तब गीतकार इन्दीवर और अनजान कुछ गाने लिखकर इंडस्ट्री में पैर जमा रहे थे... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

रविवार, 24 दिसंबर 2017

तब गीतकार इन्दीवर और अनजान कुछ गाने लिखकर इंडस्ट्री में पैर जमा रहे थे...

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–दस

                                                कड़ाके की सर्दी में जूस के साथ अरविंद कुमार                             फो.सौ. अरविंद कुमार

माधुरी’ में मेरा पहला दिन:-
टाइम्स मेँ सभी संपादकोँ और विभागाध्यक्षोँ के लिए लंच रूम थाउसके साथ ही थी लौबी जहां खाना खाने से पहले सब जूस पीतेबातचीत करते और आमंत्रित मेहमानोँ से मिलते थे। पहले दिन मुझे वहां राय अपने साथ ले गएपरिचय कराया, “मीट अवर यंगैस्ट ऐडीटर अरविंद कुमार। ही विल ऐडिट अवर न्यू मैगज़ीन।” उनका मतलब था कि मैं टाइम्स में बनने वाला सबसे कमउम्र संपादक था। (दो तीन साल बाद जब ख़ुशवंत सिंह ‘इलस्ट्रेटिड वीकली’ के संपादक बन कर आए तो उन्होंने तअज्जुब हुआ था- “यह ‘लड़का’ यहां क्या कर रहा है।) उस दिन लौबी मेँ थे स्वयं प्रताप कुमार रायपर्सनल मैनेजर वी.जी. कर्णिक, ‘पराग’ के संपादक आनंद प्रकाश जैन, ‘नवभारत टाइम्स के स्थानीय संपादक महावीर अधिकारी,‘इलस्ट्रेटिड वीकली के संपादक ए.एस.रामन, ‘महाराष्ट्र टाइम्स’ के संपादक राय द्वा.भ.कर्णिककुछ विभागाध्यक्ष।

गीतकार इन्दीवर
लौबी का एक दरवाज़ा लंचरूम मेँ खुलता था। मीनू रोज़ बदलता था। कई सब्ज़ियांकभी रोटियांकभी पूरियां। बातचीत चलती रहती। सबके अंत में आती कॉफ़ी। सारा भोजन वहां की रसोई में ही बनता था। वहीं से हम अपने केबिन में अपने लिए और अपने मेहमानों के लिए चाय या कॉफ़ी मंगवाते थे। कभी रमा जी या शांतिप्रसाद जी आते तो वह भी लंचरूम में ही खाते थे। बातें करते। कई बार सामान्य विषयों पर किसी से सवाल भी पूछते लेते थे।

इसी तरह जब कंपनी के निदेशक मंडल की बैठक होती तो सब सदस्य लंच के लिए वहीं आते। इस तरह उन्हें सभी उच्चाधिकारियों से मिलने का अनौपचारिक अवसर मिलता था। एक सदस्य पंडित मौलिचंद्र शर्मा से मेरी काफ़ी देर बातें होतीं। वह ‘कैरेवान’ मेँ लिखते भी रहते थे। तभी से उन्हेँ जानता था।
गीतकार अनजान

नई फ़िल्म पत्रिका की बात बंबई के तमाम हिंदी समाज मेँ फैल गई। मेरी कमउम्र भी चर्चा का विषय थी। हिंदी लेखकपत्रकार और कवि मिलने आने लगे। प्रसिद्ध कवि सरस्वती कुमार दीपक की कविताएं मैं  ‘सरिता मेँ बहुत छापता था। वह मिले। इंदीवर और अनजान तब फ़िल्मों में गीत लिख रहे थेपर जमे नहीं थे। नौटियाल रोज़ मिलते थे। मैं सबसे सलाह करताअच्छे अच्छे आइडिया मिलते। विनोद तिवारीआर.सी. जैन और महेंद्र सरल फिल्म स्टूडियोओ के चक्कर लगा रहे थे। वहां की रपटें लिख रहे थे।ये हमारे स्तंभ ‘सितारोँ के इर्दगिर्द’ मेँ छपने वाली थीजिसके लिए मैंने तीन पेज रखे थे। उनके साथ फ़ोटोग्राफ़र जाते थे जो तस्वीरें खींच कर लाते थे। वे सलाह भी देते। फ़िल्मवालों के संपर्क जन (पब्लिसिस्ट) भी शूटिंग की रिपोर्ट लाते थे। वे और फ़्रीलांस फ़ोटोग्राफ़र भी फ़ोटो लाते। जो अच्छा लगतामैं चुन लेता था। कवर पेज के अलावा भी तो रंगीन फ़ोटो छापने होते थे।
कवर पेज पर किसी बड़े स्टार का ही फ़ोटो छपेगा – यह मेरी नीति का भाग नहीँ था। बसफ़ोटो अच्छाआकर्षक और सामयिक होना चाहिए। मुख्य सामग्री की तैयारी कम से कम दो महीने पहले शुरू की जाती। उस साल होली फ़रवरी के अंत मेँ थी। मतलब उसकी तैयारी तत्काल करनी थी। जैनेंद्र के संपर्क काम में आए। उसने कहा हम किसी भी अच्छी एकांत जगह कुछ अभिनेत्रियोँ को बुलाकर उनसे होली खिलवाएं। बताया श्री हृषिकेश मुखर्जी के बंगले में घास का मैदान है। बाहर की बाउंडरी की दीवार ऊंची है। उसने हृषिदा से बात कीटेलिफ़ोन पर मैंने भी रिक्वैस्ट की। वह राज़ी हो गए। इस तरह ‘माधुरी’ के लिए यह हमारा पहला फ़ोटो शूट हुआ। इस का वर्णन अगली क़िस्त मेँ...
 000
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com

(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा।   संपादक-पिक्चर प्लस)

3 टिप्‍पणियां:

  1. पढ़कर अच्छा लगा, पर इतनी प्यारी पत्रिका बन्द क्यों हो गई यह बात आज तक समझ मे नही आई।

    उत्तर देंहटाएं

Post Bottom Ad