क्योंकि ‘बालिका वधू’ भी टीवी सीरियल था - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

रविवार, 9 अक्तूबर 2016

क्योंकि ‘बालिका वधू’ भी टीवी सीरियल था


                                           छोटी सी उमर...
सीरियलों की समर विजेता

छोटे पर्दे पर कई धारावाहिक आए और गए, लेकिन बालिका वधू धारावाहिक को इसलिए याद किया जायेगा, क्योंकि इसने कॉरपोरेट परिवार की कलह व कहकहे भरी कहानियों के समानांतर सामाजिक सचाई को बड़ी दिलेरी से जगह दी और अपना मुकाम बनाया था। बंद होने के बाद भी यह धारावाहिक लोगों की जुबां पर क्यों है, स्क्रीन राइटर गौतम सिद्धार्थ इसके अनछुए पहलुओं पर चर्चा कर रहे हैं...



साल 2008 में टेलीविजन चैनलों के झुंड में एक नया नाम जुड़ा, कलर्स टी वी। इस चैनल ने कुछ नये विषयों पर टीवी सीरियल्स बनाने शुरू किये। जिसका मुख्य आकर्षण था, बच्चियां, यानी गर्ल चाईल्ड। छोटे परदे पर एक जंग की शुरूआत हुई। ये जंग लड़ी जा रही थी K से। यानी स्टार प्लस पर आने वाले सास बहू के सीरियलों से। जहां एकता कपूर के रुतवे का बोलबाला ही नहीं था, बल्कि बिजनेस घरानों की बहुओं, उनकी सासों, देवरों और अन्य रिश्तेदारों के पूरे महकमे का दबदबा भी था। मध्यम वर्ग का परिवार नदारद हो गया था, जोकि कभी टीवी धारावाहिकों के विशेष किरदार हुआ करते थे। एकता कपूर ने तो धारावाहिकों की दुनिया ही बदल दी थी। और इसके लिए उन्होंने स्टार प्लस को अपना सबसे बड़ा फोरम बनाया। स्टार प्लस के बारे में लोगों ने यहां तक कहना शुरू कर दिया था, कि एकता कपूर ने इस चैनल को खरीद लिया है। तो ये सीधी जंग थी एकता कपूर से। क्योंकि..., कसौटी..., कहानी...से इन्होंने देश की बहुओं को एक नया अंदाज दिया था। अब ये जंग उस दर्शक वर्ग को हथियाने की थी, जो टीआरपी के हिसाब से 67% थी। दर्शक वर्ग बड़े-बड़े घरों में डायनिंग टेबल पर सजे-धजे गुजराती खानों को देख-देख कर ऊब चुका था। इस बात का फायदा कलर्स ने उठाया, और हिम्मत करके कुछ सीरियल प्रसारित करने शुरू किये, जिसमें बालिका बधू, इस देस ना आना लाडो और उतरन थे। बड़े-बड़े, आलीशान घरों की दरबारी चमक दमक की जगह, मध्यम वर्ग के घरों ने एक बार फिर लेनी शुरू की। जिसमें घटनाओं का मुल्लमा काल्पनिक ना हो कर वास्तविकता के नजदीक था। इस जंग की अगुवा थी, आंनदी। जिसने स्टार प्लस की टीआरपी को पछाड़ा और खुद 26% पर पहुंच गई। इस खेल में सबसे ज्यादा नुकसान ज़ी चनैल को हुआ। अब आनंदी की बयार थी, जिसके सहारे लाडो और उतरन भी चल निकले। तीनों ही धारावाहिकों ने दर्शकों के बीच पैठ बनानी शुरू कर दी। क्योंकि ये सामाजिकता के नजदीक थे और इनमें मध्यमवर्ग की भावनात्मकता, जीजीविषा और महत्वाकांक्षा का चित्रण था। गरीब सी बालिका वधू, अमीर से विरानी खानदान की बड़ी बहू पर बहुत भारी साबित हो रही थी। 
नन्हीं आनंदी की समाज से ये लड़ाई जुलाई 2008 में शुरू हुई और आगे भी जारी रही। आगे चलकर आनंदी बड़ी हुई, तो आनंदी के किरदार को निभाने वाले कलाकार तो बदले ही गये,परंतु इसका चरित्र नहीं बदला।
इन सारे बदलावों के बीच 2008 का साल भारत के इतिहास का वो साल था, जिसमें हिंदुस्तान पर सबसे ज्यादा आतंकवादी हमले हुए थे, कुल 11; जो 1 जनवरी (रामपुर) से शुरू हुए, और 26 नवम्बर (मुम्बई) तक लगातार चलते रहे। और इसी साल मुम्बई की फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐसी स्ट्राईक हुई जिससे फिल्म शूटिंग्स का सारा काम-काज ठप्प हो गया। वजह थी काम करने वाले लोगों को निर्माताओं की तरफ़ से कई महीनों के बकाये पैसों का नहीं मिलना।
इसी ऊहा पोह के दरम्यान, कलर्स टीवी के स्क्रीन पर आनंदी नाम की एक बच्ची ने जनम लिया था। जिसके गरीब बाप ने, दादी सा की मेहरबानी के तहत उसका विवाह उनके पोते जग्या से करवा दिया। कच्ची उमर की शादी, एक बच्ची बहू बन गई, यानी बालिका वधू। मैं बालिका बधु की कहानी से अलग हट कर, कुछ नये नज़रिये से इस दौर को देखना चाहता हूं, जो टेलीविजन के इतिहास में नये ऊखाड़ पछाड़ को अंजाम देने वाला था।
बालिका बधु की सफलता ने कलर्स को प्रोत्साहित किया और लाडो को मारने से ले कर, उतारे हुए कपड़े को सहेजने वाली इच्छा तक को, समाज के आईने में परोस दिया।
बालिका वधू की कहानी के तहत, एक नये विलेन को उजागर करने की कोशिश की गई, जो दादी सा थी। दादी सा, पुराने विचारों का मानवीयकरण थी, तो दूसरी तरफ़ आनंदी की सास, जो नये विचारधारा के साथ सामने आ रही थी। ये कहानी भी साधारणतया, सास बहू के परिपेक्ष्य में ही आगे बढ़ रही थी, पर एक बच्ची के खिलाफ़ एक उम्रदराज विलेन, लोगों को भा गया था। ये एक बिलकुल नया संबंध था। आनंदी की स्थिति पिंजड़े में बंद पक्षी के जैसी थी। ऐसा बाकी सीरियलों में भी होता था कि बहू, सास के जुल्मों के खिलाफ ना तो आवाज उठा पाती थी, और ना ही उस स्थिति से बाहर निकल पाती थी। जबकि दर्शकों को लगता था कि दिखाये जा रहे घटनाक्रम में बहू निकल सकती है, पर अगर बहू निकल जायेगी तो कहानी खतम नहीं हो जायेगी? फिर वो पास पड़ोस में, किस विषय पर बात करेगी? लेकिन आनंदी ने लोगों को ये विश्वास दिलवाया कि वाकई उसका कोई सहारा नहीं है, और इसी वजह से वो सहानुभूति की पात्र बनी रही।
आनंदी के इस किरदार ने, समाजसेवियों के बीच एक प्रश्न भी खड़ा कर दिया, कि बच्चों से सीरियलों में लगातार काम करवा कर, एक तरह की बाल मजदूरी करवाई जा रही है? इस नये और ज्वलंत सवाल के पीछे की सच्चाई कुछ भी रही हो, पर सवाल वाजिब था। लेकिन उत्तर किसी के पास नहीं था। कानून तो है, पर कानून से पीछे का विवेक नहीं है। क्या बच्चों के सीरियल बंद कर दिये जायें? इस बात को लेकर बच्चों के द्वारा निभाये जाने वाले किरदारों के सीरियलों में खलबली मच गई।
बात जो भी रही हो, लेकिन कलर्स के इस सीरियल, बालिका वधू ने, देश और समाज को जमीन से जोड़ने की कोशिश की। अनछुये विषयों को उठाया गया। और उन्हें निचले तबके से लेकर उच्च तबके तक पहुंचाया गया। जब मैं इस सीरियल के पहलुओं को जांचता परखता हूं, तो पाता हूं, कि इस सीरियल का घटनाक्रम बहुत तेजी से घटित हो रहा होता था। जो उस समय के आने वाले सीरियलों में सिर्फ़ रिएक्शन शॉट्स के माध्यम से भरा जाता था। वो तो कमाल ही हैं, कि किसी ने एक लाईन बोली, और शुरू हो गई रिएक्शन शॉट्स की बारिश। स्टार प्लस और एकता कपूर की किस्मत कितनी अच्छी थी कि वो चार पेज की स्क्रिप्ट पर पूरे 22 मिनट का एपिसोड बना कर लोगों को दिखा देते थे। बालिका बधू ने इस तरीके को बदला और सीरियलों में आज क्या खाना बनाना है, से अलग हट कर मानवीय संबंधों के टकराव को एक महत्वपूर्ण विषय बनाया।
डीडी के सीरियलों को अगर हम छोड़ दे, तो ये एक ऐसा इकलौता सीरियल था जिसने, समाज के मात्र, एक इशू को ही कहानी में नहीं रखा, बल्कि बालिका बधू ने बाल विवाह, विधवा विवाह, वयस्क शिक्षा, स्त्री शिक्षा, अवयस्क गर्भधारण, तलाकशुदा स्त्री से विवाह, और यहां तक कि बाल विवाह से निजात पाने के कानूनी तरीके जैसे कई गम्भीर विषयों को भी अपनी कहानी में जगह दी।
बालिका बधू की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है, कि जब प्रत्युषा बनर्जी (जिसने आनन्दी का चरित्र निभाया था और सीरियल छोड़ चुकी थी) ने जब आत्महत्या कर ली तो वियतनाम की सोशल मीडिया में भी शोक का वातावरण छा गया। क्योंकि बालिका बधु वहां आने वाले डब सीरियलों में की पहली पायदान पर था। वजह शायद ये भी रही हो, कि वियतनाम में अब भी बाल विवाह का प्रचलन बहुत ज्यादा है। सुना जाता है कि वहां छोटी बच्चियों को देह व्यापार में भी लगा दिया है।
इस कहानी के प्रेणता पूर्णेंदु शेखर ने इस 8 साल के दरम्यान कई बार ये बताया है कि कैसे वो इस कहानी पर पहले फिल्म बनाना चाहते थे, और कैसे इस छोटी सी कहानी ने इतने हज़ार एपिसोड की कहानी की शक्ल ले ली। लेकिन ये सच है कि उनकी कल्पना ने टीवी स्क्रीन पर एक नई विचारधारा की प्रस्तुति को ठोस आधार दिया है। 
ऐसा नहीं था कि ये आम धारावाहिकों से अलग हट कर बनाया गया था, वरन इसमें भी एक व्यक्ति के कई विवाह दिखाये गये, चरित्रों के कलाकार बदलते रहे, कई कलाकार तो फोटो पर बिना फूल माला लटकाये ही, सीरियल से ऐसे गायब हुए जैसे गधे पर से सींग। यहां तक कि एक चरित्र मर गया, फिर भी लौटा। कहानी को निबोली और कुंदन के जरिये फिर से कहने की कोशिश की गई, लेकिन इस बार का विलेन अखिराज था। चरित्र बदल जाने से कहने का अंदाज़ बदल गया, लेकिन पुरानी कहानी नये करेवर में दुहराई जाने लगी।
इस धारावाहिक ने, एक नये माध्यम को भी तलाशा, जो स्क्रीन पर जब तब एक उपदेश की तरह लिख कर आ जाता था। पहले तो इस लिखावट ने असर डाला, लेकिन बाद में वो सिर्फ़ हिंदी के शब्दों का वाक्य विन्यास बन कर रह गया। बाद में यही हालत सीरियल की भी हुई।
यह बालिका वधू की बढ़ती लोकप्रियता का ही असर था कि स्टार प्लस जैसे बड़े चैनल का  सबसे चर्चित धारावाहिक, क्योंकि सास भी कभी बहू थी, बंद हो गया। जिसके बाद स्टार प्लस ने अपनी टैग लाईन ही बदली और कुछ नहीं रिश्ता वही, सोच नई। लेकिन ज़ी चैनल ने अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो या छोटी बहू जैसे धारावाहिक सामने रखे, तो सीरियलों की दुनिया में कांटे की टक्कर होने लगी। किसी को कहां विश्वास था कि, आनंदी का किरदार निभाने वाली अविका गौर की मोहक प्रस्तुति का असर तुलसी जैसे विराट किरदार पर भी पड़ेगा, और ऐसा ही हुआ। बालिका बधु का ये सबसे क्रांतिकारी असर था।

(पिक्चर प्लस जुलाई-अगस्त 2016 में प्रकाशित)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad