बे-घरबार, आवारा, बातूनी, निडर, राम औरंगाबादकर के फिल्म फोटोग्राफर बनने की अजब कहानी - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 31 दिसंबर 2017

बे-घरबार, आवारा, बातूनी, निडर, राम औरंगाबादकर के फिल्म फोटोग्राफर बनने की अजब कहानी

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–ग्यारह
                                                 लेखक अरविंद कुमार                             सभी फो. सौ.अरविंद कुमार

जद्दन बाई
माधुरी का काम तेज़ी से बढ़ रहा था। हम सब को भरोसा हो चला था कि पत्रिका अच्छा रंगरूप ले रही है। समय पर – यानी 30 जनवरी 1964 का अंक सही समय पर यानी 23 जनवरी को गणतंत्र दिवस से पहले - दुकानोँ पर आ जाएगा। पत्रिका के विज्ञापन पोस्टर बन गए थे। एक छोटा सा विज्ञापन फ़िल्मोँ के साथ सिनेमा घरोँ मेँ दिखाया जाने लगा था।

जद्दन बाई के ज़माने की मरीन ड्राइव
और आगे बढ़ने से पहले मैं राम औरंगाबादकर की बात करना चाहता हूं। मेरी ‘माधुरी’ की दास्तान में उसका ज़िक्र बार बार आता रहेगा। वह कौन थाकैसे फ़िल्म पत्रकारिता मेँ फ़ोटोग्राफ़र बना, यह एक अजब कहानी है।
बंबई की मैरीन ड्राइव पर रहती थीं अपने ज़माने की तवायफ़ से मशहूर गायिका-अभिनेत्री-संगीत और फ़िल्म निर्देशक बनी जद्दन बाई। तब का फ़िल्म जगत उनके क़दमों में था। अनेक क़िस्से उनके बारे में चलते थे। पहले पति मर चुके थेमोहन बाबू नाम के दीवाने घर के दरवाज़े पड़े रहतेधीरे धीरे स्वीकृत प्रेमी बन गए। जद्दन के तीनों बच्चे अख़्तर हुसैनअनवर हुसैन और नरगिस शाम को टहलने निकलते। उस ज़माने में चौपाटी पर बैंड स्टैंड था वहां बाजे सुनते। वहीं एक बच्चा मिलता। बे-घरबार, आवारा। बातूनी। निडर। नाम था राम, राम औरंगाबादकर। एक बार राम उनके साथ लग लिया। जद्दन ने उसको घर में रख लिया। वहीं पला बढ़ा। थोड़ा बहुत पढ़ा लिखा भी। मस्तमौला। बड़ा हुआ तो जद्दन बाई ने उसे कैमरा पकड़ा कर अलग कर दिया। पूरी फ़िल्म बिरादरी जद्दन के घर जमा होती थी। राम उन्हेँ जानता था और वे उसे। राम का कामचलाऊ काम चल निकला। 

राज कपूर व नरगिस के बीच में राम औरंगाबादकर
मेरा भी मैरीन ड्राइव के उस घर मेँ जाना हुआ था। नरगिस ने अपनी भतीजी (अख़्तर की बेटी) ज़ाहिदा से मिलने का समय वहीं उसके घर पर रखा था। यह वही ज़ाहिदा है जो संजीव कुमार के साथ ‘महलों का राजा मिला’ गीत वाली ‘अनोखी रात’ में नायिका बनी तो राम औरंगाबादकर अपने तमाम शौक़ों के बावजूद लोकप्रिय था। उसका जवानी का फ़ोटो राज और नरगिस के साथ देखा जा सकता है। और संगम के ज़माने के राज कपूर और वैजयंती माला के साथ देखा जा सकता है। राम को कई बातोँ का ग़ुमान था। वह रिंद था। बेहद शराब पी सकने की क्षमता का दावा करता था। और कांग्रेस हाउस (बंबई के गायिका वेश्या बाज़ार) मेँ देर रात तक भी किसी को जगा कर गाना सुनने की पहुंच। एक बार वह मेरे मना करने के बाद भी किसी कोठे पर ले गया। वहां जो रहती थी उसे जगायासाजिंदे बुलाए गए। गाना सुनवाने लगा। थोड़ी थोड़ी देर में माचिस की तीलियां निकाल कर रख देता। चलते समय तीलियां गिनीं और उतने रुपए भेँट कर दिए। 
 
बीच मेंं राम औरंगाबादकर
पीने के एक क़िस्से के बाद आज का राम प्रकरण समाप्त करूंगा। हमलोग मेरे अभिभावक जैसे अभिनेता चंद्रशेखर के घर थे। चंद्रशेखर भी पियक्कड़ थे। उनके बीच वाले कमरे (ड्राइंग रूम) मेँ चारों तरफ़ छत के नीचे दीवार पर बढ़वां पट्टी सी थी। उस पर अपनी पी हुई बोतलें रखते जाते थे। बसथोड़ी सी जगह ख़ाली थी। किसी फ़िल्म पर बात चल रही थी। चंद्रशेखर ने व्हिस्कीवोडका आदि की बोतलें खोल रखी थीं। हुआ यह कि मैंने अपने व्हिस्की के गिलास मेँ पानी समझ कर वोडका उंड़ेल दी। और तभी अपनी ग़लती का एहसास हुआ। राम बोलाकोई बात नहीं। एक सांस मेँ सारा गिलास गटक गया। पी तो गयापर समझ गया कि मामला गड़बड़ है। उठाघर से बाहर निकला। गया तो लौट कर नहीँ आया। वह भी अंधेरी में कहीं रहता था। टैक्सी वाले उसे पहचानते थे। कोई घर पहुंचा आया होगा।

'अनोखी रात' में ज़ाहिदा 
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सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com

(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

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