कवि, गीतकार गोपालदास 'नीरज' से खास बातचीत - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 8 अक्तूबर 2016

कवि, गीतकार गोपालदास 'नीरज' से खास बातचीत

डायलॉग प्लस

हिन्दी कविता और सिने गीत-संगीत में जोश, जवानी और जिंदगी को जिस जिंदादिली के साथ कवि और गीतकार गोपालदास नीरज ने एक नई उड़ान दी, उसकी लय और लफ्ज आज की पीढ़ी की जुबान पर भी चस्पां है। यही उनकी लोकप्रियता का सबसे अहम सर्टिफिकेट है। साहित्य और सिनेमा का इससे बड़ा सेतु और क्या होगा! जिंदगी के बानवे साल बीत चुके हैं। अब वह फिल्मों के लिए गीत नहीं लिखते, लेकिन लिखने की तड़प रखते हैं। रचनाशीलता की तीव्रता और जीवन की उत्कटता का यही सबसे बड़ा प्रमाण है। उनके साहित्यिक तथा सिने गीत रचना में योगदान पर उनसे विस्तार से बात की, पिक्चर प्लस के संपादक  संजीव श्रीवास्तव ने...

मैं आज भी फिल्मों में
गीत लिखना चाहता हूं


कवि,गीतकार गोपाल दास नीरज से साक्षात्कार लेते 'पिक्चर प्लस' संपादक संजीव श्रीवास्तव



1.     जिंदगी में यादों को कितनी अहमियत देते हैं आप? ना जाने अब तक कितने कारवां गुजर गए होंगे? कभी फुरसत में पीछे मुड़कर देखते हैं?

जवाब - जिंदगी में यादों की बहुत अहमियत है। मैं उसे दिल से लगाकर रखता हूं। यादें जीवन को तरोताजा कर देती हैं। जिंदगी में अब यादों के सिवा और है भी क्या? यादें इंसान को ऊर्जावान बनाती हैं। हां, मैं कभी-कभार पीछे मुड़कर देखता हूं। खट्टी-मीठी यादों को याद करता हूं। ना जाने कितने कारवां गुजर गए। आप जैसे लोग जब मिल जाते हैं, और सवालों का जो सिलसिला शुरू होता है, तो बहुत कुछ याद आने लग जाता है। मेरी जिंदगी अब यादों का कारवां है।

2.     गुबार, गुरबत और गर्वानुभूति से भरी अपनी जिंदगी की वे कौन-कौन सी यादें हैं जो आज की पीढ़ी के कवियों को विस्तार से बताने के लायक समझते हैं?

जवाब - बहुत सारी यादें हैं, जिन्हें मैं आज की पीढ़ी से साझा करना चाहूंगा। इनमें बहुत सी बातें बहुत लोग जानते भी हैं। युवावस्था में हर किसी को जिंदगी में कुछ ना कुछ बनने की तमन्ना होती है। मैं भी कुछ बनना चाहता था। लेकिन क्या बनूं? ये समझ नहीं आ रहा था। तो मेरे बाबूजी ने कहा-जो भी बनना फर्स्ट क्लास बनना, सेकेंड क्लास मत बनना। कोई भी काम करो, उसमें अव्वल आना। तुम किसी के जैसा मत बनना, तुम सदा अपने जैसा बनने का प्रयास करना। यही जीवन में पहला मंत्र मिला था, जो मेरे बहुत काम का था। इसे याद करते हुए मैंने यह कविता लिखी थी-

एक दिन भी जी,
मगर तू ताज बनकर जी,
अटल विश्वास बनकर जी, 
अमर यूं गान बनकर जी,
मत पुजारी बन, 
स्वयं भगवान बनकर जी  

3.  आपकी कविताओं/गीतों का कसक क्या है? रस-रोमांस, जिंदगी का उत्सव, अध्यात्म या सामाजिकता की पुकार? मतलब कि कौन सी जरूरत आपको भावुक बनाती है?

जवाब- देखिए क्या है कि मैंने कविता लिखी थी-तन रोगी मन भोगी मेरी आत्मा योगी रे। तन तो रोगी रहा, मन से कविताएं लिखीं। दरअसल पीड़ा बहुत भोगी है मैंने। बचपन से ही पीड़ा को भोगा है। प्रेम भी जरूरी है। प्रेम बिना जीवन सूना हो जाता है और इंसान एकांतवास में चला जाता है। फिर एकांतवास में आदमी अध्यात्म की ओर मुड़ जाता है। तो मेरी कविताओं में अध्यात्म भी है, पौरुष भी है, दुख है, सुख भी है। मेरी कविताओं को समझने के लिए पचास साल पीछे चलना पड़ेगा। जीवन में क्या है कि आशा के साथ निराशा है, प्रकाश के साथ अंधकार है, ज्ञान के साथ विज्ञान है। बस संसार का यही रूप है। मेरी कविताओं में दो बातें विशेष रूप से मिलेंगी आपको। प्रेम तो जरूर मिलेगा आपको, लेकिन और भी बहुत कुछ मिलेगा। प्रेम के साथ-साथ भारतीय दर्शन मिलेगा, बुद्ध मिलेंगे, महावीर मिलेंगे, गीता मिलेगी। यानी प्रेम और अध्यात्म मूल स्वर हैं मेरी कविताओं के।  

4.  जिंदगी में प्रेम का क्या महत्व है? क्या प्रेमोल्लास का सामाजिक दायरा प्रेमाभिव्यक्ति में बाधा नहीं पहुंचाता? ऐसे में प्रेम फिर अपने मौलिक रूप में कहां रह जाता है? प्रेम को हम अपराध क्यों मानने लग जाते हैं? प्रेम बदनामी क्यों देता है?

जवाब - आजकल प्रेम का जो हाल है, वह तो सब के सामने है। ये प्रेम तो बदनामी ही देगा। प्रेम करने वाले को अपराधी माना जाता है। वैसे भी समाज में प्रेम कभी स्वीकार किया ही नहीं जाता। मैंने कभी लिखा था-बस यही अपराध मैं सौ बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं। मैंने भी अपनी जिंदगी में जाना कि प्रेम अपराध है, फिर भी जानबूझकर मैंने यह अपराध किया। मेरी प्रेयसी के साथ मुझे बदनाम किया गया। मैंने कुछ नहीं कहा। बस, हमें अपने शब्दों को लेकर सचेत रहना चाहिए। शब्दों का हमलोग यूं ही इस्तेमाल कर देते हैं। सोच-विचार नहीं करते। शब्द का मतलब समझे आप? शब्द का मतलब है आपका स्व। आप जो शब्द बोलेंगे, लिखेंगे वह आपका स्व होगा। और सही शब्द ही आपके प्रेम को जाहिर करेगा।

5.      उस जमाने में किसी ने आपको अश्वघोष कहा, किसी ने हिंदी की वीणा कहा तो किसी ने निराश मृत्युवादी भी कह दिया था-ऐसे उपालंभों की आपने कितनी परवाह की?

जवाब- हिन्दी की वीणा कहा था दिनकर जी ने, जिसको जो-जो लगा मुझे कहा। पता नहीं क्या...क्या, लेकिन मैंने किसी की कोई परवाह नहीं की। मैंने तो यही कहा कि-इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में, तुमको लग जाएंगी सदियां इसे भुलाने में। 

6.   जिस दौर में आपने लिखना शुरू किया, आपके सामने मंच पर मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन के अलावा भी कई दिग्गज राष्ट्रीय कवि होते थे-उनके सामने पहचान बनाने में आपको मुश्किल पेश नहीं आई?

जवाब- जी हां, तब कई बड़े-बड़े कवि होते थे। निराला जी की अध्यक्षता, पंत जी की अध्यक्षता, माखनलाल चतुर्वेदी जी की अध्यक्षता के अलावा बच्चन जी, दिनकरजी के साथ कविता पाठ का वो दौर बहुत ही अदभुत होता था। तब बहुत अच्छी-अच्छी कविताएं भी होती थीं। उर्दू के बड़े कवियों के साथ भी मैं कविताएं पढ़ता था। यह सौभाग्य मिला मुझे। बड़े ही गर्व की बात थी। जहां तक इनके बीच अपनी पहचान बनाने की बात है तो मुझे इसमें कोई कठिनाई नहीं हुई क्योंकि मैंने इनमें से किसी की नकल नहीं की।  

7.    क्या आपको बच्चनजी की परंपरा का कवि कहा जाए? आपकी कविताओं या गीतों में भी जवानी, जमाना, इश्क, तड़प, आंसू, शबाब, प्रेम, प्राण, जिंदगी, जोश और अध्यात्म की अभिव्यक्ति भी बहुत ही प्रांजल हुई है।                

जवाब- नहीं, मुझे बच्चन जी की परंपरा का कवि कैसे कह सकते हो? उनकी शैली और मेरी शैली अलग-अलग है। हां, मैंने भी उनकी तरह कविताओं के साथ-साथ गीत भी लिखे हैं। और खूब गाये भी हैं। ये एक समानता तो जरूर है।

8.     आपको क्या लगता है आज की कविता के कद्रदानों में पहले जैसा उत्साह नहीं है, या कविता भी कहीं ना कहीं शुष्क या निष्प्रभावी हुई है? आज की कविताएं कैसी लगती हैं आपको?

जवाब- आज भी कविताएं अच्छी ही रही हैं। लोग सुन-पढ़ रहे हैं। लेकिन कवि सम्मेलन आज ज्यादा हो रहे हैं, कविता सम्मेलन कम हो रहे हैं। यही दुख की बात है।

9.   मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक परिवेश में किस प्रकृति की कविता या गीतों की ज्यादा जरूरत है? उन्हें दिशा देने में कवियों की क्या भूमिका हो?

जवाब- जब आज हम आतंकवाद के खिलाफ बोलते हैं, जब आज की सामाजिक बुराइयों के बारे में भी बोलते हैं तो आज के कवियों को अपनी कविताएं आज के माहौल पर भी लिखनी चाहिए।  

10.  रचनाकारों की रचनाशीलता को क्या राजनीतिक परिवेश प्रभावित करता है? जीवन और समाज के इतर रचनाकारों के लिए राजनीतिक विचारधारा कितनी जरूरी है?

जवाब-रचनाकारों को राजनीति से दूर रहकर टिप्पणी करनी चाहिए। हम जो सोचते हैं वह पार्टी तो नहीं सोचती ना। पार्टी के लोग पार्टी के लिए बोलेंगे। हम क्यों बोले? हालांकि रचनाकारों को राजनीतिक मसलों पर जरूर टिप्पणी करनी चाहिए। आखिर हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। रचनाकार सत्ता के सलाहकार होते हैं। सही-गलत के बारे में दूर बैठकर बताते हैं। 

11.  कुछ समय पहले जब कुछ लेखकों, इतिहासकारों, कलाकारों ने सम्मान वापस कर दिये, तब आपने उनका विरोध किया था। ये उनका राजनीतिक फैसला था? या आपका विरोध भी राजनीतिक था? क्या आपको लगता है आज भी कई ऐसी घटनाएं होती हैं जिनके खिलाफ रचनाकारों को एकजुट होना चाहिए?

जवाब-साहित्यकारों ने तब बहुत गलत काम किया था। उनको पुरस्कार या सम्मान नहीं लौटाना चाहिए। आपका ये सवाल सही है कि उनका यह फैसला बिल्कुल राजनीतिक था। भई, उनके आका जो कहते हैं, वही वे सब करते हैं। आज भी समाज में कई ऐसी घटनाएं होती हैं जिनके खिलाफ साहित्यकारों को एकजुट होना चाहिए, लेकिन वो खड़े नहीं होते हैं। ये तो गलत है।
     
12.   अब बात सिनेमा की करते हैं। साहित्य के साथ सिनेमा से भी आपका मजबूत रिश्ता रहा है। कई सफल फिल्मों के लोकप्रिय गीत आपके नाम दर्ज हैं। लेकिन सिनेमा से फिर रिश्ता टूटा क्यों? क्या साहित्यिक रुझान वाले कवि-गीतकार या लेखक यहां लंबी पारी नहीं टिक पाते? उसकी बड़ी वजहें क्या हैं?

जवाब-सिनेमा से वाकई बहुत ही नजदीकी रिश्ता रहा है हमारा। लेकिन जब हमारे प्रिय संगीतकार दुनिया से चले गए तो मेरा भी मन वहां से उचट गया। एसडी बर्मन, रोशन जैसे संगीतकार सब गुजर गए तो मेरा दिल वहां नहीं लगा। और मैं वापस अपनी दुनिया में चला आया। भई, जो हमारे शब्दों के कद्रदान थे, वो ही जब नहीं रहे तो किसके लिए लिखता। कौन मेरे शब्दों की सराहना करता। लेकिन फख्र इस बात का है कि भले ही मैं सिनेमा की दुनिया में पांच साल रहा, लेकिन उस दौरान मैंने जो-जो लिखे, वे आज भी गाये जाते हैं। लेकिन यह सही बात है कि साहित्यिक रुझान वालों के लिए सिनेमा की दुनिया बहुत मुफीद जगह नहीं है। मेरे शब्द की कद्र मेरे कद्रदान ज्यादा शिद्दत से करते थे। वो शब्दों की गरिमा को समझते थे। लेकिन नए, अनजान लोग नई-नई डिमांड लेकर आते हैं, उस डिमांड में साहित्यकार लोग बहुत फिट नहीं बैठते।     

13.   फिल्मों की तरफ आप कैसे मुखातिब हुए थे? क्या आज भी फिल्म गीत लिखने की इच्छा रखते हैं?

जवाब- दरअसल 1954 में लखनऊ में एक कवि सम्मेलन हुआ था। उसी दौरान गाया था-कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे- तब लोगों ने कहा इसमें तो हिंदी भी है और उर्दू भी। ये नया प्रयोग लोगों को काफी अच्छा लगा था। मेरे गीत लोकप्रिय होने लगे थे। उसके बाद मैं मुंबई भी गया। कवि गोष्ठियों में गाता, सुनाता रहा। उस दौरान फिल्म से जुड़े लोग भी उन गोष्ठियों में बैठते थे। कुछ इस तरह से मेरे गीत फिल्मवालों के बीच भी पहुंचे। उसी दौरान एक गोष्ठी में देवानंद साहब ने मेरे गीत सुनकर कहा-आई लाइक योर ब्यूटीफुल लैंग्वेज। मैं प्रसन्न हुआ। तभी मुझे प्रेम पुजारी में गीत लिखने का मौका मिला। देव साहब को मेरे गीत बहुत पसंद आते थे। मुझे कई और फिल्मों में गीत लिखने का मौका मिला। बस सिलसिला चल पड़ा।  

14.   आपके लिखे गीत मुकेश, मन्ना डे से लेकर किशोर कुमार तक ने गाये हैं-क्या लगता है किस आवाज ने आपको अधिक अनुकूल भावाव्यक्ति दी?

जवाब- किशोर कुमार। उन्होंने हमारे गीतों को अपनी आवाज में सबसे अच्छी भावाभिव्यक्ति दी। असल में उनकी गायकी में अदाकारी भी थी, इसलिए वह अलग प्रभाव पैदा कर पाते थे। कमाल के गायक थे वो।

15.    आज के फिल्म गीत-संगीत सुन पाते हैं? सुनते हैं तो कैसा लगता है?

जवाब- आज के गीत सुनने के कम मौके मिलते हैं। लेकिन जितना भी सुनता हूं उनमें कुछ गीत अच्छे भी होते हैं। गुलजार या प्रसून जोशी-इन सबके गीत काफी अच्छे होते हैं। ये लोग काफी अच्छा लिख रहे हैं।

16.   आज के फिल्म गीतों में शब्द पर साज हावी हैं। यानी कि कलाकारों के स्वर के बदले इंस्ट्रूमेंट के स्कोर ज्यादा सुनाई देते हैं, पहले गीत और संगीत दोनों साथ-साथ एक समान प्रभाव उत्पन्न करते थे। लेकिन अब नहीं। ऐसे में फिल्म संगीत का क्या भविष्य देखते हैं? बहुत कुछ मशीनी और मैकेनिकल होता जा रहा है।  

जवाब-हां, यह बात सही है कि आजकल क्या है कि शोर बहुत हो रहे हैं, मेलोडी गायब हो गई है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आने वाले समय में शब्द खत्म हो जाएंगे। या संगीत खत्म हो जाएगा। ना कभी शब्द और संगीत खत्म होगा और ना ही इनका रिश्ता कभी खत्म होगा। हर दौर में इसमें उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। हां, यह उतार का दौर है, तो हो सकता है आगे चढ़ाव का दौर भी आएगा।  

17.   आज भी फिल्म गीत लिखने की इच्छा रखते हैं?  
जवाब- बिल्कुल इच्छा रखते हैं। लोग लिखवाते भी हैं। कुछ लोग रिकॉर्ड करके ले भी जाते हैं। लेकिन पता नहीं चलता कि वो उन गीतों का क्या करते हैं। बाद में कोई कुछ बताने नहीं आता। कुछ भी मालूम नहीं हो पाता।  

18.  युवावस्था में जिंदगी के संघर्ष के सभी रंगों को आपने आत्मसात् किया है, वह आपकी रचनाओं में भी झलकता है। सामाजिक तौर पर भी प्रखर हैं आपकी रचनाएं। अब भी कुछ ऐसा लिखना चाहते हैं जो अब तक लिख नहीं पाए?

जवाब- बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं लिख सका हूं। निबंध लिखना चाहता हूं। इसके अलावा मेरी इच्छा हाइकू लिखने की है। जापानी कविता होती है-हाइकू, जिसमें तीन पंक्तियां होती हैं। इसे लिखने का मेरा बहुत मन है। लेकिन समय नहीं मिल पाता। कभी सेहत तो कभी व्यस्तता लेखन को प्रभावित करती रहती है।   

19.  आपने नई उमर की नई फसल से फिल्म में गीत लेखन की शुरुआत की थी, आज आपके सामने फिर से नई उमर की नई फसलें यानी नए रचनाकारों की नई पीढ़ी हैं, उनसे क्या कहना चाहेंगे?

जवाब-बस यही कि,
    लेखन अश्रु की स्याही में डुबोकर लिखो,
          दर्द को प्यार से सिरहाने बैठाकर लिखो,
          जिन्दगी कमरे-किताबों में नहीं मिलती है,
          धूप में जाओ पसीने में नहाकर लिखो।

 (दिनांक 28.02.2016 को दिल्ली में यह बातचीत रिकॉर्ड की गई थी) 

पिक्चर प्लस जुलाई अगस्त, 2016 में प्रकाशित।

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