"सेंसर बोर्ड हो लेकिन अंग्रेजों के जमाने जैसा नहीं" - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

"सेंसर बोर्ड हो लेकिन अंग्रेजों के जमाने जैसा नहीं"

जानी मानी समाजशास्त्री, सामाजिक कार्यकर्ता और पेशे से प्रोफेसर नंदिनी सरदेसाई वर्तमान में सेंसर बोर्ड की सम्मानित सदस्य भी हैं। सेंसर बोर्ड के वर्तमान स्वरूप और उनके मानदंडों को लेकर चल रही बहस के मुद्दों पर उनसे  सिने शोधार्थी मनीष कुमार जैसल ने विस्तृत बातचीत की, प्रस्तुत है संक्षिप्त अंश...



सेंसर बोर्ड की समकालीन गतिविधियों पर आपकी क्या टिप्पणी है?

1952 में जो कानून पास हुआ, उसके बाद 1983 में मुगदल कमेटी ने जो सुझाव रखे, उसके बाद से  सेंसरशिप में बदलाव की काफी हद तक जरूरत है क्योंकि तीस साल हो चुके हैं समाज में बदलाव स्वाभाविक है। इसीलिए सेंसरशिप में भी बदलाव की बहुत जरूरत है। उदाहरण के तौर पर देखें तो आजकल के बच्चे गालियों और अपशब्दों  का इस्तेमाल आम बोलचाल की भाषा में  करने लगे हैं। ऐसे में फिल्मों मे ऐसे सीन और संवाद को काटना कितना सही है यह हमें सोचने की जरूरत है। मेरी याद में इसको लेकर शर्मिला टैगोर जी जब चेयरमैन थीं तब बातचीत चली थी किन्तु संसद में इसे संज्ञान में  लिया ही नहीं गया क्योंकि उनका ध्यान अब तक सेंसरशिप  कानूनों के बदलाव पर गया ही नहीं। मुझे लगता है उनको यह सबसे निचले कार्यों की सूची में समझ आता होगा। संसद में  इसको लेकर कभी कोई ध्यान नहीं दिया गया, बीच में मुगदल कमेटी जरूर बनाई फिर भी उसकी सिफ़ारिशें आज भी ठंडे बस्ते मे हैं।  

क्या सेंसर की जरूरत इस समाज को है?

यह बहुत ही कंट्रोवर्सियल सवाल है, इस पर जितनी डिबेट होगी लोग इसके पक्ष विपक्ष पर खड़े होते आपको दिखेंगे। मेरी राय में सिनेमा में सेंसर की जरूरत उतनी ही है जितना कानून हमें इजाजत देता है। महेश भट्ट और श्याम बेनेगल जैसे फ़िल्मकारों को अपनी रिसपॉंसबिलिटी तो पता है किन्तु हमें यह भी मालूम है कि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो पैसा बनाने के लिए किसी भी हद तक जाकर फिल्मों में कुछ भी दिखाने की कोशिश करते हैं। हर कोई ज़िम्मेदारी नहीं निभाना चाहता । अगर उन पर रोक नहीं लगाई गयी तो समाज में एक गंदा संदेश जाएगा जिसको रोकने के लिए हम लोगों को सरकार ने बैठाया है।  दुनिया के लगभग सभी देशों में सेंसरशिप है तो भारत जैसे देश में तो यह और भी जरूरी हो जाता है। अमेरिका, सिंगापुर की संस्कृति हमारे देश से काफी अलग है और वहां लोग काफी खुलापन है फिर भी वहां सेंसरशिप लागू है। मैं यहां एक बात और स्पष्ट कर दूं कि अन्य देशों की तुलना में अपने यहां सेंसरशिप को ठीक से लागू नहीं किया गया है इसीलिए यहां सेंसर बोर्ड हमेशा विवादों में रहता है। हम टेलीविज़न और एडवरटाइजिंग की तरह सेल्फ सेंसरशिप की तरफ जाने को सोच  सकते हैं। लेकिन  इसके लिए फ़िल्मकारों को आगे आना होगा ।

क्या बोर्ड सदस्य फिल्में देखते हुए मॉरल पुलिसिंग की भूमिका निभाते हैं?

हां क्यों नहीं। मैं ऐसे कई सदस्यों के साथ फिल्में देख भी चुकी हूं जो कहते रहते हैं, यह नहीं चलेगा वो  नहीं चलेगा तब मैं उनसे कहती भी थी कि हमारा काम सर्टिफ़ाई करना है न कि काटना । लेकिन वहां अकेली मैं या कोई भी अकेला क्या कर सकता है। सेंसरशिप के कानून प्रमाण पत्र देने के लिए बनाए गए थे न कि फिल्मों को प्रतिबंधित या उनके सीन कट करने के लिए। क्योंकि यही काम उन दिनों ब्रिटिश सैनिक भी कर रहे थे। जब देश अंग्रेजों के गुलाम था वो कोई ऐसा संदेश भारतीय सिनेमा में रखते ही नहीं थे जो उनके खिलाफ हो, हमें इससे बचना होगा। हमें अंग्रेजी हुकूमत वाले सेंसरबोर्ड की कार्य प्रक्रिया को बदलना होगा और 1952 के कानून का वास्तविक पालन भी करना होगा।
मैं ये नहीं कह रही कि फिल्म को सिर्फ सर्टिफ़ाई ही  करें जहां जरूरत पड़े तो सामाजिक जिम्मेदारी आप निभा सकते हैं। किसी खुद एक फिल्म को देखते हुए, मैंने फिल्म के संवाद औरत एक सामान है को हटाने की मांग की थी। हालांकि यह कोई गाली नहीं थी लेकिन इसका अर्थ गलत तरीके से समाज में जा रहा था। इसीलिए हटाने के लिए निर्माता को कहा गया।

वर्तमान सेंसर बोर्ड चेयरमैन के ऊपर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने खुद अपने जीवन में ऐसी तमाम फिल्में बनाईं जिनमें अपशब्द और सी गेड सीन हुआ करते थे? इस पर आपकी क्या राय है?
 
सबसे पहले तो वो मुझे गलत आदमी ही लगता है जो बोर्ड का मुखिया बना हुआ है। जैसे एफटीआई आई का चेयरमैंन गजेंद्र चौहान। बात वहां इसलिए फैल गई कि क्योंकि वो छात्र थे और यहां हमलोग सरकार द्वारा चुने हुए लोग हैं, जो विरोध भी नहीं कर सकते थे। मैं आपको यह भी बताना चाहती हूं कि चेयरमैन का पद राजनीति से पूरी तरह लिप्त हुआ होता है । अब आप देखिये इन दिनों सिनेमा की  दुनिया में एक से बढ़कर एक बड़े नाम हैं,  जैसे साउथ में ही आप देखें तो कई नाम मिल जाएंगे । लेकिन बीजेपी ने इन्हें लाकर रख दिया और ये अपनी मालकीयत बोर्ड सदस्यों पर दिखाते रहते हैं।  ये कोई सिनेमा के बड़े नाम नहीं हैं। कई सदस्य तो उनसे पूछ भी लेते हैं कि जो सीन आप प्रतिबंधित कर रहे हैं आपने भी तो ऐसी कई फिल्में निर्मित की है, तो वो कुछ नहीं बोलते। अपना सारा कर्म भूल कर वो समाज को साफ करने का बीड़ा उठाते दिखते हैं जो सरासर गलत है और संवैधानिक रूप से भी गलत है। आपको यह सूचना दिये देती हूं कि जो 32 शब्दों को पहलाज जी ने प्रतिबंधित करने का निर्णय लिया, वे आज के नहीं हैं, बीते कुछ सालों में जब क्षेत्रीय आफ़िसरों की मीटिंग होती थी उन्हीं  में से यह शब्द निकल कर आते थे । पता नहीं किसने लाकर उन्हें यह लिस्ट दे दी और तुरंत उन्होंने सभी जगह बांटना शुरू कर दिया। फैसले से पहले बोर्ड सदस्यों की मीटिंग में जब हमलोग पहुंचे तो काफी विरोध भी किया। मैं और  चन्द्रप्रकाश द्विवेदी जी और काफी लोग इस फैसले का विरोध कर रहे थे लेकिन वो किसी की सुनने को तैयार नहीं थे,यहां तक कि द्विवेदी जी ने उनकी फिल्मों के नाम और प्रयोग किए गए शब्दों की लिस्ट भी दिखाई। पहलाज जी मुझे बोलते हैं कि आप बहुत लिबरल हो और बात नहीं सुनते । जब भी बोर्ड की मीटिंग होती है, मुझे मेरे और शर्मिला जी के समय पास की गई फिल्म ओमकारा के बारे में ही पूछते हैं और कहते हैं वो गलत निर्णय था आपका। शर्मिला  टैगोर से मैं कितना अच्छा हूं यह जताने का प्रयास करते रहते हैं। अपनी फिल्मों को भूल वो मेरे पीछे ही पड़े हैं । अभी हाल ही में मैंने फिल्म तितली में गालियों को फिल्म में शामिल रहने के बाद ए प्रमाण पत्र के लिए पास किया तो मुझे कहने लगें कि आप बहुत गलत कर रही हैं, बोर्ड में इतना लिबरल सदस्य होना सही नहीं है। उनको लगता है कि शर्मिला जी के समय में सभी लोग भ्रष्टाचारी थे । सीधी सी बात तो यह है कि शेक्सपियर के नाटक को जब आप पढ़ेंगे तो पाएंगे फिल्म में कुछ भी गलत नहीं था । फिल्म की डिमांड थी वो सीन तभी पास किए गए। वो फिल्मों के प्रचार और विकास के लिए काम करते नहीं दिखते बस उन्हें कुर्सी का रौब है ।

बोर्ड के सदस्यों में अधिकतर लोग राजनीति से जुड़े हुए दिखाई देते हैं, क्या यह सच है?  

पहलाज जी के आने के बाद अभी 10 लोग आए आप देखेंगे कि उनमें से अधिकतर उनकी पार्टी, विचारधारा से जुड़े हुए लोग होंगे,यह भी कहने से मुझे कोई गुरेज नहीं कि कॉंग्रेस के समय  भी ऐसा ही हुआ करता था। हालांकि सरकार ने 2 साल के अपने कार्यकाल को पूर्ण कर चुके पैनल सदस्यों को अभी तक हटाया नहीं है, उनका कार्यकाल धीरे धीरे 3-3 महीने करके बढ़ाती जा रही है  ऐसा क्यों है यह पता नहीं । जबकि मेरे कार्यकाल को पूरा होते ही मुझे लेटर भेज दिया गया था कि आपका कार्यकाल खत्म हो रहा है। पैनल मेम्बर का कार्यकाल 2 साल और बोर्ड मेम्बर 3 साल के लिए नियुक्त होते हैं । बोर्ड मेम्बर तो इन्होंने जल्द-जल्दी बदल लिए लेकिन पैनल मेम्बर लाने में इतना लेट लतीफी क्यों ? पैनल मेम्बर ही अधिकतर फिल्में देखता है तो ऐसे में उन्हें बदलने में इतनी देरी गलत है । कही न कहीं इसमे भी भ्रष्टाचार आगे चल कर सामने आता दिखेगा।

नंदिनी सरदेसाई के साथ साक्षात्कारकर्ता मनीष जैसल
आप देखिये कि अभी तक के इतिहास में पहले ऐसे चेयरमैन हैं जो रोजाना ऑफिस आकर पैनल सदस्यों के साथ फिल्म देख रहे होते हैं और हस्तक्षेप करते हैं। बोर्ड सदस्य भी पैनल सदस्यों के प्रमाणपत्र से संतुस्त न होने की दशा में ही फिल्में देखते हैं तो एक चेयरमैन होते  हुए भी वह ऐसा करते हैं तो यह किस हद तक सही है यह देखना होगा।  कुछ दिनों पहले मैंने एक फिल्म दोज़ख देखी थी जिसमे मेरे साथ दो अन्य मुस्लिम महिलाएं जो पैनल सदस्य थीं, वो  भी थीं। फिल्म में मुस्लिम दाह संस्कार के चित्रण को लेकर दोनों मुस्लिम औरतों को दिक्कत हुई और सीन कट करने का निर्णय लिया किन्तु प्रोड्यूसर पिछली बोर्ड अध्यक्षा लीला सैमसन से मिला तो उन्होंने भी बोल दिया कि रिवाइजिंग कमेटी ने अगर यह फैसला लिया है तो अपने विवेक से ही लिया होगा और उन सीन को हटाना पड़ा। अब बताइये यहां तो पहलाज जी पहले से ही मौजूद हैं, ऊपर से समाज के ठेकेदार के रूप में भी काम करते दिखते हैं, तो आप समझ सकते हैं कि हालात क्या होंगे। अभी हाल ही मुझे फिल्म हाइ-वे जब रिवाइजिंग कमेटी के रूप मे मेरे पास आई तो मैंने कट्स देकर पास कर दी तो कुछ सदस्यों ने चाइल्ड अब्यूज का पक्ष रख मुझे फिल्म पास न करने के लिए बोला तो मैंने कहा कि हम रोज अपने आस पास बच्चों के साथ हो रही ऐसी घटनाएं देखते हैं तो फिल्मों में दिखाने में क्या दिक्कत है। समाज का सच ही तो दिखा रही हैं फिल्में। कुल मिलकर पहलाज जी बोर्ड सदस्यों को स्टूडेंट्स की तरह ट्रीट करते दिखते हैं, ये नहीं रखना फिल्म में, वो नहीं रखना, इसे काटो उसे काटो,आदि आदि ....।
  
सेंसरशिप का पायरेसी के संबंध पर आपकी क्या टिप्पणी है?

भारत में इन दिनों प्रोद्योगिकी का विकास काफी तेज गति से हो रहा है । ऐसे में फिल्मों की पायरेसी सरकारी तंत्र पर बड़े सवाल खड़े करती है । क्या हमारी सरकारों ने पायरेसी से लड़ने के लिए योजनाएं बनाई हैं इसका भी अब तक कुछ पता नहीं चला है । जहां तक बात सेंसरशिप और पायरेसी की है फिल्में जितना समय सेंसर बोर्ड के अधीन रहेगीं पायरेसी का खतरा ज्यादा ही रहता है। आप देखेंगे कि  कुछ फिल्में हाल ही मे सेंसर कॉपी के रूप में सोशल मीडिया पर देखी गयी है। सूचना और प्रोद्योगिकी के इस युग में हमें सेंसरशिप के साथ पायरेसी से निपटने के लिए भी कड़े नियम बनाने होंगे ताकि हमारा  सिनेमा और भी विकास कर सके।

विदेशी फिल्मों की सेंसर प्रक्रिया में किस प्रकार का रवैया रहता है?

विदेशी फिल्मों में भी सेंसर के वही नियम लागू होते हैं जो भारतीय फिल्मों में है। किन्तु अगर लॉजीकली  हमलोग देखें तो विदेशी सिनेमा में ऐसे दृश्य-संवाद हमें अमूमन देखने को मिल ही जाएंगे जो भारतीय फिल्मों मे विवादित होने के बाद दिखते हैं । हाल ही मे मैंने अंग्रेजी फिल्म वैकेशन देखी जिसमें काफी गालियां थीं, किन्तु भारत में प्रदर्शन हेतु उन गालियों को हटाना पड़ा । ऐसे में विदेशी फिल्मों पर कहें तो सेंसरशिप की मार और भी ज्यादा देखने को मिलती है, जो कानूनन गलत है।

विवादित फिल्मों पर राज्य सरकारों द्वारा एक और सेंसर प्रक्रिया  को आप किस तरह देखती हैं?

राज्य सरकारें अपने नियमों और कानून व्यवस्था को ध्यान में रख कर यह सब करती हैं किन्तु इसके लिए वह कानूनन सही नहीं है । चूंकि देश में आंदोलनों के डर से निर्माता भी चुपचाप बैठ जाते हैं तो इस पर कोई बड़ी बहस का मुद्दा बन नहीं पाया कि अब तक  द विंची कोड, पीके, विश्वरूपम आदि जैसी फिल्मों पर  राज्य सरकारों द्वारा प्रतिबंध लगाया जाना लीगली कितना सही था।

एक प्रोफेसर होने के नाते वर्तमान सेंसरबोर्ड को आप किस नज़र से देखती है?

एक प्रोफेसर भी होने के नाते बोर्ड के अब तक के सफर के बारे में इतना कह सकती हूं कि सेंसरशिप को लेकर सिर्फ राजनीति की गयी है, कोई ढंग का काम नहीं हुआ दिखता है । बोर्ड सदस्यों के अलावा अगर गौर करें तो आपको पैनल सदस्यों के रूप में आपको एक बार का मालिक, ड्राइवर, किसी नेता का पूर्व पीए जैसे लोग मिल जाएंगे। बोर्ड में ऐसे लोगो की भरमार है जो फिल्म से कोसो दूर हैं, लेकिन फिल्म को सर्टिफ़ाई करने का जिम्मा जरूर दिया गया है। सरकार भी ऐसे लोगों को वोट या किसी अन्य कार्य के बदले में उन लोगों को रिटर्न गिफ्ट देना नहीं भूलती, क्योंकि यही एक ऐसी जगह है जहां अभी तक कोई सवाल जवाब नहीं उठते । अंबिका सोनी जब मंत्री थीं तो मैंने पैनल सदस्यों के लिए एक निश्चित योग्यताएं बनाने की बात कही थी लेकिन कुछ नहीं हुआ। कांग्रेस के जमाने के पैनल सदस्यों और बीजेपी द्वारा बनाए गए लोगो में मुझे बीजेपी वाले अभी तक ठीक लग रहे हैं क्योंकि मैं कुछ ऐसे लोगों से मिल चुकी हूं जो नाटककार और स्वतंत्र फ़िल्मकार भी हैं ।
बाकी तो आप देख ही रहे हैं बोर्ड क्या कर रहा हैं...?

(साक्षात्कारकर्ता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में हिन्दी सिनेमा में सेंसरशिप विषय के शोधार्थी हैं। यह साक्षात्कार पिक्चर प्लस के दिसंबर, 2016 के अंक में प्रकाशित हो चुका है

1 टिप्पणी:

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