'रागदेश' और 'इंदु सरकार' - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 17 जून 2017

'रागदेश' और 'इंदु सरकार'

आमने-सामने तिग्मांशु धूलिया और मधुर भंडारकर 
बॉक्स ऑफिस पर दो अहम पीरियड फिक्शन


-संजीव श्रीवास्तव
लंबे समय के बाद अगले महीने दो ऐसी फिल्में रिलीज हो रही हैं जिनका जिक्र करने की इच्छा हो रही है। एक फिल्म है-रागदेश, जिसे राज्यसभा टेलीविजन ने प्रस्तुत किया है, और जिसके निर्देशक हैं-तिग्मांशु धूलिया। तो वहीं दूसरी फिल्म है- इंदु सरकार, जिसके निर्देशक हैं-मधुर भंडारकर। हमारे समय के दो अलग अलग जॉनर से दो बड़े निर्देशक। संभवत: मधुर पहली बार किसी पीरियड फिक्शन को लेकर आ रहे हैं। यह थीम उनकी पुरानी फिल्मों से जरा हटकर है। मधुर के लिये यह जरूरी भी था। क्योंकि लगातार उन पर यह आरोप लगते रहे हैं कि घुमाफिराकर ग्लैमरस कास्ट्यूम की पृष्ठभूमि वाली कहानी से वो अपने आपको अलग नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन इंदु सरकार में उनकी परंपरागत कास्टयूम की बदली हुई छटा दिखेगी तो उनके प्रशंसकों को भी उनके प्रोडक्ट में एक नयापन नजर आयेगा।
इंदु सरकार-घटना से प्रेरित काल्पनिक कहानी का ताबा बाना है। वाकया 1975 का है, जब कांग्रेस शासित कार्यकाल के दौरान देश में आपातकाल लगाया गया था। प्रोमो देखकर लगता है कि फिल्म में संजय गांधी का किरदार अत्यधिक एग्रेसिव है। नील नितिन मुकेश का गेटअप संजय गांधी के बिल्कुल करीब तैयार किया गया है। आवाज भी मिलती-जुलती है। इस रोल में नील याद किये जायेंगे। इंदिरा गांधी की भूमिका निभाने वाली सुप्रिया विनोद का किरदार उतना नहीं, जितना कि नील का लगता है। दर्ज इतिहास के उलट किस्स-कहानियों के आधार पर यहां संजय गांधी और इंदिरा गांधी की भूमिका को घटाया बढ़ाया गया लगता है। मसलन आपातकाल के दौरान अगर पृष्ठभूमि में संजय गांधी थे (जैसा कि कहा जाता है) और फ्रंट पर इंदिरा गांधी थीं, तो इस फिल्म में संजय गांधी इंदिरा गांधी से कहीं ज्यादा ऑन स्क्रीन नजर आते लगते हैं। हो सकता है, फिल्मकार का यही मकसद हो। लेकिन इसी के बरक्स एक महिला प्रोटेगोनिस्ट है, जोकि आपातकाल के जुल्मों के खिलाफ आवाज बुलंद करती है। इस प्रोटेगोनिस्ट का किरदार निभाया है पिंक की अभिनेत्री कीर्ति ने। फिल्म में उसके पति की हत्या कर दी जाती है जिसके वाद वह सत्ता से विद्रोह कर बैठती है। यानी इंदिरा गांधी बनाम एक आम विद्रोदी नारी। सत्ता बनाम सड़क का संघर्ष। संसद बनाम परिवार की अस्मिता। इंदु सरकार में और क्या-क्या होता है, ये जानने के लिए हमें रिलीज का इंतजार करना होगा। लेकिन फिलहाल कह पाना मुश्किल हो रहा है कि पूरी फिल्म को देखने के बाद प्रतिघात की याद आयेगी या नहीं। फिल्म अनुपम खेर अहम और आकर्षक रोल में हैं। 


इसी दिन रिलीज होने जा रही है दूसरी फिल्म है- रागदेश। ऐसी फिल्म किसी पब्लिक सेक्टर से ही उम्मीद की जा सकती थी। संविधान के बाद राज्यसभा टेलीविजन की यह सबसे अहम और ताजाजरीन प्रस्तुति है। संविधान को श्याम बेनेगल ने निर्देशित किया था। डाक्यूमेंटेशन को फिक्शन की तरह रोचक बनाकर प्रस्तुत करने की कला संविधान की प्रस्तुति से सीखी जा सकती है। इसके लिए जाहिर है कि गुरुदीप सिंह सप्पल की पहल और मेहनत सबसे अधिक काबिलेतारीफ रही जिसकी सराहना सबकी जुबां पर है। रागदेश का टीजर देखने और उसके पूरे कांसेप्ट पर गौर फरमाने के बाद प्रतीत होता है सप्पल साहब एक बार फिर अपने मिशन में कामयाब होते दिख रहे हैं। इस बार उन्होंने अपने मिशन को साकार करने के लिए पान सिंह तोमर और साहब बीवी और गैंगस्टर फेम तिगमांशु धूलिया जैसे निर्देशक का साथ लिया, जिनकी सामाजिक और सिनेमाई सोच और अध्ययन के खुद कई बड़े फिल्मकार भी मुरीद हैं। इतिहास में बलिदानी नायकों की कहानियां अनंत हैं, लेकिन हम उनमें से कुछ की ही कहानियां अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन रागदेश में
शाहनवाज खान, गुरुबख्श सिंह ढिल्लो, प्रेम सहगल जैसी आजादी की दीवानी शख्सियत की जाबांज कहानी हम देखेंगे। निश्चय ही यह राज्यसभा टेलीविजन की प्रस्तुतियों में सबसे अहम पड़ाव माना जायेगा। दरअसल रागदेश विशाल भारद्वाज की फिल्म रंगून के बाद दूसरी ऐसी फिल्म है, जो द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है। फिल्म में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के तीन जांबाज अफसरों कर्नल प्रेम सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लो और मेजर जनरल शाह नवाज खान के मशहूर कोर्ट मार्शल की कहानी को दिखाया गया है। इसे इतिहास के पन्नों में रेड फोर्ट ट्रायल का नाम दिया गया था। फिल्म में यह बताने का प्रयास किया गया है कि भारत को आजादी दिलाने में आजाद हिंद फौज का सबसे अहम योगदान था। इन तीन अहम किरदारों को कुणाल कपूर, अमित साध और मोहित मारवाह ने निभाया है।    
सुपर स्पेशल इफेक्ट्स और लाउड इंस्ट्रूमेंट्स से लैस सिनेमा के इस दौर में रागदेश दर्शकों को कहानी, किरदार, चरित्र, संदेश, सोच, विचार और इतिहास आदि से साक्षात्कार होगा। दर्शकों को ऐसे सिनेमा का आगे बढ़कर स्वागत करना चाहिये। तभी पब्लिक सेक्टर का कोई दूसरा यूनिट भी विचारशील सिनेमा बनाने के लिए हिम्मत करेगा और हिन्दुस्तान का सिनेमा आगे नये मुकाम को हासिल करेगा।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अनमोल जानकारी प्राप्त हुई। आपके लेखक का तो मै वैसे भी फैन हूं

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