"सबकुछ सीखा तुमने ना सीखी होशियारी" - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

बुधवार, 30 अगस्त 2017

"सबकुछ सीखा तुमने ना सीखी होशियारी"

गीतकार शैलेन्द्र की जन्म तिथि पर विशेष 
(30 अगस्त)


 गीतकार व कवि शैलेंद्र के अनन्य मित्रों में से एक रहे हैं माधुरी के पूर्व संपादक अरविंद कुमार। उनके मुताबिक फिल्म तीसरी कसम के अंतिम दिनों शैलेंद्र को  एक नजदीकी दोस्त से पांच या दस हजार रुपए कर्ज के बदले फिल्‍म में बराबर की भागीदारी लिखनी पड़ी थी
                                                                    -अरविंद कुमार
 मुझे वह जगह और वह दिन अच्‍छी तरह याद हैँ।
 मुंबई में कोलाबा का एक छोटा सा नर्सिंग होम। 14 दिसंबर 1966 - राज कपूर का जन्‍मदिन। उस दिन राज कपूर की आत्‍मा जाती रही थी। और राज कपूर का हैरान खड़ा शरीर ताक रहा था लोककवि और फ़िल्‍म गीतकार शैलेंद्र के धरती पर रखे पार्थिव अवशेषों को। मुझे लगा जो खड़ा है और जो पड़ा है - जो है और जो चला गया है - वह एक ही है।

राजकपूर और शैलेन्द्र
 जो खड़ा था, वह था राज कपूर – अभिनेता। जो चला गया था, वह था – शैलेंद्र । शैलेंद्र, जिस ने उस भारतीयता को परिभाषित किया जिसके दरवाजे और खिड़कियां चारों दिशाओं में खुले हैं, जो सारे संसार से अपनी पसंद का और अपनी जरूरत का हर प्रभाव और हर संस्‍कार लेने को तैयार है, और साथ ही साथ जिसमें अपना अपनापन बनाए रखने की आंतरिक शक्ति है। इस अस्‍मिता को शैलेंद्र ने राज कपूर की ही फिल्‍म श्री 420 के लिए इन शब्‍दों में कहा था:

 मेरा जूता है जापानी,
 ये पतलून इंगलिस्‍तानी,
 सिर पे लाल टोपी रूसी,
 फिर भी दिल है हिंदुस्‍तानी.

 सच तो यह है कि यह गीत आजाद हिंदुस्‍तान का मैनिफेस्‍टो था, वह देश जो बड़े आत्‍मविश्वास के साथ खुली सड़क पर सीना ताने अपने सपनोँ को पूरा करने के सफर पर निकल पड़ा था। उसके लिए चलना जीवन की कहानी था और रुकना मौत की निशानी। वह फटेहाल था, लेकिन उस बिगड़े दिल शाहज़ादे की तमन्ना एक दिन सिंहासन पर जा बैठने और दुनिया को हैरान कर देने की थी।

 शैलेंद्र नये बनते आजाद हिंदुस्तान के दिल की धड़कन थे। फ़िल्मों को मिला एक वरदान थे। वह फिल्म संगीत मेँ बिलकुल अलग तरह का निजी रंग भर रहे थे। स्वभाव और मान्यताओं से वह समानतावादी कट्टर साम्यवादी थे। ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर मेँ हड़ताल हमारा नारा है जैसा उद्घोष उन्होंने ही दिया था और भारतीय जननाट्य संघ का गतिशीलता से भरा निम्न सभागीत भी उन्हीँ ने लिखा था:

 तू ज़िंदा है, तो ज़िंदगी की जीत पर यक़ीन कर
 अगर कहीँ है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर.
 ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन
 ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन

 लेकिन तथाकथित साम्यवादी बुद्धिवादियों की बौद्धिकता उन्हें पसंद नहीँ थी। जिस  देश मेँ गंगा बहती है में शैलेंद्र ने उन पर कटाक्ष इस तरह किया था:
 कुछ लोग जो ज़्यादा जानते हैँ,
 इनसान को कम पहचानते हैँ.
 शैलेंद्र की पहचान है उन के गीतोँ की सादगी — हद दर्जे तक की सादगी। मां को रसोई के कामोँ से मुक्ति दिलाने की बेटे की आकांक्षा के लिए उन्होंने लिखा:
 क्यों न हम रोटियों का पेड़ एक लगा लें,
 आम तोड़ें रोटी तोड़ें – आम रोटी खा लें.
 ये दो पंक्तियां वह सब कह जाती हैँ, जो प्रेमचंद जी ईदगाह कहानी में कहते हैं जिसमे बच्चा दादी के लिए मेले से चिमटा खरीद लाता है।
 बड़ी से बड़ी दार्शनिक बात वह इतनी सादगी से कहते हैं:
 सबेरे वाली गाड़ी से चले जाएंगे
 न कुछ ले के जाएंगे – न कुछ दे के जाएंगे.
 या अनाड़ी फ़िल्म का यह गीत:
 सब कुछ सीखा हमनेना सीखी होशियारी
 सच है दुनिया वालो कि हम हैं अनाड़ी
 दुनिया ने कितना समझाया
 कौन है अपना कौन पराया
 फिर भी दिल की चोट छुपा कर
 हमने आपका दिल बहलाया
 ख़ुद ही मर मिटने की ये ज़िद थी हमारी
 सच है दुनिया वालो कि हम हैं अनाड़ी
 इसी अनाड़ी थीम को उसी फ़िल्म में वह एक बार फिर इस नए रूमानी रंग में लाते हैँ:
 वो चाँद खिला, वो तारे हंसे
 ये रात अजब मतवाली है
 समझने वाले समझ गए हैं
 ना समझे, ना समझेवो अनाड़ी हैं
 वो चाँद खिला...

तीसरी कसम:शैलेंद्र की अमर कृति
तीसरी क़सम शैलेंद्र का विदा गीत ही सिद्ध हुई...
(एक रहस्योद्घाटन)
  शैलेंद्र बुरी तरह कर्ज मेँ डूबे थे। हैंगिंग गार्डन में सुबह सैर पर मुकेश और मैं शैलेंद्र के संकटों की बात करते और उन से उबारने की तरक़ीबें भिड़ाते। फ़िल्‍म ओवर बजट हो चुकी थी। तय था कि सुपरहिट हो जाए तो भी फ़िल्‍म घाटे का सौदा रहेगी। सवाल मुनाफ़े का नहीं घाटा कम करने का था। जो कुछ भी शूट किया गया था उसे समझने की कोशिश आर.के. स्‍टूडियो में राज खुद करने लगे। झींकते झल्‍लाते किसी तरह वह शाम आई जब हम लोगों ने आर.के. मेँ तीसरी क़सम का संतोषप्रद फाइनल प्रिंट देखा... फिल्‍म डिस्‍ट्रीब्‍यूटरोँ को दे दी गई... दुर्भाग्‍य अभी खत्‍म नहीं हुआ था। एक दिन खबर मिली कि बिना किसी प्रचार के अखबारों में रिलीज की सूचना तक दिए बगैर दिल्‍ली के गोलचा मेँ लगा दी गई और धड़ाम से बैठ गई। (आज वह एक क्लासिक फ़िल्म मानी जाती है।)
 बात घाटा कम करने की थी। अब घाटा ही घाटा था। पैसा उगाहने वालों की भीड़ मेँ शैलेंद्र को अंडरग्राउंड होना पड़ा। अंडरग्राउंड होने का मतलब इस मामले में बस इतना था कि कोई भी मिलने वाला आता तो कह दिया जाता कि शैलेंद्र शहर मेँ नहीँ हैं। आने वाला जब थक कर जाने लगता तो ऊपर से परदे के पीछे से झांक कर देखा जाता कि कौन है, जो जा रहा है। इसी प्रकार एक दिन मैं लौट रहा था। मुझे भीतर बुला लिया गया। हम लोग बातें करने लगे। गलती यह हुई कि फुसफुसा कर नहीं अपने स्‍वाभाविक स्‍वर में बात कर रहे थे। तभी एक लेनदार आ गया। उसने हमारी आवाज़ें सुन लीं। कितना ही टरकाया गया वह गया नहीँ। जोर जोर से बोलने लगा कि उसने शैलेंद्र की आवाज पहचान ली है। वह था भी शैलेंद्र का निजी मित्र। कोई छोटे मोटे सरकारी कर्मचारी था। उसे भीतर बुलाना पड़ा। तीसरी कसम के अंतिम दिनों में शैलेंद्र ने मित्रता का वास्‍ता देकर उनसे पांच या दस हज़ार रुपए कर्ज़ लिए थे, और उस दोस्‍त ने बस इतनी सी रक़म के बदले फ़िल्‍म में बराबर की भागीदारी लिखवा ली थी! फ़िल्‍म अब पिट चुकी थी। उससे एक भी पैसा वसूल होने की संभावना नहीं थी।
 इससे पहले और इसके बाद इतना अपमानित होते मैंने किसी को नहीँ देखा। वह दोस्‍त पूरे परिवार और मेरे सामने शैलेंद्र को मां बहन की गालियां देता रहा। शैलेंद्र और हम सब चुपचाप सुनते रहे...
ï
 दिन बीतते गए...शैलेंद्र को पता था कि दिनों के साथ जीवन भी रीत रहा है...उन्‍हें सिरोसिस आफ़ लिवर की जानलेवा बीमारी थी। इस बीमारी का संबंध बहुत ज़्यादा शराब पीने से भी होता है। हम लोगोँ के इसरार पर वह कई महीनों बिना शराब रहे। पर तीसरी क़सम के तनावों ने उन्‍हें तोड़ दिया। वह फिर पीने लगे, पीते रहे...जिगर सिकुड़ कर पत्‍थर होता जा रहा था। जीवन रस सूखता जा रहा था। पता था कि अब वह कुछ दिनों के मेहमान हैं।
 13 दिसंबर 1966 की शाम को सांताक्रूज़ से वह कोलाबा के एक निजी नर्सिंग होम के लिए निकले। आर.के. स्‍टूडियो चेंबूर मेँ था, बिलकुल अलग दिशा में। पर पहले वहां गए। उन्‍हें पता था कि यह आख़िरी घड़ी है। पर जीने की आस थी, ज़िंदगी पर एक बार फिर यक़ीन करने का मन कर रहा था। उन्‍होंने राज कपूर से वादा किया कि मेरा नाम जोकर का अधूरा गीत जीना यहां मरना यहां वह ज़रूर पूरा करेंगे। 14 की सुबह तक वह गीत के मुखड़े का दूसरा अंश पूरा कर पाए थे। यह था राज कपूर का जन्मदिन।
 उन्‍होंने कभी सबेरे वाली गाड़ी से चले जाने की बात की थी। अपने आख़िरी सफ़र पर पैदल ही गए,...वहां. जहां न घोड़ा है न गाड़ी है, जहां पैदल ही जाना है... यह है तीसरी क़सम का वह गीत

 सजन रे झूठ मत बोलो ख़ुदा के पास जाना है
 ना हाथी है ना घोड़ा है वहां पैदल ही जाना है
 तुम्हारे महल चौबारे यहीं रह जायेंगे प्यारे
 अकड़ किस बात की प्यारे ये सिर फिर भी झुकाना है
 भला कीजे भला होगा बुरा कीजे बुरा होगा
 बही लिख लिख के क्या होगा यहीँ सब कुछ चुकाना है
 लड़कपन खेल में खोया जवानी नींद भर सोया
 बुढ़ापा देख कर रोया यही क़िस्सा पुराना है
 ï
 14 दिसंबर 1966 को शैलेंद्र के चले जाने पर जनवादी कविता के प्रतिनिधि कवि बाबा नागार्जुन ने अप्रैल में शैलेंद्र को श्रंद्धाजलि इन शब्दों में दी :

गीतों के जादूगर का मैं छंदों से तर्पण करता हूं
सच बतलाऊंतुम प्रतिभा के ज्योतिपुंज थे, छाया क्या थी
भलीभांति देखा मैंने दिल ही दिल थे, काया क्या थी
जहां कहीं भी अंतर्मन से ऋतुओं की सरगम सुनते थे
ताजे कोमल शब्दों से तुम रेशम की जाली बुनते थे
जन मन जब हुलसित होतावह थिरकन भी पढ़ते थे तुम
साथी थे, मजदूर पुत्र थे, झंडा ले कर बढ़ते थे तुम
युग की अनुगुंजित पीड़ा ही घनघोर घटा सी गहराई
प्रिय भाई शैलेंद्र, तुम्हारी पंक्ति पंक्ति नभ में लहराई
तिकड़म अलग रही मुसकाती, ओह, तुम्हारे पास न आई
फ़िल्म जगत की जटिल विषमता, आख़िर तुम को रास न आई
ओ जन जन के सजग चितेरे, जब जब याद तुम्हारी आती
आंखें हो उठती हैं गीली, फटने सी लगती है छाती

14 दिसंबर 1966 को जो एक दर्द सा मेरे सीने में पैठ गया था, वह कई साल तक रह रह कर उठता रहा और उस दिन के बाद भाभी जी को विधवा भेस में देखने की हिम्मत मैं कभी बटोर नहीं पाया।

लेखक:अरविंद कुमार, पूर्व संपादक 'माधुरी'
(यह लेख पिक्चर प्लस के सितंबर 2016 अंक में प्रकाशित हुआ था।  पुनर्प्रकाशन हेतु पूर्वानुमति आवश्यक है।)



1 टिप्पणी:

  1. अद्भुत और सच्ची कथा l गुणी जनो का दर्द और बाज़ार की मार का जीता जागता चित्रण l इस साझे का आभार... I

    उत्तर देंहटाएं

Post Bottom Ad