'बाहुबली 2' में मिलेगा 'बाहुबली 1' जैसा मनोरंजन? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

'बाहुबली 2' में मिलेगा 'बाहुबली 1' जैसा मनोरंजन?

          

बाहुबली 2 का प्रचार प्रसार जोरों पर है। फिल्म 28 अप्रैल को रिलीज हो रही है। भारत ही नहीं दुनिया भर में बाहुबली फेम प्रेमियों को फिल्म के रिलीज का इंतजार है। इस जुमले को पहले से ही मशहूर कर दिया गया है कि-कटप्पा ने आखिर बाहुबली को क्यों मारा? यह जानने के लिए देखिये बाहुबली 2, लेकिन सवाल कई हैं, क्या बाहुबली 2 भी बाहुबली वन की तरह दर्शकों को कौतुहल और रोमांच से भर सकेगी? नये पोस्टर में प्रभास उसी जोश खरोश के साथ दिखाई दे रहे हैं जैसी कि पहले भाग में दिखे थे। युद्ध की तैयारी में नजर आ रहे हैं। कमर कस चुके हैं। रण तैयार है। डंके पर चोट पड़ चुकी है। सामने कटप्पा है। आखिर क्या होगा आगे? क्या सचमुच कटप्पा बाहुबली को मार देगा? जैसा कि जुमलों में पहले से बताया जा रहा है? उत्सुकताएं दर्शकों के दिलों में हैं।
लेकिन इस बीच जो बातें सामने आ रही हैं वह विशेष चौंकाने वाली है।
पहली बात यह कि कटप्पा ने वाकई अगर बाहुबली को मारा तो यह तथ्य पहले क्यों लीक किया गया? एंटी क्लाइमेक्स को पहले क्यों जगजाहिर कर दिया गया? क्या यह भी उत्सुकता जगाने की रणनीति थी? एंटी क्लाइमेक्स के तर्क के पीछे क्या बाहुबली के अहंकार का ध्वस्त किया जाना जस्टीफाई किया जायेगा? या क्या महज यह पब्लिसिटी के लिए था कि लोग दूसरे भाग को भी उसी आकर्षण के साथ देखें और अंतिम सीन तक सीट पर यह देखने के लिए बैठे रहें कि क्या सचमुच कटप्पा बाहुबली को मार देता है? मान लिया अगर कटप्पा नहीं मारता तो दर्शकों के दिलों दिमाग पर इसका क्या असर होगा? दर्शक क्या प्रतिक्रिया देंगे? क्या उसे सोशल मीडिया के द्वारा मूर्ख बनाया गया? एक जुबान से दूसरी जुबान तक बात फैलेगी कि कटप्पा ने बाहुबली को नहीं मारा। जाहिर है इसका असर फिल्म के प्रदर्शन पर पड़ेगा। लेकिन अगर वाकई कटप्पा ने बाहुबली को मार दिया तो भी दर्शकों के सामने कोई एंटी क्लाइमेक्स नहीं रहेगा। जाहिर जोखिम दोनों ही तरह से हैं। यानी राजामौली अपने ही फैलाये जाल में फंसते दिख रहे हैं।
दूसरी मुश्किल फिल्म की लंबाई को लेकर है। आज की तारीख में हिन्दुस्तान में ज्यादातर फिल्में हॉलावुड की फिल्मों की लंबाई के मुताबिक पहले के जमाने से छोटी फिल्में बन रही हैं। दो घंटे, सवा दो घंटे तक बस। खुद बाहुबली वन की लंबाई भी दो घंटे अड़तीस मिनट थी। लेकिन बाहुबली 2 की लंबाई दो घंटे पचास मिनट (करीब तीन घंटे) की है। यानी पहले पार्ट से करीब पंद्रह मिनट ज्यादा।
राजामौली के लिए यह दूसरा बड़ा जोखिम है। बाहुबली 2 की लंबाई कहीं दर्शकों के भीतर ऊब ना पैदा कर दे। अगर बाहुबली 2 में बाहुबली वन के मुकाबले स्पेशल इफेक्ट्स ज्यादा मनोहारी और हैरतअंगेज नहीं हुये तो राजामौली को इस बार अपनी सारी रणनीतियों के जंजाल में खुद ही मुश्किल उठानी पड़ सकती है।
बहरहाल इंतजार कीजिये फिल्म के रिलीज का। अभी केवल अनुमान ही व्यक्त किया जा सकता है।
असली समीक्षा तो फिल्म देखने के बाद होगी।   
=संजीव श्रीवास्तव

(इस टिप्पणी को कहीं भी प्रकाशित करने से पहले लेखक से पूर्वानुमति आवश्य है।)

1 टिप्पणी:

  1. कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? यह सवाल देश का सबसे बड़ा सवाल उस समय से बना हुआ था, जब जुलाई 2015 में इसका पहला भाग रिलीज़ हुआ था। इस सवाल को बेहद खूबसूरती से सुलझाती हुई बाहुबली 2 द कनकलयूज़न कल से देश के 8000 से अधिक स्क्रीन पर रिलीज हुई। चूंकि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा, यह जानने की उत्सुकता आम जनता में लगभग दो साल से थी और लोग तरह- तरह के कयास लगा रहे थे, ऐसे में इस फ़िल्म ने आते ही हमें अस्सी के दशक के उस दौर में पहुंचा दिया जब टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग हुआ करती थी और लोग घण्टों लाइन में लगकर टिकट खरीदते थे।
    अब कुछ बातें इस फ़िल्म पर, मूलतः तेलुगु भाषा मे बनी और 8 भाषाओं में डब की गयी इस इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है कम्प्यूटर ग्राफ़िक्स का शानदार प्रयोग। फ़िल्म में चित्रित सभी पशु और अधिकांश प्राकृतिक एवं नगरीय दृश्य कम्प्यूटर और पात्रों के कुशल सामंजस्य से जीवन्त हो गए हैं। फ़िल्म के गीत संगीत साधारण होते हुए भी भव्य छायांकन के कारण प्रभावशाली लगते हैं। फ़िल्म की लंबाई कम होती तो यह फ़िल्म और प्रभावशाली हो सकती थी। कई बार ऐसा लगता है कि अब फ़िल्म खत्म हो जाएगी लेकिन इसके बाद भी फ़िल्म आगे बढ़ती रहती है जो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। फ़िल्म के कॉस्ट्यूम और युद्ध दृश्यों में मौलिकता है और वृक्षों, तनों तथा तीरों का कुशल प्रयोग फ़िल्म को अधिक प्रभावशाली बनाता है लेकिन अधिकांश युद्ध दृश्य देखकर दांतों तले अंगुली तो दबाई जा सकती है किन्तु वे अस्वाभाविक भी प्रतीत होते हैं। फ़िल्म की कहानी पर महाभारत का प्रभाव स्पष्ट दिखता है लेकिन महिलाओं की युद्ध तथा राज्य संचालन में प्रमुख भूमिका यह दिखाती है कि अब हमारा समाज इन बदलावों को स्वीकारने के लिये तैयार है। कुल मिलाकर इसे एक बेहतरीन फ़िल्म कहा जा सकता है जिसे इसकी उत्सुकता भरे अंत के लिये अवश्य देखा जाना चाहिए। मेरी तरफ से इस फ़िल्म को साढ़े चार स्टार।

    उत्तर देंहटाएं

Post Bottom Ad