“पिताजी के छापेखाने में छपते थे मूवी टिकट, बस लग गया फिल्में देखने का चस्का” - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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सोमवार, 6 नवंबर 2017

“पिताजी के छापेखाने में छपते थे मूवी टिकट, बस लग गया फिल्में देखने का चस्का”

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-तीन
 
अरविंद कुमार
संजीव श्रीवास्तव : ये तो बात हो गई दिल्ली की...लेकिन इससे पहले भी आपका जीवन मेरठ की यादों से जुड़ा है। क्यों नहीं...आगे बढ़ने से पहले हमलोग ज़रा और पीछे हो लें...!  

अरविंद कुमार : शानदार पॉश मल्टीप्लैक्सोँ के युग मेँ रहने वाले नई पीढ़ी के लोग कल्पना नहीँ कर सकते पुराने ज़माने के सिनेमाघर कैसे होते थे। हॉल के बाहर खुला मैदान। एक कोने मेँ साइकिल स्टैंड। कभी बहुत पहले पुती फीकी दीवारेँ। टिकटघर। फ़िल्म अच्छी हुई तो विंडो पर धकियाती भीड़...। बदबू फैलाता पुरुषोँ का मूत्रालय। स्त्रियोँ का मूत्रालय नदारद। यूं भी देखने वालोँ मेँ औरतेँ बहुत कम होती थीं। औरतोँ का सिनेमाघर जाना बुरा माना जाता था। बुरा तो बच्चोँ का भी माना जाता था। पर वे चोरी छिपे आ ही जाते थे।

मेरठ मेँ नंबर तीन क्लास का टिकट होता था चवन्नी यानी आजकल के पच्चीस पैसे। इसमेँ कुर्सियां नहीं बैंच होती थीँ, दूसरी का शायद अठन्नी, फिर बारह आने, ऊपरी बाल्कनी हुई तो एक रुपया (पुराने चौँसठ पैसोँ वाला)। बालकनी की सीटेँ फटे कपड़े से मंढी होती थीं। छत पर पंखे हुए तो खड़खड़ाते थे। ठंडक कम गरमी ज़्यादा फैलाते थे। ठंड का मौसम हुआ तो ठिठुरन। सीटोँ पर नंबर नहीँ होते थे। यानी भीतर जाने के लिए धक्कमधक्का। जो पहले घुस पाता वह मनपसंद जगह दो लोगोँ की जगह घेर लेता। परदा अकसर पीला पड़ गया होता था। शुरू होने पर फ़िल्म कई बार टूट टूट जाती थी। क़ायदा तो यह था कि बेचने वाले मध्यांतर मेँ सोडा वाटर, लेमन की बोतलेँ और खाने का सामान आएं, पर वे बेखटे कभी भी आ जाते थे।

'चंद्रलेखा' की एक तस्वीर
    साल 1943; तेरह साल तक बचपन के शहर मेरठ मेँ मैँने कुछ फ़िल्मेँ देखी थीँ। कारण पिताजी के छापेख़ाने मेँ टिकट छपते थे और कुछ कंप्लीमेंटरी टिकट उन्हेँ मिल जाते थे। एक फ़िल्म लगी थी सिंहल द्वीप की सुंदरी’ (घंटाघर के पास नावल्टी में)। हातिम ताई (ख़ैरनगर सिनेमाघर का नाम था शायद निशात) की कहानी आठ सीरियलोँ मेँ बनी थी। एक फ़िल्म शहर के एक ही सिनेमाघर मेँ चलती थी। फ़िल्मोँ के प्रचार का तरीक़ा था - गाजे बाजे के साथ पोस्टरोँ का छोटामोटा जुलूस या बाज़ारोँ मेँ परचे चिपकाना।
दिल्ली : 1948 मेँ आई भारत की पहली स्पैटेकल यानी भव्य दृश्योँ वाली विराट फ़िल्म एस.एस. वासन की इसी नाम की तमिल फ़िल्म का चंद्रलेखा हिंदी मेँ आंशिक रीमेक। सोहराब मोदी भी फ़िल्मेँ बड़े स्केल पर बनाते थे, पर इतने बड़े पैमाने पर फ़िल्म के महल नहीँ दिखाते थे। न ही कैमरा वर्क इतना मुस्तैद। पहले मैँ बताऊंगा इसके बनने की कहानी। वासन स्वभाव से बड़े दांव लगाते आए थे। घुड़दौड़ मेँ अपने प्रिय सफल घोड़े के नाम पर अपनी फ़िल्म कंपनी का नाम रखा जैमिनी (Gemini) । कई सफल फ़िल्म बनाईं। उन्हीं दिनों चंद्रलेखा डकैत के क़िस्से अख़बारोँ मेँ थे। सोचा न समझा चंद्रलेखा नाम की तमिल फ़िल्म घोषित कर दी। कोई कहानी नहीँ थी। नायिका बदली। नया खलनायक लिया रंजन। शूटिंग के दौरान कई बार बदल बदल कर कहानी लिखवाई, दोबारा शूटिंग की। 1947 मेँ तमिल फ़िल्म रिलीज़ हुई – एक साथ 40 शहरोँ मेँ। तब के लिए बहुत बड़ी बात। 
'चंद्रलेखा' का एक चर्चित दृश्य  

अब एक और कैरेक्टर इस फ़िल्म के निर्माण की कहानी मेँ आया। ताराचंद बड़जात्या। वह मद्रास मेँ किसी फ़िल्म वितरक के यहां काम करता था। उसने वासन को एक सुझाव दिया। इसका हिंदी वर्जन बनाओ। वासन ख़ुशी से उछल पड़े। अब ताराचंद ने कहा, इसका वितरण मैँ करूंगा। वासन राज़ी। ताराचंद ने कहा, वितरण मेँ मदद के तौर पर पैसा मुझे आप देंगे। दोनोँ के लिए बड़ा दांव था। दांव लगा दिया गया। हिंदी चंद्रलेखा पूरे दशक की सब से ज़्यादा कमाई वाली फ़िल्म साबित हुई। और इसके साथ भविष्य के मूवी मुग़ल ताराचंद बड़जात्या का निजी व्यापार शुरू हुआ। (बंबई मेँ मेरा और उनका संबंध पहले ही कुछ महीनोँ मेँ प्रगाढ़ हो गया था, जो मेरे वहां से आने तक बना रहा।)

कहानी एक राजा के दो बेटोँ की थी। बड़ा बेटा सुशील है, अच्छा राजा बनने के सब गुण हैँ। उस की मुलाक़ात गांव की गोरी सुंदरी गायिका-नर्तकी से हुई। मन ही मन दोनोँ एक दूसरे के हो गए। दूसरा बेटा शशांक कुटिल है। मां बाप को क़ैद करके छिपा देता है। उन्हेँ मृत घोषित करता है। बड़े भाई को किसी गुफा मेँ बंद करके कहता है कि वह संन्यासी बन कर कहीँ चला गया है। वह भी नायिका पर मोहित हो जाता है। पकड़वा कर मंगवाता है। रास्ते में वह भाग निकलती है। संयोगवश गुफा तक पहुंच जाती है, सर्कस मंडली की सहायता से बचवाती है। सर्कस कंपनी के साथ दोनोँ गुप्त रहते हैँ। सर्कस के कई सीन...नायिका पकड़ी जाती है। अब कहानी उसकी मुक्ति और अच्छे बेटे के राजा बनने की है। फ़िल्म का क्लाईमैक्स एक नगाड़ा डांस का है, सैकड़ों बड़े बड़े नगाड़े हैं। उन पर नर्तकियां नाच रही हैं। नायिका भी एक से दूसरे नगाड़े पर कूदती नाचती हैं। हर नगाड़े मेँ कई सैनिक छिपे हैं। एक संकेत पर वे बाहर निकल कर कुटिल बेटे के महल पर, क़िले पर टूट पड़ते हैँ। जीतते हैँ। नायक और नायिका राजा रानी बन जाते हैँ।

'चंद्रलेखा' का पोस्टर
यह नगाड़ा डांस वाला विराट और लंबा दृश्य भारतीय फ़िल्मोँ के इतिहास मेँ अभूतपूर्व परिकल्पना और आदर्श संपादन का उदाहरण माना जाता है।
यह दृश्य निम्न लिंक पर देख सकते हैं—

(वार्तालाप जारी है...)

1 टिप्पणी:

  1. खैरनगर के पास उस सिनेमाहाल का नाम फिल्मीस्तान है

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