सिने सुर और शायर के गीत... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 10 दिसंबर 2017

सिने सुर और शायर के गीत...

अफ़साना हिन्दी सिनेमा संगीत के सुरीले सफ़र का    

                                         *डॉ. संगीता राय  
(हिन्दी विभाग,मिरांडा हाउस)

हिन्दी सिनेमा के सौ साल से अधिक के सुहाने सफ़र में सिनेमा ने हमें बहुत कुछ दिया। सिनेमा विधा कहानी प्रस्तुत करने का एक ज़रिया है, इसलिए फ़िल्म एक जु़बान है, भाषा है। कहानी कई तरीकों से प्रस्तुत की जा सकती है-बोले हुए शब्दों में, लिखे हुए शब्दों में, नृत्य में, कविता में, गीत में, हाव-भाव में और तस्वीरों में। सिनेमा में ये सब समा जाते हैं। सिनेमा सिर्फ कला नहीं, कलाओं में महान कला है। सिनेमा एक कविता है, एक नाटक है। सिनेमा मनोरंजन ही नहीं करता, विचार भी देता है, नई कल्पना देता है और उसके मधुर गीतों की कड़ियां, गुदगुदाते  हुए सौन्दर्य की नहीं, नये जगत को देखने की दृष्टि देती है।  
हिन्दी की पहली बोलती फ़िल्म थी आलमआरा, जिसमें लगभग एक दर्जन गीतों का प्रयोग हुआ। धीरे-धीरे फ़िल्मों से  गीतों का रिश्ता गहराता चला गया। गायक अभिनेता कुन्दनलाल सहगल के गीतों में फ़िल्मी गीतों को प्रतिष्ठा दिलाई।शाहजहांके गीतों में पूरे देश में धूम मचा दी। यक़ीनन कुन्दनलाल सहगल हिन्दी सिनेमा में एक युग के रूप में जाने जाते हैं। जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगेऔरग़म दिए मुस्तक़िल कितना नाजु़क है दिल ये न जाना, हाय हाय रे ज़ालिम ज़मानामजरूह सुल्तानपुरी की क़लम से निकले इन गीतों ने धूम मचा दी।

मजरूह सुल्तानपुरी : कितना नाजुक है दिल...
सिनेमा के गीतों ने हमारे मन के भावों को अभिव्यक्ति दी। अब तक अनगिनत फ़िल्में बनीं हैं। भावों को तो गीतकारों और शायरों ने शब्दों में बांध लिया पर गीत सीमाओं को लांघ गये। सरहद पार हिन्दी फिल्मी गीतों को खू़ब पसन्द किया गया। हिन्दी सिनेमा के फ़िल्मी गीत हिन्दुस्तानी ज़बान की धरोहर हैं। हिन्दी उर्दू और कुछ हद तक फ़ारसी भाषा को लोगों की ज़बान पर चढ़ाने का काम हिन्दी फिल्मी गीतों ने किया। तीन से चार मिनट के गीतों में शायर दुनिया जहान की बातें समेट के रख देता है, सारे जज़्बात उड़ेल देता है। पहले फ़िल्मों में उर्दू का प्रयोग बहुत ज्यादा होता था। फ़िल्म  के नाम से लेकर सभी कलाकारों के नाम हिन्दी के साथ-साथ उर्दू में भी लिखे जाते थे। उर्दू ज़बान से लोग भली भांति परिचित थे।
कहानी में आए सिचुएशन और बनी बनाई धुन पर गीत लिखना किसी चुनौती से कम नहीं। तब अर्थपूर्ण गीतों के बोल साफ-साफ सुनाई देते थे। गीत में बसे शब्द हमारे जे़हन में बस जाते थे।
सौभाग्य से सिनेमा के शुरुआती दौर की अगर बात करें तो साहित्य से बड़ा गहरा रिश्ता रहा। उर्दू हिन्दी के कई कहानीकारों, उपन्यासकारों और नाटककारों ने सिनेमा का रूख़ किया। उस दौर के जो गीतकार थे वो मूलतः कवि थे, शायर थे। मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, कैफ़ी आज़मी, जां निसार अख़्तर, फै़ज अहमद फैज़ मखदूम, मजाज़-शहरयार ये सभी प्रगतिशील शायर थे। इन्होंने फिल्मों के लिए लिखते समय अपनी लेखनी या भाषा से समझौता नहीं किया। कई कवि या शायर फिल्मों में मजबूरी में भी गए, पर उस व्यावसायिकता भरे माहौल में रहते हुए भी उन्होंने समझौता नहीं किया। मजरूह सुल्तानपुरी को दादा साहेब फाल्के के साथ-साथ उर्दू साहित्य के लिए इक़बाल पुरस्कार भी मिला। कैफ़ी आज़मी को अपने उर्दू कविता संकलन आवारा सज़्देके लिए साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया। इसी संकलन का पशेमानी नज़्म‘ ‘हकीक़तफिल्म का गीत बन गई-‘‘मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था...’’फिल्म के अन्दर ये गीत एक तड़प पैदा करती है। शायर की क़लम से निकला एक-एक लफ़्ज टीस पैदा करता है।
साहिर लुधियानवी : हर इक पल का शायर
साहिर लुधियानी ख़ुद कहा करते थे कि-‘‘मैं मजबूरी से इस लाइन में आया हूं।’’ बावजूद इसके उन्होंने फ़िल्मी गीतों को लिखते समय अपनी सृजनात्मकता का ही परिचय दिया। पांव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी (ताजमहल) तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा (धूल का फूल) संसार से भागे फिरते हो, भगवान् को तुम क्या पाओगे (चित्रलेखा) अल्ला तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम (हम दोनों) औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया (साधना) ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है (प्यासा) मैं पल दो पल का शायर हूँ (कभी-कभी)।
साहिर एक तरफ़ हिन्दी के गीत रचते हैं तोरा मन दर्पण कहलायेतो उसी फ़िल्म में छू लेने दो नाज़ुक होठोको ग़ज़ल लिखते हैं। साहिर की बात अधूरी रह जायेगी अगर फ़िल्म बरसात की रातकी क़व्वाली का ज़िक्र ना हो। जब हम धर्म के नाम पर लड़ते हैं, भाषा के नाम पर लड़ते हैं, ईश्वर के होने न होने पर लड़ते हैं, तब साहिर जैसे लोग लड़ते नहीं, उनकी क़लम चलती है और कड़वी ज़बान पर रस घोल जाती है। पूरी क़व्वाली तो काफ़ी लम्बी है, कुछ हिस्से ज़रूर सुनाउंगी -
मज़हब-ए-इश्क़ की हर रस्म कड़ी होती है
हर क़दम पर कोई दीवार खड़ी होती है।
इश्क़ आज़ाद है, हिन्दू न मुसलमान है इश्क़
आप ही धर्म है और आप ही ईमान है इश्क़
जिससे आगाह नहीं शेख - ओ बरहमन दोनों
उस हक़ीक़त का गरजता हुआ ऐलान है इश्क़
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तेरा इश्क़ है मेरि आरजू
तेरा इश्क़ है मेरि आबरू
तेरा इश्क़ मैं कैसे छोड़ दूं
मेरे उम्र भर की तलाश है।
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जब जब कृष्ण की बंसी बाजी निकली राधा सज के
जान अजान का मान भुला के, लोक लाज को तज के
जनक दुलारी बन-बन डोली, पहन के प्रेम की माला
दर्शन जल की प्यासी मीरा पी गई विष का प्याला
और फिर अरज करी के लाज राखो राखो राखो...
अल्लाह रसूल का फरमान इश्क़ है
यानी हफ़ीज़ इश्क़ है, क़ुरान इश्क़ है
गौतम का और मसीह का अरमान इश्क़ है
ये कायनात जिस्म है और जान इश्क़ है
इश्क़ सरमद, इश्क़ ही मंसूर है
इश्क़ मूसा, इश्क़ कोहेतूर है
ख़ाक को बुत और बुत को देवता करता है इश्क़
इन्तहा ये है के बंदे को ख़ुदा करता है इश्क।
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दुनियावी इश्क़ से लेकर ख़ुदाई इश्क़ तक जिसे हम इश्के़ हक़ीक़ी और इश्क़े मजाज़ी कहते हैंइतने ख़ूबसूरत तरीके़ से साहिर ही बयान कर सकते थे। पूरी क़व्वाली में साहिर हिन्दुस्तानी ज़बान का ही प्रयोग नहीं करते बल्कि हिन्दुस्तान की ज़मीन से जुड़ी कहानियों को भी पिरोते हैं।
ऐ दिल-ए-नादां-2
आरजू क्या है, जुस्त जू क्या है?’
रज़िया सुल्तान के इस गीत को लिखा जां निसार अख़्तर ने।
80 के दशक में ये फ़िल्म आई। ये वो दौर था जब सिनेमा और गीत दोनों का ही स्तर नीचे आ गया था। पर इसी दौर में जहां कुछ फिल्मकार अच्छी फ़िल्में बना रहे थे, वहीं कुछ शायर और गीतकार फिल्म में गीत के स्तर को बनाये हुए थे। ये दिन और उनकी निगाहों के सायेऔर आप यूं फासलों से गुजरते रहे का ज़िक्र किया जा सकता है। क़ाग़ज के फूल’, ‘हक़ीक़त’, ‘हंसते ज़ख्म’, ‘हीर-रांझा’, ‘अर्थ जैसी फ़िल्मों के गीतों से कैफ़ी आज़मी की क़लम का जादू देखा जा सकता है।
ज़रा-सी आहट होती है तो दिल सोचता है, कहीं ये वो तो नहीं
या क़ाग़ज के फूल का गीत-
वक़्त ने किया क्या हसीं सितम तुम रहे न तुम, हम रहें न’/
देखी ज़माने की यारी बिछड़े सभी बारी-बारी
क़ैफ़ी तरक्क़ी पसन्द शायर थे। उनकी शायरी में उनकी विचारधारा भी नज़र आती है, पर शब्दों के जाल में उलझती नहीं, बोझिल नहीं होती-मार्क्स की थ्योरी को सरल तरीके से गीतों में पिरो देना आसान काम नहीं। विचारधारा का खुरदुरापन, गीतों में समाते ही सहज, सरल हो जाता है। शब्दों से खेलना क़ैफ़ी आज़मी से बेहतर भला कौन जानता है!
अब बात एक ऐसे शायर की जिसे यक़ीन है कि मोहब्बत, रंजिश की हर दीवार को ढहा सकती है। तभी भी तो वो कहते हैं-गुफ्तगू बन्द न हो आप लाहौर को लाइये हम बनारस को लाते हैं
पद्मश्री से नवाज़े गए अली सरदार जाफरी की क़लम कबीर और मीरा पर हिन्दी और उर्दू में बराबर चली। फिल्मी गीतों से आम आदमी के दिल में जा बसते हैं-
दिन परेशान है रात वीरान है
देख जा किस तरह आज तन्हा हैं हम
शाम-ए-ग़म की क़सम आज ग़मगीं है
हम आ भी जा आ भी आज मेरे सनम
फुटपाथ फिल्म का ये गीत अली सरदार जाफरी को हमारे और करीब लाता है।
ये बता चारागर तेरी ज़म्बील में
नुस्ख़ कीमिया मोहब्बत भी है...
कुछ इलाज ओ मदावाये उलफ़त भी है
इक चमेली के मंडवे तले
दो बदन प्यार की आग में जल गए... 
शायर-ए-इन्क़लाब मख़दूम मोहिउद्दीन तरक्कीपसन्द शायर थे। उनकी शायरी पर मार्क्सवाद का प्रभाव है तो दूसरी तरफ़ वो एक बेहद रोमांटिक शायर भी हैं। फिर छिड़ी रात बात फूलों की रात है या बरात फूलों की
बहुत सारे नाम हैं, किसे लिया जाये और किसे छोड़ा जाये, मुश्किल है। बेतकल्लुफ़ ज़बान में अपनी बात कह देनें का हुनर अगर किसी में नज़र आता है तो वो हैं निदा फ़ाज़जी। धर्मयुग में लगातार लिखते रहे फिर रुख़ किया मुंबई की ओर। निदा फ़ाज़ली उन शायरों में हैं जिन्होंने शायरी को कुछ और आसान ज़बान दी। इसके साथ ही शमशुल हुदा बिहारी जो उर्दू में लिखते थे, पर हिन्दी और बंगाली दोनों पर जबर्दस्त अधिकार। 
‘‘चेहरे से ज़रा आंचल
जो आपने सरकाया
दुनिया ये पुकार उठी
लो चांद निकल आया।
पं. नरेंद्र शर्मा : शुद्ध हिन्दी की धारा के गीतकार

इन शायरों के अलावा कई ऐसे गीतकार हैं, जिन्होंने अपने बेहतरीन गीतों से उसे हर दिल अज़ीज़ बनाया। राजेन्द्र कृष्ण, शकील बदायूंनी, क़मर जलालाबादी, ख़ुमार बाराबंकवी, हसरत जयपुरी, राजा, मेंहदी अली खाँ, प्रेम धवन-इन गीतकारों ने हिन्दी फ़िल्मी गीतों में अरबी, फारसी, उर्दू और हिन्दी के तालमेल को बिठाया। कई गीतकारों ने संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली हिन्दी का उपयोग करते हुए श्रेष्ठ गीतों की रचना की। जैसे-पंडित नरेन्द्र शर्मा का ज्योतिकलश छलकेभरत व्यास का-आधा है चन्द्रमा रात आधी, रह न जाये तेरी मेरी बात आधी, मुलाक़ात आधी। इसके साथ ही-आ लौट के आ जा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं’; ‘दिल का खिलौना हाय टूट गया’, कह दो कोई ना करे यहां प्यार। और तेरे सुर और मेरे गीत पर जब उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई गूंजी तो ये गीत हर किसी की ज़ुबान पर चढ़ गया- मेरी मोहब्बत में तासीर है, तो खिंचकर मेरे पास आओगे तुम -ऐसा भरत व्यास की क़लम से ही निकल सकता था।
कवि प्रदीप ने आम बोल चाल की भाषा में जो गीत लिखे वो दार्शनिक भाव के साथ-साथ इंसान के व्यवहार को बयान करते हैं।
देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान
कितना बदल गया इंसान
या फिर
उमरिया कटती जाये रे...’
आगे चलकर संस्कृत में शूद्रक रचित मृच्छकटिक नाटक पर आधारित उत्सव फिल्म के लिए भी विशुद्ध खड़ी बोली में गीत लिखे गये। मन क्यूं बहका रे बहका आधी रात को, या सांझ ढले गगन तले…’ - जैसे गीतों को लिखा मुंबई के पार्ले कॉलेज के हिन्दी के अध्यापक और श्रेष्ठ अनुवादक वसंत देव ने। इन गीतों के लिए उन्हें फिल्म फेयर अर्वार्ड भी मिला।
शैलेन्द्र : प्रेम व श्रम के गीतकार
शैलेन्द्र के गीत हमारे बचपन की गुनगुनाहटों में शामिल होकर आज तक हमसफ़र हैं। शैलेन्द्र की कविता ज़िन्दगी की पुरपेंच गलियों में राह दिखाती चलती है। इतने सरल और लुभावने कि आवारा मिजाज़ी से ज़ुबां पर चढ़ जाए, क़दम-ब-क़दम ज़िन्दगी के फ़ससफ़े में तब्दील होते हुए। सीधी-सी बात न मिर्च मसालाउनके गीतों की ख़ासियत है। उनके गीतों में लोक की गंद्य मिलती है। जैसे-जुल्मी संग आंख लड़ी दइया रे दइया चढ़ गयो पापी बिछुआ, सजनवा बैरी हो गये हमार। फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी तीसरी क़समका उन्होंने निर्माण किया। शैलेन्द्र दुनिया भर के शब्दों के चक्कर में नहीं पड़ते। लोकसे जुड़े हुए शब्दों की पूंजी से ही काम चलाते हैं। बिलकुल सहज-‘‘चूल्हा है ठंडा पड़ा और पेट में आग है गर्मागर्म रोटियां-कितना हसीन ख़्वाब है। आलू टमाटर का साग इमली की चटनी बने रोटी करारी सिंके। देव आनन्द को मजरूह और साहिर ज़्यादा पसन्द थे। पर कालाबाज़ार और गाइड के लिए सचिन देव बर्मन ने शैलेन्द्र से गीत लिखवाने की शर्त रखी। एस.डी. बर्मन और विजय आनन्द जानते थे कि उनकी गाथा के महानायक के व्यक्तित्व के फ़लसफ़े को बिल्कुल आसान शब्दों में सिर्फ़ शैलेन्द्र ही गीतों में ढ़ाल सकते हैं।
‘‘वहां कौन है तेरा, मुसाफ़िर जायेगा कहां
दम ले ले घड़ी भर ये छइयां पायेगा कहां।
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कांटों से खींच के ये आंचल,
तोड़ के बंधन बांधी पायल
कोई न रोको दिन की उड़ान को,
दिल ये चला अहा हा हा हा...
आज फिर जीने की...तमन्ना है
आज फिर मरने का इरादा है 
ग़ालिब याद आते हैं- उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफ़िर पे दम निकले। भाषा से, शब्दों के चयन से इन कवियों का क्या सरोकार था- ये इस उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है। श्री 420 का वो गीत अगर याद हो आपको-
प्यार हुआ इक़रार हुआ है
प्यार से फिर क्यूं डरता है दिल
इसका अन्तरा है-
रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियां (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, अग्नि, आकाश, पाताल) - शंकर जयकिशन जी इस फ़िल्म के संगीतकार थे। उन्होंने कहा कि- दिशाएं तो चार ही होती हैं। आम आदमी तो चार दिशा ही जानता है। तब शैलेन्द्र ने बड़ी अच्छी बात कही थी कि-‘‘हम जनता की रूचि का परिष्कार भी तो कर सकते हैं।’’
और निश्चय ही जब ये फिल्म रिलीज हुई, तो जो गीत सबसे ज़्यादा पसन्द किया गया, वो यही था। एक और बात कि हर ज़ोर जुल्म के टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है’- ये नारा शैलेन्द्र का दिया हुआ है।
नीरज : कारवां गुजर गया...

कवि गोपालदास नीरज ने भी कई फ़िल्मों के लिए गीत लिखे। 
खिलते हैं गुल यहां’, ‘शोख़ियों में घोला जाये - ये सारे गीत हमारी ज़बान पर आज भी चढ़े हुए है।स्वप्न झरे फूल से (नई उम्र की नई फ़सल) और वो हम न थे, वो तुम न थे (चा चा चा) गीत जाने जायेंगे नीरज के हिन्दी शब्दों के चयन और भाव के लिए।

इन्दीवर ने फ़िल्मी गीतों को नए आयाम दिए। फ़िल्म मल्हार के बड़े अरमान से रक्खा है बलम तेरी क़सम प्यार की दुनिया में ये पहला क़दम
इस गीत से फ़िल्मी दुनिया में इन्दीवर भी पहला क़दम रखा। इन्दीवर ने साहित्यिकता से पूर्ण कई गीत लिखें। ओर रे ताल मिले नदी के जल में (अनोखी रात), ‘चंदन सा बदन चंचल चितवन (सरस्वती चन्द्र) कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे (पूरब और पश्चिम) दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा (अमानुष)मधुबन ख़ूशबू देता है (साजन बिना सुहागन) जीवन से भरी तेरी आँखे (सफ़र) होठों से छू लो तुम (प्रेमगीत) जैसे उनके गीत किसी कविता से कम नहीं।
चांद मिलता नहीं सबको संसार में है दिया ही बहुत रोशनी के लिए

इंदीवर : 'मल्हार' से 'सेक्सी सेक्सी...' तक

ऐसी दार्शनिक पंक्तियां लिखने वाले इन्दीवर जब एक आँख मारू तो रस्ता रूक जाय या सेक्सी सेक्सी मुझे लोग बोलें जैसे गीत लिखते हैं तो मैं इसे एक युग का अंत, व्यावसायिकता का दबाव और एक कवि के काव्य यात्रा के अन्त के रूप में लेती हूँ। फिल्मी गीतों में अवसर के अनुरूप क्लैसिक शायरों को भी लिया गया। अमीर खु़सरो, क़ुली कुतुब शाह, वली दकनी, मीर तक़ी मीर, इंशा, बहादुरशाह ज़फ़र, मिर्ज़ा गा़लिब की ग़ज़लों को फ़िल्मों में लिया गया और लोगों से उसे पसन्द भी किया। अमीर खु़सरो की तो न जाने कितनी ग़ज़ले और कव्वालियां फिल्मों में ली गई। आज रंग है री मां रंग है री और ज़िहाले मिस्की का मुखड़ा लेकर गु़लाम फिल्म में गीत लिखा गया। मिर्ज़ा गालिब पर तो बारह अलग-अलग दौर में फ़िल्में भी बनी और उसमें प्रयोग ग़ज़लें, जब गायी गईं तो मिर्ज़ा ग़ालिब हर किसी की ज़बान पर चढ़ गए। इसी तरह ऐसी फ़िल्में जिनमें 1857 के दौर का वर्णन है, तो कई जगह बहादुर शाह ज़फर की ग़ज़लों को भी लिया गया है। ‘‘लगता नहीं है दिल मेरा (मिरा) उजड़े दयार में’’। खुदा-ए-सुख़न यानी मीर तक़ी मीर के ज़माने में तो फिल्में नहीं थीं, लेकिन फ़िल्मों ने मीर के ज़माने को पसन्द किया। श्याम बेनेगल की फिल्म मंडी में मीर तक़ी मीर की ग़ज़ल है- ‘‘ज़बाने बदलते हैं, हर आन खुबाँ ये सब कुछ है बिगड़े ज़माने की बातें बिगड़े ज़माने की बातें...फिल्म बाज़ारमें मीर की दो ग़ज़लें ली गई हैं? दिखाई दिए यूँ कि बेखुद किया हमें आप से भी जुदा कर चले और ‘‘पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा, हाल हमारा जाने है।’’
निदा फाजली : हिन्दी-उर्दू की नई परंपरा 

कुली कुतुब शाह का पिया बाज़ प्याला, पिया जाने नाया इंशा का मुझे चुभती है।इन ग़ज़लों के साथ ही ये शायर जो चन्द पढ़े-लिखे लोगों के बीच जाने जाते थे, फ़िल्मों के माध्यम से आम लोगों तक पहुँच गये। इसी तरह फ़िल्म दुल्हन इक रात कीमें अल्लामा इक़बाल की एक नज़्म की गई-‘‘कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में कितनी खूबसूरती से शायर कहता है- ‘‘तिरा दिल तो है सनम आशना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में। ऐसी बात अल्लामा ही कह सकते थे। सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ता हमाराको अलग अलग फिल्मों में लिया गया है। उस दौर के संगीतकारों ने इनकी ग़ज़लों को यह कहकर ख़ारिज नहीं किया कि- ये लोगों की समझ में नहीं आयेंगी। बल्कि सिनेमा के माध्यम से आम लोगों में उर्दू ज़बान की समझ पैदा की। ख़ालिस उर्दू न जानने वाला भी इन ग़ज़लों को गाता है, गुनगुनाता है। नुक़्तों को थोड़ा हिला ज़रूर देता है, पर उससे सम्भवतः भाषा के स्वाद को और चख लेता है- अपनी तरह। ये तो क्लैसिक शायर थे, इनके ज़माने में सिनेमा था नहीं। पर बाद के शायरों को फ़िल्मी दुनिया रास नहीं आई तो वो साहित्य की दुनिया में लौट आये। मजाज़ की नज़्म आवाराको फ़िल्म ठोकर में लिया गया- ऐ गम-ए-दिल क्या करूं। ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं। बहुत सारे ऐसे संगीतकारों का भी ज़िक्र कर सकते हैं जिन्होंने हमेशा बेहतरीन शायरी को लिया। ख़य्याम उनमें से एक हैं। उमराव जान की सभी ग़ज़लें शहरयार ने लिखी थी। जिन्हें उर्दू साहित्य के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार भी दिया गया। बाज़ार फ़िल्म के लिए किसी एक शायर को न लेकर कई शायरों को लिया गया। मीर तक़ी मीर, मिर्ज़ा शौक़, बशर नवाज़, प्रगतिशील शायर मख़दूम मोहिउद्दीन जैसे नामी शायरों को चुना गया। बाज़ार के सभी गीत मशहूर हुए, पर ऐसा कम ही हुआ है।
सिनेमा की जादुई दुनिया में सभी को अपनी तरफ आकर्षित किया। मुंशी प्रेमचंद जैसे उपन्यासकार स्वयं चाहते थे कि उनकी कहानियों, उपन्यासों पर फ़िल्म बने ताकि वो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँच सके। ये बात अलग है कि ये दुनिया उन्हें रास नहीं आई। वक़्त वक़्त पर सिनेमा भी साहित्य को देखकर ललचाया। हिन्दी साहित्य से कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार सिनेमा तरफ गये और लौट कर साहित्य की तरफ भी आये। पर कविता के साथ ऐसा नहीं हुआ। मुझे तो नहीं याद कि सिनेमा के किसी गीतकार को हमने अपने साहित्य या सिलेबस में स्थान दिया हो। यही स्थिति हमारे यहाँ के कवियों की भी है। उन्होंने सिनेमा की तरफ रूख़ नहीं किया। ले-देकर मुझे एक सुमित्रानन्दन पन्त याद आते हैं, जिन्होंने फिल्म कल्पना के लिए गीत लिखे। ये उनकी पहली और आखि़री फ़िल्म थी। एक हरिवंश राय बच्चन याद आते हैं जिन्होंने अलग से कोई गीत नहीं लिखे बल्कि लोकगीतों को ही लिया और उसे कुछ फ़िल्मी रंग देकर लिखा।
उर्दू के संदर्भ में एक बात बहुत अच्छी है कि उर्दू अदब से सिनेमा और सिनेमा से उर्दू अदब में शायरों को आवाजाही लगी रही। सिनेमा के शायर और गीतकार कह कर उन्हें दरकिनार नहीं किया गया। सिनेमाई शायरों को खूब पढ़ा और पढ़ाया जाता है, सिलेबस का हिस्सा भी बनाया गया। जब कि हिन्दी में स्थिति इसके उलट है। हिन्दी में हमने उन्हें सिनेमा का कवि कहकर साहित्य में स्वीकार नहीं किया। विषय बहुत बड़ा है और समय कब। बहुत सारे गीताकरों का ज़िक्र नहीं हो सका। बहुत सारे शायरों का ज़िक्र नहीं हो सका। 
जावेद अख़्तर व गुलजार : आज के दो बड़े शायर

आखि़र में सिर्फ इतना ही कि ये शायर ये गीतकार भावों के ही नहीं भाषा के भी जादूगर थे। वर्तमान दौर में गुलज़ार और जावेद अख़्तर उस परम्परा को संजोए हुए हैं- अपनी कुछ बेहतरीन ग़ज़लों के साथ। हिन्दी सिनेमा में गुम होते इन खूबसूरत गीतों और ग़ज़लों के लिए सिर्फ इतना ही कि-‘‘तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं। तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन ज़िन्दगी तो नहीं।
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*लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका हैं।
संपर्क – Email : mhsangeeta@gmail.com / मो.9990218282

(नोट-इस आलेख को अन्यत्र प्रकाशित करने के लिए लेखिका से पूर्व अनुमति आवश्यक है।)

1 टिप्पणी:

  1. सिनेमा देखना कोई बड़ी बात नहीं है। आजकल ज्यादातर लोग वीकेंड पर देखते ही हैं। कुछ लोगों की तो ऐसी आदत है कि नई फिल्म का फर्स्ट डे - फर्स्ट शो न देखें तो चैन नहीं होता। पर सिनेमा देखना और सिनेमा समझना सबके बस की बात नहीं। जैसा कि आपने कहा – “सिनेमा सिर्फ कला नहीं, कलाओं में महान कला है। सिनेमा एक कविता है, एक नाटक है। सिनेमा मनोरंजन ही नहीं करता, विचार भी देता है, नई कल्पना देता है और उसके मधुर गीतों की कड़ियां, गुदगुदाते हुए सौन्दर्य की नहीं, नये जगत को देखने की दृष्टि देती है।“ – दरअसल सिनेमा का अर्थ ही यही है।
    सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन से जोड़कर उसे निम्नस्तर पर लाकर खड़ा कर दिया गया है। सिनेमा के प्रति समझ विकिसत करने का काम भी हमारे यहाँ नहीं हुआ। फिल्मी पत्रिकाएं फूहड़ तस्वीरों और अफेयर्स के किस्सों से भरी होती हैं। इस लिहाज से मैं पिक्चर प्लस के सम्पादक संजीव श्रीवास्तव जी का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा जिन्होंने हम जैसे साधारण लोगों में भी सिनेमा को समझने दृष्टि पैदा करने की कोशिश की है।
    आपका आलेख – सिने सुर और शायर के गीत ....। बहुत ही सूचनापरक व समझपूर्ण है। बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ

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