'कैंची' चलाने वाले के सिर लटकी 'तलवार'? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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बुधवार, 26 जुलाई 2017

'कैंची' चलाने वाले के सिर लटकी 'तलवार'?

अध्यक्ष बदलने से खत्म होगा विवाद? क्योंकि जज नहीं होते बोर्ड अध्यक्ष!

पहलाज निहलानी: फिल्म सेंसर बोर्ड के वर्तमान अध्यक्ष
-कल्पना*
एक तरफ जहां यह चर्चा जोरों पर है कि क्या पहलाज निहलानी को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन (सीबीएफसी) बोर्ड के प्रमुख के पद से छुट्टी कर दी जायेगी? वहीं पहलाज निहलानी ने यह बयान देकर फिर फिल्म कारोबारियों और सिने प्रेमियों में इस बहस को जन्म दे दिया कि अब दर्शक पर्दे पर नायक को धूम्रपान करते या शराब पीते हुए नहीं देख सकेंगे। ऐसे दृश्य वहीं रहेंगे जहां कहानी की कड़ी में इनका होना एकदम अनिवार्य होगा। साथ ही पर्दे के कोने में यह चेतावनी दिखाई जाएगी कि यहां धूम्रपान या शराब पीते हुए जो दृश्य आप देख रहे हैं वह ज्यादा दिनों तक नहीं रहने वाला। निहलानी की दलील है कि ‘जिन सुपरस्टारों को लाखों लोग पसंद करते हैं, जो सामाजिक व्यवहार में एक उदाहरण की तरह स्वीकृत हैं; उन्हें तब तक पर्दे पर धूम्रपान करते या शराब पीते नहीं दिखना चाहिए जबतक कि कहानी में इसकी एकदम से जरूरत ना हो।' बोर्ड अध्यक्ष निहलानी ने यहां तक कहा कि फिल्म में जहां शराब वाले दृश्य की अत्यंत आवश्यकता होगी उसे ‘एडल्ट’ का प्रमाण पत्र दे दिया जाएगा। हालांकि विवाद बढ़ने पर निहलानी ने अब यह सफाई दी है कि उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया।
फिल्म: जब हैरी मेट सेजल; 'इंटरकोर्स' शब्द पर आपत्ति
सबके निशाने पर निहलानी
दरअसल ऐसे ही कई बयानों और सिल्वर स्क्रीन के मनोरंजन उद्योग की अनेक दृश्यावलियों तथा शब्दावलियों पर कठोरता से कैंची चलाने के पक्षधर पहलाज निहलानी पर कम हमले नहीं हुये हैं। अदाकारा और राज्यसभा सांसद शबाना आजमी का मानना है कि सेंसर बोर्ड का काम कैंची चलाना नहीं बल्कि पिल्मों को वर्गीकृत करना है। उन्होंने पहलाज निहलानी के फैसलों की निंदा करते हुये कहा कि भारत में फिल्म प्रमाणन के लिए जिस तरह की प्रक्रिया अपनाई जाती है वह फिल्मों के विकास के हित में नहीं हैं।
पहलाज निहलानी पर कबीर बेदी भी निशाना साध चुके हैं। उनका कहना है कि बोर्ड दुनिया के मंच पर भारत की छवि ध्वस्त कर रहा है। कबीर बेदी ने तो पहलाज निहलानी की संज्ञा में ‘त्रासदी’ शब्द तक का इस्तेमाल किया। कबीर बेदी ने नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन पर बने वृत्तचित्र को सेंसर बोर्ड की मंजूरी न दिए जाने से संबंधित खबर का लिंक शेयर किया था और उस इस लिंक को प्रधानमंत्री कार्यालय को भी टैग करते हुये लिखा था कि, "सेंसर बोर्ड को समझ नहीं आ रहा कि वह अपनी मूर्खतापूर्ण मांगों के चलते भारत की छवि को कितना नुकसान पहुंचा रहा है। पहलाज निहलानी एक त्रासदी हैं।" गौरतलब है कि अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्यूमेंट्री को सेंसर बोर्ड ने फिल्म में 'गाय', 'गुजरात', 'हिंदू भारत' तथा 'हिंदुत्व' शब्दों के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी और मंजूरी देने से इनकार कर दिया था।

फिल्म:'लिपस्टिक अंडर माय बुरक़ा'; संस्कार के विरुद्ध बताया गया
बहुत पिछले के विवादों में अगर ना भी जायें तो हाल में फिल्म सेंसर बोर्ड ने कई बड़ी फिल्मों पर कैंची चलाने का आदेश जारी कर नई बहस को जन्म दे दिया था। मधुर भंडारकर की फिल्म 'इंदु सरकार' में 14 जगहों पर कांट-छांट करने और दो जगह खंडन चलाने के लिए कहा था। बोर्ड ने फिल्म में आपातकाल के दौरान मुखर राजनैतिक शख्सियतों तथा तत्कालीन समय से जुड़ी शब्दावलियों को निकालने के लिए कहा था। मधुर भंडारकर को यह आदेश रास नहीं आया। उन्होंने बोर्ड अध्यक्ष पहलाज निहलानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। मीडिया में निहलानी के खिलाफ टिप्पणियों की भरमार होने लगी।
इससे पहले उन्होंने अलंकृता श्रीवास्तव निर्देशित फिल्म फिल्म 'लिपस्टिक अंडर माई बुरक़ा' को भारतीय संस्कृति के विरुद्ध बता कर फिल्म में अभिव्यक्ति की स्वंत्रता के हिमायती कलाकारों को गहरा आघात पहुंचा दिया। बोर्ड अध्यक्ष के बयान पर नाराजगी जताते हुये फिल्म निर्देशिका अलंकृता श्रीवास्तव ने एक साक्षात्कार में कहा कि 'मुझे लगता है कि एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में किसी भी तरह की सेंसरशिप नहीं होनी चाहिए। हमने दिसंबर के अंत में सेंसर सर्टिफिकेट के लिए अप्लाई किया था और हमें इस साल जून के अंत में अपनी फिल्म के लिए सर्टिफिकेट मिला है। मुझे नहीं लगता कि फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट मिलने में इतना समय लगना चाहिए। मुझे लगता है कि देश में जेंडर ईक्वॉलिटी और महिलाओं की स्वतंत्रता को आप अनदेखा नहीं कर सकते।'
और अब लीजिये इम्तियाज अली की फिल्म 'जब हैरी मेट सेजल' में 'इंटरकोर्स' शब्द के इस्तेमाल को नाजायज़ बता दिया। इस टिप्पमी को लेकर निहलानी फिर से निशाने पर आ गये। हालांकि शाहरुख खान ने साफ किया है कि उनकी इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपत्तिजनक हो। इसके अलावा हाल ही रिलीज हुई फिल्म ‘फुल्लू’ को लेकर भी बोर्ड को आलोचना झेलनी पड़ी। यह फिल्म महिलाओं के मासिक धर्म के विषय पर किशोरियों के लिए शिक्षाप्रद श्रेणीँ की है लेकिन जब इसे ‘ए’ श्रेणी का प्रमाणपत्र दे दिया गया तो सवाल उठने लगे कि ऐसे में किशोरियां यह फिल्म कैसे देख सकेंगी? बोर्ड के इस अविवेकपूर्ण फैसले पर लोगों ने कम हैरत नहीं जताई। इसी के बरक्स अनुराग कश्यप को ‘उड़ता पंजाब’ के लिए बोर्ड से कितनी लड़ाई लड़नी पड़ी इसे भला लोग कैसे भूल सकते हैं। संभवत: ऐसे ही तमाम वाद-विवाद के चलते फिल्म अभिनेता और बीजेपी सांसद परेश रावल ने तो यहां तक कह दिया कि आज की तारीख में सेंसर बोर्ड की जरूरत ही नहीं, इसे खत्म ही कर देना चाहिये।

अमर्त्य सेन पर बने वृत्तचित्र को मंजूरी नहीं देने पर विवाद
कौन बनेगा बोर्ड अध्यक्ष? विवाद होगा खत्म?


बहरहाल अब सबकी नजर इस बात पर लगी है कि अगर पहलाज निहलानी की कुर्सी जाती है तो यह कुर्सी किसे मिलती है? वैसे चर्चा है कि निहलानी को हटाने के बाद चंद्रप्रकाश द्विवेदी अथवा प्रकाश झा को बोर्ड को अध्यक्ष बनाया जा सकता है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि अध्यक्ष बदल जाने सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली में कितना बदलाव आयेगा? क्योंकि बोर्ड अध्यक्ष जज नहीं होते और ना ही उनके सामने फैसले के लिए कोई ऐसा लिखित विधान होता है जिसके आधार पर वह फिल्मों को प्रमाण पत्र दें अथवा कैंची चलायें। सारा फैसला कुर्सी पर आसीन शख्सियत के स्व-विवेक पर निर्भर करता है। कभी कोई अधिकारी किसी दृश्य अथवा संवाद को जायज समझता है तो कभी किसी को वही संवाद और दृश्य आपत्तिजनक प्रतीत होता है।

तो बड़ा सवाल है ऐसे में सेंसर बोर्ड विवादों से अछूता कैसे रह सकता है? और इसका निदान क्या है?

*(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं। इस टिप्पणी को कहीं भी प्रकाशित करने से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है।  ईमेल करें-kalpnakdelhi@gmail.com/pictureplus2016@gmail.com)

2 टिप्‍पणियां:

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