“वेस्टर्न कभी ईस्टर्न को खत्म नहीं कर सकता” - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 29 जुलाई 2017

“वेस्टर्न कभी ईस्टर्न को खत्म नहीं कर सकता”

सत्यजीत रे,मृणाल सेन,ऋतुपर्णो घोष,अमिताभ बच्चन के साथ काम कर चुकी हैं ममता शंकर

अमिताभ बच्चन के साथ ममता शंकर
जानी-मानी फिल्म अभिनेत्री और कोरियोग्राफर ममता शंकर देश के मूर्धन्य शास्त्रीय नृत्य कलाकार उदय शंकर एवं अमला शंकर की पुत्री हैं। माता-पिता की उंगली पकड़कर इन्होंने नृत्य की बारीकियां सीखीं हैं और बाद में फिल्म अभिनेत्री के रूप में भी एक अलग पहचान बनाई। 1976 में रिलीज हुई मृणाल सेन की फिल्म 'मृगया' में भावप्रवण अभिनय के लिए ममता को पुरस्कार भी मिला था। ममता शंकर इन दिनों क्या कर रही हैं, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक व अभिनेता संजय सिन्हा ने उनसे इस बारे में बातचीत की:-

-स्वनामधन्य कलाकार परिवार से सम्बन्ध हैं आपका, कला आपको विरासत में मिली, कैसा अनुभव करती हैं आप ?

मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करती हूं। पंडित रविशंकर, उदय शंकर, अमला शंकर और आनंद शंकर जैसे गुणी और सुविख्यात कलाकारों के बीच ख़ुद को पाकरमैं धन्य होती रही। जन्म लेते ही कानों में संगीत का स्वर गूंजता रहा। घुंघरू क़ी आवाज़ सुनाई पड़ती रही।

-आपने भी नृत्य से ही अपने करियर क़ी शुरुआत की थी। अचानक फिल्मों की तरफ कैसे मुड़ गईं?

वैसे भी नृत्य और अभिनय के बीच प्रगाढ़ रिश्ता है। भावप्रवण अभिनय के बिना नृत्य की प्रस्तुति बेमानी है। मैंने तो शास्त्रीय नृत्य से ही अपने करियर का शुभारम्भ किया था मगर कुछ फिल्मकारों ने अभिनय का ऑफर दिया तो मैं इनकार नहीं कर सकी।

-शास्त्रीय नृत्य को आप किस रूप में देखती हैं ?

शास्त्रीय नृत्य में जीवन का हर पहलू समाहित है। इसे वही महसूस कर सकता है जो पूरी तरह से इसके प्रति समर्पित है। चूंकि मेरा पारिवारिक माहौल ही नृत्य और कला के ईर्द-गिर्द घूमता है इसलिए मैं भी पूर्णरूपेण इसमें डूबी हुई हूं। इसका एक अलग आनंद है। मैंने शास्त्रीय नृत्य को हमेशा पूजा की तरह माना है। मैं अभिनेत्री ज़रूर हूं मगर नृत्य मेरी पहचान है।
 
मंच पर नृत्य प्रस्तुत करतीं ममता शंकर
-किन फिल्मकारों के साथ काम करना आपके लिए एक सुखद अहसास बना और आज भी उन पलों को आप भूल नहीं पाईं हैं ?

मैंने लगभग सभी दिग्गज फिल्मकारों के साथ काम किया। मसलन-सत्यजीत रे, मृणाल सेन, ऋतुपर्णो घोष, बुद्धदेब दासगुप्ता, गौतम घोष आदि सभी ने मुझे स्नेह दिया और हर पल सीखने का मौका भी मिला। इन दिग्गजों के सानिध्य से मैंने अभिनय की बारीकियां सीखीं। शूटिंग्स के दौरान भी मैं हमेशा कुछ सीखने का प्रयास करती थी। मेरा ऐसा मानना है कि इंसान ताउम्र सीख सकता है। इसकी कोई उम्र नहीं होती, ना ही कोई सीमा होती है। अपने को-आर्टिस्ट्स के साथ भी मेरे रिलेशन्स अच्छे रहे। काम के दौरान भी हमलोगों ने ज़िन्दगी का आनंद लिया।

-कोई ऐसा पल जिसे आज तक भूल नहीं पाई हैं आप ?

ऐसे बहुत सारे पल हैं। सुख-दुःख तो जीवन का हिस्सा होता है मगर मैंने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी खुद को सम्भाला।

-नृत्य के क्षेत्र में नया क्या कर रहीं हैं आप ?

देखिये नृत्य के क्षेत्र में करने को बहुत कुछ है। मैंने भी बहुत सारे प्रयोग किये हैं। समय समय पर कुछ कुछ अलग करने की कोशिश क़ी है। आज भी मैं अपने स्टूडेंट्स को हमेशा अलग करने क़ी सीख देती हूं। एक कलाकार के लिए कला ही उसकी पहचान होती है। इसलिए एक कलाकार को सदैव बेहतर करना चाहिए। अगर आपका परफॉरमेंस अच्छा होगा तभी आप पहचान बना पाएंगे। मैंने अपने पिता और माता को भी कड़ी मेहनत करते हुए देखा है।

-आजकल ईस्टर्न के साथ वेस्टर्न मिक्स करने की परंपरा-सी चल रही है। इसे किस रूप में देखतीं हैं आप ?

इसमें कोई खराबी नहीं है। समय के साथ सब कुछ बदलता है। यह प्रयोग बहुत दिनों से होता आ रहा है। लेकिन इस दौरान एक बात का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी है कि ईस्टर्न और वेस्टर्न के मिक्सिंग के बीच कहीं ईस्टर्न क़ी आत्मा मर न जाये। मैंने भी कई बार इस तरह के प्रयोग किये हैं मगर इस मामले में हमेशा गम्भीर रही हूं। शास्त्रीय संगीत और नृत्य क़ी अपनी एक अलग गरिमा है, इसे नाकारा नहीं जा सकता। विदेशों में भी लोग शास्त्रीय संगीत को फॉलो कर रहे हैं। मेरे बहुत सारे शिष्य विदेशों में हैं और शास्त्रीय नृत्य सीख रहे हैं।

ममता शंकर के साथ साक्षात्कारकर्ता संजय सिन्हा
-इस मुकाम तक पहुंचकर कैसा अनुभव करती हैं ?

अच्छा लगता है कि परिवार से मिली विरासत को आगे बढ़ा रही हूं। कला की सेवा कर रही हूं। जब तक सांस है तब तक ये सब छूटेगा नहीं।

-फिल्म अभिनय से अब नाता तोड़ लिया है आपने?

ऐसी बात नहीं है, लेकिन अभी पूरी तरह से नृत्य और अपने डांस इंस्टिट्यूट के प्रति समर्पित हूं।

-मूलतः आप एक कलाकार हैं, लेकिन कभी अगर पॉलिटिक्स में जाने का मौका मिले तो क्या करेंगी ? बहुत सारे कलाकारों ने पॉलिटिक्स ज्वाइन किया है।

सही कहा अपने मगर मैंने पॉलिटिक्स के बारे में नहीं सोचा है। कलाकार ही रहना चाहता हूं। जीवनपर्यंत कला क़ी सेवा करने क़ी इच्छा है।
 
-आपको नहीं लगता कि आज के माहौल में आज के युवा वेस्टर्न म्यूजिक क़ी तरफ भाग रहे हैं।

शास्त्रीय संगीत और नृत्य कभी ख़त्म नहीं हो सकता। ये बात ठीक है कि वेस्टर्न म्यूजिक का प्रचलन बढ़ा है मगर ये कहना गलत है कि ये खो रहा है। आज भी युवाओं का एक वर्ग ईस्टर्न डांस और म्यूजिक के प्रति समर्पित हैं।

-नए कलाकारों के लिए क्या सन्देश देना चाहती हैं ?

मेहनत, लगन और समर्पण बहुत ज़रूरी है। इसके बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते। नए कलाकारों के लिए भी यही कहना चाहूंगी कि वे समर्पित भाव से रियाज़ करें और लक्ष्य क़ी ओर सदैव दृष्टि रखें। जब तक आप टारगेट नहीं बनाएंगे तब तक सफलता तक नहीं पहुंच सकते।

(साक्षात्कारकर्ता वरिष्ठ पत्रकार तथा सिनेमा समेत विभिन्न कला माध्यमों के विशेषज्ञ हैं। यह साक्षात्कार पिक्चर प्सस के दिसंबर,2016 अंक में प्रकाशित हो चुका है। इसके पुनर्प्रकाशन के लिए  पूर्वानुमति आवश्यक है।) 

1 टिप्पणी:

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