तीन तलाक और बॉलीवुड - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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मंगलवार, 22 अगस्त 2017

तीन तलाक और बॉलीवुड

ना 'निकाह' से पहले ना उसके बाद बनी दूसरी कोई फिल्म  

'निकाह' में सलमा आगा
-संजीव श्रीवास्तव
तलाकऔर फिर उसके बाद मिलन हिन्दी फिल्मों के लिए एक अहम विषय रहा है लेकिन तीन तलाक पर गिनती की फिल्म बनी।  
सबसे पहले सन् 1938 में एक फिल्म बनी थीं जिसका नाम ही था-तलाक। मिनरवा मुवीटोन के लिए बनाई गई इस फिल्म का निर्देशन सोहराब मोदी ने किया था। इसमें तलाक को एक सामाजिक बुराई के तौर पर दिखाया गया था। सायरा बानो की मां नसीम बानो ने इस फिल्म में मुख्य किरदार निभाया था-जिसका नाम था-रूपा। यानी तलाक फिल्म में मुस्लिम पति-पत्नी के तलाक की कहानी नहीं थी बल्कि हिन्दू पति-पत्नी की कहानी थी। ऐसी कहानी पर आगे चलकर साठ और सत्तर के दशक में तमाम फिल्में बनीं। सन् 1958 में महेश कौल के निर्देशन में एक बार फिर तलाक नाम से फिल्म आई-जिसमें राजेंद्र कुमार और कामिनी कदम ने अभिनय किया था लेकिन यहां की कहानी एक बार फिर से हिन्दू पति पत्नी के दांपत्य जीवन के उतार चढ़ाव पर आधारित थी।
फिलहाल हम उन फिल्मों की चर्चा नहीं करने जा रहे हैं। हम बात यहां करेंगे - मुस्लिम समाज के भीतर चली आ रही एक बार में तीन तलाक कहने की प्रथा पर आधारित हिन्दी फिल्मों की। सवाल उठ सकता है कि हमारे बॉलीवुड में मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि कलाकारों की कोई कमी नहीं है इसके बावजूद एक बार में तीन तलाक विषय पर फिल्मों की संख्या नगण्य क्यों है?  

राज बब्बर और सलमा आगा

एकमात्र निकाह
सालों बाद 1982 में बी.आर.चोपड़ा ने एक फिल्म बनाई थी-निकाह। रिलीज से पहले यह फिल्म काफी चर्चा में रही। क्योंकि पहले इसका नाम तलाक तलाक तलाक रखा गया था। लेकिन सेंसर बोर्ड से आपत्ति और काफी विचार-विमर्श के बाद इस फिल्म का नाम निकाह रखा गया। फिल्म का नाम इसीलिये बदला गया था कि सामान्य जनजीवन में इसे बोलने से किसी मुस्लिम मर्द का अपनी पत्नी से तलाक ना हो जाये। क्योंकि इस्लामिक मान्यता के मुताबिक मुस्लिम महिला के कान में अगर उसके पति द्वारा उच्चरित तीन बार तलाक...तलाक...तलाक सुनाई दे दे, तो फिर वह तलाक माना जाता रहा है।  
इस फिल्म में राज बब्बर, दीपक पाराशर अभिनेता थे और सलमा आग़ा अभिनेत्री थीं। सलमा आगा पाकिस्तान से आईं थीं और हिन्दी में उनकी यह पहली फिल्म थी। सलमा आग़ा वहां बेहतरीन गायिका भी रही हैं लिहाजा उन्होंने अपने किरदार के लिए रचे गये सारे गीत खुद ही गाये थे। यह फिल्म सलमा आगा की हरी आंखें और उनकी नकीली स्वरलहरी के चलते भी फिजां में काफी मशहूर हुई थी।
मसलन,
दिल के अरमां आंसुओं में बह गये,
हम वफ़ा करके भी तन्हां रह गये...

दीपक पाराशर और सलमा आगा
इसी फिल्म में मशहूर गजल गायक गुलाम अली की ग़ज़ल को भी पार्श्वगीत के तौर पर शामिल किया गया था...
चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है,
हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है...

कुल मिलाकर आंसू दोनों ही तरफ थे। स्त्री के जीवन में भी आंसू थे और पुरुष के दामन में भी दर्द था। और ये दर्द तथा आंसू की वजह था-तलाक।

दरअसल निकाह की कहानी लिखी थी-हिन्दी की मशहूर लेखिका अचला नागर ने। जिनके जेहन में यही सवाल था कि इस समाज में केवल पुरुष ही स्त्री को छोड़ने का हक क्यों रखता है? बात जहां तक मुस्लिम समाज की आती है कि तो वहां यह अंतर और भी विकट दिखाई देता है। क्योंकि जिस तरह निकाह में स्त्री की मर्जी पूछी जाती है उस तरह एक बार में तीन तलाक के वक्त स्त्री का पक्ष क्यों नहीं सुना जाता।  

'निकाह' की लेखिका-अचला नागर
निकाह आज भी  इस विषय की इकलौती फिल्म है। गीत, संगीत, कहानी, अभिनय, सरोकार आदि सभी दृष्टिकोणों से निकाह आज भी एक अहम मुद्दे को उठाने वाली फिल्म है। लेकिन निकाह के बाद एक लंबा अंतराल होने के बावजूद  एक बार में तीन तलाक या मुस्लिम महिला के तलाकशुदा जीवन की दुश्वारियों पर हिन्दी में कोई फिल्म नहीं बन सकी। अगर यह सवाल पूछा जाये कि क्यों? तो इसका जवाब मैं आप सबपर छोड़ता हूं।  
 कुछ शॉर्ट कोशिश
 हाल के सालों में जब से तीन तलाक पर सियासत शुरू हुई है और मुस्लिम समाज की महिलाओं ने इसको लेकर सवाल उठाया, कोर्ट का रुख़ किया तो उसके बाद कुछ फिल्मकारों ने भी इस विषय पर कुछ शॉर्ट फिल्में बनाने की ठानी। इसी कड़ी में इस प्रथा को एक सामाजिक बुराई मानते हुये निर्देशक विपुल झा की सच्ची घटना पर आधारित एक शॉर्ट फिल्म है, जिसका नाम है-ट्रिपल तलाक’; तो वहीं नेशनल अवॉर्ड विजेता निर्देशक शिवाजी लोटन पटेल  एक फिल्म को लेकर आ रहे हैं-जिसका नाम है–हलाल। यह फिल्म 53वें  महाराष्ट्र फिल्म पुरस्कार समारोह में 6 पुरस्कार जीत चुकी है। लेकिन ये सारी की सारी शॉर्ट फिल्म है। एक बार में तीन तलाक से पीड़ित किसी मुस्लिम महिला की जिंदगी के दर्द के अहम आयाम को चित्रित करने वाली मुख्यधारा की फीचर फिल्म अब भी बाकी है।
 एक बार में झटके से दिये गये तीन तलाक के मुद्दे पर पिछले साल भारत आईं पाकिस्तानी अदाकारा सलमा आगा ने भी कहा था-यह तीन तलाक मुस्लिम औरतों के लिए अभिषाप है। इससे मुक्ति मिलनी चाहिये। तीन तलाक की इजाजत कुरआन भी नहीं देता

(कॉपीराइट नियमों के मुताबिक इस टिप्पणी को कहीं भी प्रकाशित करने से पूर्व अनुमति लेने तथा साभार लिखना आवश्यक है। ईमेल करें-pictureplus2016@gmail.com)

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही उम्दा रचना...
    धन्यवाद...
    साजन वर्मा "संजय"
    http://www.filmysansaar.com

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