गुरुदत्त और हमारी-आपकी दुनिया - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 9 जुलाई 2017

गुरुदत्त और हमारी-आपकी दुनिया

'प्यासा' से लेकर 'दुनिया पित्तल दी' तक कितना बदल गया संसार?

-संजीव श्रीवास्तव

ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है!
कभी कभी सोचता हूं कि हिन्दी सिनेमा को अगर गुरुदत्त नहीं मिले होते तो शायद दुनिया को गहराई से समझने का नया नजरिया भी नहीं मिला होता।
यूं तो दुनिया को ज्यादातर लोगों ने निराली और सौंदर्यबोध से परिपूर्ण ही माना है, वरना प्रसाद, पंत जैसे प्रकृतिवादी कवि हमारे पास कहां होते! लेकिन सिनेमा की दुनिया में गुरुदत्त ने दुनिया को कुछ अलग ही नजरों से देखा। दुनिया उनके लिए महकते फूलों का गुलदस्ता नहीं बल्कि वह तो कागज के फूल है।

जला दो, मिटा दो ये दुनिया!

साल 1957 में जब ‘प्यासा’ आई तो दुनिया के बारे में कुछ इसी किस्म के बेज़ार और गुस्सैल नजरिये को लेकर आई। मसलन-ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है। गीत लोकप्रिय हुआ तो, गीत के फलसफे की सामाजिक-आर्थिक-दार्शनिक व्याख्या की गई और फिर लोगों के दिलों दिमाग पर एक नशा सा असर कर गई। जिसे भी जहां भी विफलता मिली, गाना शुरू किया-ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है 
हालांकि इससे पहले साल 1951 में ‘मल्हार’ फिल्म में नायक-नायिका ने बड़े ही जोश और जतन से प्यार की दुनिया में अपना कदम रखा था और गाया भी था कि बड़े अरमान से रखा है बलम तेरी कसम, प्यार की दुनिया में ये पहला कदम...लेकिन इन्हें कहां पता था दुनिया कितनी जालिम है। यहां प्यार की दुनिया भला इतनी आसानी से कहां फलने फूलने दी जाती है। एक साल बाद ही यानी 1952 में ‘बैजू बावरा’ में प्रेमी के दर्द भरे नाले उखड़ गए थे। उन्होंने ऊपर वाले से गुहार लगा दी-ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले...और फिर इसके ठीक पांच साल के बाद जब ‘प्यासा’ आई तो तड़पते नायक का दिल कहीं अंधकार में डूब गया। दुनिया की हर चमक उसे फीकी लगने लगी। हर तरफ धोखा, फरेब और जुल्म के जख्म नजर आने लगे। फिर तो नायक ने इस पूरी दुनिया को ही धता बता दिया -ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।

गुरुदत्त के  इस दर्द और निराशा का असर बहुत दूर तलक गया। जाहिर है वह ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार नहीं थे और ना ही लवर ब्वॉय देवानंद या कि गंवई अंदाज में भोलेपन के साथ इश्क करने वाले भावुक राजकपूर। गुरुदत्त का दिल, देह और दुनिया के प्रति अपना ही नजरिया था। वह प्रेम की विफलता को सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखते थे। उनकी भावुकता में असमानता और अन्याय या कि दिखावे की दौलतबाजी के प्रति गुस्सा भी था। तभी तो वो प्यासा के इस गीत में दुनिया को जला देने, हटा देने की लाउड भावना भी व्यक्त करते हैं।
 
दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा...

दुनिया में जीना ही पड़ेगा!

हालांकि इसी बीच प्यासा के उलट दुनिया में संघर्ष की भावना और जीजिविषा के प्रति समर्पण और त्याग को 1957 में ही मदर इंडिया के इस गीत ने बहुत ही आशावादी नजरिये को अभिव्यक्त किया-दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा, जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगा...। हालांकि नैराश्य फिर भी था लेकिन दुनिया के प्रति सकारात्मकता की शुरुआत यहां से हो गई थी। जिसका असर काफी बाद में आठवें और नब्बे के दशक के सिनेमा पर पड़ा। इस बीच प्यासा’ के उस दर्द भरे यथार्थवादी भावुक का गीत का असर फिर भी जारी था। सन् 1959 में आई ‘उजाला’ के प्रेमी-प्रेमिका ने तो एलान ही कर दिया-दुनिया वालों से दूर, जलने वालों से दूर, कहीं दूर कहीं दूर कहीं दूर...। आगे भी दुनिया कुछ इसी भाव से परिभाषित होती रही, मसलन-तेरी दुनिया से दूर, हो के चले मजबूर हमें याद रखना  (जबक-1961), ‘दुनिया बड़ी जालिम है, दिल खोल के हंसती है’ (एक सपेरा, एक लुटेरा-1966)। दुनिया में दर्द देने वालों को इतना कोसने के बाद भी जब पत्थर दिल नहीं पिघला तब ‘अनुपमा’ (1966) का ललकारता हुआ यह गीत आया-या दिल की सुनो दुनिया वालो...। लेकिन फिर भी दुनिया ने नहीं सुनी। दुनिया भर की प्रेम कहानियां बताती हैं जहां दिल जन्मता है वहीं दीवार की नींव भी पड़ जाती है।

दुनिया बनाने वाले, काहे को दुनिया बनाई...?

काहे को दुनिया बनाई…?  

जिंदगी की इसी दुनियादारी का पेंचोखम जब भोले और सीधे हीरामन को समझ नहीं आया तो उसने ऊपर वाले से कुछ यूं सवाल कर दिया-दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई...(तीसरी कसम-1966)। यह एक दार्शनिक सवाल था। प्रेम का रहस्यवाद। देहवाद से जरा हटकर सौंदर्य की चेतना के करीब। हां, यहां निराशा कम थी। इसमें दुनिया के प्रति एक अलग किस्म का आकर्षण था। नैसर्गिक चमत्कार और उस चमत्कार के प्रति सम्मोहन से भरे कई रहस्यवादी सवाल थे। पूरे गीत में नायक सवाल करता ही जाता है-काहे बनाये तूने माटी के पुतले, काहे लगाया जवानी का मेला ‘ आदि...आदि...। लेकिन दुनिया का रहस्यवाद, रहस्यवाद ही रहा। ‘तीसरी कसम’ के नायक के भोले सवालों का जवाब शायद नहीं मिला। तब सन् 1970 में एक तरफ ‘हीर रांझा’ के नायक ने रेतीले मैदान में गर्दो-गुबार उड़ाते हुए गाया- ‘ये दुनिया, ये महफिल, मेरे काम की नहीं तो ‘पवित्र पापी’ के नायक ने भी कुछ इसी अंदाज व भाव के साथ गमन किया-तेरी दुनिया से होके मजबूर चला...मैं बहुत दूर...बहुत दूर...बहुत दूर चला...।

आठवां दशक : बदलने लगी दुनिया

लेकिन आठवें दशक तक आते-आते या कि उसके बाद हिंदी सिनेमा में दुनिया को देखने का नजरिया बदलने लगा। सड़क, गलियों, बाजार आदि में भीड़ बढ़ी तो भावुकता हाशिये पर जाती हुई दिखाई देने लगी। यह बढ़ते बाजार, चढ़ते भाव और दौड़ती-भागती जिंदगी के साथ कदमताल करने का वक्त था। भारत के बाहर की दुनिया भारत की ओर देखने लगी थी और भारत के लोग बाहरी दुनिया में झांकने लगे थे। अगर ये दुनिया मिल जाए तो वाह क्या बात है(पीयूष मिश्रा की प्रस्तुति) सरीखे भाव भी दिखाई देने लगे। राजकपूर ने ‘बॉबी’ (1973) में डिंपल कपाड़िया की जुबान से कहलवाया कि “मैं इक्सवीं सदी की लड़की हूं तो सिनेमा के पर्दे पर नायिकाओं ने दुनिया का वातायन खोल दिया था। उससे पहले फुटपाथ पर बीच बाजार में नायिका ने गाया -दुनिया का मेला, मेले में लड़की, लड़की अकेली शन्नो नाम उसका...(राजा जानी-1972)। यह परंपरागत वर्जनाओं को बाजार के बीच भुला देने का नया दौर था।  

नब्बे का दशक : दुनिया हसीनों का मेला

नब्बे का दशक तक आते-आते दुनिया मनोरंजन के उदारवाद की दहलीज को पार कर गई। दुनिया को देखने का एक और नजरिया विकसित हुआ। जिस दुनिया को लोगों ने अपनी दुनिया और ख्वाहिशों के आगे कुछ नहीं समझा, वहां अब गाया गया-दुनिया में कितना गम है मेरा गम कितना कम है...लोगों का गम देखा तो मैं अपना गम भूल गया...(अमृत-1986) या कि ‘दुनिया हसीनों का मेला...(गुप्त-1997) । जी हां, ये रोमांटिसिज्म की दुनिया से बाहर निकलकर दिल और सामाजिकता की उदार दुनिया में एक नई दस्तक थी। तभी तो जिस दुनिया को लोगों ने इतना भला-बुरा कहा -उसी दुनिया को ‘त्रिमूर्ति’ (1995) में झूमते-झामते गाया गया- ‘दुनिया से दुनिया...वेरी गुड वेरी गुड...। यह दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है- को करारा जवाब देने का प्रयास था।

ये दुनिया पित्तल दी...

बीसवीं सदी : दुनिया पित्तल की या जादू का खिलौना है!

लेकिन आज की संचार क्रांति की दुनिया में विस्फोटक मनोरंजनवाद की एक बेबी डॉल ने यह कह कर सनसनी फैला दी कि ‘ये दुनिया, ये दुनिया पित्तल दी...जिसके बाद यह दुनिया मादकता प्रधान हो गई। लोग भी मादकता के वशीभूत होने लगे वशीकरण कला से अभिभूत होने लगे। यह देहवादी दुनिया थी जहां उपभोग स्थायी भाव था, लेकिन इसके केंद्रीय भाव में दुनिया को पित्तल कह कर उसी नैराश्य भाव को प्रकट किया गया था, जिसे पचास के दशक में गुरुदत्त ने कहा था-ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है लेकिन मदमाती दुनिया के मदमस्त लोगों को इसके केंद्रीय भाव के निहितार्थ से क्या लेना देना। सोना (Gold) अगर ना मिले तो पित्तल ही सही। इसी संदर्भ में गजल किंग जगजीत सिंह ने क्या खूब गाया है कि ‘दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है।
(इस लेख को किसी भी तौर उपयोग में लाने के लिए लेखक से पूर्वानुमति जरूरी। ईमेल करें।) सभी फोटो-नेट से साभार       

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहोत बेहतरीन तरीक़े से आपने पुरे फ़िल्म युग को एक माला में पिरोया है....!!

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  2. रणवीर सिंह का नया वीडियो खून भरी मांग उनके साथ हीरोइन हैं फराह खान
    गोविंदा के इल्‍जामों पर वरुण धवन ने साधी चुप्‍पी कहा मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है
    मामी ने दिखाया स्वर्ग का दरवाजा (Mammi Ne Dikhaya Swarga Ka Darwaja)
    देश के सबसे अमीर अंबानी परिवार के बारे में ये सब नहीं जानते होंगे आप
    इस महाराजा ने बनाया था क्रिकेट और पटियाला पैग का अनोखा कॉकटेल
    आखिर क्यों ये लड़की रोज लगाती है शमशान घाट के चक्कर
    शादी से एक सप्ताह पहले मां बेटे के कमरे में गई तो पैरों तले खिसक गई जमीन
    Antarvasna युवकों की आम यौन समस्यायें
    इस तरह के कपड़े पहनना दरिद्रता को न्योता देता है
    सलमान की खास दोस्त यूलिया ने किया एक और गाना रिकॉर्ड
    वैलेंटाइन डे पर बेडरूम में बस रखें ये खास चीज और फिर देखें कमाल

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