‘पंचलैट’ मतलब गांव में प्रेम की रौशनी फैलाने वाला प्रकाशयंत्र ! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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बुधवार, 15 नवंबर 2017

‘पंचलैट’ मतलब गांव में प्रेम की रौशनी फैलाने वाला प्रकाशयंत्र !

पचास साल बाद फणीश्वरनाथ रेणु की दूसरी कहानी पर बनी फिल्म


 सन् 1966 में रिलीज तीसरी कसम के लंबे अंतराल के बाद हिन्दी के कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की किसी कहानी पर दूसरी फिल्म बनी है- पंचलैट। फिल्म के निर्देशक प्रेम प्रकाश मोदी से पिक्चर प्लस संपादक संजीव श्रीवास्तव की बातचीत :-

संजीव – फणीश्वरनाथ रेणु की पंचलैट कहानी में आपको ऐसा क्या लगा कि इस पर फिल्म बननी चाहिये? इसकी प्रासंगिकता क्या है आपके विचार से?
प्रेम प्रकाश मोदी – मैं खुद भी झारखंड के दुमका से हूं। सालों पहले फणीश्वरनाथ रेणु की यह कहानी पाठ्यक्रम में पढ़ी थी। तब मैं नौवीं कक्षा में था। इस कहानी का तभी से मुरीद हूं। मुझे बहुत रिलेट करती रही है यह कहानी...। स्कूल, कॉलेज के बाद भी सालों तक यह कहानी मेरे मन मस्तिष्क में घूमती रही है। हां, तब यह नहीं सोचा था कि कभी फिल्म निर्देशक बनूंगा...लेकिन बाद के दिनों में जब कोलकाता आया...वहां मृणाल सेन जैसी शख्सियत के साथ काम करने का मौका मिला...उनको असिस्ट किया...उसके बाद मेरे भीतर भी खुद ही फिल्म बनाने की इच्छा जागृत हुई...। उन्हीं दिनों मैंने सोच लिया कि जब भी अपनी फिल्म निर्देशित करुंगा...तब शुरुआत रेणु की कहानी पंचलैट से ही करुंगा। क्योंकि पंचलैट से मैं खुद को कनेक्ट कर पाता हूं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या है इस तरह की कहानी पर फिल्म बनाने के लिए प्रोड्सूयर का मिल पाना। शुरुआत में मुझे भी काफी दिक्कतें हुईं लेकिन प्रसन्नता है कि बाद में हमें  कोलकाता के ही अनूप, अनिल और प्रमोद ऐसे प्रोड्यूसर मिले जिन्होंने हमारा उत्साहवर्धन किया।  

संजीव - साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाना बड़ा जोखिम भरा काम रहा है, व्यावसायिक तौर पर भी और चित्रण के तौर पर भी। फिल्म देखने के बाद रेणु के परिजनों का कैसा रुख था? 
प्रेम प्रकाश मोदी – हां, यह बिल्कुल सही बात है कि साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाना बहुत आसान नहीं है। ऐसी फिल्मों के लिए प्रोड्यूसर्स नहीं मिलते और ना ही दर्शकों के बड़े वर्ग को इसमें ज्यादा रुचि होती है। आज बॉलीवुड में लोग हिन्दी साहित्य की रचनाओं पर फिल्में नहीं बनाना चाहते हैं। वे ज्यादातर विदेशी अंग्रेजी या फिर चेतन भगत की कहानी पर ही फिल्में बनाना चाहते हैं। लेकिन मेरा प्रयास उनसे अलग है। हमारी यह फिल्म रेणुजी के दोनों बेटों ने भी देखी। दोनों को फिल्म खूब पसंद आई है। उनका मुझे काफी सहयोग मिला है। उनके अलावा भी विशेष शो में जितने लोगों ने यह फिल्म देखी है...उनको भी पंचलैट काफी पसंद आई है। यह मेरे लिये गर्व की बात है।   
 
फिल्म 'पंचलैट' का एक दृश्य
संजीव -  फणीश्वरनाथ रेणु की यह दूसरी कहानी होगी जिस पर फीचर फिल्म बनी है। जाहिर है तीसरी कसम से भी इसकी तुलना होगी-क्या इसका कोई दवाब आप पर नहीं था?
प्रेम प्रकाश मोदी - मुझे तुलना का कोई खतरा महसूस नहीं हुआ। क्योंकि मुझे लगता है हाल में जैसा मैं सोच रहा हूं...शायद उस दौर में शैलेंद्र जी भी वैसा ही सोच रहे होंगे। तीसरी कसम बाद में जाकर काफी लोकप्रिय हुई। पिछले दिनों झारखंड की राजधानी रांची में मैंने इस फिल्म का विशेष शो किया था...मुझे उस दौरान लोगों की जो प्रतिक्रिया मिली...उसे देखकर मैं दंग रह गया। लोगों ने गोधन के किरदार को देखकर यहां तक कह दिया कि इस फिल्म में दूसरा राजकपूर पैदा हो गया। दरअसल इसमें मैंने भी गोधन के किरदार में राजकपूर वाली छवि पिरोने की कोशिश की है। चूंकि फिल्म में वह राजकपूर की फिल्म आवारा देखकर प्रभावित होता है। उसके किरदार पर आवारा का असर भी है। वह गीत गाता रहता है--आवारा हूं...sss

संजीव - आप जो कहें...लेकिन तीसरी कसम की तरह आप की फिल्म भी प्रचार-प्रसार की मुख्यधारा से दूर है। बहुत लोगों को मालूम ही नहीं है कि ऐसी कोई फिल्म रिलीज हो रही है।  
प्रेम प्रकाश मोदी – असल में इस तरह की फिल्मों की यही बड़ी समस्या है। पहले ही हमने बताया कि एक तो प्रोड्यूसर्स नहीं मिलते...दूसरी दिक्कत...डिस्ट्रीबूटर्स की है...। जब डिस्ट्रीब्यूटर से पहली बार मीटिंग हुई तो उनका जवाब था कि कहीं ये भोजपुरी फिल्म तो नहीं है? मैंने कहा—अगर मैं इसमें बड़ा स्टार लेता तो...? आप हरियाणवी टोन वाली फिल्म दंगल को हरियाणवी फिल्म क्यों नहीं कहते हैं...? आप पंजाबी टोन और पृष्ठभूमि वाली फिल्म उड़ता पंजाब को पंजाबी फिल्म क्यों नहीं कहते हैं? अगर अंडरवर्ल्ड वाली किसी फिल्म में किरदार मराठी बोलता है तो उसे मराठी फिल्म क्यों नहीं कहा जाता है? इसका जवाब कठिन है। हमने उनको कहा कि हमारी पंचलैट में भारतीय संस्कृति के रंग को दिखाया गया है...। इसका परिवेश भले ही स्थान विशेष का है लेकिन इसका अपना राष्ट्रीय फलक है। लेकिन वो बिना बड़े स्टार के इस बात को नहीं समझना चाहते। आपको जानकर हैरत होगी कि रेणुजी के जिले फारबिसगंज के डिस्ट्रीब्यूटर भी इस फिल्म को रिलीज करने से डर गये थे। जबकि हमारी फिल्म को पूरी तरह से यूसर्टिफिकेट मिला है। बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं, लड़कियां सभी एकसाथ बैठकर यह फिल्म देख सकते हैं।   
 
'पंचलैट' जलाने की प्रैक्टिस
संजीव - तीसरी कमस की अपार लोकप्रियता के पचास साल के लंबे अंतराल के बाद भी किसी और प्रोड्यूसर ने रेणु की किसी और कहानी पर फिल्म क्यों नहीं बनानी चाही? आप को क्या लगता है?  
प्रेम प्रकाश मोदी – जैसा कि मैंने बताया न...आज लोग हिन्दी साहित्य की कृति पर फिल्में नहीं बनाना चाहते। सबको अंग्रेजी का साहित्य चाहिये। मेरी शुरुआत बंगाल में हुई है। और बंगाल में साहित्य से सिनेमा के जुड़ाव का लंबा इतिहास है। आज भी वहां यह परंपरा कायम है। मुझ पर इसी परंपरा का असर है कि मैं भी साहित्य पर आधारित फिल्में बनाना चाहता हूं। मुझे लगता है कि अंग्रेजी के अलावा हमारे पास भी बहुत सी ऐसी कहानियां हैं, जिनपर फिल्में बनाई जा सकती हैं। हमारी संस्कृति में बहुत कुछ ऐसा है जो फिल्मों को लोकप्रियता प्रदान कर सकता है। बाहुबली इतनी बड़ी हिट क्यों हुई...? क्योंकि उसका सब्जेक्ट भारतीय संस्कृति के रंग को दिखाता है। उसमें दिखाया गया बहुत कुछ ऐसा है जो हमारे मिथकों में भी है...इसलिये लोगों को उसे देखने में अच्छा लगा। मुझे लगता है हिन्दी साहित्य पर फिल्म बनाना खतरा जरूर था...इसके बावजूद मैंने प्रयास किया। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी पंचलैट फिल्म भी लोगों को खूब पसंद आयेगी।

संजीव - क्या फिल्म के नाम को लेकर मन में कोई भय नहीं हुआ...? आज के लोगों को पंचलैट क्या पेट्रोमैक्स का मतलब भी समझाना पड़े...! तीसरी कसम का नाम भी मारे गये गुलफाम था।
प्रेम प्रकाश मोदी नहीं...मुझे नाम को लेकर कोई शंका नहीं थी। इस नाम से पहले भी कई नाटक होते रहे हैं। साहित्य और थियेटर की दुनिया  में पंचलैट नाम पहले से मशहूर है। फिल्म का नाम बदलने से रेणुजी के साथ अन्याय होता।   
 
निर्देशक : प्रेम प्रकाश मोदी
संजीव - फिल्म की ज्यादातर शूटिंग्स कहां-कहां हुई? और इसमें लिये गये कलाकार कितने स्थानीय हैं और कितने मुंबई के?
प्रेम प्रकाश मोदीपंचलैट की पूरी शूटिंग्स झारखंड में हुई। खासतौर पर देवघर के सुदूर गांव में इसकी काफी शूटिंग्स हुई है। फिल्म में ज्यादातर कलाकार थियटर से जुड़े हुये हैं। अमितोष नागपाल, यशपाल शर्मा कई बड़ी फिल्मों में काम कर चुके हैं और उनका संबंध एनएसडी से रहा है। हां, कुछ झारखंड के कलाकार भी हैं। लेकिन सभी के सभी मंझे हुये थियेटर के कलाकार हैं।

संजीव – रेणु बिहार के थे। कहानी बिहार के अंचल की है। क्या बिहार सरकार की तरफ से इस फिल्म के निर्माण में कोई सब्सिडी या किसी और तरह की सहूलियत का आश्वासन मिला है? 
प्रेम प्रकाश मोदी - सरकारी  सहयोग प्राप्त करने की प्रक्रिया बड़ी लंबी होती है। मैंने शुरुआत में इसके लिए सोचा था लेकिन फिर लगा कि लंबा समय लगेगा...। हालांकि सरकारों से सहूलियत की अपेक्षा है। वैसे झारखंड सरकार से सहयोग मिला है...उनको फिल्म पसंद आई है...। पटना में भी मैं फिल्म प्रमोशन के लिए गया था। मैंने सरकार को संदेश भी दिया। फिल्म देखने के लिए...ईमेल भेजा, फोन भी किया लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। रेणुजी के बेटों ने भी सरकार से फिल्म को टैक्स फ्री करने की मांग की है।  

संजीव – आप बांगला में काफी काम कर चुके हैं लेकिन हिन्दी में यह आपकी पहली निर्देशित फिल्म है। इसके बाद क्या फिर कोई साहित्यिक कृति उठाने जा रहे हैं या कुछ और कहानी पर काम करना चाहते हैं?
प्रेम प्रकाश मोदी – यह जरूरी नहीं कि अगली बार फिर कोई पुरानी कहानी पर काम करें...नई कहानियां भी हो सकती हैं। लेकिन इतना तय है कि मैं साहित्यिक कहानी पर ही फिल्में बनाउंगा। 
 
कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु
संजीव - अंत में, पंचलैट के गोधन और मुनरी किरदार के बारे में कुछ बताएं...
प्रेम प्रकाश मोदी कहानी में गोधन दूसरे गांव का है...यहां नानी के घर रहता है...। गांव के महतो जाति के लोग चाहते हैं  कि वह अपनी संपत्ति से कुछ दे दे...लेकिन वह मना कर देता है...महतो जाति के लोग उससे नाराज है...। गोधन का मुनरी से भी लगाव है...। दोनों के बीच एकदम पवित्र प्यार है। गोधन पटना में आवारा फिल्म देखता है...। गांव आकर गाना गाता है...आवारा हूं...इस पर मुनरी की मां पंचायत से शिकायत करती है कि गोधन उसकी बेटी को देखकर गाता रहता है...पंचायत बैठती है।
वैसे पूरी फिल्म में मैंने एक आजादी ली है...कि गांव में बाहर से रासलीला के लिए जो मंडलियां आती रहती हैं...उनमें एक मंडली को मैं मथुरा से लेकर आता हूं...। रासलीला में गोधन और मुनरी के प्रेम को राधा और कृष्ण के प्रेम की तरह दिखाने का प्रयास होता है और इसी दौरान पंचलैट को सामने रखा जाता है। पूरी फिल्म आप देखेंगे तो बहुत आनंद आयेगा।
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(यह साक्षात्कार विशेष तौर पिक्चर प्लस के लिए लिया गया है। पूर्व अनुमति के पश्चात् ही इसे अन्यत्र प्रकाशित किया जा सकता है। संपर्क- pictureplus2016@gmail.com )

तीसरी कसम (1966) : फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पर बनी पहली फिल्म

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