दादा साहेब फाल्के का संघर्ष - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 30 अप्रैल 2017

दादा साहेब फाल्के का संघर्ष



                           {जन्म तिथि (30 अप्रैल) पर विशेष}                                               - चंद्रमोहन बुद्धिराजा 
दादा साहेब के नाम से हर पढ़ा लिखा भारतीय परिचित है। उनका वास्तविक नाम धुंडीराज गोविंद फालके था। पेशे से उन्होंने सर्वप्रथम फोटोग्राफर का धंधा अपनाया था। सन् 1911 में उन्होंने मुंबई के एक तंबूनुमा सिनेमा में लाइफ़ ऑफ क्राइस्ट फिल्म देखी थी। इस फिल्म से वो बहुत ही प्रभावित हुये थे। अपनी पत्नी सरस्वती को भी यह फिल्म दिखाने ले गये। इस फिल्म को उन्होंने अलग अलग दिनों 10-12 बार देखा। यह फिल्म उनके जहन में उतर गई। उन्होंने अपनी स्टिल फोटोग्राफी को छोड़कर चलती-फिरती फिल्म बनाने की ठान ली। इसके लिए उन्होंने लंदन की बायस्कोप मैगजिन पढ़ना शुरू किया। और फिल्म प्रोजेक्टर का सारा सामान उसी मैग्जिन के मालिक के जरिये अपने देश में मंगवा लिया। यह सन् 1912 की बात है। फिर अपने ही देश के देवी देवताओं को पर्दे पर दिखाने की मुहिम में लग गये। घूम फिर कर उन्होंने अपनी पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र के जीवन पर बनानी शुरू कर दी।
फिल्म के सभी किरदारों को इकट्ठा तो कर लिया गया मगर तारामती के किरदार के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। उन्होंने बहुत सारी स्त्री पात्रों से पूछताछ की लेकिन कोई भी पर्दे पर नारी पात्र को निभाने के लिये तैयार नहीं हुई। अंत में थक हार कर उन्होंने दादा वेश्याओं के कोठे पर गये मगर वहां उन्हें जवाब मिला-कि उसका पेशा फिल्मों में काम करने वाली बाई से भी कहीं अच्छा है।
जब वो कोठे से वापस आ रहे थे तो थक कर एक चाय के ढाबे पर चाय पीने के लिए रुक गये। जब चाय वाला वेटर चाय लेकर आया तो उन्होंने देखा कि वेटर की उंगलियं जनानियों जैसी और नाजुक थीं। तो दादा ने सहसा उससे पूछा-तुम्हें यहां कितनी पगार मिलती है? वो बोला-पांच रुपये महीना। दादा ने कहा-अगर तुम्हें पांच रुपये रोज मिलेंगे तो काम करोगे? उस वेटर ने तुरंत हां कर दिया। दादा ने उसे सारी कहानी बताई। इस तरह उस फिल्म में तारामती का किरदार किसी स्त्री ने नहीं बल्कि पुरुष ने निभाया। जिसका नाम अन्ना सालुके था। उसने देश की पहली मूक फिल्म में सफलतापूर्वक अभिनय किया। और इस तरह देश की पहली चलती फिरती मूक फिल्म का निर्माण हुआ। जिसका प्रदर्शन 21 अप्रैल 1913 को मुंबई के ओलंपिया सिनेमा हॉल में हुआ। यह फिल्म लगातार 13 दिन तक चली। जिसके बाद दादा साहेब फालके एक ऐतिहासिक हस्ती बन गये।
दादा ने अपनी पूरी जिंदगी में कुल 125 मूक फिल्में बनाईं। दादा ने अपना पूरा परिवार फिल्म निर्माण के काम काज में लगा दिया था। अपनी फिल्म कालिया मर्दन (1919) में कृष्ण की भूमिका उनकी अपनी लड़की मंदाकिनी ने निभाई थी। शुरुआती तौर पर अपने घर को ही दादा ने फिल्म लेबोरेटरी बनाया था।  जहां पर रसोई में दादा के साथ उनकी पत्नी सरस्वती उनका हाथ बंटाती थी। इस प्रकार दादा ने भारत में सर्वप्रथम पहली मूक फिल्म बनाने का इतिहास रचा था। उनकी प्रतिष्ठा और लगन को गौरवांवित करने के लिये भारत सरकार ने दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड की घोषणा की है, जिसे प्राय: 1970 से अब तक किसी ना किसी महान् फिल्मी हस्ती को प्रदान किया जाता है। यह दादा के प्रति हमारे देश की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है। लेकिन बड़े खेद से कहना पड़ता है कि ऐसी हस्ती का अंतकाल अच्छा नहीं रहा। घर को चलाने के लिए उन्हें आखिरी समय में अल्मोनिया के बर्तनों का धंधा करना पड़ा था।  
(लेखक हिन्दी सिनेमा के विशेषज्ञ हैं। दिल्ली में रहते हैं।)

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