिस समय तक उन्होंने द्रोपदी नामक एक फिल्म नहीं बनाई। उस फिल्म का निर्माण एक हादसा सिद्ध हुआ और उनकी धाक समाप्त हो गई। यही पत्रिका फिल्म इंडिया कालांतर में मदर इंडिया नाम से प्रकाशित हुई। हमारे यहां बाबूराव पटेल की परिपाटी पर चलकर कुछ समीक्षकों ने फिल्में बनाईं, जैसे टाइम्स के खालिद मोहम्मद ने फिल्में बनाई। किंतु सभी ने केवल यही रेखांकित किया कि फिल्म समीक्षा के नाम पर चटाखेदार सामग्री लिखना और फिल्में बनाना दो अलग-अलग काम हैं। यह कमोबेश कुछ इस तरह है कि अधिकांश महिलाएं भोजन बनाती हैं, परंतु पांच सितारा होटलों में व्यंजन रचने वाले ज्यादातर शेफ पुरुष होते हैं। पाक विधा को जन्मना, जानना और शास्त्र की तरह अध्ययन करना दो अलग-अलग बातें हैं।
    भारत में फिल्म निर्माण प्रारंभ होने के दशकों बाद फिल्म विधा के प्रशिक्षण के केंद्र खुले और नेहरू की प्रेरणा व पहल से पूना फिल्म संस्थान की संरचना हुई परंतु फिल्म समीक्षा की शिक्षा व्यापक रूप से दिया जाना आज भी नहीं हो रहा है। कुछ पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में फिल्म समीक्षा को शामिल किया गया है, लेकिन वह सब सतही है। प्राय: साहित्य के शिक्षकों को ही फिल्म समीक्षा पढ़ाने का दायित्व दिया गया है क्योंकि इस क्षेत्र में प्रतिभा का अकाल है। साहित्यकार फिल्म देखते हैं परंतु फिल्म के प्रति अपनी हिकारत को भी कलमबद्ध नहीं करते अन्यथा हमें पठनीय सामग्री मिलती।  कमलेश्वर ने धर्मयुग में मेरा नाम जोकर की समीक्षा की थी जिसका लब्बोलुआब यह था कि पहले भाग में राजकपूर सभी निर्देशकों को पीछे छोड़ देते हैं दूसरे में हांफने लगते हैं और तीसरे में स्वयं से दूर चले जाते हैं।फिल्म देखने की कला पर एक प्रारंभिक किताब स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए ताकि अधिकतम लोग इस विधा से परिचित हों। प्रतिभा को मांजने का यही एक तरीका है परंतु सरकारें इस मायने में उदासीन रही हैं अब जबकि इस विभाग की महिला मंत्री ने स्यवं ही अपनी शिक्षा के संदेहास्पद दस्तावेज प्रस्तुत किये हों तब तो कत्तई कोई आशा नहीं करनी चाहिए। यह काम ज़हालत को गौरव मंडित करने की तरह है, पूरा प्रशासन ही फूहड़ प्रहसन बनकर रह जाता है।
       वर्तमान में फिल्म समीक्षा के नाम पर रची फूहड़ता में फिल्म की बॉक्स ऑफिस आय को भी महत्वपूर्ण बना दिया गया है और इसके तहत प्रस्तुत आंकड़ों से भरम पैदा हो रहा है। ये लोग ग्रॉस (सकल) को आय बता रहे हैं जबकि ग्रॉस का पचास प्रतिशत ही आय होती है। और विदेश क्षेत्र में ग्रॉस का पैंतालीस प्रतिशत ही नेट होता है अर्थात तीन-चार सौ के आंकड़े पूरी तरह से भ्रामक हैं। फिल्म समीक्षा में आय का महत्व बाजार युग का स्वाभाविक नतीजा है। शीघ्र ही चरित्र का मानदंड भी आय हो जाएगी और गरीब होने का मानदंड चरित्रहीन होना माना जायेगा। आय के नजरिये से लिखे फिल्म इतिहास में गोविंद निहलानी और श्याम बेनेगल का जिक्र नहीं होगा तथा मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और करन जौहर विधा के पुरोधा माने जायेंगे। गॉसिप और आय-व्यय के आंकड़ों ने फिल्म समीक्षा को लील लिया है।
        मुंबई के अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित अखबारों की अपनी विज्ञापन एजेंसी है और उसमें लगातार खूब विज्ञापित की गई फिल्म के प्रति उदार दृष्टिकोण रखा जाता है। इस खेल में फिल्मों की गुणवत्ता को सितारेदेकर उनका मूल्यांकन किया जाता है और इसकी कीमत अदा करना पड़ती है। फिल्म का प्रचार विभाग लोकप्रिय अखबारों के फिल्म समालोचकों को दावतों पर आमंत्रित करता है और उन्हें महंगी भेंट दी जाती है। सितारों से साक्षात्कार की सुविधा सबसे बड़ा आकर्षण है क्योंकि समीक्षा के बाजार में आए अधिकांश लोग मूलत: सितारा क्रेजी फिल्म प्रशंसक होते हैं उनके पोर्टफोलियो में उनके लिखे से अधिक सितारों के साथ ली गई उनकी तस्वीरें होती हैं। फिल्म के लिए जुनून ही फिल्म के अर्थतंत्र की रीढ़ की हड्डी रही है और समालोचक भी अपने मूल स्वरूप में फिल्म प्रशंसक ही हैं, इसलिए, निष्पक्ष सटीक मूल्यांकन कठिन हो जाता है।
     भारतीय दर्शक फिल्म समीक्षा चटखारे लेकर पढ़ता है परंतु उसकी फिल्म चुनने की प्रक्रिया में समीक्षा का कोई महत्व नहीं है। दर्शक का फिल्म चुनने और देखने का अपना ही नजरिया है जिसका वैज्ञानिक ढंग से कोई अध्ययन हुआ ही नहीं है। हमारे फिल्मकार भी दर्शक के अवचेतन के बारे में ठीक से कुछ नहीं जानते। बलदेवराज चोपड़ा के स्कूल के फिल्मकार अपनी फिल्म अपने सितारों को भी प्रदर्शन पूर्व ही दिखाते थे परंतु राजकपूर अपनी निर्माणाधीन फिल्म की रीलें प्राय: अनेक लोगों को दिखाते थे और उस प्रदर्शन में देखने वालों की प्रतिक्रिया का अध्ययन करते थे। इस तरह वे सामान्य दर्शक की प्रतिक्रिया भी जानना चाहते थे। सिनेमा हॉल में किसी दृश्य या गीत पर बजाई गई तालियों से अधिक महत्वपूर्ण दर्शकों की खामोशी है। दर्शकों से भरे सिनेमा हॉल का सन्नाटा भी बहुत कुछ कहता है। कभी आप सिनेमा हॉल में सूखे कुएं से आती भायं’...‘भायं को सुन सकते हैं और पानी से भरे कुएं से अलग किस्म की ध्वनि आती है। कुंओं से आती इन दो किस्म की आवाजों से परिचित व्यक्ति ही सिनेमा हॉल में व्याप्त सन्नाटे का अर्थ समझ सकता है।
     यह बहुप्रचारित तथ्य है कि कांस समारोह में सत्यजीत रे की पाथेर पांचालीका प्रदर्शन हुआ तब ज्यूरी के सभी सदस्य ऊंघ रहे थे, केवल एक जाग रहा था। उसने प्रदर्शन के बाद ज्यूरी सदस्यों से आग्रह किया कि वे कॉफी पीकर तरोताजा होकर आएं और इस महान फिल्म को देखें। यह किया भी गया। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि वह ज्यूरी सदस्य भी अगर अन्य सदस्यों की तरह सो गया होता तो उस महान फिल्म के मूल्यांकन में अनावश्यक विलंब हो जाता।
   फिल्म पत्रकारिता का एक प्रसंग इस तरह है कि ख्वाजा अहमद अब्बास एक अखबार में फिल्म समीक्षा लिखते थे। उन्होंने एक बार लिखा कि शांताराम की फिल्म के सैट नकली लगते हैं। शांताराम ने कत्तई बुरा नहीं माना और ख्वाजा अहमद अब्बास को शूटिंग देखने के लिए निमंत्रित किया ताकि वे फिल्म पर विश्वसनीय लिख सकें। इसका असर यह हुआ कि ख्वाजा अहमद अब्बास की लिखी डॉ. कोटनीस की अमर कहानी पर शांताराम ने यादगार फिल्म बनाई।
   ख्वाजा अहमद अब्बास अपने मित्र बी.पी. साठे के साथ मिलकर पटकथा लिखते थे। धन के अभाव के कारण शिवाजी पार्क के पास एक श्मशान घाट के निकट एक होटल में सस्ते में किराये का एक कमरा लिया था। अब्बास और साठे वहां काम करते थे। उनकी आवारानिर्माता मेहबूब खान ने पसंद की परंतु वे इसे पृथ्वीराज और दिलीप कुमार के साथ बनाना चाहते थे जबकि अब्बास का विश्वास था कि यथार्थ जीवन के पिता-पुत्र पृथ्वीराज व राजकपूर को लेकर आवारा को अलग धार मिलेगी।  यह बात नगरिस ने राजकपूर को बताई और आधी रात को राजकपूर शवदाह स्थल के निकट बने होटल जा पहुंचे और कथा सुनकर उसके फिल्मांकन अधिकार भी उन्होंने उसी वक्त खरीद लिये। यह एक तरह से श्मशान घाट पर अलख जगना हुआ और आवारा राजकपूर के लिए निर्णायक पथ प्रदर्शक, भाग्य विधाता फिल्म सिद्ध हुई। दुनिया के सबसे अधिक देशों में आवारा का प्रदर्शन हुआ है। यहां तक कि नॉर्थ पोल पर खोज के लिए रवाना रूसी वैज्ञानिकों को भी पोर्टेबल प्रोजेक्टर पर फिल्म दिखाई गई तथा रूस की अघोषित राष्ट्रीय फिल्म सिद्ध हुई। यह भी गौरतलब है कि ख्वाजा अहमद अब्बास और राजकपूर के आपसी सहयोग ने अनेक सफल फिल्में दीं लेकिन अब्बास साहब ने जब अपनी लिखी फिल्मों का निर्माण किया तो वह सफल नहीं रही। और यह कहा गया कि उनकी फिल्में पत्रकार स्वरूप में लिखे हुए लेख की तरह होती हैं और कुछ लेख पटकथा की तरह लगते हैं।
        टाइम्स पत्रिका की फिल्म पत्रिका माधुरी में जैनेंद्र जैन छुट्टी इतवारी लाल की नामक कॉलम लिखते थे और राजकपूर की बॉबी में उन्हें संवाद लिखने का अवसर मिला था। कालांतर में उन्होंने जैकी श्रॉफ के साथ फिल्म निर्माण किया और शेष जीवन उसी के लिए लिये गये कर्ज चुकाने में बीता। फिल्म विधा में लोकप्रिय बात कही जाती है कि फिल्म दो टेबलों पर बनती है-एक लेखक की टेबल, दूसरे संपादक की टेबल। फिल्म इस कदर निर्देशक का मीडियम है कि फ्रांस के आलोचकों ने फिल्मकारों को लेखक का दर्जा दिया है।
      भारत में फिल्म पत्रकारिता की दयनीय दशा का कारण अवाम की लेखन विधा के प्रति उदासीनता है। दूसरी बात यह कि लेखन से जीवनयापन संभव नहीं है। प्रकाशन का यह हाल है कि विरल लेखकों को ही कुछ रॉयल्टी मिल पाती है। हमारे पाठक किताब नहीं खरीदते। आजकल सभी अखबारों में फिल्म के परिशिष्ठ प्रतिदिन होते हैं और सारे अखबारों में मुंबई के दोपहरिया अखबारों में प्रकाशित गॉसिप का अनुवाद प्रकाशित होता है। हम गॉसिप भी अपनी नहीं रचते। वह भी अनूदित है। फिल्म हमारा नया लोकगीत है जिसके साथ शास्त्रीयता का कोई मानदंड नहीं लगाया जा सकता।
   सिनेमा हॉल से बाहर निकले दर्शक वर्ग प्राय: कहते सुने गए हैं कि पैसा वसूल फिल्म हैटिकट दाम के बदले तीन घंटे का आनंद मिला या पैसा ठगे जाने का भाव मन में आया है! आम दर्शक के नजरिये से फिल्म के कला पक्ष और तकनीकी का कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता परंतु आज की समीक्षा इस नजरिये से शासित है। बॉक्स ऑफिस परिणाम से फिल्म का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। इस काम में फिल्म की आय और लागत का भी कोई महत्व नहीं है। शोले के साथ प्रदर्शित जय संतोषी मां की आय उसकी लागत से दो हजार गुना अधिक थी परंतु उसे शोले के ऊपर नहीं रखा जा सकता।शोलेन तो मौलिक और न ही महान फिल्म है परंतु सामूहिक अवचेतन पर उसका गहरा प्रभाव हुआ है और भारतीय मसाला फिल्म की यह प्रतिनिधि रचना है। दर्जनों देशी-विदेशी फिल्मों का अंश लेकर यह चदरिया बुनी गई है। नरेंद्र बेदी ने इस तरह की चदरिया का विचार जीपी सिप्पी के कथा विभाग में सबको सुनाया था और बिना सितारों के उसने इस मसाले पर कम बजट की फिल्म भी बनाई थी। रमेश सिप्पी ने नरेंद्र बेदी की अवधारणा को ही सलीम-जावेद से लिखवाकर भव्य फिल्म बनाई। इसका इतना प्रभाव पड़ा कि आप व्यावसायिक सिनेमा को शोलेके पहले और शोले के बाद के खंडों में विभाजित करके भी प्रस्तुत कर सकते हैं। शोले ने भारतीय सिनेमा में स्थायीका स्थान रखने वाली प्रेम-कथाओं के स्थान पर हिंसा कथाओं को स्थापित कर दिया। शोले ने सिने-पत्रकारों पर भी गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने इसे मानदंड की तरह स्थापित कर दिया।
   फिल्म उद्योग के इतिहास में व्यावसायिक रूप से सफल फिल्मों का प्रतिशत किसी भी वर्ष दस से अधिक नहीं रहा। इतनी विराट आर्थिक खाई के बाद भी फिल्म उद्योग जीवित है क्योंकि इसके ग्लैमर के कारण नए पूंजी निवेशक इसकी ओर आकर्षित होते रहे हैं। इस मामले में यह सदासुहागन उद्योग है। विगत सालों में पान सिंह तोमर, विकी डोनर, मसान की तरह विलक्षण फिल्में बनीं हैं परंतु सिने-पत्रकारों ने इन फिल्मों की समीक्षा में अपने पुराने रवैये को नहीं छोड़ा। इन फिल्मों में दर्शकों को चौंकाने और झंझोड़ देने की ताकत है। ये फिल्में दर्शकों के पैर के नीचे सदियों से स्थापित पूर्वाग्रह की जमीन को हिला देती हैं। पत्रकारों को इस तरह इनकी समीक्षा करनी चाहिए थी कि इन्हें नहीं देखने से आप बहुत कुछ खो देते हैं और आपके मानवीय स्वरूप पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। भारतीय सिने उद्योग में यह भाव कि अगर यह नहीं किया तो जीवन शून्य रह गया, इसी जुनून से फिल्में बनाई जाती हैं और इसी जुनून को सिने पत्रकारों को खुद में जगाना चाहिए। जब राजकपूर ने शंभू मित्रा के नाटक जागते रहोपर फिल्म बनाने का निश्चय किया तब उनके नजदीकी लोगों ने उन्हें परामर्श दिया कि यह भारी आर्थिक जोखिम है। राजकपूर का जवाब यह था कि अगर उन्होंने यह फिल्म नहीं बनाई तो जीवन में कुछ नहीं किया। सफल फिल्म बनाना आसान है परंतु जागते रहो बनाना अत्यंत कठिन है। हम सब तो वे प्रहरी हैं जो जागते रहो की हुंकार देकर सो जाते हैं।

(पिक्चर प्लस जून, 2016 में प्रकाशित)

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