'ट्यूबलाइट' बनाने वालों को क्या मालूम 'डॉ. कोटनिस की अमर कहानी', 'हिन्दी चीनी भाई-भाई' की वो वास्तविक दास्तां? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 11 नवंबर 2017

'ट्यूबलाइट' बनाने वालों को क्या मालूम 'डॉ. कोटनिस की अमर कहानी', 'हिन्दी चीनी भाई-भाई' की वो वास्तविक दास्तां?

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से जीवनीपरक सिनेवार्ताभाग-चार 

अरविंद कुमार : मधुर मुस्कान और जीवंत लेखन 
अरविंद कुमार : आप का प्रश्न था उन कलाकारों, फ़िल्मकारों और स्वयं फ़िल्मोँ ने आपके मन मस्तिष्क पर विशेष प्रभाव डाले थे अब तक कुछ फ़िल्मों के बारे में लिख चुका हूं। लगता है कि और भी बहुत कुछ है जो मुझे लिखना चाहिए। पर ऐसी तमाम फ़िल्मों के बारे में लिखूं तो शायद एक पूरी उम्र बीत जाएगी!

वी. शांताराम फ़िल्मों में स्वाधीनता संग्राम और समाज सुधार का संदेश ले कर आए। महाभारत के गुरु विदुर को उन्होंने गांधीजी का जो रूप दिया, वह अंगरेजी सरकार को इतना ख़तरनाक़ लगा कि फ़िल्म ज़ब्त कर ली गई थी।सावकारी पाश–किसानों को दुर्दशा से उबारने का प्रतीक भी बने। शांताराम की पड़ोसी या दुनिया न माने जैसी महान फ़िल्मोँ की बात न करके मैं आजकल के भारत-चीन विवाद की पृष्ठभूमि में मैत्री का संदेश लाने वाली डाक्टर कोटनिस की अमर कहानी (1946) के बारे में लिखकर यह चर्चा समाप्त करूंगा ताकि आपके अगले प्रश्नों के उत्तर दे सकूं।

'डॉ. कोटनिस की अमर कहानी' में वी शांताराम और जयश्री
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सन् 1938 मेँ जापान ने चीन पर हमला कर दिया। आधुनिक हथियारों से लैस जापान के मुक़ाबले चीन के पास हथियार बहुत कम थे। जनरल झू दे (Zhu De) ने पंडित नेहरू से अपील की कि कुछ डॉक्टर भिजवाइए। चंदे के बाईस हज़ार रुपए इकट्ठा कर चार चिकित्सकोँ का दल वहां भेजा गया। उनमेँ से एक थे नौजवान डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनिस जो लौट नहीं आए। भयानक प्लेग के एक नए रूप से सैनिक मरने लगे। उसके रोगाणुओं के नाश का एक ही तरीक़ा था–उनका अध्ययन। कोटनिस ने अपने शरीर मेँ उन रोगाणुओं का प्रवेश किया और इलाज ढूंढ़ निकाला, पर बीमार पड़ गए। तभी जनरल झूकई जापानी गोलियोँ से ज़ख़्मी हो गए। बीमारी से अशक्त कोटनिस ने जान पर खेलकर वे गोलियां तो निकाल दीं पर बच न सकें। सन् 1942 मेँ वह संसार से जुदा हो गए।

फिल्म का सादगी भरा एक पोस्टर
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सन् 1946 मेँ बनी शांताराम की फ़िल्म इस जीवन संघर्ष की कहानी थी। शुरूआत होती है महाराष्ट्र के ग्राम्य क्षेत्र मेँ सुबह की गतिविधियों से। डॉक्टरी की पढ़ाई पूरा करके घर लौटता नवयुवक डॉक्टर कोटनिस गा रहा है–कुछ करें या मरें/देश पर जान देने का नाम है ज़िंदगी।(दर्शक को याद आ जाता है सन् 1942 मेँ गांधी जी का नारा करो या मरो) कोटनिस के चीन पहुंचने पर कथानक आगे बढ़ता है चिंगलान नाम की चीनी नर्स के प्रेम प्रसंग के माध्यम से। दोनों का विवाह हुआ, एक संतान हुई. अंत मेँ अपना बेटा लिए चिंगलान भारत आती है। शोलापुर स्टेशन पर ट्रेन से उतरती है। तांगे में सवार होकर कोटनिस के घर पहुंचती है। पार्श्व मेँ कोटनिस की आवाज़ आ रही है–चिंगलान, हम हिंदुस्तान जा रहे हैं।
जयश्री

मैंने यह फ़िल्म किसी मॉर्निंग शो में देखी होगी सन् 1950 के आस-पास। जब भी वह याद आती है तो कानों वह आवाज़ गूंजती हैचिंगलान, हम हिंदुस्तान जा रहे हैं।
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फ़िल्म में नायक थे स्वयं शांताराम और नायिका थीं अभिनेत्री पत्नी जयश्री। दोनों ही दिल को छू लेते थे।
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डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस की तस्वीर, जिनके जीवन पर फिल्म बनी

अंत में फ़िल्म बनने की कहानी.
बंबई में दो नौजवान फ़िल्म समीक्षक ख़्वाज़ा अहमद अब्बास और वी.पी. साठे घनिष्ठ दोस्त थे। अख़बारोँ मेँ समाचार पढ़कर अब्बास ने कोटनिस पर उपन्यास लिख मारा। साठे को लगा कि इस पर फ़िल्म बननी चाहिए। दोनों जा पहुंचे शांताराम जी के पास, जो कहानी सुनते ही फ़िल्म बनाने को राज़ी हो गए। बाद में अब्बास स्वयं तो फ़िल्म निर्माता निर्देशक बने ही, राजकपूर से उनका साथ हुआ आवारा से, जो बॉबी तक चलता रहा। दोनों से मेरा बंबई मेँ निकट का संबंध रहा। वी.पी. साठे तो फ़िल्म इतिहास की चलती फिरती इनसाइक्लोपीडिया ही थे। जब भी जरूरत पड़ी उन्होंने मेरी जानकारी बढ़ाई और माधुरी मेँ टिप्पणियां भी लिखीं।
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सिनेवार्ता जारी है...
(अगली कड़ी अगले रविवार)

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