“बिना वेतन तय किये ‘माधुरी’ निकालने दिल्ली से मुंबई गया, दरअसल कुछ नया करना था” - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 26 नवंबर 2017

“बिना वेतन तय किये ‘माधुरी’ निकालने दिल्ली से मुंबई गया, दरअसल कुछ नया करना था”

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-छै

                                      एक कार्यक्रम में व्याख्यान देते अरविंद कुमार                फो.सौ. अरविंद कुमार

संजीव श्रीवास्तव–माधुरी के प्रवेशांक की तैयारियां या रिलीज के कुछ रोचक/प्रेरक संस्मरण सुना सकें तो आज के हमारे जैसे उन सिनेप्रेमियों को नई जानकारी मिल सकेगी जो माधुरी को फिल्म पत्रकारिता की एक आदर्श और मुकम्मल पत्रिका मानते हैं। 

अरविंद कुमार-टाइम्स ज्वाइन करने के पांच छह दिन बाद पर्सनल विभाग के अध्यक्ष श्री वी.जी. कर्णिक ने मुझे बुलाया, कहा–“आप का आवेदन पत्र कहां है, कितना वेतन तय हुआ है?” मैँने बताया–“आवेदन पत्र तो मैंने दिया ही नहीं। रमाजी (साहू शांतिप्रसाद जैन की पत्नी, वही टाइम्स के हिंदी प्रकाशनोँ की देखभाल करती थीँ) ने अपने 5 सरदार पटेल मार्ग वाले बंगले मेँ मुझ से कहा–‘बंबई चले जाओ’, राय साहब ने भी यही कहा, मैं चला आया। वेतन की तो बात कभी किसी ने नहीँ की, मैंने पूछा नहीं। आप उन्हीं से मालूम कर लीजिए।

कर्णिक जी ने भी आवेदन नहीं लिखवाया। जो भी वेतन मुझे दिया गया मैंने स्वीकार कर लिया। किसी भी नौकरी में वेतन कितना होगा यह मेरे लिए महत्व का कभी नहीं रहा। महत्व इस बात का रहा कि मुझे कुछ नया करने का, कुछ नया देखने, सीखने का अवसर मिल रहा है। दिल्ली में मैं सरिता-कैरेवान के संस्थान मेँ अठारह साल रहा। हर साल तनख़्वाह वे तय करते रहे, और हर साल उन्नति करता मैं अपने को वहीं किसी नए और बेहतर मुकाम पर पाता रहा। दोनों ही जगह मैंने कोई ऐप्लीकेशन नहीं दी। इस बीच इंग्लिश में एम.ए.करने पर एक दो जगह ऐप्लाई भी किया। पर हर जगह रीजैक्ट कर दिया गया। सन् 1946 मेँ सेना के जी.एच.क्यू. में भरती हो रही थी-मैट्रिक पास लड़कोँ के लिए। एक दोस्त मुझे भी साथ ले गया। वह रख लिया गया, मुझे देख कर अंगरेज अफ़सर ने कम उम्र कह कर रीजेक्ट कर दिया। पता नहीं क्यों मैं हमेशा अपनी उम्र से कुछ साल छोटा लगता रहा हूं। अभी तक।

तो बात टाइम्स की हो रही थी। पिछले रविवार मैंने राय साहब और अभिनेत्रियोँ वाला प्रसंग लिखा थाअपने अज्ञान का।

टाइम्स मेँ रमाजी से मुलाक़ात स्व. श्री अक्षय कुमार जैन (संपादक, नवभारत टाइम्स) ने करवाई थी। वहां के उच्चस्तरीय अधिकारियोँ से मेरी ग्यारह मुलाक़ातें हुई थीं। एक में मैंने तत्कालीन जनरल मैनेजर श्री जे.सी. जैन को किसी तकनीकी विषय पर छोटा दिखा दिया था। रमा जी प्रसन्न हुईं। किसी भी मुलाक़ात मेँ किसी ने मुझसे फ़िल्मों के बारे में मेरी जानकारी की बात नहीं की। वे करते तो मैं बेहिचक अपना अज्ञान बता देता। संक्षेप में कहूं तो उन्होंने पूछा नहीं, मैंने बताया नहीं।
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टाइम्स के तत्कालीन हिंदी संपादकों में से परागके श्री आनंद प्रकाश जैन और मैं कभी दिल्ली प्रैस में साथ थे। वह बड़े कहानीकार थे। जब मैं उप-संपादक बना तो वह प्रूफ़रीडर बने थे। नवभारत टाइम्सके श्री महावीर अधिकारी थे। उनसे बस देखादेखी की जान-पहचान थी दिल्ली मेँ। अब हम तीनों मित्र थे। सारिकामें श्री चंद्रगुप्त विद्यालंकार थे या आने वाले थे। मैं उनका नाम ही जानता था। पहले कभी मुलाक़ात नहीं हुई थी।

डॉ. धर्मवीर भारती का मैं प्रशंसक था। दिल्ली में जो अंतिम नाटक मैंने देखा था वह फ़ीरोज़शाह कोटला की प्राचीरोँ के बीच प्रस्तुत इब्राहिम अल्काज़ी के निर्देशन में अंधा युग। मैं उससे आतंकित था। जब मैंने टाइम्स ज्वाइन किया वह महीने भर की छुट्टी पर थे।
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                                                   जीवनसंगिनी कुसुम जी के साथ अरविंद जी         फो. :अरविंद जी के फेसबुक वॉल से

मुंबई में मेरे दो घनिष्ठ मित्र हिंदी ब्लिट्ज़में थेसंपादक मुनीश नारायण सक्सेना और सहायक संपादक नंदकिशोर नौटियाल। नौटियाल और मैं कई मोर्चों पर साथ थे, मेरे पूरे परिवार में वह सदस्य समान रहे हैं। मुनीश से मुलाक़ात हुई दिल्ली के मॉडल टाउन में। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था, लोग चादर के अनुसार पांव पसारते हैं मैँ पांव पसार कर चादर तानता हूं, और मैं उन का प्रशंसक मित्र बन गया था। मुंबई आकर पता चला कि वह ख़्वाजा अहमद अब्बास के साढ़ू थे। भारती जी से मुलाक़ात कराने ले गए मुनीश। जब हम उन के घर पहुंचे तो वह कहीं गए थे, पर आने ही वाले थे। इस तरह मेरी पहली मुलाक़ात पुष्पा जी से हुई, भारती जी से बाद मेँ। मित्र बनने में हमें देर नहीं लगी। सच कहूं तो भारतीजी, पुष्पाजी, मेरी पत्नी कुसुम (जो बंबई कुछ महीनोँ बाद आईँ) और मैं हमेशा हमेशा के लिए अंतरंग हो गए।
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार

(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

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