ऐसे बनी 'लगान' - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 17 सितंबर 2017

ऐसे बनी 'लगान'

लगान निर्माण का पल-पल भोगा हाल

क्लासिक फिल्म 'लगान' और सिनेमा विधा पर यह एक अद्वितीय किताब है

पुस्तक लेखक या फिल्म समीक्षक आमतौर पर फिल्म बन जाने के बाद फिल्मों के बारे में लिखते हैं-लेकिन यह पुस्तक मेकिंग ऑफ लगान का केवल आंखों देखा हाल भर नहीं है बल्कि भोगे हुए पल दर पल का भावनात्मक चित्रण है। लगान के जन्म से लेकर उसके रिलीज और रिव्यू तक का जीवंत रिपोर्ताज है। लगान निर्माण टीम का हिस्सा रहे लेखक सत्यजित भटकल ने इसे औपन्यासिक विन्यास का टच देते हुये लिखा है। इसलिये इसे पढ़ते हुये रोचकता का अदभुत संचार होता है। निर्माण के दौरान की दुर्लभ तस्वीरें, लोकेशन का संस्मरण और हंसी-मजाक, दुख-तकलीफ, साहस-प्रेम के आपसी संवादों से युक्त यह किताब पहले अंग्रेजी में द स्पिरिट ऑफ लगान नाम से प्रकाशित हुई जिसे हिन्दी में लाने का श्रेय वरिष्ठ फिल्म विश्लेषक अजय ब्रह्मात्मज को जाता है। 


अपनी किताब के बारे में सत्यजित भटकल के शब्द हैं- यह पुस्तक मेरे अनुभवों और साक्ष्यों की कहानी है। यह संपूर्णता का दावा नहीं करती और न ही पर्दे पर दिखी सृजनात्तमकता के आकलन का दावा करती है-फिल्म की सृजनात्मकता स्वयं बोलती है। यह लगान के निर्माण के लिए कटिबद्ध व्यक्तियों के जीवन के निश्चित हिस्सों की कहानी है। यह उनके डर, उम्मीद, पीड़ा, साहस और विजय की कहानी है।
पुस्तक के हिन्दी अनुवादक अजय ब्रह्मात्मज के शब्द हैं-द स्पिरिट ऑफ लगान जोश और विजय की कहानी है। फिल्म स्टार्स के ग्लैमर और चकाचौंध से दूर यह असंभव को संभव कर दिखाने की विजयगाथा है। 14 अगस्त 1996 से लेकर 15 जून 2001 तक के बीच लगान क्रमश: आकार लेती रही। यह उसकी क्रमवार कथा है। आशुतोष गोवारीकर की आरंभिक हताशा को हम इस पुस्तक से समझ सकते हैं। आमिर खान ने लगान के लिए हां कहने में ही दो साल लगा दिये थे। फिल्म शुरू होने की इस देरी की आंतरिक पीड़ा को सत्यजित भटकल ने शब्द दिये हैं।
सत्यजित भटकल ने लगान के निर्माण को ग्लैमर गाथा के रूप में नहीं प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक जीत की इच्छा से प्रेरित कुछ व्यक्तियों के सामूहिक प्रयास का अवलोकन है। नेतृत्व कला के साथ टीम भावना के सूत्र इल पुस्तक के पन्ने – पन्ने में है। कहीं भी यह नहीं बताया गया है कि प्रबंधन या कार्य निष्पादन के संकट से कैसे उबरें, मगर हर अध्याय में एक मुश्किल और असाध्य कार्य संपन्न होता है। यह ऐसे बनी लगान की विशेषता है।    
पुस्तक का एक अंश :-
2 जवनरी, 2000
भुज एयरपोर्ट। लगान से भरा जहाज हवाई पट्टी पर उतरता है। दूर खड़े जिज्ञासु दर्शक आमिर को खोज रहे हैं। आम तौर पर फिल्मी लोग आउटडोर शूटिंग की प्रतीक्षा करते हैं। एक मायने में यह पिकनिक की तरह होता है। मुंबई की रूटीन से छुट्टी मिलती है। यात्रा और घूमना-फिरना निर्माता के खर्जे पर हो जाता है। इसके अलावा प्रसिद्धि और समृद्धि मिलती है, सो अलग। और क्या चाहिये इंसान को?
भुज पर उतरे लोगों में पिकनिक का उत्साह नहीं दिख रहा है। उनके चेहरों पर तात्कालिक चिंताएं हैं। उन्होंने मुंबई में अपने परिवारों से ऐसे विदा ली है, जैसे पर्वतारोही किसी अभियान पर निकलते हैं। आगे का सबकुछ अनजाना और अनिश्चित है। एक ही चीज़ निश्चित है कि वे अगले चार महीनों तक घर नहीं लौटेंगे। इतने लंबे समय तक भुज की तपती गर्मी में रहना शायद बड़ा काम होगा, पर पिकनिक नहीं होगा।(पृष्ठ संख्या-116)

अगर आप में से कोई इस पुस्तक मंगवाना चाहते हैं तो निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं:-

पोपुलर प्रकाशन प्रा.लि.
35-सी, पं. मदन मोहन मालवीय मार्ग,
पोपुलर प्रेस बिल्डिंग, ताड़देव
मुंबई-400034 

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