अवाक् कर देती है फिल्म ‘कड़वी हवा’ - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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गुरुवार, 23 नवंबर 2017

अवाक् कर देती है फिल्म ‘कड़वी हवा’

फिल्म नहीं आबोहवा के प्रति आखिरी अलार्म है कड़वी हवा
(64वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में फिल्म का स्पेशल मेंशन)
 
संजय मिश्रा : आउटस्टैंडिंग अभिनय 
फिल्म  – कड़वी हवा
निर्देशक – नील माधब पांडा
सितारे – संजय मिश्रा, रणवीर शौरी, तिल्लोत्मा शोमे आदि।
रेटिंग – 4.5 स्टार
*संजीव श्रीवास्तव
कड़वी हवा देखने के बाद सिनेमा के कई प्रतिमान दृष्टिपटल से धूमिल होने लग जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में कथा, पटकथा, संवाद, अभिनय, अदायगी आदि सबके प्रतिमान सुरक्षित स्थान पर हैं। दो बीघा जमीन में बलराज साहनी और प्यासा में गुरुदत्त का अभिनय प्रतिमान है। कागज के फूल की पटकथा और गरम हवा के संवाद भी प्रतिमान हैं। लेकिन कड़वी हवाकहानी, परिदृश्य, संवाद तथा अभिनय के दृष्टिकोण से सिनेमा का सामयिक प्रतिमान है।
पूरी फिल्म ध्यान से देख लेना भी एक साहस की बात है। कहानी, मन मस्तिष्क को झकझोर देती है तो कलाकारों का अभिनय, हमें अंदर तक तोड़ देता है। संजय मिश्रा का अभिनय अपने चरम पर नजर आता है। उनका किरदार और उस किरदार की ऐसी अदायगी के बिना कड़वी हवा की कड़वाहट की मारकता का अहसास मुश्किल ही था। वो इस फिल्म में अभिनय का नया प्रतिमान बनाते दिखते हैं।

अभिनय का नया प्रतिमान

पर्यावरण संकट और उसके दुष्परिणाम पर फीचर फिल्म बनाना चुनौती मोल लेने से कम नहीं था। कहानी को बांध कर रखना, संदेश का संप्रेषण, मारकता की अनुभूति, अभिनय की कुशलता और बाजार का दवाब आदि कुछ ऐसे तत्व हैं कि इस श्रेणी की फिल्म, फीचर फिल्म बनते-बनते रह जाती है। वह डाक्यू- ड्रामा की शक्ल लेने लग जाती है। लेकिन इसे नील माधब पांडा की काबिलियत और साहसिकता कहिये कि इनमें किसी भी विन्दु पर वो कमजोर नहीं पड़े हैं। उन्होंने पूरी फिल्म पूरे धैर्य और मिशन भावना के तहत बनाई है। वो चाहते तो बड़ी आसानी से कहानी को मोड़कर उसमें राजनीति और मीडिया के दो दावेदार किरदार खड़ाकर पीपली लाइव जैसा दूसरा सनसनीखेज मनोरंजन मसाला बना सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने इसे डे आफ्टर टूमौरो का रूप भी नहीं दिया। उन्होंने मूल परिवेश की मूल परिस्थिति की मौलिकता को अपनी शैली में बरकरार रखा। इसीलिए कड़वी हवा फिल्म समग्रता में भी एक नया प्रतिमान तैयार करती है। किसी फिल्म की निर्माण टीम में जब मनीष मुंदड़ा, अक्षय कुमार परीजा और नील माधब पांडा जैसे नाम हों तो वह फिल्म नहीं, बल्कि विचार और संवेदना की झकझोरने वाली नई सामाजिक तस्वीर कहलाती है। इससे पहले भी मनीष मुंदड़ा आंखों देखी, मसान, धनक, रुख या फिर न्यूटॉन जैसी लीक से हटकर फिल्मों को प्रस्तुत कर मुख्यधारा के मसाला सिनेमा को आईना दिखा चुके है। तो नील माधब पांडा भी विशेषत: पर्यावरण के प्रति जागरुक करने वाली फिल्में/डाक्यूमेंट्री बना चुके हैं। आयएम कलाम, कौन कितने पानी में तथा जलपरी जैसी फिल्मों से उनकी ख्याति है। वस्तुत: फिल्में केवल मल्टीस्टारर या पांच सौ करोड़ के बिग बजट वाली ही नहीं होतीं बल्कि मीनिंगफुल सिनेमा का हमेशा से अपना वजूद रहा है।   
संजय मिश्रा व रणवीर शौरी : बंजर में दूब की तलाश

कड़वी हवा की कहानी और पटकथा नितिन दीक्षित ने लिखी है, जिनकी भी खूब प्रशंसा की जानी चाहिये। कहानी की पृष्ठभूमि सूखाग्रस्त बुंदेलखंड की है। जहां के गांवों में हरियाली विलुप्त हो गई है। मौसम बेघर हो गया है। यहां के लोग केवल दो ही मौसम जानते हैं। सर्दी और गर्मी। बच्चे किताबों में बरसात के मौसम के बारे में पढ़ते हैं लेकिन गांव में बरसात का मौसम कभी आता नहीं। इसलिये यहां दो ही मौसम होते हैं। बरसात नहीं होने से खेती, किसानी सब मारी गई है। किसान हलकान हो गये हैं। पेट भरने को मोहताज हो गये हैं। मजबूरन बैंक से कर्ज लिया। लेकिन कर्ज नहीं चुका पाने से धीरे धीरे काल के गाल में समा रहे हैं। संजय मिश्रा ने एक अंधे बूढ़े का किरदार निभाया है जिसका बेटा भी बैंक से कर्ज लेता है। लेकिन नहीं चुका पाता और एक दिन घर नहीं लौटता। घर में बहू और उसकी दो बच्चियां हैं और खुद अंधा बूढ़ा बाप।
कहानी की दूसरी पृष्ठभूमि में बैंक रिकवरी एजेंट के किरदार में रणवीर शौरी है, जो ओडिशा के तटवर्ती क्षेत्र का रहने वाला है। जहां पर्यावरण संकट के चलते समुद्री तूफान का खतरा बना रहता है। उसका परिवार वहीं है और वह खुद यहां रिकवरी एजेंट की नौकरी कर रहा है। उस दिन की खुशहाली की बाट जोह रहा है जब वह अपने परिवार को उस खतरनाक हो चुके तटवर्ती इलाके से निकालकर साथ-साथ रहेगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता। तूफान उसका घर परिवार सब खत्म कर देता है। रणवीर शौरी अपने किरदार में फिट लगे हैं।

मौसम के बेघर होने से जीवन हुआ बंजर

वस्तुत: कड़वी हवा महज एक फीचर फिल्म नहीं है, यह फिल्म की शक्ल में एक चेतावनी है। पर्यावरण को लेकर जागरुक करने वाला एक अलार्म। निर्माता-निर्देशक की सबसे बड़ी खूबी फिल्म के आउटपुट कलेवर में नजर आती है। फिल्म कहीं से भी लाउड नहीं है। ना पोलिटिकली, ना ही सैटेरिकली। यथार्थ को यथार्थ की शैली में ज्यों का त्यों रख देने का सफल प्रयास है। फिल्म एक तल्ख तस्वीर सत्ता, सरकार और समाज के सामने रखती है। अब सोचना इन्हीं को है-कि जिस फिजां में कड़वी हवा घुल चुकी है तो यहां सांसें लेते रहने का मौका आखिर कब तक बचा है? संजय मिश्रा का किरदार जब-जब पर्दे पर आता है, लाठी टेकता, पत्थर फेंकता, जमीन उकेरता, भैंस लेकर चलता...हूंsss हूं...sss की कराहती ध्वनि निकालता हुआ हरदम यही सवाल करता है। फिल्म के बैकग्राउंड में जो बंजर और वीराना दिखाया गया है, वह डराने वाला है। 
फिल्म जब खत्म होती है तो दर्शक दरवाजे की तरफ तेज कदम भागते हैं लेकिन गुलजार की आवाज़ में उन्हीं की कविता सुनकर एकदम से ठिठक जाते हैं-

बंजारे लगते हैं मौसम
मौसम बेघर होने लगे हैं
जंगल, पेड़, पहाड़, समंदर
इंसां सब कुछ काट रहा है
छील छील के खाल ज़मीं की
टुकड़ा टुकड़ा बांट रहा है
आसमान से उतरे मौसम
सारे बंजर होने लगे हैं
मौसम बेघर...
दरयाओं पे बांध लगे हैं
फोड़ते हैं सर चट्टानों से
बांदीलगती है ये ज़मीन
डरती है अब इंसानों से
बहती हवा पे चलने वाले
पांव पत्थर होने लगे हैं
मौसम बेघर होने लगे।

तब हॉल में सन्नाटे के सिवा कुछ नहीं रहता। सीढ़ियों से उतरते दर्शक महज चहलकदमी के एंबियंस के साथ सिनेमा हॉल से बाहर हो जाते हैं। अब भी नहीं सोचेंगे तो हथेलियों में कर्ज की रेखा लेकर पैदा होने वाली पीढ़ियां सत्ता, सियासत और समाज को कभी माफ नहीं करेगी। 
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*लेखक पिक्चर प्लस के संपादक हैं।
( निवेदन - इस समीक्षा को कहीं भी पुनर्प्रकाशित करने अथवा किसी भी रूप में उपयोग में लाने से पहले अनुमति लेना आवश्यक है। 
संपर्क pictureplus2016@gmail.com )

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन फिल्म की उम्दा समीक्षा

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  2. बेहतरीन फि़ल्म समीक्षा ! आपने कहीं भी इस तरह के फि़ल्म के लेखक से कम नही लिखा !!

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  3. बहुत ख़ूब !!!

    "अब नही सोचेंगे तो...." - एक संवेदनशील समीक्षा !!

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