जब मैं पहली बार शैलेंद्र और राजकपूर से मिला... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 3 दिसंबर 2017

जब मैं पहली बार शैलेंद्र और राजकपूर से मिला...

'माधुरी' के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भागसात
                                                                                 अरविंद कुमार                                             फो.सौ. अरविंद कुमार

माधुरी मेँ प्रधान सहकर्मी मुझे मिल चुके थे। मैंने उनसे खुल कर बात की। कहा – पत्रिका में कौन किस पद पर हैयह संयोग की बात है। संपादक मैं हूं, आप में से कोई भी हो सकता था। हम सब बराबर हैंकिसी न किसी पद पर संपादक हैं। आप सब स्वतंत्र हैं हर तरह का सुझाव देने के लिए। सबको दोस्तोँ की तरह रहना है। जब तक मैं रहा तब तक पूरा संपादकीय विभाग परस्पर मित्र रहा। मेरे बाद भी रहा होगा क्योँकि मेरे उत्तरवर्ती विनोद तिवारी भी उसी कल्चर मेँ आगे बढ़े थे।
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लेकिन एक बार फिर बंबई में मेरे पहले दिनों की तरफ़ लौटना चाहता हूं।
उन दिनों सन् 1963-64 में बंबई में ट्रैफ़िक सन् 1978 जब मैंने बंबई छोड़ा, के मुक़ाबले बहुत कम था। तब वहां विक्टोरिया गाड़ी यानी बग्घी भी चला करती थीं। उनमें बैठना मुझे बड़ा अच्छा लगता था। मित्रों के साथ उनमें सवारी करता। कई बार तो साईस के पास जा बैठता। मैरीन ड्राइव की हवा में बालों का उड़ना बड़ा मज़ेदार लगता था। मुनीश ने ही उनमें सवारी का चस्का डाला था।



शैलेंद्र जी के प्रति मेरा प्रीति भाव मुनीश जानते थे। मुनीश उनके मित्र थे। वही ले गए मुझे उनसे मिलवाने। बांद्रा-खार में शैलेंद्र बंगले की ऊपरी मंज़िल मेँ रहते थे। अपनी पसंद का बड़ा रूमानी काव्यात्मक नाम रखा था उन्होंने – ‘रिमझिम। उस दिन क़रीब 4-5 बजे हम पहुंचे। कुछ लोग शैलेंद्र के साथ थे। मैं तैंतीस साल का था। शैलेंद्र मुझसे सात-आठ साल बड़े होंगे। जो लोग उनके साथ थेवे मुझसे भी कम उम्र के थे – उनके प्रशंसक। उनमें से दो-तीन अभी तक मेरे संपर्क में हैं।
मैंने उनसे कहा था कि दिल्ली मैं और मुंशी हर रोज़ उनकी बात करते थे। मुंशी माने रामसरण शर्मा प्रसिद्ध साहित्यकार रामविलास जी के छोटे भाई। मैँ सरिता के प्रकाशकों के झंडेवालान कार्यालय में था। मुंशी एक बिल्डिंग छोड़ कर पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस के हिंदी विभाग मेँ संपादन विभाग में थे। शैलेंद्र जी के लोकगीत मस्ती में सुनाते थे। और शैलेंद्र के घनिष्ठों में से थे। मुंशी ने ही कहा था शैलेंद्र से मिलने बेहिचक चले जाना और मेरा नाम लेना।
पांच-दस मिनट में शैलेंद्र मेरे बड़े भाई हो गए। बहुत देर बातें होती रहीं।
मैं यह बताना भूल गया कि बंबई में मेरे दो ही हीरो थे। पहले शैलेंद्र, दूसरे राज कपूर। मैंने बताया तो शैलेंद्र ने कहा–“राज साहब से तुम्हें मैं मिलवाऊंगा। जब तारीख़ और समय पक्का होगा मैं तुम्हारे दफ़्तर मेँ फ़ोन कर दूंगा। और दो तीन सप्ताह बाद वह मुलाक़ात हुई। मेरी यादोँ में बस गई।

शैलेंद्र और उनकी 'तीसरी कसम'

तो उन दिनोँ रेणु जी के उपन्यास तीसरी क़समपर शैलेंद्र फ़िल्म बना रहे थे। उस की बातें हुईं। उस मीटिंग में बलबीर भी थे, उनका दूसरा नाम दीनानाथ। वह शैलेंद्र जी के मित्रों में भी थे और तीसरी क़समके साथ भी। उनसे मेरा संबंध लगभग सन् 78 तक चला, जबकि शैलेंद्र जी 14 दिसंबर 1966 को हमें छोड़ गए थे। मेरे संस्मरणों में उनका नाम भी कभी-कभी आता रहेगा। बड़े क़िस्सागो थे। धर्मेंद्र के भी साथ थे। बिहार के रहने वाले थे। रेणुजी के प्रशंसक थे।
राज कपूर से पहली मुलाक़ात पर एक लंबा चौड़ा लेख मैंने लिखा है। आज बस इतना लिखूंगा कि राज कपूर ने वचन दियातुम कविराज के मित्र हो, मेरा दरवाज़ा तुम्हारे लिए हमेशा खुला रहेगा। जब तक मैं बंबई रहा, उन्होंने यह वादा पूरी तरह निभाया।
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सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)


1 टिप्पणी:

  1. बहुत ख़ूब !!... लगता है "उस दौर में जी' लिए हों !!" दिल को बड़ा मलाल होता है कि उन "मूल्यों वाला माहौल आज क्यूँ नहीं है ?" "....दुनियां में आने में ही लेट हो गए यार !!

    आज चहुँ ओर फैली' व्यावसायिकता' भावनात्मकता और रिश्तों की मिठास को लील चुकी है....!😢

    उत्तर देंहटाएं

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