जब मैं ‘माधुरी’ का संपादक बना, बॉलीवुड के लिए ‘कोरा काग़ज़’ समान था - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 19 नवंबर 2017

जब मैं ‘माधुरी’ का संपादक बना, बॉलीवुड के लिए ‘कोरा काग़ज़’ समान था

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से 
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-पांच
 
         बीच में अरविंद कुमार, एकदम दाहिनी ओर धर्मवीर भारती दिख रहे हैं।      फोटो सौ. अरविंद कुमार
संजीव श्रीवास्तव – अब मुंबई की बात की शुरुआत करते हैं। उन दिनों के कुछ अहम किस्से सुनायें जब आपने मुंबई पहुंचकर माधुरी के संपादन का कार्यभार संभाला। किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा था? और उनका हल कैसे निकाला?

अरविंद कुमार - जहां तक मुझे याद है-18 सितंबर 1963 (शायद छोटी दीवाली)। मैँ बंबई जाने वाली शताब्दी मेँ सवार था। वहां टाइम्स परिवार के लिए नई फ़िल्म पत्रिका निकालनी थी। बीसियोँ प्रसन्न मित्र और परिवारजन बधाई देने और विदा करने आए थे। 21 सितंबर सोमवार। मैँ टाइम्स के दफ़्तर जा पहुंचा और तत्कालीन जनरल मैनेजर प्रताप कुमार राय से मिला। यह तय था कि पत्रिका का पहला अंक गणराज्य दिवस 26 जनवरी 1964 को बाज़ार मेँ आएगा। समय कम था, कम नहीँ लगभग था ही नहीं।

मुझे दफ़्तर के लिए फ़िलहाल एक अस्थायी केबिन दिलवा दिया. पूछा - स्टाफ़ मेँ कितने जन चाहिए। मैँने कहा - एक टाइपिस्ट तथा चार संपादकीय कर्मी,उनमें से एक वह हो जो टाइम्स कार्यालय मेँ कहां क्या है, कौन क्या है जानता हो, एक फ़िल्म जगत से सुपरिचित और दो बिल्कुल अनुभवहीन ट्रेनी। धीरे धीरे, छह सात दिन मेँ मुझे मिले धर्मयुग के जैनेंद्र जैन, दो ट्रेनी विनोद तिवारी, रमेशचंद्र जैन। महेंद्र सरल बाद मेँ आए। हां, एक टाइपिस्ट तत्काल मिल गया।
जहां तक फ़िल्मोँ का सवाल है–मैँ कोरा काग़ज़ था, फिल्म उद्योग भी मेरे लिए कोरा काग़ज़ था। न मैँ उसे जानता था, न वह मुझे।
यह जानने की प्रक्रिया तत्काल शुरू हो गई। कई हिंदी और इंग्लिश फ़िल्म पत्रिकाएं देकर मैंने टाइपिस्ट से कहा, इनमेँ से फ़िल्म कलाकारों के नामों की सूचियां बनाओ। वह काम से लग गया। फ़िल्मफ़ेअर संपादक श्री बी.के. करंजिया से मिला। उनसे सहायता मांगी। मैँ पहले मुखपृष्ठ पर वैजयंती माला और मीना कुमारी मेँ से जो भी मिल जाएं उन्हेँ छापना चाहता था। उन्होंने बस इतना किया कि दोनोँ के नाम चिट्ठी पोस्ट कर दी। मैँ जानता था चिट्ठियां पढ़ने की फ़ुरसत बड़े कलाकारोँ के पास नहीं होती। मतलब–सब कुछ अपने आप करना था।
युवावस्था की तस्वीर
तभी न जाने किसके कहने से मेरे पास आ पहुंचे राम औरंगाबादकर। बड़े धाकड़ फ़ोटोग्राफ़र थे। मेरे कमरे से जिस किसी फ़िल्मवाले को फ़ोन करते तो बोलते–मी औरंगाबादकर बोलतोय। हर जगह से तत्काल संपर्क हो जाता। राम का पूरा वर्णन मैँ कभी और करूंगा। बीस तीस साल से थे। उन्हें कैमरा पकड़ाया था नरगिस की मां जद्दन बाई ने। बहुत अच्छे फ़ोटो नहीं खींचते थे। हद से हद कामचलाऊ न्यूज़ फ़ोटोग्राफ़र कहा जा सकता है। उन्हीं के फ़ोन से तय हो पाया कि निर्माणाधीन फ़िल्म पूर्णिमा की शूटिंग पर शाम के सात-आठ बजे मीना जी की फ़ोटोग्राफ़ी की जा सकती है। टाइम्स के फ़ोटोग्राफर पर श्री महाजन के साथ मैं स्वयं गया था। उस शाम की कहानी भी किसी और दिन...
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उन्हीँ दिनोँ का एक संस्मरण....
कुल दो दिन हुए थे। जनरल मैनेजर श्री प्रताप कुमार राय के पास निमंत्रण आया–फ़िल्मिस्तान से, जिसके संचालक लीजेंडरी शशधर मुखर्जी थे। (पर यह तब मैं नहीं जानता था) दिल्ली से केंद्रीय सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्री लाला शामनाथ का स्वागत था। राय साहब मुझे अपनी कार में ले गए। वहां एक से एक सुंदर अभिनेत्रियां इधर से उधर आ जा रही थीं। राय पूछते - यह कौन है, वह कौन है। मैंने जवाब दिया – मैं किसी को नहीं जानता। छह महीने बाद मैं सब कुछ बता सकूंगा...।
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी अगली बार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com  
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

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