"अभी तो और सिनेमा बाकी है मेरे भाई" - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 17 जून 2017

"अभी तो और सिनेमा बाकी है मेरे भाई"


डायलॉग प्लस : मनोज कुमार

मैं आज और इस वक्त अपनी आगामी फिल्म की घोषणा करता हूं।
और वह फिल्म होगी – आर्यभट्ट

(हिन्दी सिनेमा के रजत पटल पर सन्देशपरक मनोरंजन के सांचे में ढाल कर देशभक्ति को सफलता का मन्त्र बनाने वाले फ़िल्मकार हरिकिशन गिरी गोस्वामी यानी भारत कुमार अर्थात मनोज कुमार को 3 मई, 2016 को वर्ष 2015 का भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
इस विशेष अवसर पर वरिष्ठ फिल्म पत्रकार डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने विज्ञान भवन, नयी दिल्ली में सम्मान प्राप्ति के पश्चात तत्काल ही मनोज कुमार का विभिन्न विषयों पर विस्तृत साक्षात्कार लिया। प्रस्तुत है इस विशेष बातचीत के प्रमुख अंश)

विज्ञान भवन में मनोज कुमार से बात करते हुए फिल्म  विशेषज्ञ डॉ. राजीव श्रीवास्तव
प्रश्न: भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ से सम्मानित किये जाने पर आपको ढेरों बधाई मनोज जी. क्या आपको ऐसा लगता है कि फिल्मों में आपके महत्वपूर्ण योगदान के लिये यह सम्मान आपको पहले ही मिल जाना चाहिये था ?
उत्तर: पहले तो आपकी नयी आने वाली सिनेमा पत्रिका ‘पिक्चर प्लस’ के लिये बधाई और शुभ कामनाएं. अब आपने पूछा है कि यह सम्मान मुझे पहले मिल जाना चाहिये था पर मेरा मानना है कि हर काम का एक निश्चित समय होता है, समय से पहले या बाद में कुछ भी नहीं होता. आपको कितना मिलना है, क्या मिलना है और कब मिलना है यह सब अपने नियत समय पर ही होता है सो मुझे आज तक जो भी मिला है वह सब ईश्वर का प्रसाद है मेरे लिये.

प्र.: आज का यह अवसर हम सब के लिये विशेष है और आपके स्वयं के लिये तो यह अवसर निश्चय ही विशिष्ट होगा. आपके मन में क्या चल रहा है ? पीछे पलट कर देखते हैं तो क्या-क्या स्मरण आ रहा है ?
उ.: मैं पीछे मुड़ कर देखने में विश्वास नहीं रखता. जीवन चलते रहने का नाम है. आगे और आगे बढ़ते जाने का नाम ही जीवन है. इस सम्मान ने मेरे अन्दर एक नया उत्साह भर दिया है, मेरे अन्दर के कलाकार को एक नयी दिशा प्रदान कर दी है. मैं अपने शुभ चिंतकों के प्रति नतमस्तक हूँ. मेरे लिये यह बेला एक पड़ाव मात्र है, लक्ष्य तो अभी भी दूर है.

प्र.: किस लक्ष्य की बात कर रहे हैं आप ? अब भी कुछ करना, पाना या देना शेष है ?
उ.: अभी मेरी फ़िल्म पूरी नहीं हुयी है. ये तो मध्यान्तर है, आगे अभी और सिनेमा है मेरे भाई. मैं आज अभी अपनी नयी फ़िल्म की घोषणा करता हूँ. ‘आर्यभट्ट’ ! हमारे भारत के महान वैज्ञानिक, गणितज्ञ और दार्शनिक जिन्होंने हमें, इस संसार को दशमलव दिया, शून्य दिया और वह सब कुछ दिया जिसके बल पर हमारा संसार आज यहाँ तक पहुँचा है. उन्हीं महान ‘आर्यभट्ट’ पर होगी मेरी अगली फ़िल्म. मैं भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात सुनाता हूँ.

प्र.: अब आप जब भारत की बात बता ही रहें हैं तो फिर यह भी बताइये कि आप हरिकिशन से मनोज कुमार और फिर भारत कुमार कैसे बन गये ?
उ.: ओह, मैं तब दस-बारह बरस का रहा हूँगा. उन दिनों मैंने एक फ़िल्म देखी थी फ़िल्मिस्तान की ‘शबनम’. इस फ़िल्म के हीरो थे दिलीप कुमार जिसमें उनका नाम मनोज था. नाम नया था मुझे यह नाम अपील कर गया. उसी समय मैंने निश्चय कर लिया कि मैं जब भी फ़िल्मों में काम करूँगा तब अपना नाम मनोज कुमार रखूँगा. ऐसे मैं बन गया आप सब का मनोज कुमार.

प्र.: और भारत कुमार ?
उ.: फिल्म ‘शहीद’ के शो पर हमने तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी को आमन्त्रित किया था. वो कुछ ही समय के लिये आये थे पर फ़िल्म उन्हें अच्छी लगी तो वो पूरे समय रुक गये. अगले दिन उन्होंने मुझे अपने यहाँ बुलाया और कहा कि देखो मैंने एक नया नारा दिया है ‘जय जवान जय किसान’. क्या इस पर कोई फ़िल्म बन सकती है ? मैंने उनके पाँव छुये और कहा कि आपका आशीर्वाद होगा तो मैं इस पर फ़िल्म अवश्य बनाउँगा. मुझे दिल्ली से वापस बम्बई आना था ट्रेन से. अपने साथ के लोगों से मैंने कहा कि मुझे काग़ज़ और दो-चार पेन दे देना. सुबह जब ट्रेन बम्बई पहुँची तब फ़िल्म ‘उपकार’ की कहानी पूरी हो चुकी थी. इस फ़िल्म में मेरा नाम भारत था. फ़िल्म भारत वर्ष और विदेशों में भी बहुत पसन्द की गयी और लोगों ने मुझे नया नाम दे दिया – भारत कुमार.

प्र.: फ़िल्मों में सफलता का पहला स्वाद कब चखा था आपने ? सुना है बहुत ही संघर्ष के दिन थे तब.
उ.: हाँ, संघर्ष तो था. लोगों की गालियाँ खायी, पुलिस के डंडे भी खाये, फूटपाथ पर सोया भी पर मैं घर से भाग कर फ़िल्मों में नहीं आया था. अपने माता-पिता की अनुमति ले कर मैं बम्बई आया था. पहली फ़िल्म मिली थी ‘फ़ैशन’. इसमें एक नब्बे साल के बूढ़े का छोटा सा रोल था. इसके बाद कुछ और फ़िल्मों में रोल किये पर बात बनी नहीं. ‘काँच की गुडिया’ में मुझे हीरो का रोल मिला पर सफलता का पहला स्वाद मिला फ़िल्म ‘हरियाली और रास्ता’ से. जब मैं ये फ़िल्म कर रहा था तब मेरा विवाह नहीं हुआ था. इसके प्रदर्शन के पहले ही मैंने शादी की और मेरी पत्नी जैसे मेरे लिये सौभाग्य बन कर आयीं. ‘हरियाली और रास्ता’ मेरी पहली सिल्वर जुबली फिल्म थी. उसके बाद तो फ़िर मैं अपने चाहने वालों के आशीर्वाद और प्यार के बलबूते पर आगे ही आगे बढ़ता गया.

प्र.: एक अभिनेता-नायक की भूमिका करते हुये आप लेखक, सम्पादक, निर्देशक और निर्माता बन गये. पर्दे पर और पर्दे के पीछे एक साथ ढेरों भूमिकायें करते हुये तालमेल बैठाना तो बहुत कठिन रहा होगा ?
उ.: हाँ, एक के बाद एक नया काम करना मुझे अच्छा लगता था. स्टोरी राइटर, डायलाग राइटर, स्क्रीनप्ले राइटर, एडिटर, प्रोडूसर, डायरेक्टर, एक्टर सभी काम मैंने किये. मैं कोई बड़ा बोल नहीं बोलूँगा पर इन सब कामों में मैं भारतीय सिनेमा का अकेला व्यक्ति हूँ जिसने इन सब क्षेत्रों में काम करते हुये अवार्ड जीते.

प्र. सुना है आपने धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन जैसे और भी लोगों को हौसला दिया उन्हें काम दिया और उनको सम्बल प्रदान किया.
उ.: जब हम संघर्ष कर रहे थे तब धर्मेन्द्र भी हमारे साथ जूझ रहे थे. एक दिन धरम ने कह दिया कि मैं तो वापस जा रहा हूँ अब बहुत हो चुका. मैंने उसे दिलासा दी, कहा छह महीने और देख ले कुछ न कुछ तो होगा ही. कहने लगे मेरे पास अब पैसे भी ख़त्म हो गये हैं. मैंने कहा जो भी मेरे पास है उसी में मिल कर रह लेंगे. वो रुक गये और बात बन गयी. राजेश खन्ना को हम काका बुलाते थे. वो तब स्टेज भी करते थे. मेरे पास आये और काम की बात की. ‘उपकार’ फिल्म में जो भूमिका प्रेम चोपड़ा ने की है उसे पहले राजेश कर रहे थे. सेट तैयार था अगले दिन उन्हें शूटिंग पर आना था और वो आये भी पर बड़े रुआंसे थे. कहने लगे जिनके साथ अभी मैं काम कर रहा हूँ वो मुझसे कह रहे हैं कि आप बाहर की कोई फिल्म नहीं कर सकते. अब मैं क्या करूँ. मैंने उन्हें समझाया कि यहाँ एग्रीमेंट के साथ ही ज़ुबान का भी बहुत मान होता है. कोई बात नहीं, फिर सही. अमिताभ बच्चन भी जब संघर्ष कर रहे थे तब उन्होंने भी मन बना लिया था वापस जाने का. मैं उन दिनों ‘रोटी कपड़ा और मकान’ बना रहा था. उनको मैंने एक रोल उसमें दिया और कहा कि काम करते रहो, सब ठीक हो जायेगा. इस फिल्म के प्रदर्शन के पहले उनकी ‘ज़ंजीर’ फिल्म आ गयी और बात बन गयी. सुभाष घई को भी उनके पिता जी मेरे पास ले कर आये थे जब उन्होंने पूना के फ़िल्म इंस्टिट्यूट से एक्टिंग में गोल्ड मेडल ले कर पढ़ाई पूरी की थी. मुकेश जी के निधन के बाद उनके बेटे नितिन मुकेश एक दिन मेरे पास आये. तब मैं ‘क्रान्ति’ फ़िल्म पर काम कर रहा था. मैंने उन्हें कहा था कि आपको वायस् टेस्ट देना होगा, और वो पास हो गये.

प्र.: आप अपनी फ़िल्म के गीत-संगीत पर खूब ध्यान देते थे. ‘उपकार’ तथा ‘पूरब और पश्चिम’ के गीत आज भी फ़िल्म संगीत में धरोहर के रूप में हैं. इन दोनों ही फ़िल्मों में आपके संगीतकार थे कल्याणजी-आनन्दजी. इतना लोकप्रिय और सफल संगीत देने के बाद भी क्या कारण था जो आपने उन्हें आगे अपनी किसी भी फ़िल्म में नहीं लिया. लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल आपके स्थायी संगीतकार बन गये.
उ.: कल्याणजी-आनन्दजी ने जो संगीत ‘उपकार’ में दिया वह माइलस्टोन है. ‘पूरब और पश्चिम’ का भी उनका संगीत आज भी सबसे ऊपर है. मैं लक्ष्मी-प्यारे को तब से जानता था जब वे केवल म्यूजिशियन थे. उनको मैंने कल्याणजी भाई के यहाँ सहायक के रूप में काम करते हुये देखा था. उनका काम मुझे पसन्द था और मैं उन्हें दूसरों के यहाँ रेकुमेंड भी करता था. ‘शोर’ में मैंने उनको उनकी प्रतिभा और नयेपन के कारण लिया और फिर ‘एक प्यार का नगमा’ बज उठा. इसके बाद ऐसा तालमेल बैठा कि सिलसिला चल निकला.

प्र.: राजकपूर और आपमें एक समानता है. मैंने यह बात नोटिस की है कि गायक मुकेश आप दोनों की स्थायी आवाज़ थे. एक तरफ़ राजकपूर मुकेश के साथ अपने लिये मन्ना डे की आवाज़ रखते थे और आप अपनी फिल्मों में मुकेश के साथ ही महेन्द्र कपूर का स्वर प्रयोग में लेते थे. मेरा अपना विश्लेक्षण है कि हिन्दी सिनेमा में आप दोनों का यह एकमात्र उदाहरण है जिसमें मुख्य स्वर मुकेश रहे और समान्तर में वहाँ मन्ना डे और यहाँ महेन्द्र थे. इसके पीछे उद्देश्य क्या था ?
उ.: मुकेश जी तो महान गायक शुरू से ही थे. बचपन में जो मैंने दिलीप कुमार जी की फ़िल्म ‘शबनम’ देखी थी उसमें एस.डी. बर्मन का संगीत था और उस फिल्म में सारे गीत मुकेश जी के थे जो दिलीप कुमार पर फिल्माये गये थे. ‘तू महलों में रहने वाली’ जैसे उस फ़िल्म के सभी गीत खूब लोकप्रिय हुए थे. मेरे मन-मस्तिष्क पर तब ही मुकेश जी की आवाज़ का असर पूरी तरह से हो गया था, सहगल साहब के बाद तब मुकेश जी को ही सभी पसन्द करते थे. आगे चल कर मैंने भी उनकी ही आवाज़ ली. देशभक्ति के गीतों में महेन्द्र कपूर अधिक भाते थे मुझे और उनकी रेंज भी वैसी ही बुलन्द थी इसलिये वो मेरे किरदार को सूट करते थे. फिर भी सदाबहार गीतों में और ऊँचे रेंज के गीतों में भी मुकेश जी ने मेरी फ़िल्मों में क्या खूब गाया है. उन्हें मैं आदर के साथ कृपाराम जी कह कर बुलाता था. उनकी आवाज़ की मुझ पर सदा विशेष कृपा रही है.

प्र.: फ़िल्म ‘हिमालय की गोद में’ आप पर फ़िल्माया मुकेश जी का एक ऐसा कालजयी गीत था जिसे सुनील गावस्कर ने विवाह के पूर्व अपनी पत्नी को उसके अनुरोध पर सुनाया था, वो गीत था ....
उ.: ‘चाँद सी महबूबा हो मेरी कब, ऐसा मैंने सोचा था, हाँ, तुम बुल्कुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था’, यही वो गीत था जिसे सुनील गावस्कर जी ने अपनी पत्नी को सुनाया था. वैसे तब के जाने-माने क्रिकेटर गुगली मास्टर भागवत चन्द्रशेखर यानी चन्द्रा के भी पसन्दीदा गायक आज भी मुकेश जी ही हैं.    

प्र.: बहुत कुछ ऐसा होगा जो आपको अत्यधिक पसन्द आता होगा और स्वाभाविक है कई बातें आप नापसन्द भी करते होंगे.
उ.: मुझे झूठ, गद्दारी और छल-कपट से सख्त नफ़रत है. मैं सबकुछ सहन कर लूँगा पर झूठ और छल-कपट करने वालों से मैं दूर ही रहता आया हूँ.

प्र.: यदि मैं आपकी किसी ऐसी फ़िल्म के बारे में जानना चाहूँ जिसे आज भी आप बार-बार देखने की इच्छा रखते हैं तो किस फिल्म का नाम लेंगे आप ?
उ.: हाँ, ऐसी एक फ़िल्म है जिसे मैं आज भी देखता हूँ. वो है मेरे परिवार की अपनी फ़िल्म. इस फ़िल्म में मैं हूँ, मेरे माता-पिता हैं, चाचा-चाची हैं परिवार के अन्य सदस्य, मित्र और सम्बन्धी हैं. इस फ़िल्म को देख कर आज भी मैं खुश होता हूँ, रोता भी हूँ और बीते दिनों की याद भी कर लेता हूँ. ये फ़िल्म मेरे साथ ही जायेगी.

प्र.: आप जीवन का मूल मन्त्र किसे मानते हैं ? वर्तमान पीढ़ी के लिये क्या सन्देश देना चाहेंगे आप ?
उ.: मेरा श्रीमद् भागवद गीता पर अटूट विश्वास है. मैं कर्म को ही प्रधान मानता हूँ. मैंने देखा है कि बिना कर्म के जीवन में कुछ भी नहीं मिलता. परिश्रम और लगन ही जीवन में इन्सान को आगे ले जाती है उसे ऊपर उठाती है. जिसका जीवन कर्मप्रधान होगा सफलता उसके चरण चूमेगी. यह बात सभी लोगों को और नयी पीढ़ी को भी समझ लेनी चाहिये. यह कर्म का ही फल है जिसने मुझे आज ‘आर्यभट्ट’ बनाने का संकल्प दिया है. मेरा ईश्वर और मेरा धर्म मेरा कर्म है।

(नोटःयह साक्षात्कार  पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका के जून, 2016 अंक में प्रकाशित हो चुका है। इसे कहीं भी किसी भी रूप में पुनर्प्रकाशन हेतु पूर्वानुमति आवश्यक है। अनुमति के लिए एसएमएस/ह्वाट्स एप अथवा ईमेल करें। धन्यवाद।)


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