एक ‘रिजेक्टेड 'पिक्चर' की सुपर सक्सेस स्टोरी - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 26 मार्च 2017

एक ‘रिजेक्टेड 'पिक्चर' की सुपर सक्सेस स्टोरी

वो चार दिन: 'सात हिन्दुस्तानी' में काम मिलने की असली कहानी

 देखा था जो ख्वाब वही सिलसिले हुए...

फिल्मफेयर, माधुरी फिल्म टैलेंट कांटेस्ट और आकाशवाणी में रिजेक्टेड, स्व. इंदिरा गांधी की सिफ़ारिश और सुनील दत्त - नरगिस दत्त के  सहयोग से मिला काम लेकिन अपनी मेहनत और प्रतिभा से हासिल किया महानायक का अपना-सा मुकाम-जी हां, यही है अमिताभ बच्चन की सफलता का सूत्र वाक्य। मुंबई में शुरुआती दिनों में अमिताभ बच्चन के साथ रहे उनके मित्र राज ग्रोवर ने संस्मरणों की एक पुस्तक लिखी है-प्रस्तुत है उस किताब का एक अंश... 


अमिताभ बच्चन : 11 अक्टूबर, 1942 को जन्म

यह किस्सा जो 1967 में शुरू हुआ एक ऐसे नौजवान का है जिसने उस वक्त जो एक डगर पर चलना शुरू किया तो आज अड़तालीस साल गुजर जाने के बाद भी इसका सफ़र जारी है।
1967 में अंग्रेजी पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया के दो फिल्मी मैग्जिनों-फिल्मफेयर और माधुरी (हिन्दी) ने मिलकर एक स्कीम का एलान किया-

FILMFARE, MADHURI FILM TALENT CONTEST

ये जानने के बाद एक अच्छा और ऊंचे खानदान का चश्मो चिराग, अपनी मां का मुन्ना और लाडला जो कलकत्ता में एक अच्छी भली नौकरी से जुड़ा था लेकिन एक्टर बनने की जबरदस्त ख्वाहिश दिल में रखता था। ये बात उसके छोटे भाई को अच्छी तरह मालूम थी इसीलिए उसने जब ये इश्तेहार देखा तो बड़े भाई की तालीमो तरवीयत की सारी तफ्सील और एक तस्वीर फौरन टाइम्स ऑफ इंडिया को पोस्ट कर दिया। लगभग दस दिनों के अंदर जब ये जवाब रिजेक्टेड मिला तो नौजवान का सपना जैसे टूट ही गया। नौजवान इस वाकये के बाद जब उदास रहने लगा तो मां काम आई और कैसे काम न आती? आखिर मां जो ठहरी।
रिजेक्ट होने के दो ही हफ्तों के बाद नरगिस जी को दिल्ली से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का फोन आया। उन्होंने कहा-मेरी एक सहेली का बेटा बंबई जाकर फिल्मों में काम करने का ख्वाहिशमंद है, कोशिश कर रहा है लेकिन बात नहीं बन रही है। सहेली जैसी तो आप भी हैं मेरे लिए। सुनील जी से बात करके अगर बात बन जाये तो मेरी सहेली के बेटे को जितनी खुशी वहां कलकत्ता में होगी उतनी ही खुशी मुझे यहां दिल्ली में होगी।
अब जो होना था उसकी शुरुआत हो गई थी लेकिन ये बात कब बनेगी, यह खुद एक पहेली बनी हुई थी। और जब इंदिरा जी की सहेली तेजी बच्चन से नरगिस जी की फोन पर बात हुई तो दो हफ्ते बाद चार दिनों की छुट्टी लेकर बेटा ख्वाहिशों का सामान के साथ मुंबई आ पहुंचा। उसके पहुंचने से पहले ही दत्त साहेब व भाभी जी ने मुझे घर बुलाया और समझाते हुए कहा कि ना सिर्फ उस लड़के और उसकी ख्वाहिश का मुझे ख्याल रखना है बल्कि लोगों से मिलने मिलाने का काम भी मुझे ही करना है। उसका हुक्म था, मैं भला कैसे नहीं करता। वो जब आया तो नरगिस भाभी ने राज ग्रोवर कहके मेरा नाम लेते हुए मेरे बारे में बहुत कुछ कहकर मेरा उस लड़के से परिचय करवाया। अमिताभ बच्चन है उसका नाम, यह कहते हुए बताया कि ये फिलहाल तो चार दिनों की छुट्टी लेकर आया है लेकिन उसकी कोशिशों का सिलसिला पिछले कई महीनों से जारी है। वो लड़का अपने एक दोस्त के यहां कोलाबा में ठहरा था। इन चार दिनों में मैं कुछ कर पाया, वो यूं है...

लेखक व अमिताभ बच्चन के मित्र : राज ग्रोवर
पहला दिन
दत्त साहेब ने मुझे रात को उसे डिनर पर साथ में घर पर लाने को कहा। जब आठ बजे हम दोनों पाली हिल उनके घर पर पहुंचे तो देखा कि दत्त साहेब और भाभी जी एक पार्टी में डिनर के लिए बाहर गये हुए हैं। मैं हक्का बक्का रह गया कि यह क्या बात हुई?
लेकिन परेशानी बस दो मिनट में ही जाती रही। जब उनके बावर्ची गंगाराम ने मेरे हाथ में भाभी जी की चिट्ठी पकड़ाई, लिखा था-राज डिनर, यहीं पास में ही आरके नय्यर और साधना के बंगले पर पार्टी में आना पड़ गया। कोई ऐसी फिक्र की बात नहीं। तुम और अमिताभ दोनों वहां आ जाओ। हम इंतज़ार करेंगे। इस पार्टी में लोगों से मिलना जुलना भी हो जायेगा। इस लड़के को मैं खुद मिलवाउंगी।
अब मैं भी खुश और वो भी खुश।
दस मिनट में ही मैं और वह दोनों बंगला नंबर अड़तीस, पाली हिल पर पैदल चलते हुए पहुंचे तो पहला शख्स जो हमें वहां मिला वह दत्त साहेब का एक दोस्त था जिसे उन्होंने फिल्म ये रास्ते हैं प्यार केका प्रोड्यूसर बनाया था। नाम था-केवल कपूर। जो बागीचे में किसी से बातचीत में मशरूफ़ था। अंदर पार्टी की अच्छी खासी धूम थी। मैंने अमिताभ को मिलवाने से पहले हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया मगर केवल कपूर का हाथ जहां था वहीं रहा। उसने हाथ को नहीं मिलाया मगर कंधे पर हाथ रख कर कहा-यहां कैसे आना हुआ तेरा? यह बंगला हीरोइन साधना और प्रोड्यूसर, डायरेक्टर आरके नय्यर का है। और अंदर पार्टी में शत्रुघ्न सिन्हा, संजीव कुमार, वहीदा रहमान, सुलीन दत्त, नरगिस और बड़े-बड़े लोग मौजूद हैं और तू यहां कैसे? और यह कौन है? अपनी औकात में रहना सीखो। आलतू-फालतू चले आते हैं। चलो, चलते फिरते नजर आओ।
मैंने भाभी जी की वह पर्ची तो जेब में ही रहने दी परंतु जो हाथ मिलाने के लिए बढ़ाया था उससे उसका गिरेबान पकड़ के उसे पूरी तरह झिंझोर दिया। केवल कपूर के लिए ये शायद आश्चर्यजनक था, लेकिन गुस्सा जब सिर पर चढ़ जाता है तो सामने वाला कौन है और क्या,  समझने की जरूरत बाकी नहीं रहती। मैंने भी कोई कोशिश ना की, यह याद रखने की कि वे दत्त साहब के दोस्त हैं या कोई और। इस दौरान के हंगामे में अमिताभ जरा दूर खड़ा हो गया और शोर सुन के दत्त साहब बाहर आये। उन्हें जब हमारी औकात का जिक्र का पता चला तो पैश्तर इसके कि केवल कपूर कुछ सफ़ाई में कहता, जो वह कहना चाहता था; दत्त साहब अंदर गये और मिस दत्त को साथ लिया और केवल कपूर पर नजर डाले बगैर हम तीनों को गाड़ी में बिठा के बंगला नंबर अड़तीस से ड्राइव करके बंगला नंबर अट्ठावन पाली हिल ले आये। अब हम चारों की भूख का गंगाराम ने ही ख्याल रखा और खूब रखा।

दूसरा दिन          

भाभी जी ने बड़े प्रोड्यूसर से मिलने का वक्त मेरे लिए पहले ही ले रखा था सुबह ग्यारह बजे, साथ ही यह भी बता दिया कि एक नया लड़का है जोकि मशहूर लेखक और कवि हरिवंश राय का बेटा है, फिल्मों में काम के सिलसिले में बंबई आया हुआ है। वह राज ग्रोवर के साथ होगा। हम दोनों ठीक ग्यारह बजे उनके दफ़्तर पहुंचे। अभी हमने कदम अंदर रखे ही थे कि सामने कुर्सी पर बैठे हुए प्रोड्यूसर साहब मेरे साथ आये हुये लड़के को देखकर अंग्रेजी में बोले-

No heroin would like to work with you. You are very tall. You should follow your father and write poetry like him.  

हम लगभग ग्यारह मिनट तक वहां दफ्तर में रहे। ग्यारह में से सात-आठ मिनट तक मुझसे बात करते रहे, मौजू था दत्त साहब और नरगिस जी। सुनील कैसा है? कौन सी नई फिल्म बना रहा है? कितनी फिल्में हैं उनके पास? नरगिस जी मेरा नमस्ते कहना। ये सब बातें मुझसे ख्वाहमखाह होती रहीं। मगर वे बातें नहीं हो सकीं जिसके लिए मैं मुलाकात का वक्त लेकर अमिताभ को यहां लाया था। ये दफ्तर था राजश्री फिल्म्स का और वो मशहूर प्रोड्यूसर थे श्रीमान ताराचंद बड़जात्या।

इस बेसिर पैर की बात के बाद गुफ़्तगू खत्म हो गई और हम दोनों का दूसरा दिन भी यूं ही खत्म हो गया। अब दो ही छुट्टियां उस लड़के के पास बची थीं उसकी कलकत्ता की नौकरी की।

उस लड़के की आमद के दस बारह दिन पहले मैं और नरगिस जी बी.आर.चोपड़ा साहब के घर उसकी वह तस्वीर लेकर पहुंचे, उसके छोटे भाई अजिताभ बच्चन (बंटी) ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के दफ़्तर फिल्मफेयर और माधुरी के एडिटर को भेजी थी। मैं नरगिस जी के कहने पर यह तस्वीर लेने माधुरी के एडिटर साहब अरविंद कुमार से मिला। वह मेरे पुराने दोस्तों में से थे। उन्होंने वह फ़ाइल मंगवाई जिसमें उन सबकी तस्वीरें थीं जो रिजेक्ट कर दी गई थीं। और कलकत्ता से पहुंची हुई तस्वीर मुझे पकड़ा दी गई। दूसरे दिन वही तस्वीर हमने बी.आर.चोपड़ा जी को पकड़ा दी, लेकिन अभी उनसे सिफ़ारिश का जिक्र किया ही न था कि उन्हेंने एक झलक देखकर दो सेकंड बाद तस्वीर मेरे हाथ में खामोशी से थमा दी। उनके चेहरे के भाव से यह अंजादा लगाना मुश्किल न था कि उनकी राय भी मैग्जिनों के एडिटरों से अलग न थी। अब नरगिस जी ने उस सिफ़ारिश का जिक्र किया तो वह हैरानगी जो मैंने उनकी आंखों में देखी, भुलाये न भूल पाउंगा कभी। उन्होंने चाय मंगवाई साथ में बिस्कुट भी और फौरन टेलिफोन किया प्रोड्यूसर, डायरेक्टर मोहन सहगल को और दरख्वास्त किया कि आपकी फिल्म की शूटिंग्स के दौरान एक लड़के का स्क्रीन टेस्ट लेना चाहते हैं। जिस दिन भी आपको सहूलियत हो मुझे फोन पर बता दीजिएगा। किस दिन और किस वक्त वह आये स्क्रीन टेस्ट के लिए। इतना जरूर कहूंगा कि पर्सनाल्टी जरा हट के है इस लड़के की। चाय का दौर खत्म होते ही हम दोनों वहां से चल दिये।

अगले ही हफ़्ते जब वो दिन और वक्त तय हो गया तो नरगिस जी ने प्रधानमंत्री जो फोन करके कहा कि अपनी सहेली को कलकत्ता फोन करके कहें कि लड़का छुट्टी लेकर फौरन बंबई पहुंचे। दो ही दिन बाद वह लड़का चार दिनों की छुट्टी लेकर बंबई पहुंच गया। कोलाबा में अपने फैमिली फ्रेंड के घर सामान रखके उसने नरगिस जी को फोन किया कि कब आऊं? जबाव मिला कि फौरन आ जाओ। और उसी वक्त नरगिस जी ने मुझे फोन किया कि मैं बंगले पर पहुंचूं।

दो दिन की तफ़सील आप जान चुके हैं। और तीसरे दिन की हालत सुनिये।

तीसरा दिन

ग्यारह सितंबर 1967 का दिन सुबह 11 बजे का वक्त।
हम दोनों मोहन सहगल साहब की फिल्म साजन की शूटिंग्स पर रूप तारा स्टूडियो, दादर 10.30 बजे सुबह ही टैक्सी लेकर पहुंच गये। शूटिंग्स पर मैं यह जानकर बहुत खुश हुआ कि उस फिल्म का हीरो मेरा पुराना जिगरी यार मनोज कुमार है। सबसे पहले मैंने मनोज से उसका परिचय करवाया तो उसके सांवले चेहरे पर कुछ गुलाबी रंग चमकता नजर आया। हीरो हमको अपने मेकअप रूम में ले गया। चाय, पानी का जरा दौर चला। मनोज जी जानकर बहुत खुश हुए कि ये लड़का उसके चहेते और मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन जी का बेटा है। खुशी के साथ थोड़ी सी हैरानी भी थी उसके चेहरे पर। फिर मनोज बोला-उसकी धीमी आवाज़ और खामोश चेहरा मानों बादल गरज के बोल रहा हो, यह कहते कहते अपने चेहरे पर हाथ रखते हुए कहा – कुछ भी हो वो बात तो है इस लड़के में जिसका होना बहुत जरूरी है उसके लिये जो बनने की ख्वाहिश है इसकी।

जब सेट पर आने के लिए बुलावा आया तो हीरो ने हमसे वहीं बैठे रहने को कहा और ये कहते हुए कि वे सहगल साहब को बता देगा कि हम आ चुके हैं, चला गया। लगभग बीस मिनट बाद मनोज कुमार, मोहन सहगल साहब को लेकर अपने मेकअप रूम में आया। और बैठने से पहले ही अमिताभ को डायरेक्टर साहब से मिलवा दिया। माहौल अच्छा रहा। सहगल साहब का चेहरा भी वही बता रहा था जो कुछ देर पहले मनोज कुमार के चेहरे पर पढ़ा था। पांच मिनट तक सहगल साहब हमसे बातचीत करते रहे। फिर मुस्कराते हुए उस सीन को शूट करने सेट पर चले गये जिसमें हीरो की जरूरत नहीं थी। साथ ही कह गये कि लंच के बाद स्क्रीन टेस्ट कर लेंगे। मेकअप रूम से जाते-जाते मुझे सेट पर आने का इशारा कर गये। मैं जब सेट पर पहुंचा तो शत्रुघ्न सिन्हा पुलिस इंस्पेक्टर की वर्दी पहने अपने डायलॉग की रिहर्सल में मशरूफ़ था। मोहन सहगल साहब ने अपनी राय जाहिर करते हुए पहले तो मुझसे एक सवाल किया क्या सोचकर यह लड़का यहां एक्टर बनने आया है? मैं हैरान हूं कि ऐसा भी क्या दिखा जो नरगिस जी ने जो फोटो लेकर चोपड़ा जी के घर जा पहुंची। खैर जाने दो, खाना वाना खा लो। लंच के बाद दो सीन हैं, मुक्कमल हो जाये तो बुला लेंगे।

एक, डेढ़ बजे का वक्त होगा जब लंच टाइम हुआ प्रोड्यूसर तेजनाथ आए और हीरो मनोज कुमार को साथ ले गये। हमने लंच भी न खाया था। जाते वक्त कह गये थे कि लंच कर लो, मैं एक घंटे में आ जाऊंगा। हम दोनों हीरो के मेकअप रूम में बैठे के बैठे रह गये। हमसे किसी ने भी खाने के लिए नहीं पूछा। मैं अमिताभ को लेकर रूपतारा स्टूडियो से श्री साउंड स्टूडियो के सामने अपने करीबी दोस्त गुरपाल सिंह जिसे सब काका बुलाते थे, के गीता रेस्टोरेंट लंच करने के लिए चलते-चलते पहुंचे। उनका कहना था खाओ, पैसे जब होंगे दे देना। काका के इस रेस्टोरेंट में मेरा अकाउंट चलता था। यहां ज्यादातर टैक्सी ड्राइवर या फिर वे लोग आते थे जो कुछ बनने का इरादा लेकर मुंबई आये थे। फिर फिल्मी दुनिया में जद्दोजहद कर रहे थे। उनकी जेबें तो हल्की लेकिन उम्मीदें भारी भरकम होतीं। सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार, मनोज कुमार, धर्मेंद्र, प्रेम चोपड़ा, आनंद बख्शी, जगजीत सिंह (गजल गायक), प्रकाश मेहरा इन सबकी दाल रोटी का मेरी तरह यहां अकाउंट रहा है।
जब हम खाना खा रहे थे तो खाते खाते मैं यूं ही पूछ बैठा कि राजेश खन्ना से क्या मिलना चाहोगे? मैं जानता था कि श्री साउंड स्टूडियो में वह फिल्म डोली की शूटिग्स कर रहे थे। यह सुनते ही हाथ का निवाला मुंह तक नहीं पहुंचा वह प्लेट में जा पड़ा। अमिताभ बच्चन खाना छोड़कर खड़ा हो गया और इसरार करने लगा कि अभी चलो। मैं टस से मस ना हुआ। और जब उससे कहा खाने की इज्जत करना सीखो तो पहले तो वह मेरी हिदायत पर हामी भरते हुए मुस्कराया और पूरा खाना और फिर सामने स्टूडियो में उसे ले जाकर राजेश खन्ना से काका कहते हुए उसे मिलवाया तो उसे जैसे यकीन ही न आया। उसे हैरानी हुई कि इतने बड़े सुपर स्टार को मैं काका कहकर मुखातिब हूं। जब मैं बताया कि काका, यह लड़का मशहूर लेखक, कवि हरिवंश राय बच्चन का बेटा अमिताभ है। अमिताभ ने हाथ मिलाने के लिए इस तरह अपना हाथ बढ़ाया जैसे कोई भक्त अपने भगवान से प्रसाद मांगता हो मगर काका ने सिर्फ इतना ही कहा-ठीक है, ठीक है। वह भक्त प्रसाद से महरूम रहा फिर भी सुपर स्टार राजेश खन्ना को अपने सामने खड़ा देखर बहुत खुश था। और अब जबकि घड़ी में तीन बजने को थे हम वापस रूप तारा स्टूडियो पहुंचे। वहां शूटिग्स जोरों पर चल रही थी। सहगल साहब ने जब मुझे देखा तो मुझसे कहा कुछ भी डायलॉग तुम इसको लिख के दे दो, स्क्रीन टेस्ट है। कोई फिल्म का सीन तो है नहीं। मैं मरता क्या नहीं करता। जब कुछ समझ नहीं आया तो मेरा हाथ जेब में पहुंचा और वह खत तो मैंने अपनी गर्ल फ्रेंड को दार्जिलिंग भेजने के लिए लिख रखा था इस बच्चन के चक्कर में पोस्ट नहीं कर पाया था। उस वक्त वह खत बहुत काम आया। इन दिनों मैं सिर्फ शुदा ही था ना कि शादीशुदाऔर यह लड़का अमिताभ भी मेरी ही तरह था। उस खत में मैंने काफी कुछ रोमांटिक अंदाज में लिखा था। वही की वही लाइनें पहले सहगल साहब को देखने के लिए वह कागज दिया और जब उनके मुख से ओके निकला तो सहगल साहब ने अमिताभ के हाथ में पकड़ा दिया। मैंने सिर्फ एक तब्दिली की थी। उस खत में मेरी गर्लफ्रेंड का नाम रोजी था मैंने कागज पर उसे निम्मो के नाम से बदल दिया था। इस स्क्रीन टेस्ट के लिए जो इबारत मैंने लिखी थी वह कुछ इस तरह थी :  तुम जब भी मुझे यूं देखती हो मैं सब भूल जाता हूं कि मै कौन हूं क्या हूं, कहां हूं? कुछ समझ में नहीं आता। नजारा चौदहवीं के चांद का हो या ताजमहल का, खुदा जानता है तेरा मेरे सामने होने से बढ़कर कुछ नहीं है।
इसके अलावा उसने अपने पिताश्री की एक मशहूर कविता मधुशाला बिना किसी कागज के बहुत ही कमाल से अपने डायलॉग में शामिल किये। सब बहुत खुश हुए। जब मोहन सहगल जी ने अपनी गाड़ी की तरफ जाने से पहले उस लड़के अमिताभ बच्चन को ऑल द बेस्ट कहा। सहगल साहब अपने घर की तरफ रवाना हुए और हम दोनों का आलम यह था कि दर्द भरे दिल की जबां...जायें तो जायें कहां?
वह कोलाबा और मैं बांद्रा। अपने-अपने इन ठिकानों की तरफ रवाना हुए। जो हमारे होते हुए भी हमारे अपने ना थे। तीसरा दिन छुट्टी का भी खत्म हुआ।

चौथा दिन

आखिरी चौथे दिन की छुट्टी दोपहर से रात के खाने तक राज ग्रोवर के साथ 58, पाली हिल बांद्रा में दत्त साहब और नरगिस भाभी के बंगले पर गुजार दी गई। अगले ही दिन वह लड़का अमिताभ बच्चन अपनी नौकरी पर हाजिरी देने के लिए रवाना हो गया। पूरी फिल्म इंडस्ट्री में सुनील दत्त साहब अपने चंद उन दोस्तों और यारों को जो इस फिल्मनगरी में बहुत ऊंचा नाम कमाये हुये प्रोड्यूसर और डायरेक्टर थे, को जब अमिताभ की तस्वीर दिखाते हुए इसका जिक्र किया करते तो यकीन जानिये मजाक का मौजू बन जाते।

अमिताभ के कलकत्ता वापस जाने से पहले दत्त साहब ने इससे वादा किया कि उनकी अगली फिल्म में अगर कोई अच्छा मर्कजी रोल होगा तो वह उसे जरूर देंगे। यह वादा उस वक्त पूरा हुआ जब अजंता आर्ट्स (दत्त साहब की प्रोड्यूसर कंपनी) की अगली फिल्म रेशमा और शेरा शुरू हुई। अमिताभ बच्चन इसमें शामिल रहा। इस फिल्म के साथ एक फिल्म में भी उसे काम करने का मौका मिला। मशहूर और कामयाब फिल्म राइटर और फिल्म मेकर ख्वाजा अहमद अब्बास साहब की फिल्म सात हिन्दुस्तानी में, यह फिल्म तो हमारी फिल्म के बाद हुई लेकिन रिलीज हुई पहले।
रेशमा और शेरा फिल्म पर बहुत पैसा और मेहनत खर्च हुई। तीन महीनों तक राजस्थान के रेगिस्तानों में हम सब तंबुओं में रहते हुए शूटिंग्स करते रहे। फिल्म जब रिलीज हुई तारीफ तो मिली मगर कामयाबी न मिल पायी। फिल्म जब शुरू हुई तो अमिताभ की आवाज का शोर हो गया। पूरी फिल्म इंडस्ट्री में दो नामचीन फिल्ममेकर और एक्टर थे-जो इस लड़के अमिताभ बच्चन की हट के पर्सनाल्टी और कमाल की आवाज़ की कदर करते थे और करते रहे। एक सुनील दत्त और दूसरे मनोज कुमार। तीसरा नाम अगर मैं अपना लिखूं तो लोग अपने मुंह मियां मिट्ठू तोहमत मुझ पर थोप देंगे। जो मुझे मंजूर नहीं।

मरहूम राइटर अली रज़ा साहब जिन्होंने फिल्मी दुनिया में जितना नाम कमाया, उतना ही इल्मी दुनिया में भी मारूफ़ नाम था। मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि मेरा हमेशा उनसे सगे भाइयों जैसा रिश्ता रहा। और मेरी बीवी शशि से निम्मी साहिबा को बिल्कुल बहनों जैसा। फिल्म रेशमा और शेरा की शूटिंग्स के दौरान एक बात ऐसी हुई जिससे मुझे इत्तिफाक न था। फिल्म के राइटर अली रजा साहेब और सुनील दत्त साहेब ने काफी सोच विचार के बाद तय किया कि अमिताभ के किरदार को इस तरह पेश किया जाये कि लोगों को इस पर तरस खाते हुए इससे प्यार हो जाये। इसलिए किरदार को गूंगा बना दिया। छोटा मुंह बड़ी बात की तरह मैंने इससे इख्तेलाफ़ भी किया लेकिन कुछ हासिल ना हुआ। इंतेहाई मादबाना मोजरत के साथ आज भी दत्त साहब और अली रज़ा साहब के इस फैसले से मुझे इत्तेफाक नहीं है।
  
इसी दौरान डायरेक्टर ऋकेश मुखर्जी की फिल्म गुड्डी रिलीज हुई और खूब कामयाब रही। फिल्म के मर्कजी में इस फिल्म की हीरोईन जया भादुड़ी ने कमाल का रोल निभाया था। हिंदुस्तान भी में कोई प्रचार ऐसा ना था जिसमें इस फिल्म के चर्चे और जया भादुड़ी की तारीफें ना हो। ऋषिदा का दफ्तर कहूं या अड्डा, बात एक ही है वह अंधेरी में मोहन स्टूडियो था जो उनके गुरु बिमल राय का भी दफ्तर था और मेरे गुरु कृशन चोपड़ा का भी। मेरा तो एक तरह से मोहन स्टूडियो पोस्टल एड्रेस बन गया था। ऋषि दा की बदौलत जो मकाम जया भादुड़ी की फिल्म गुड्डी से मिला वही रुतवा ऋषि दा की फिल्म आनंद से अमिताभ बच्चन को भी मिला। इसी मोहन स्टूडियो में दोनों अपने-अपने रुतवे के साथ मिलते रहे और वहीं दोनों ने बतौर हीरो हीरोईन दो फिल्में एक नजर और बंसी बिरजू साइन कर ली।

दोनों ही फिल्मों का बिजनेस टोटल नफ़ी में रहा। इस हीरो की दो, एक फिल्में और भी इसी तरह नुकसान का सौदा साबित हुई। जिनमें एक परवाना थी। इन फिल्में का जिक्र भी कम होता है और वह याद भी नहीं रहती। मगर हीरोईन जया भादुड़ी के काम की सराहना बराबर होती रही। ऋषि दा की फिल्म बावर्ची में राजेश खन्ना के साथ जो किरदार निभाया है वह भी खूब है इसी तरह डायरेक्टर नरेंद्र बेदी की फिल्म जवानी दीवानी में रणधीर कपूर के साथ भी खूब काम किया।
अंग्रेजी की एक मैग्जिन ने मेरे मुंह से फिसला एक जुमला लिख मारा-

Jaya Bhaduri is saleable and Amitabh is available.   

खैर, यह तो एक मजाक था चटपटी मसालेदार चाट की तरह, मगर हकीकत में इन दोनों के मेल मिलाप को देखता रहा, वह कुछ और ही था। मोहन स्टूडियो के सांउड रिकॉर्डिंग रूम के पीछे उन दोनों का एक साझा मेकअप रूम था। कभी वहां नज़र आते कभी इससे जरा आगे एक छोटा सा थियेटर था जहां ट्रायल शोज होते थे, इसमें मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा। उनकी नेक और पाक मोहब्बत का यह सिलसिला मेरी आंखों ने देखा है। ऐसे में उनकी शादी हो जाना दूर की बात नहीं लगती थी बल्कि उनकी मोहब्बत पर एक मुहर लग गई। उन दिनों अमिताभ की फिल्म सात हिन्दुस्तानी का एक साथी एक्टर अनवर अली जो मशहूर व कामयाब एक्टर व फिल्ममेकर महमूद का छोटा भाई था, उसने अमिताभ को अपने बड़े भाई से मिलवाया। इसके बाद कुछ ऐसे बनती चली गई कि अमिताभ का पोस्टर अड्रेस महमूद भाईजान हो गया। साथ ही उनकी फिल्म बॉम्बे टू गोवा शुरू हुई जिसमे अरुणा ईरानी बतौर हीरोईन और अमिताभ हीरो बने। यह फिल्म अच्छी खासी कामयाब रही। मैं अपने करीबी दोस्त फिल्म डायरेक्टर प्रकाश मेहरा से अमिताभ का जिक्र काफी दिनों से करता आ रहा था लेकिन यह सिलसिला बस जिक्र तक ही रहा। बात कुछ आगे ना बढी। प्रकाश मेहरा ने राइटर जोड़ी सलीम जावेद से एक कहानी सुनी जो उन्हें बहुत पसंद आई। हीरो की तलाश का सिलसिला शुरू हुआ। सबसे पहले धमेंद्र से बात की गई। उसे कहानी कुछ पसंद ना आई। प्रकाश मेहरा ने धमेंद्र से जब इनकार सुना तो कहानी देव आनंद को सुनाई गई। उनका एतराज यह था कि पूरी कहानी की स्क्रीप्ट में हीरो के लिए गाने का कोई गुंजाईश नहीं है जबकि प्राण साहब के लिए है। यहां भी ना सुनना पड़ा। फिर जब अमिताभ का जिक्र आया तो प्रकाश मेहरा ने बात करने से पहले डिस्ट्रीब्यूटरों को बुलाकर उनसे अमिताभ के बारे में सलाह मशवरा करने का इरादा किया ही था कि एक खबर यह आई कि प्रोड्यूसर डायरेक्टर कुंदन कुमार की फिल्म दुनिया का मेला जो तकरीबन आधी शूट हो चुकी थी, उनके डिस्ट्रीब्यूटरों ने अगली इंस्टालमेंट का चेक देने के लिए शर्त रख दी कि वह कुंदर कुमार को चेक इसी शर्त पर देंगे कि फिल्म का हीरो अमिताभ को बदल कर उस की जगह कोई ऐसा हीरो लें जिसका नाम मार्केट में बिकता हो।
लीजिए शर्त मंजूर कर ली गई। अमिताभ फिल्म से बाहर और संजय खान अंदर। 
इससे दिल को करंट का इतना बड़ा झटका लगा कि अमिताभ शहर छोड़ के वापस जाने की सोचने लगा तभी जया भादुड़ी और गुलजार ने ढाढस बधाया कि वह हिम्मत ना हारे। मुझसे भी इस वाकये के बाद राब्ता हुआ। मैंने कहा फिल्मों की कहानियां तो पहले लिखी जाती हैं लेकिन तुम्हारी कहानी का सफर शुरू हो चुका है। देखना एक दिन ऐसा आएगा केवल तू आसमानों में उड़ेगा। जिस तरह तू आज मेरे सामने खड़ा है एक दिन आंखों पर दूरबीन लगाकर तुझे आसमान की ऊंचाई पर तलाश करना पड़ेगा। तेरी आवाज का जादू एक दिन सर चढकर जरुर बोलेगा। बात करते करते मेरी नज़र दोनों हाथों से ताली बजाते हुए आसमान की तरफ थी, और जब नज़र वहां से उतर कर उसके चेहरे पर पड़ी तो लगा कि करंट का वह झटका गायब हो चुका है। अब शहर छोड़कर वापस जाने का एहमकाना ख्याल दिल से जा चुका था। इलाहबाद में पैदा हुए इस बच्चे को अल्लाह ने इसी शहर में आबाद कर दिया। और उसी ने ना जाने कौन-कौन सी लकीरें उसके हाथों की अदल बदल कर दी कि जो काम बन नहीं रहा था वह बनता नजर आने लगा। जैसा कि प्रकाश मेहरा ने बताया था कि जया भादुरी इन दिनों प्रोड्यूसरों और डिस्ट्रीब्यूटरों की पसंदीदा हिरोईन थी। उसने सिफारिशतन जब अमिताभ का नाम लिया तो पता चला कि मेहरा साहब ने धर्मेंद्र और देव आनंद के इनकार के बाद राज कुमार साहब के सेक्रेटी महेंद्र ने उनकी तरफ से इनकार का संदेशा प्रकाश मेहरा के हम निवाला व हम पियाला दोस्त सत्यन पाल चोधरी को यह बताते हुए दिया कि प्रकाश मेहरा चूंकि बाकायदगी से अपने सर पर सरसों का तेल लगाते हैं इसलिए इस डायरेक्टर से बात बन ना सकेगी। क्यूंकि राज साहब को सरसों के तेल से एलर्जी है। यह अजीब व बेवकूफाना वजह जानने के बाद पहले तो बहुत हंसी आयी और उसके बाद उतना ही गुस्सा भी आया। चूंकि फिल्म में हिरोईन के लिए जया भादुरी का नाम तय हो चुका था तो फिल्म के लेखक सलीम जावेद ने सलाह दी कि क्यों ना इस अमिताभ को ही आजमाया जाए। अगर बात ठीक ठाक लगे तो क्या मजाल है केवल वह हां ना कहे। एक्टर प्रोड्यूसर महमूद की फिल्म बॉम्बे टू गोवा तकरीबन मुकमल हो चुकी थी, जिसमें अरुणा ईरानी के साथ हीरो अमिताभ था। हीरो के काम को परख के अंदाजा करना था। प्रकाश मेहरा और जया भादुरी के लिए फिल्म का ट्रायल शो रखा गया। फिल्म का एक गाना जो चलती बस में अमिताभ और अरुणा ईरानी पर फिल्माया गया था, उसे देखते ही वह बात बन गई, जो बन नहीं रही थी।
फिल्म शुरू हुई। इस फिल्म का नाम था जंजीर जब मुकम्मल हो कर यह फिल्म रिलीज हुई तो कामयाबी के मैदान में यूं दौड़ी कि मिल्खा सिंह भी क्या दौड़ा होगा। प्रकाश मेहरा, हीरो अमिताभ बच्चन, हीरोईन जया भादुरी और प्राण साहब को लेकर कलकत्ता में फिल्म के प्रीमियर शो के बाद जो Reaction देखा वह काबिले जिक्र है। उस होटल की छत से जहां सब ठहरे थे, नीचे का मंजर ऐसा था कि सड़क पर तकरीबन दस हजार की तादाद का हुजूम होगा। सब तरफ से एक ही शोर सुनाई दे रहा थाः अमिताभ बच्चन...अमिताभ बच्च्न...अमिताभ बच्चन।
बकौल प्रकाश मेहरा साहब कि अपने हीरो की जो हालत देखी वह ऐसी थी कि सब ठंड से कांप रहे हों। आज जिंदगी में पहली बार देखा कि जब खुशी हद को पार कर ले तो कैसी कंपकंपी बन जाती है। इस खुशी का इस ठंड से क्या मुकाबला। खुशी के साथ हीरो मुंह खोले हैरान खड़ा था और दोनों आंखों से आंसुओं की गंगा जमुना बह रही थी। उसके हाथों की लकीरों में अदल बदल करते हुए कुदरत ने कामयाबी की ऐसी जंजीर पहना दी कि फिर उसे कोई ना तोड़ सका। तोड़ने वाले खुद टूटते गए लेकिन जंजीर का तोड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। फिल्म जंजीर की इस कामयाबी के साथ प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई की कई फिल्में ऐसी आईं जिन्होंने कामयाबी के झंडे लहराए और उनका लहराना इसलिए मुमकिन हो सका कि इस झंडे में डंडा अमिताभ बच्चन था।



अमिताभ के इस लम्बे सफर में स्टेशन तो बहुत से आए लेकिन बड़े जंक्शन जहां से गाड़ी बदलनी पड़ती है, प्लेटफार्म बदल कर गाड़ी पकड़ना पड़ती है वह जंक्शन यह चार नाम है- ऋषिकेश मुखर्जी, प्रकाश मेहरा, मनमोहन देसाई और यश चोपड़ा। इस लम्बे सफर के लिए टिकट तो उसे रूपतारा स्टूडियो के स्क्रीन टेस्ट से ही मिला था। जिसके बाद वह अपनी नौकरी पर कलकत्ता वापस चला गया था। जब इस स्क्रीन टेस्ट के बारे में जानने के लिए (क्या हुआ) मैं दो दिन बाद मोहन सहगल साहब के दफ्तर पहुंचा तो साहब तो दफ्तर में ना थे लेकिन उनका असिस्टेंट डायरेक्टर सरदार बगा जरूर मिला। पैश्तर इससे मैं कोई सवाल करता बग्गा जी ने अंग्रजी में जो कहा वह कुछ यूं था:

It was waste of time and waste of our raw stock.

यानी इस लड़के का कुछ नहीं हो सकता। अमिताभ तो कलकत्ता अपनी नौकरी की सीट पर वापस पहुंच चुका था। उसे इंतजार मेरे टेलिफोन का था। मैंने फोन किया तो मगर इस बात का जिक्र (क्या हुआ) करना मैंने मुनासिब ना समझा और झूठ बोल दिया कि अभी दो चार दिन और लग जाएंगे।
इत्तेफाक की बात है कि अगले ही दिन सुनील दत्त साहब को एक जरूरी मिटिंग के सिलसिले में कलकत्ता जाना तय हो गया। मेरा अपना प्रोग्राम दार्जिलिंग जाने का पहले से ही तय था। वहां पहुंचने के लिए कलकत्ता से होकर ही जाना पड़ता है। दत्त साहब के साथ ही मैं उसी फ्लार्इट से कलकत्ता पहुंच गया। वह ग्रैंड होटल में ठहरे और मैं अपनी कज़न के घर। दार्जिलिंग जाने के लिए मेरी फ्लार्ईट अगले दिन थी। शाम को दत्त साहब का फोन आ गया कि कल सुबह होटल पर आ जाओ। दोपहर को अमिताभ की माताजी लंच पर आ रही हैं। तुम्हारा मौजूद होना जरूरी है। अब मैं भला क्या करता, मेरी गर्ल फ्रेंड रोजी दार्जिलिंग में मेरे इंतजार में थी मैंने फौरन उसे फोन घुमाया यह कहते हुए कि दो दिन बाद मैं फोन कर के जरूर पहुंच जाऊंगा। फोन पर खामोशी में उसकी उदासी मुझे सुनाई तो ना दी लेकिन दिखाई देने लगी।
दूसरी सुबह मैं ग्रैंड होटल दत्त साहब के पास पहुंच गया। दोपहर के ठीक एक बजे तेजी बच्चन जी भी पहुंच गईं. बातचीत का सिलसिला जब शुरू हुआ तो पहला ही जुमला उनका था कि मेरे मुन्ने के लिए कुछ करना ही होगा आप को।
दत्त साहब ने मेरी तरफ देखते हुए मेरे बारे में उनसे इतना कुछ कह डाला कि लंच के बाद तेजी जी बज़ीद हो गईं कि मैं उनके मुन्ना से जरूर मिलूं। इस जिद में एक मां का अपने बेटे के लिए बहुत प्यार था, चाहत थी। उन्होंने मेरी कज़न का घर का पता लिखा और कहा कि कल शाम लगभग साढ़े पांच बजे तक काम के बाद मुन्ना वहां पहुंच जाएगा। चाय के मुख्तसर से दोरानिए के बाद दत्त साहब जिस मिटिंग के लिए कलकत्ता आए थे वहां चले गए और मैं कज़न के घर आ गया।
अगले दिन मैं अपनी गर्ल फ्रेंड के लिए कुछ गिफ्ट वगैरह खरीद कर भागा-भागा साढ़े पांच बजे कजन के घर पहुंचा तो देखा कि अमिताभ बच्चन पंद्रह मिनट पहले वहां पहुंच चुके थे। चाय के साथ हमारी गुफ्तगू शुरू हुई तो मैंने अपने दिल में उसके लिए प्यार महसूस किया। उसके अंदाज में भी मेरे लिए बेहद इज्जत थी। उसके इसरार पर अगले दिन मैं उसके दफ्तर Bird & company पहुंचा। उसका जोश देखकर चाय की चुस्कियों के दौरान मैंने उससे कहा, लगे रहो मुन्ना भाई, हिम्मत मत हारना कभी और मुम्बई जब दफ्तर से छुट्टी लेकर आना तो हमसे जो भी हो सकेगा करेंगे। हम भी तुम्हारे साथ लगे रहेंगे यह तुमसे वादा रहा। तुम बिलकुल फिक्र ना करना। आगे ऊपर वाले की मर्जी, वह तो होकर रहेगा। मगर तुम अपनी नौकरी हरगिज ना छोड़ना। यह कहने के बाद मैं उठा तो वह मुझे बाहर तक छोड़ने आया। उसकी कंपनी का डाईवर मुझे कजन के घर पहुंचाने के लिए मेरा इंतजार कर रहा था। मैंने उसका शुक्रिया अदा किया। मेरे दिल ने कहा कि वह कामयाब जरूर होगा और वह हुआ। मुझे यकीन है उसके दिल में मेरी इज्जत आज भी उसी तरह बाकी है जैसी कल थी। हालांकि पहले वह मुन्ना था और आज शहंशाह है। मैं जो कुछ भी इसके बारे में अब तक कहता और लिखता रहा हूं उसकी हैसियत यह है कि उस वक्त वह एक आम सा बंदा था लेकिन उसकी अहमियत थी। वह मशहूर लेखक और कवि हरिवंश राय बच्चन का बेटा था जो जवाहरलाल नेहरू के करीबी दोस्त थे। उसकी मां तेजी बच्चन इंदिरा गांधी के करीबी सहेली थी और दोनों अमिताभ और अजिताभ इंदिरा जी के दोनों बेटों संजय गांधी और राजीव गांधी के दोस्त और हम जमात थे। इस ताल्लुक से एक किस्सा मुझे याद आ रहा है। यह उन दिनों की बात है जब अमिताभ महमूद भाई के यहां रह रहा था। उसका एक दोस्त यूं ही उससे मिलने बम्बई चला आया और दो तीन दिन वहां साथ में रहा। खूब गपशप और मस्ती रही। महमूद भाई को अमिताभ के इस दोस्त में हर वह बात नजर आई जो एक कामयाब हीरो में होनी चाहिए। यूं ही अचानक उसके पहुंचने के दूसरे ही दिन अमिताभ के इस नौजवान दोस्त को महमूद भाईजान ने पांच हजार रुपए का एक चेक पकड़ाते हुए कहा कि मेरी अगली फिल्म में तुम ही हीरो का रोल करोगे। उस दोस्त ने बाद में अमिताभ को जब यह वाकया बताया तो दोनों खूब हंसे। वह दोस्त जो दिल्ली से आया हुआ था और जिसे महमूद भाई ने हीरो बना दिया था, कोई और नहीं राजीव गांधी था।
अमिताभ बच्चन का यह सफर चौबीस बरस की उम्र से शुरू हुआ था, आज उसकी उसकी शोहरत सारी दुनिया में फैल चुकी है। उसका राज़ है मां, बाप और बुजुर्गो की इज्जत करना, वक्त की क़दर करना, कहानी को पहले सुनना और फिर कारोबारी बात करना, अपने काम को ही अपना मजहब समझते हुए मेहनत और ईमानदारी से उसमें लगे रहना।
आज हिंदुस्तानी फिल्मी दुनिया में कोई एक्टर हो या एक्ट्रेस, प्राड्यूसर हो या डारेक्टर, डिस्ट्रीब्यूटर हो या....सब की एक ही ख्वाहिश, एक ही सपना है कि कोई ऐसी फिल्म में काम करने का मौका मिले जिसमें अमिताभ बच्चन साहब साथ में हो।
इसे मैं दुनिया का मेला ना कहू तो क्या कहूं। पहले वह जया का पति बना और फिर TV पर कौन बनेगा करोड़पति शो की कामयाबी से खुद भी करोड़पति बन गया। मुझे जर्रा बराबर भी हैरानी ना होगी अगर कल को कोई कहे कि अखबार में शाए हो के अमिताभ बच्चन भारत के राष्ट्रपति बन गए।
अमिताभ के इस सफर में जो जो भी जिस स्टेशन या जंक्शन पर मिला साथ होता चला गया और मंजिल तक पहुंचते पहुंचते एक मेला सा बनता गया। 1971 में जब अमिताभ के इस सफर की इब्तेदा हुई थी, इन दिनों संस्कार नाम की एक फिल्मी कहानी मेरे पास भी थी। फिल्म प्रोड्यूस करने का कीड़ा मुझे डंसे जा रहा था। मैंने हिम्मत करके फ़िल्म का पक्का इरादा कर लिया। हीरो मेरे ज़हन में था। उसकी दीवानगी सी लगन और कमाल की आवाज़ पर तो फ़िदा मैं दत्त साहब के घर पहली ही मुलाक़ात में हो गया था। मैंने सोचा, राज ग्रोवर अपनी इज़्ज़त का ख़्याल कर और अपनी फ़िल्म संस्कार के लिए किसी Saleable  हीरो की बजाए इस Available को तो खूब रोल निभाएगा। कल की वह जाने या रब जाने कि क्या होगा। मेरे एक ही बार कहने पर इसी वक़्त अमिताभ ने मेरी कंपनी Elora Arts  के लेटर हैड पर Letter of consent पर अपने दस्तख़त कर दिए। अखबारों में इश्तेहार छपा तो चर्चे शुरू हो गए। मगर मैं चाहता था ये चर्चे फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूटरों के दफ़्तरों में हों, वह ना हुआ। इसकी दो वजहें थीं, एक तो यह कि बतौर प्रोडयूसर यह मेरी पहली फ़िल्म थी, दूसरी वजह यह थी कि हर एक का यही सवाल होता। यह नया लड़का कौन है जो इस फ़िल्म का हीरो बना है? पुराने और कामयाब डिस्ट्रीब्यूटरों को तो वह फ़िल्में नज़र आतीं जिनके प्रोड्यूसर डायरेक्टर मंझे हुए नाम थे जैसे बी. आर. चोपड़ा, विमल राय, शक्ति सामंत वगैरहा और हीरो भी जाना माना होना चाहिए जैसे राजेश खन्ना, मनोज कुमार, धमेंद्र, ज़ाहिर है नए नामों को लेकर बनती फ़िल्म के लिए कोई नया डिस्ट्रीब्यूटर ही ठोक बजा के बात करेगा कि कहीं ऐसा ना कि नया धंधा शुरू करते ही मंदा हो जाए। महीने पर महीने गुजरते गए और वह बात ना बनी जिसकी उम्मीद लिये मैं बैठा था। इस बीच वक़्त का फ़ासला भी बढ़ता गया और मैं तो ज़मीन पर चलता रहा लेकिन अमिताभ शोहरत और कामयाबी की बुलंदी पर पहुंच गया। अब वह राज ग्रोवर को दूरबीन से आसमान पर उड़ता हुआ तो नज़र आता है लेकिन क्या अमिताभ का राज ग्रोवर ज़मीन पर नज़र आता होगा?
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(लेखक सुनील दत्त परिवार के अंतरंग सदस्य और उनके निजी सहायक रहे हैं। उनकी पुस्तक का नाम है यादें ज़रा ज़रा। यह पुस्तक उनके संस्मरणों का संकलन है। उन्होंने लाल बत्ती (बलराज साहनी-माला सिन्हा), हीरा मोती(बलराज साहनी-निरुपा राय) चार दीवारी (शशि कपूर-नंदा), ग़बन (सुनील दत्त-साधना), फिर सुबह होगी (राज कपूर-माला सिन्हा, रहमान) जैसी फिल्मों में सहायक निर्देशन भी किया है। राज ग्रोवर इन दिनों अमेरिका में रहते हैं। यह लेख माधुरी के पूर्व संपादक अरविंद कुमार जी से सौजन्य से प्राप्त हुआ है। संपर्क - raajgrover@gmail.com)  
विशेष नोट- यह आलेख पिक्चर प्लस के अक्टूबर, 2016 अंक में प्रकाशित हो चुका है। इसे पुनर्प्रकाशित करने के लिए पूर्वानुमति आवश्यक है। संपर्क : pictureplus2016@gmail.com

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