“हमारी दुनिया से ज्यादा अंधेरा तो आपके लॉ एंड ऑर्डर में है” - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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गुरुवार, 9 नवंबर 2017

“हमारी दुनिया से ज्यादा अंधेरा तो आपके लॉ एंड ऑर्डर में है”

ब्लैक के खिलाफ सिनेमैटिक युद्ध

दोस्ती : दिव्यांग किरदार के जीवन का भावुक चित्रण

विकलांग को दिव्यांग कहने से क्या उनके प्रति भेदभाव कम हो जाते हैं? बॉलीवुड की कई फिल्मों में दिव्यांगों के जीवन के विभिन्न पहलुओं को अलग-अलग तरीके से दिखाया गया है लेकिन क्या निर्देशक उनके किरदारों के साथ न्याय कर सके हैं? क्या सामाज की प्रचलित धारणा से उन्होंने अपने आपको अलग रखा है? पुरुष विकलांग का चरित्र और महिला विकलांग का चरित्र क्या प्रगतिशील सोच की कसौटी पर खरे उतरते हैं? हिन्दी सिनेमा के पीएचडी स्कॉलर मनीष कु. जैसल का एक विश्लेषण...

एकदम नई खबर यह है कि ऑक्सफोर्ड प्रकाशन ने 70 के करीब नए हिन्दी अङ्ग्रेज़ी शब्दों को डिक्सनरी में  शामिल किया है जिनमें फिल्म फुकरे से प्रचिलित हुआ शब्द जुगाड़ भी है। पिछले वर्षों में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने विकलांग की जगह दिव्याङ्ग शब्द इस्तेमाल करने पर भी ज़ोर दिया। अब आम जन मानस में इस शब्द को प्रयोग में लाया भी जा रहा है। विकलांग शब्द सुनते ही आपके अंतरमन में पहली छवि क्या बनती है? मेरे मन में तो फिल्म उपकार’ में विकलांग की भूमिका में मलंग चाचा (प्राण) और मन्ना डे का गाया कसमें वादे प्यार वफा सब बातें है बातों का क्या दिखाई और सुनाई पड़ता है।

काबिल : नेत्रहीन किन्तु जीवन से भरपूर
देश में विकलांगों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है, न ही उनकी प्रतिभा पर संदेह किया जा सकता है। दोनों ही  अपने नए कीर्तिमान गढ़ रहे हैं। सामान्य व्यक्तियों की तरह उनके जीवन में यापन और मूलभूत आवश्यकताओं संबंधी नीतियां बनती रहें तो उनमें और हिम्मत और कुछ करने की ललक बढ़ेगी। संजय गुप्ता की फिल्म काबिल का ही उदाहरण लें तो विकलांगों के प्रति समाज की स्थिति भी सामने आती है । वाकई आंखों से न देखने वालों के लिए ये दुनिया किसी खतरनाक सपने से कम नहीं है। फिल्म में वो दोनों जीना चाहते हैं, अपने आप मे खुश रहना चाहते हैं, लेकिन दरिंदा समाज उन्हें भी वस्तु की तरह इस्तेमाल करता है। फिल्म में बेहतरीन आवाज निकाल कार्टून कार्यक्रमों से पैसा कमाने वाला रोहन (रितिक रोशन), अपने जैसी आंखों से न देख पाने पाने वाली सुप्रिया (यामी गौतम) से शादी करता है और एक खूबसूरत दुनिया बसाने के लिए दोनों प्रयासरत होते हैं । बस फिर उसके बाद शुरू होती हैं काबिल की असली कहानी, जो समाज से पूरी तरह जुड़ती नज़र आती है। जब रोहन काम से ऑफिस जाता हैं तो कुछ दरिंदे सुप्रिया का रेप करते हैं । दोबारा फिर करते हैं । पुलिस को खबर की जाती है । जब पुलिस और कानून आंखों वालों की नहीं सुनता तो अंधों की कितना सुनेगा ? यह हमें सोचने की जरूरत नहीं हैं । रोहन (रितिक रोशन ) कहता हैं हमारी दुनियां से ज्यादा अंधेरा तो आपके लॉं एंड ऑर्डर में है

कोशिश : जीवंत संवेदना से लबरेज

हिन्दी सिनेमा में दिव्यांग किरदार का चरित्र

महिला विकलांगों की हिन्दी सिनेमा में स्थिति की खोज करते हुए इसी तरह के कई तथ्यों पर हम दिव्याङ्गों और समाज के अंतर्संबंध पर एक नज़र दौड़ा लेते हैं ।
सच है महिलाएं इस समाज की उपेक्षित घटक हैं, और तो और अगर उसी घटक में विकलांगता को शामिल कर दिया जाये तो वह और भी ज्यादा उपेक्षा का शिकार होने लगती हैं । महिला, गरीबी, विकलांगता जब तीनों का मेल हो जाएं तो समाज में उनकी स्थिति और भी दयनीय हो जाती है। यहां यह देख लेना होगा कि सामान्य महिला तथा विकलांग महिलाओं के जीवन में आने वाली समस्याएं लगभग एक जैसी ही है। Mary Chinery Hessey अपनी किताब विमेन एंड डिसएबिलिटी में Equality of Opportunity और समाज में उनके साथ हो रहे  ट्रीटमेंट/व्यवहार का एक बड़ा पक्ष सामने रखते हुए कहती है कि एक फिजिकल या मेंटल विकलांग महिला इस समाज में दोहरी मार झेल रही है । महिलाएं पुरुषों के लिए जहां एक उपभोग की वस्तु है यह जगजाहिर है । लेकिन इसी समाज में विकलांग महिला की स्थिति और भी क्रूरता भरी और दयनीय है । ऐसी महिलाएं नॉन सेक्सुअल शादी के लिए अनुपयुक्त मानी जाती है। खासकर भारत जैसे देश जहां अरेंज शादी ज्यादा होती है वहाँ एक हैंडीकैप महिला शादी के लिए डिसक्वालिफाइड है (हमारे आस पास कई उदाहरण आसानी से मिल जाएंगे)। न जाने कौन सा रब/ ईश्वर/अल्लाह/जीसस ऊपर से इनकी जोड़ियां बनाना भूल जाता है या फिर बेमेल जोड़ियां वह इन महिलाओं की किस खुन्नस में बना देता है, जहां उसे शादी के लिए कंप्रोमाइज़ करना पड़ रहा है । मजबूरी में अपने से बड़ी उम्र के अधेड़ के साथ, विधुर तक के साथ  शादी करनी पड़ती है । और अभी भी पड़ रही है ।  दहेज के लिए  सामान्य महिला से ज्यादा प्रताणना के कई किस्से अखबारों में छप चुके हैं। घर और ससुराल के परिवार में उसे और भी ज्यादा उपेक्षित क्यों होना पड़ रहा है? हमारा ही मूंछें तान मर्द बनने वाला समाज मानता आया है कि दिव्याङ्ग महिलाएं मजबूत बच्चे को जन्म तथा उसकी देखभाल नहीं कर सकती हैं । वह एक आदर्श मां भी नहीं बन सकती। वह कहीं नौकरी भी नहीं कर सकती। अच्छी पत्नी तो कभी बनी ही नहीं, आदि आदि ...। मीडिया और अन्य उद्योगों में ऐसी महिलाओं की संख्या उंगलियों पर भी गिनी जाने योग्य हालत हो तो समझिए कुछ सुधार हुआ है। भारत ही नहीं वरन पूरे विश्व में विकलांग महिलाएं पीड़िता के तौर पर ही देखी गयी है।
भारत के संदर्भ में इन महिलाओं के साथ इस तरह की हीन-भावना के पीछे कौन से सामाजिक, सांस्कृतिक और एतिहासिक फैक्टर जिम्मेदार हो सकते है? कोई शोध हुआ हो तो भी ढूंढने  के प्रयास हमें करने चाहिए ।
दिव्यङ्ग पुरुषों की भांति इन्हें भी सामाजिक दर्पण पर दैत्य दानव या कहें नकारात्मक छवि के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता रहा है। भारतीय पौराणिक कथाओं में भी विकलांगों का चित्रण निर्दयी और कई जगहों पर तो दैत्यों, खलनायकों के रूप में हुआ है। एक आंख वाली कैकेई की दासी मंथरा इसका सटीक उदाहरण है । वहीं कृष्ण लीला में कूबड़ा का चरित्र इसे और विस्तार देता है । दूसरी तरफ पुरुष विकलांगों के प्रति सकारात्मक रवैया क्यों? दिव्याङ्ग धृतराष्ट्र और मामा शकुनी आज भी पौराणिक कहानियों के महिला विकलांग पात्रों से उच्च माने जाते है । सम्मान पाते हैं। ऐसे में स्त्री पुरुष भेदभाव की एक भयावह स्थिति यहां भी स्पष्ट होती है ।
भारत जैसे अर्धशिक्षित देश में विजुअल माध्यम का लोकप्रिय होना कोई बड़ी बात नहीं है। यही इस माध्यम का सबसे बड़ा गुण भी है। सिनेमा और टेलीविज़न जैसे माध्यमों ने जिस प्रकार इस समाज में अपनी पैठ बनाई हुई है वह भी गौरतलब है। लेकिन दिव्याङ्गो के प्रति (ख़ासकर महिलाओं के प्रति) फिल्मों में उदासीन और अलोकप्रिय चित्रण ही क्यों पेश किया है?

स्पर्श : जीवन के अहसासों का

प्रचलित धारणा से अलग क्यों नहीं होते दिव्यांग किरदार?

वॉलीवुडिया अभिनेता-अभिनेत्री जिस प्रकार आम जनमानस में अपनी पैठ बना ले जाते हैं उससे यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर दिव्यांगों के प्रति संवेदनशील रहा होता तो सिनेमा की आज स्थिति और भी बेहतर होती ।   शुरुआत से ही भारतीय सिनेमा हॉलीवुड से प्रभावित रहा है। एमहर्स्ट मैसाचुसेट्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मार्टिन एफ नॉर्डन और मेडलीन काहिल ने अपनी किताब Violence, Women, and Disability in Tod Browning's Freaks and The Devil Doll में माना है कि हॉलीवुड ने विकलांगों के समाज की परेशानियों को उम्दा तरीके से उकेरा है । लेकिन वहीं भारत में महिला और पुरुष विकलांगों के चित्रण में अंतर क्यों देखने को मिलते हैं? बॉलीवुड फिल्मों में पुरुष विकलांग प्रबल दिखाया जाता है, वहीं दिव्यांग महिला और भी ज्यादा दुखियारी। आमतौर पर विकलांग पुरुष के साथ सामान्य महिला आसानी से रहते हुए दिखाई देती हैं लेकिन विकलांग महिला के साथ सामान्य पुरुष उसकी विकलांगता को आधार बनाते हुए उसे नकारता हुआ देखा जा सकता है।  एक विकलांग महिला दुर्बलता के साथ मां, बहन और और कभी-कभार नायिका की भूमिका में देखी जा सकती है। फिल्म कोशिश और खामोशी में चित्रित देख और न सुन पाने वाले विकलांग चरित्र द्वारा कर इसकी पुष्टि की जा सकती है । 1961  में नवकेतन के बैनर तले बनी फिल्म हम दोनों का जिक्र यहां करना जरूरी है जिसमें देव आनंद डबल रोल में हैं। युद्ध से क्षतिग्रस्त हुआ देव का किरदार यहां विकलांगों की सामाजिक स्थिति को स्पष्ट कर देता है। देव अपनी पत्नी से खुद की इस विकलांगता की हालत से तंग आकर जीवन खत्म करने की बात करता है। अपनी आधी अधूरी ज़िंदगी जीने से अच्छा वो मर जाने की बात को फिल्म में  स्वीकार कर रहा है ।
एक और फिल्म आरजू जो 60 के दशक में आई, उसका भी जिक्र यहां जरूरी है जिसमें अभिनेता राजेन्द्र कुमार गोपाल के किरदार में है । और उनके परोक्ष अभिनेत्री साधना आशा के किरदार में है । आशा ने गोपाल से शादी से पूर्व एक अपाहिज की ज़िंदगी जीने से तो मौत अच्छी है बोला था । एक दुर्घटना के आबाद गोपाल के दोनों पैर कट जाते हैं और उसे आशा का यह संवाद याद आता है । वह आशा को नज़रअंदाज़ करने लगता है । हालांकि आशा गोपाल को उसी तरह चाहती है । एक सामान्य महिला का विकलांग पुरुष के साथ संघर्ष को फिल्म में दिखाया जाता है।
 
ब्लैक : रोशन जिंदगी के लिए जंग
जैसे ब्लैक के खिलाफ अंधा युद्ध चल रहा है

एंग्री यंग मैन के समय में भी अगर हम देखे तो इन महिलाओं के लीड रोल में होने के बावजूद उनकी दुर्बलता को आसानी से समझा जा सकता है । रवि टंडन की 1974 में बनी फिल्म मजबूर में अमिताभ की व्हील चेयर की स्थिति में उनकी बहन का किरदार कर रही फरीदा जमाल, मनमोहन देसाई की 1970 में आई फिल्म सच्चा झूठा में ओर्थपेडिक विकलांग की भूमिका में नाज़ इसके उदाहरण माने जा सकते हैं। दोनों ही फिल्मों में इन महिलाओं के संघर्ष से ज्यादा इनकी विकलांगता को पेश किया गया है । और इनके पुरुष किरदारों पर आश्रित रहते हुए पेश किया गया।
इसी दशक की चार और फिल्मों को यहां उदाहरणस्वरूप देखा जाएं तो स्थिति और भी स्पष्ट हो सकती हैं। 1977 में बनी गुलजार की फिल्म किनारा में हेमा मालिनी द्वारा निभाया गया नेत्रहीन नृत्यांगना का किरदार,1972 में आई शक्ति सामंता की फिल्म अनुराग में मौसमी चटर्जी द्वारा निभाया गया नेत्रहीन अनाथ लड़की का किरदार, गुलजार की एक और फिल्म कोशिश 1972 में जया भादुरी और संजीव द्वारा निभाया गया मूक बधिर का किरदार और मदन बावेजा की 1974 की फिल्म इम्तिहान में चल फिर सकने में अक्षम के किरदार में तनुजा को याद किया जाना जरूरी है । किनारा और अनुराग दोनों ही फिल्मों की नायिकाएं मुख्य भूमिका में हैं सुंदर, रमणीय और कला के प्रति समर्पित भी है ।  दोनों ही फिल्मों के नायक क्रमश जितेंद्र और विनोद मेहरा उन्हें बहुत प्यार करते हैं। हेमा मालिनी को एक दुर्घटना के परिणामस्वरूप दृष्टिहीन दिखाया गया है, जिसका आंशिक रूप से पुरुष नायक ही जिम्मेदार है। और फिल्म में हर समय इसके लिए उसको जिम्मेदार भी माना जाता है। जबकि फिल्म अनुराग में मौसमी चटर्जी का अंधापन अंत में ठीक हो जाता है। फिल्म इम्तिहान एक नया दृष्टिकोण पेश करते हुए दिखती है जिसमें तनुजा का पति उसके लिए उसकी विकलांगता से जुड़ी चीजें खरीदता है। और उसे खूब प्यार भी करता है ।
नाचे मयूरी : कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
 पुरुष दिव्यांग साहसी किन्तु महिला दिव्यांग निरीह क्यों?

1980 के दशक में अगर बात करें तो दो बड़ी फिल्मों का जिक्र किया जा सकता है । जिसमें एक व्यावसायिक और दूसरी समानान्तर सिनेमा की फिल्म है । टी रामा राव की नाचे मयूरी 1986  और साई परांजपए की 1980 में  बनी स्पर्शनाचे मयूरी भारत नाट्यम की नृत्यांगना सुधा चंद्रन की वास्तविक संघर्षों पर आधारित है  जिन्होनें अपना एक पैर दुर्घटना में खो दिया था । और आर्टिफिसियल पांव के सहारे वह अपने मिशन को पूरा करती है। फिल्म आगे बढ़ती है और उसका प्रेमी शेखर सुधा की विकलांगता को देखते हुये उसे छोड़ देता है । वहीं फिल्म स्पर्श में नसीरुद्दीन शाह एक अंधे अध्यापक की भूमिका में है जो प्रचंड स्वतंत्रता का हिमायती, अत्यधिक शिक्षित है। एक सामान्य महिला शबाना आज़मी उससे प्यार करती है । दोनों ही फिल्मों में हमें स्त्री पुरुष विकलांग चरित्रों पर गौर करने पर पता चलेगा कि विकलांग स्त्री को  सामान्य पुरुष छोड़ सकता है लेकिन विकलांग पुरुष को सामान्य महिला, पतिव्रता और सामाजिक बंधन में बंध कर सहन करती है । फिल्म गुजारिश का रितिक रोशन, एश्वर्या राय को मंजूर है लेकिन 80 के दशक की फिल्म बरसात की एक रात में अंधी महिला के किरदार में राखी स्वतंत्र नहीं है । वह आर्थिक रूप से भी स्वतंत्र हमें नहीं दिखती है । फिल्म में पुलिस इंस्पेक्टर के किरदार में अमिताभ राखी से शादी का प्रस्ताव भी रखते है लेकिन वह सामाजिक बंधनों और अपने साथ हुई रेप की घटनाओं और अपनी विकलांगता के कारण प्रस्ताव को मना कर देती है।  
अब यहीं देख लीजिये 90 के दशक में ऐसी कई फिल्में बनी जिनमें सामान्य महिलाओं ने विकलांग पुरुषों का अपना प्यार,अपना पति स्वीकार किया है । फिल्म साजन में पोलियो ग्रस्त किरदार में संजय दत्त को माधुरी प्यार करती है, स्पाइनल के शिकार ऋषि कपूर को फिल्म चांदनी में श्रीदेवी प्यार करती है, फिल्म दुश्मन में अंधे के किरदार में एक बार फिर संजय दत्त को अभिनेत्री द्वारा स्वीकारा जाता है और फिल्म हम आपके है कौन में बाएं हाथ से बेकार मोहनीश बहल के साथ बाकायदा पत्नी का दर्जा देतीं हुई दिखती हैं तब्बू।
विकलांगता विषय पर काबिल से पहले 1996 में बनी खामोशी जिसमें नाना पाटेकर और सीमा विश्वास अंधे जोड़े के रूप में हैं । दोनों अपनी मूक और शांत दुनिया में खुश हैं लेकिन दुनियां की नज़र में वह मिसफिट दिखते हैं । फिल्म मन का आमिर खान मनीषा कोइराला से  उसके अपाहिज होने के बाद भी उससे प्यार करता है । 80 में  बनी बरसात की एक रात की तर्ज पर यहां भी वही विकलांगता के बाद स्वीकार्यता का मामला आता है लेकिन आमिर इस मन में अपने मन की सुनते हैं। इसके बावजूद फिल्म में पुरुष रूढ़िवादी तत्वों की प्रधानता देखी जा सकती है । 

बर्फी : जिंदगी कितनी खट्टी मिठी है!
दिव्यांग को कब तक विक्टिम की तरह दिखाते रहेंगे?

हम सीधे तौर पर कह सकते है कि लगभग हर दशक के सिनेमा में विकलांगों/दिव्यांगों का चित्रण होता आया है । लेकिन उनके प्रश्नों, उनकी समस्याओं और उनके हौसलों को सिनेमा ने बढ़ाने के बजाय उन्हें विक्टिम/दोषपूर्ण तरीके से ही रखे हैं। इसके अलावा अलावा स्त्री पुरुष पात्रों में जो भेदभाव की बहुलता देखी गयी है वह पुरुषवादी समाज की पोल खोलने में और मदद करता है । क्या दलित सिनेमा, स्त्री सिनेमा, मुस्लिम विषयों से जुड़ा सिनमा की तर्ज पर अब विकलानों को अपने सकारात्मक चरित्रों को पर्दे पर उकेरने के लिए इस ओर प्रयास करने पड़ेंगे? तभी उनका सकारात्मक चित्रण संभव है? नहीं तो पुरुष विकलांग पात्र खलनायक की भूमिका में जाते जाएंगे और महिला विकलांग पात्र पतिव्रता न बन पाने के गम में और भी रोना रोती रहेंगी। कब उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ उनकी मूलभूत समस्याओ को उठाने वाला सिनेमा बिना स्त्री पुरुष का भेदभाव किए आएगा? हमने भी उसी दिन का इंतजार है। मन्ना डे अभी भी गाते जा रहे हैं ...कसमें वादे प्यार वफा सब बातें है बातों का क्या ... लेकिन बातों से काम नहीं चलेगा, संवेदनशीलता की ओर हमें बढ़ना ही होगा।
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(लेखक महत्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में सिनेमा विषय के पीएचडी स्कॉलर हैं।)
संपर्क - mjaisal2@gmail.com / pictureplus2016@gmail.com  

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