'बादशाहो' की बिसात ! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

'बादशाहो' की बिसात !

फिल्म समीक्षा                                
बादशाहो
सितारे-अजय देवगन, इमरान हाशमी,
इलियाना डिक्रूज, सुधीर मिश्रा,
ईशा गुप्ता, विद्युत जाम्बाल
पिक्चर प्लस रेटिंग- 2.5   

अजय देवगन और इलियाना डि'क्रूज
हिन्दी सिनेमा को रुमानी दुनिया से बाहर निकालकर डार्क पृष्ठभूमि में ले जाने के लिए सत्तर और उसके आस-पास का साल बखूबी जाना जाता है जबकि सन् 1975 तक आते-आते हिन्दी सिनेमा के विषय और भी बदल गये। यहां तक आते आते सामाजिक, राजनीतिक और आपराधिक परिवेश की कहानियों का चलन पहले से बढ़ जाता है। गोकि सन् 1975 राजनीतिक तौर पर काफी उथल पुथल वाला साल रहा है जिसकी तह में अब कई कहानियां सामने आने लगी हैं। इंदु सरकार के बाद बादशाहो ऐसी ही फिल्म है, जिसकी पृष्ठभूमि में आपातकाल है।

कहानी में क्या है? 
  
फिल्म में एक ऐसा ग्रुप दिखाया गया है जो सोने से भरे ट्रक को लूटने का प्रयास करता है। कहानी 1975 के आपातकाल के वक्त की है। सरकार राजस्थान के राजघरानों की पूरी संपत्ति अपने कब्जे में ले लेती है। फिल्म में गीतांजलि यानी इलियाना डी'क्रूज़ एक शाही राजकुमारी की भूमिका में है, जिसे गिरफ्तार कर लिया जाता है और राजमहल के खजाने को सरकार अपने कब्जे में कर लेती। गीतांजलि इसे बचाने के लिए अपने प्रेमी भवानी सिंह यानी अजय देवगन से मदद लेती है। भवानी सिंह एक टीम बनाता है जिसमें चुलबुला दलिया यानी इमरान हाशमी, गुरुजी यानी संजय मिश्रा और संजना यानी ईशा गुप्ता हैं। जबकि मेजर सेहर सिंह यानी विद्युत जमवाल के आदेश पर गीतांजलि के खजाने को ले जाने वाले ट्रक को रोकने और लूटने का मिशन सौंपा जाता है। 96 घंटे और रेगिस्तान की 600 किलोमीटर दूरी में यह टीम कैसे अपना काम करती है, इसकी रोमांचक कथा फ़िल्म में दिखाने का प्रयास किया गया है। ट्रक का पीछा करने का सीन काफी हैरतअंगेज है। इस दौरान कुछ सीन काफी बेहतरीन बनाने की कोशिश की गई है, दर्शक इन दृश्यों को देखकर लुत्फ उठा सकते हैं लेकिन पूरी फिल्म में एक जैसा रोमांच नहीं है। पूरी फिल्म देखने के बाद अहसास होगा कि चलो किसी तरह टाइम पास हो गया, ऐसा कुछ भी हाथ नहीं लगा जिसे यादगार बनाया जा सके।   
दरअसल रजत अरोड़ा डार्क शेड की दिलचस्प की कहानी लिखते रहे हैं। वंस अपोन ए टाइम इन मुंबई,  द डर्टी पिक्चर, किक, गब्बर इज बैक के बाद इस फिल्म में भी उन्होंने एक अलग फ्लेवर दिया है लेकिन जब आप निर्देशक मिलन लुथरिया, अभिनेता अजय देवगन और लेखक रजत अरोड़ा-तीनों को बार बार एक प्रोजेक्ट में देखते हैं तो लगता है कि वो कुछ ऐसा कहने का प्रयास कर रहे हैं जिसे पहले भी कह दिया था।

इमरान हाशमी और ईशा गुप्ता
किसके अभिनय में है दम?   

अजय देवगन एक जांबाज किरदार में हमेशा जंचते रहे हैं, यहां भी वही स्तर बरकरार है।  उनका एक्शन अब भी देखने लायक है। इमरान हाशमी के चरित्र का भी एक जाना पहचाना टेस्ट है जोकि ठीक ठाक हैं। इलियाना डी'क्रूज ग्रेसफुल नजर आती हैं। कास्ट्यूम उस पर फबता है। वहीं ईशा गुप्ता के पास ज्यादा काम नहीं है लेकिन जितना है उतने में भी पहचान नहीं बन सकी है। विद्युत जामवाल उम्दा हैं तो संजय मिश्रा सबसे बेतहरीन अंदाज में हैं उनकी डायलॉग डिलेवरी में रोचकता है।

गीत, संगीत कैसा है?

इन दिनों गाने किसी फ़िल्म में कुछ अच्छा दम नहीं दिखा पा रहे हैं। इस फिल्म में 'मेरे रशके कमर' और 'होशियार रहना' ठीक ठाक हैं, और 'पिया मोरे' भी। कुल मिलाकर कामचलाऊ।

क्या देखनी चाहिये यह फिल्म?

रोमांचक लोकेशन के लिहाज से फिल्म मनभावन नजारा पेश करती है। एक तरफ राजस्थान की बलुआ धरती तो दूसरी तरफ राजघराने की रंगीनी को बहुत ही मनोहारी तरह से प्रदर्शित किया गया है। यानी एक्शन, थ्रिल की पैकेजिंग के स्तर पर यह फिल्म दर्शकों को कुछ देर के लिए तनाव दूर कर सकती है लेकिन ज्यादा सोचने विचारने के लिए यहां कुछ नहीं है। बस, पॉपकॉर्न चबाते जाइये, फिल्म देखते जाइये और अपने साथ फिल्म देख रहे पार्टनर के साथ गप्पें भी करते जाइये। हो गया टाइम पास।

-संजीव श्रीवास्तव 

1 टिप्पणी:

  1. संजीव आपकी लेखनशैली इतनी प्रभावशाली है कि बड़ी ही सहजता से हर फ़िल्म का सटीक-संतुलित आंकलन कर देती है....!

    आप समीक्षाएं सदैव पठन नही, अपितु पाठन योग्य लगती हैं....जी' करता है "पढ़कर सुनाएं...."

    शुभलामनाएं ।

    महेन्द्र

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