श्रीदेवी : ‘जूली’ से ‘मॉम’ तक - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

श्रीदेवी : ‘जूली’ से ‘मॉम’ तक

'मॉम' फिल्म में श्रीदेवी
     -संजीव श्रीवास्तव
पहली बात तो यह कि श्रीदेवी, नाम से ही उत्तर भारतीय दर्शकों को पहली बार लगा कि ये तो बड़ा ही अजीब नाम है। भला लड़कियों के नाम के आगे भी कहीं श्री लगता है! अपने यहां तो परंपरा रही कि लड़की हो तो उसके नाम के आगे सुश्री अथवा विवाहिता हो तो उसके नाम के आगे श्रीमतीलगता है। लेकिन यहां तो नाम था श्रीदेवी, मानो पुरुषों का नाम हो जैसेकि श्रीप्रकाश, श्रीनिवास, श्रीदेवी प्रसाद आदि। शायद एक यह भी एक बड़ी वजह थी कि शुरुआत में श्रीदेवी नाम उत्तर भारत के दर्शकों के दिलों में जगह नहीं बना सका। अमोल पालेकर जैसे  अभिनेता के साथ सोलवां सावन (1979) आई और चली गई। किसी को पता भी नहीं चला। गोयाकि इससे महज चार साल पहले 1975 में जूली जैसी अपने समय की ब्लॉकबस्टर फिल्म में श्रीदेवी ने एक किशोरी की भूमिका निभाकर सराहना बटोरी थी। जूलीमें श्रीदेवी मुख्य अभिनेत्री लक्ष्मी की छोटी बहन बनी थीं। एकदम शहरी आधुनिका। आज के जमाने जैसी छोटी लिबास पहन कर श्रीदेवी ने लाखों लोगों का ध्यान खींचा था। लेकिन जब सोलवां सावन से बात नहीं बनीं तो श्रीदेवी वापस दक्षिण के सिनेमा में चली गईं।  वहां वह महज चार साल की उम्र से ही अभिनय कर रही थीं और आगे चल कर भी उन्होंने कई सफल फिल्में दीं। लेकिन यकीनन श्रीदेवी की कला प्रतिभा और उत्कट प्रभा की चकाचौंध केवल दक्षिण की परिधि तक सीमित नहीं रह सकी।
'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी

श्रीदेवी को हिन्दी फिल्मों में दोबारा प्रवेश दिया पदमालय स्टूडियो की तरफ से निर्माता जी. हनुमंथप्पा और निर्देशक के. राघवेंद्र राव ने। हुआ दरअसल ये कि तेलुगु में साल 1981 में एक फिल्म बनी- ऊरुकी मोनागुडू’’ जिसमें जयाप्रदा और पदमालय स्टूडियो से जुड़े अभिनेता कृष्णा ने अभिनय किया था। यह फिल्म काफी सफल रही। और 1981 में ही कमल हासन अभिनीत उनकी पहली हिन्दी फिल्म एक दूजे के लिए की अपार सफलता ने बॉलीवुड में दक्षिण की फिल्मों के रीमेक और दक्षिण के सितारों के लिए नये तरीके से द्वार खोल दिये। दरअसल एक दूजे के लिए भी तेलुगु फिल्म मारो चरित्रा (1978) का रीमेक थी। और जब ऊरुकी मोनागुडू’’ के हिन्दी रीमेक की बात सामने आई तो पदमालय स्टूडियो के निर्माताओं ने अपने चहेते फिल्म स्टार जितेंद्र को उस फिल्म में साइन कर लिया और बतौर अभिनेत्री श्रीदेवी को। अभिनेत्री का नया नाम होने के बावजूद जितेंद्र पदमालय स्टूडियो के चयन को मना नहीं कर सकते थे। दरअसल पदमालय स्टूडियो की पहली हिन्दी फिल्म मेरी आवाज सुनो में जितेंद्र  ने दो साल पहले ही सफलतापूर्वक काम किया था और अपनी नई पारी शुरू की थी।
...तो कुछ इस तरह जितेंद्र और श्रीदेवी की जोड़ी बनी और फिल्म आई हिम्मतवाला साल था-1983। अमिताभ बच्चन के विस्फोट काल में हिम्मतवाला के बारे में किसी को शुरुआत में कुछ पता नहीं चल सका। पहले हफ्ते के शुरुआती कई दिन हॉल खाली रहा। उस जमाने में आज की तरह हर हफ्ते फिल्म नहीं बदलती थी। सिनेमा हॉल के मालिकों ने फिल्म को बदलने का फैसला कर लिया था। लेकिन हफ्ते के आखिरी दिनों में जब सिनेमा हॉल में भीड़ बढ़नी शुरू हुई तो हॉल मालिक चौंक गये। क्योंकि दूसरे हफ्ते में दर्शकों की संख्या दोगुनी हो गई और तीसरे हफ्ते में सिनेमा हॉल हाउसफुल। बॉलीवुड के इतिहास में ऐसा अमूमन बहुत कम बार देखा गया है। हरेक फिल्म देखकर आने वालों की जुबान पर बस श्रीदेवी का नाम और फिल्म के गाने-नैनों में सपना, सपनों में सजना..., लड़की नहीं है तू लकड़ी का खंबा है...आदि गीत चस्पां हो गये। जाहिर है गीत जुबां पर चस्पां होते ही किसी भी फिल्म को ब्लॉकबस्टर होने से कोई रोक नहीं सकता। इसके बाद तो नई टीम बन गई-जितेंद्र, श्रीदेवी, कादर खान, शक्ति कपूर, असरानी, गीत-इंदिवर, संगीत-बप्पी लाहिड़ी, डांस-कमल, स्टूडियो-पदमालय आदि। ना जाने कितने ही फिल्मों में ये जोड़ियां कमाल करती रहीं और दर्शकों के दिलों पर राज करती रहीं। और इसी साल सन् 1983 में ही जब श्रीदेवी ने अपने ही दक्षिण के सुपर स्टार कमल हासन के साथ सदमा में भावप्रणब अभिनय का सिक्का जमाया तो उन लोगों की जुबां पर ताला जड़ दिया जिन्होंने श्रीदेवी को केवल सेक्स अपील पैदा करने वाली और डांस का तड़का लगाने वाली अभिनेत्री बताया था।  
'मि. इंडिया' में श्रीदेवी

श्रीदेवी के हिन्दी फिल्मों में स्थापित हो जाने से दक्षिण की ही एक और अभिनेत्री जया प्रदा को भी अपने अभिनय का जलवा दिखाने का फिर से मौका मिल गया। क्योंकि सरगम (1979) जैसी हिट फिल्म देने के बाद जया प्रदा भी कहीं गुम हो गई थीं। लेकिन श्रीदेवी के पदार्पण के बाद स्पर्धावश दोनों को तोहफा, मकसद, मवाली, आखिरी रास्ता आदि करीब नौ फिल्मों में साथ-साथ काम करने का मौका मिला। वस्तुत: यह स्पर्धा निर्माता-निर्देशकों की मार्किंट रणनीति का हिस्सा थी। हालांकि यह भी सच है कि उस दौरान दोनों अभिनेत्रियों में शीत युद्ध लंबे समय तक चला था।
बहरहाल इस दौर के बाद श्रीदेवी को नगीना और मिस्टर इंडिया ने नये अवतार में ढाल दिया। वह हवा हवाई हो गई। वाकई उसने बिजली गिरा दी। इन दोनों फिल्मों की अपार सफलता ने श्रीदेवी को बुलंदी पर पहुंचा दिया। नगीना की श्रीदेवी ने तो नागिन की बैजयंती माला की चर्चा को धूमिल कर दिया। वह सुपर स्टार अभिनेत्री कहलाने लगीं। और फिर इंकलाब तथा खुदा गवाह, लमहे, लाडला, गुमराह, जुदाई आदि फिल्मों ने तो श्रीदेवी को उस स्थान पर पहुंचा दिया जिसके पहले उस स्थान पर सिर्फ और सिर्फ हेमा मालिनी ही हुआ करती थीं। वस्तुत: श्रीदेवी में हेमा सी नृत्य दक्षता थी, जया भादुड़ी सी चुलबुल शोखी थी, ज़ीनत अमान सा सेक्स अपील था, परवीन बॉबी सी मोहकता थी तो रेखा सी ग्लैमरस अदायें थीं। लिहाजा वह सारे फ्लेवर मिलाकर एक सुपर स्टार अभिनेत्री का दर्जा हासिल करती थी।

'नगीना' में श्रीदेवी
लेकिन जुदाई के बाद श्रीदेवी ने लंबा ब्रेक लिया। निर्माता-निर्देशक बोनी कपूर से विवाह के पश्चात कुछ वर्षों तक फिल्मों से दूर रहीं और करीब पंद्रह सालों के बाद साल 2012 में गौरी शिंदे के निर्देशन में श्रीदेवी ने जब इंग्लिश-विंग्लिश से कम बैक किया तो  एक बार फिर से वो गुजरा जमाना याद आ गया। इस बार श्रीदेवी युवती नहीं थी। लेकिन उनका अभिनय अब भी उतना ही युवा था जितना कि चांदनी में या कि चालबाज में। 
इंग्लिश-विंग्लिश के पांच साल के बाद अब जबकि श्रीदेवी मॉम के अवतार में नजर आईं तो  उन्होंने अपने अभिनय की गहराई को फिर से उसी अंदाज में अहसास करा दिया जिसके लिए अपने फैन के बीच लोकप्रिय रहीं हैं।
वस्तुत: कम बैक के बाद  श्रीदेवी अपनी वास्तविक उम्र को चुनौती देने वाली अस्वाभाविक की भूमिका से कतिपय दूर रहना चाहती हैं तो उनका ये अफर्ट सहजता को स्थापित करने वाला प्रतीक होता है।  और इस कदम का स्वागत होना चाहिये। यही अफर्ट अमिताभ बच्चन में भी है जो उनकी बढ़ती उम्र के बावजूद उन्हें लोकप्रियता की कसौटी पर टिकाये रखता है।

'जूली' में बाल कलाकार श्रीदेवी
आशा की जानी चाहिये कि हमारे बॉलीवुड के ये आशावान कलाकार कुछ ऐसे ही स्वाभाविक से नये नये मुकाम को तैयार करते जायेंगे ताकि तात्कालिक सिनेमा की खतरनाक प्रवृतियां अपने आप ही हाशिये पर जाती रहें।
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1 टिप्पणी:

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