मीना कुमारी की फोटो खिंचवा कर निकला कि नीचे ही मिल गए धर्मेंद्र... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 10 दिसंबर 2017

मीना कुमारी की फोटो खिंचवा कर निकला कि नीचे ही मिल गए धर्मेंद्र...

'माधुरी' के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–आठ
                                                      अरविंद कुमार                                    फो. सौ. अरविंद कुमार

संजीव श्रीवास्तव : माधुरी का प्रवेशांक निकालने के लिए पत्रिका की कैसी रूप रेखा व योजनाएं बन रही थीं? मन में किस तरह का खाका तैयार हो रहा था कि माधुरी जोकि फिल्म पत्रिका होगी, लेकिन वह किस प्रकार की होगी? तैयारियों के दौरान के कुछ रोचक-प्रेरक किस्से बतायें।  

अरविंद कुमार : सब सहकर्मी मिल चुके थे। सबने मिलकर ‘माधुरी’ मेँ होने वाले स्तंभ तय किए। यह भी तय किया कि ‘फ़िल्मफ़ेअर’ जैसा तो होगालेकिन उस से बहुत अलग। साहित्यकारोँ से लेख लिखवाए जाएंगे। कोशिश करेंगे कि मुखपृष्ठ वाले कलाकार पर उसकी किसी फ़िल्म के लेखक से लिखवाएंगे। अपने आप कम से कम लिखेंगे। जहां तक मेरा सवाल है ‘माधुरी’ में अपने लगभग चौदस सालों के संपूर्ण काल में मैंने सुनील दत्त और शत्रुघ्न सिन्हा पर कवर स्टोरियां लिखीं। मुकेश के अवसान पर एक संस्मरण लिखा। हांअनेक उपनामोँ से कई स्तंभ लिखेऔर अपने नाम से ‘हिंदी फ़िल्म इतिहास के शिलालेख’ सीरीज़ मेँ क्लासिक फ़िल्मोँ की समीक्षाएं लिखीं। धीरे धीरे माधुरी’ का सरकुलेशन डेढ़ लाख से ऊपर पहुंच गया।
तय किया गॉसिप नहीं छापी जाएगी। परदे पर लोकप्रिय कलाकार ही नहीं फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में काम करने वालों की जानकारी भी दी जाएगी। पत्रिका को पूरी तरह पारिवारिक रूप दिया जाएगा।

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सबसे पहला काम था पहले कवर पेज के लिए फ़ोटो खिंचवाना। राम औरंगाबादकर काम आए। मेरे कमरे में बैठे बैठे उन्होंने टेलिफ़ोन पर ‘मी राम औरंगाबादकर बोलतोय’ लहज़े में कई कॉलें कीं। तय हुआ कि गोरेगांव के फ़िल्मिस्तान स्टूडियो में निर्माणाधीन फ़िल्म ‘पूर्णिमा’ के सैट पर शाम के आठ बजे मीना जी के फ़ोटो लिये जाएंगे। टाइम्स आफ़ इंडिया के फ़ोटोग्राफ़र श्री महाजन के साथ मैं भी गया था। अपनी पत्रिका के पहले मुखपृष्ठ के लिए फ़ोटो खिंचवाने जैसा भाव मेरे मन में भी था।
स्टूडियो के गेट पर ही मीना जी के जनसंपर्क व्यक्ति मोबीन अनसारी मिले। वह हमेँ भीतर ले गये। पहली बार कोई फ़िल्म स्टूडियो देखा। बड़े बड़े शैड। एक शैड के भीतर जाने के लिए बड़े से फाटक मेँ छोटा सा दरवाज़ा। बिल्कुल नया अनुभव। मैं आतंकित नहीं था। पूरे आत्मविश्वास के साथ चल रहा था। उत्सुकता भी थी मीना जी को देखने की। मोबीन ने हमारा परिचय करवाया। रस्मी शुरुआती बातें हुईं। महाजन से वह सुपरिचित थीं। मैंने अपना नाम बताया। उन्होंने पूछा, ‘कैसा फ़ोटो चाहिए?’ मैंने कहा, ‘हमें एक आशावादी लुक चाहिए - भविष्य की ओर ऊपर देखते हुए जो हमारी पत्रिका के आशावादी चरित्र का परिचायक हो सके। महाजन से पूछा, ‘फोटो में मैं कहां तक दिखूंगी?’ महाजन ने कहा, ‘बस्ट तक।’ मीना जी आराम से बैठीँपोज़ बनाया। महाजन ने एक के बाद एक कई शॉट लिये।

फिल्म 'पूर्णिमा' में मीना कुमारी और धर्मेंद्र

विदा लेकर हम लोग बाहर आए। मोबिन से यह मेरी पहली मुलाक़ात थी। मोबिन बोले, ‘चलिए एक नए एक्टर से भी मिल लीजिए।’ एक और शैड के बाहर कोने में लाइट के नीचे मुझसे भी कमउम्र नौजवान खड़ा थाशर्मीला सा। मोबिन ने मिलवाया, ‘यह धर्मेंद्र हैं।’ मैंने उनका नाम सुना भर था। वह बिमल राय की ‘बंदिनी’ में हिट हो चुके हैं यह मैं नहीँ जानता था। हम दोनों बातचीत करने लगे। पता नहीं कैसे उनके बारे में और उनका फ़ोटो छपने की बात चल निकली। मैं ठहरा अज्ञानी। यह पता नहीं था कि वह ‘पूर्णिमा’ मेँ हीरो है। मैंने उससे कहा, ‘आप अभी नए हैं, देखेंगे।’ वह भलामानस मुस्करा ही सका। बाद में वह और मैं अच्छे मित्र बने। एक रविवार मेरे सांताक्रुज़ वाले पहली मंज़िल मकान में आ धमका। तब तक कुसुम बंबई नहीँ आई थीं। एक चटाई पर मैला बनियान पहने मैं लेटा था। वह सांताक्रुज़ में बच्चों की किताबें लेने आया था। साथ था शैलेंद्र जी और उसके लिए संपर्क कराने वाला दीनानाथ उर्फ़ बलबीर। उसने बताया कि मैं पास ही रहता हूंतो मेरे ही जैसा खुले दिल वाला धर्मेंद्र मुझसे मिलने को उतावला हो गया था।
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सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

1 टिप्पणी:

  1. मेरे बड़े दादा जी माधुरी पत्रिका से इतने प्रभावित थे, कि उन्होंने अपनी एक बेटी का नाम 'माधुरी' रखा ।
    बढ़िया संस्मरण

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