हिंदी में सिनेमा पर अच्छी किताबें क्यों नहीं लिखी जाती? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

बुधवार, 10 जनवरी 2018

हिंदी में सिनेमा पर अच्छी किताबें क्यों नहीं लिखी जाती?


हिंदी में सिनेमा पर गंभीर पुस्तक की कमी क्यों है?
हिंदी में सिनेमा पर मौलिक पुस्तक के अभाव की समस्या क्या है? हिंदी के प्रकाशक सिनेमा पर किस तरह की पुस्तक को आसानी से प्रकाशित करना चाहते हैं? या सरकार को सिने-संस्कृति के इतिहास के संरक्षण को लेकर कैसी पहल करनी चाहिये...?
बता रहे हैं वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज


अजय ब्रह्मात्मज
मैं फिल्म पत्रकार होने के साथ-साथ फिल्मों का अध्येता भी रहा हूं। हमलोग हमेशा कोई ना कोई फिल्म देखते रहते हैं लेकिन उन फिल्मों के परिप्रेक्ष्य को गहराई से समझने के लिए, उसके सन्दर्भ को विस्तार से जानने के लिए यह भी चाहते हैं कि कुछ अच्छी किताबें मिले। किसी किताब से हमें सिनेमा की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि को जानने का अवसर मिलता है। जब मैंने फिल्मों पर लिखना शुरू किया, इस विषय पर थोड़ा गंभीरता से सोचना शुरू किया तो सिनेमा के इतिहास को जानने के लिए मुझे उस वक्त बहुत ही दिक्कत होती थी। यह इंटरनेट के विस्तार से पहले का समय था। एनएफफडीसी की पत्रिका सिनेमा इंडिया पत्रिका से कुछ मदद मिलती थी और बाकी विशेषज्ञों से जानकारी प्राप्त करता था। उसी दौरान हिंदी में सिनेमा पर मुझे एकमात्र सबसे अच्छी किताब हाथ लगी-उसका नाम है हिंदी सिनेमा का इतिहास जिसके लेखक हैं मनमोहन चड्ढ़ा। उस वक्त तक मुझे उससे बेहतर हिन्दी में कोई दूसरी किताब नहीं मिली। छुटपुट तौर पर कई लेख आदि मिल जाया करते थे। उनमें एक ब्रजेश्वर मदान का नाम भी है। जिनके लेख मैं पढ़ता था। हालांकि उस वक्त पत्र-पत्रिकाओं में सिनेमा पर ज्यादातर साहित्यिक लेखन होता था। मेरा मानना है फिल्म समीक्षा को साहित्यिक नजरिये से नहीं देखना चाहिये। आज भी साहित्यकार जब फिल्मों की समीक्षा करते हैं तो उसकी कहानी और चरित्र की चर्चा करके रह जाते हैं लेकिन सिनेमा केवल कहानी या चरित्र नहीं है। सिनेमा और भी बहुत कुछ है। दुर्भाग्य से हिंदी में ऐसी कोई किताब नहीं मिलती जिसे पढ़कर सिनेमा के सभी आयाम को हम सीख, समझ सकें।
हिंदी में जब कोई और अच्छी किताब नहीं मिली तो मैंने अंग्रेजी में पढ़ना शुरू किया। अंग्रेजी में हमें कई अच्छी किताबें मिलीं। खासतौर पर हॉलीवुड के लोगों कि लिखी सिनेमा पर कई अच्छी किताबें मिलीं। सिनेमा का तकनीकी पक्ष तथा सिनेमा को कैसे देखें तथा कैसे पढ़ें-इसके बारे में वहां अनेक अच्छी किताबें लिखी गई हैं। हाउ टू रीड अ फिल्म का कान्सेप्ट भारतीय दर्शक या पत्रकार आज तक नहीं जानते। भारतीय दर्शक या पत्रकार केवल सिनेमा देखते रहे हैं, सिनेमा को पढ़ना नहीं जानते रहे हैं। संभव है तब इसकी दूसरी समस्या रही होगी लेकिन अब स्थितियां बदली हैं। इधर के सालों में कुछ अच्छी किताबें आई हैं। खासतौर पर भारतीय संदर्भ में भारतीय लेखकों की अच्छी किताबें प्रकाशित हुई हैं। लेकिन ये किताबें अंग्रेजी में लिखी गई हैं। और अंग्रेजी की ये ज्यादातर किताबें व्यक्तिपरक हैं। किसी ना किसी की ऑटोबायोग्राफी हैं। लेकिन फिल्ममेकिंग विषय पर भारतीय लेखकों को अभी और काम करने की जरूरत है। फिल्म बनाने की प्रक्रिया में कलाकार, निर्देशक, कला निर्देशक, साउंड रिकॉडिस्ट तथा कैमरामैन आउडोर या इनडोर कैसे काम करते हैं, क्या सोचते हैं तथा आपस में क्या-क्या बातें करते हैं-उस बारे में पहली बार और संभवत: आखिरी बार सत्यजीत भटकल ने द स्पिरिट ऑफ लगान नामक किताब लिखी, जिसका हिंदी अनुवाद मैंने किया-ऐसे बनी लगान नाम से। उस किताब में पहली बार सिनेमा पर ग्लैमरविहीन लेखन किया गया है। उसके अलावा बीडी गर्ग, आशीष राजाध्यक्ष, अनुपमा चोपड़ा या गायत्री जी की किताबें भी काफी अच्छी हैं। इनकी किताबें हिंदी में भी आनी चाहिये।

हिंदी में सिनेमा पर अच्छी किताबों के अभाव को देखते हुये जब मैंने लिखना चाहा तो ज्यादातर प्रकाशकों ने किसी ना किसी की बायोग्राफी प्रकाशित करने में दिलचस्पी अधिक दिखाई। खासतौर पर अभिनेत्रियों की बायोग्राफी मे उनकी अधिक रुचि थी। मसलन रेखा की बायोग्राफी–क्योंकि रेखा जैसी अभिनेत्रियों का निजी जीवन चर्चित और विवादास्पद भी रहा है। लिहाजा प्रकाशकों में उनके बारे में पुस्तक प्रकाशित करने की अधिक इच्छा है। जाहिर है यहां सिनेमा पर अध्ययन जैसी कोई चीज़ नहीं है। हिंदी में यह भी एक बड़ी समस्या है कि सिनेमा पर अध्ययन कोई प्रकाशित नहीं करना चाहता। लेकिन अंग्रेजी में ऐसा नहीं है।

हिंदी में मुझे एकमात्र प्रह्लाद अग्रवाल जी नजर आते हैं जिन्होंने सिनेमा पर सिलसिलेवार तरीके से काम किया है। उन्होंने बहुत से हिंदी लेखकों से सिनेमा से जुड़े प्रासंगिक विषयों पर लिखवाया भी है।
मुझे लगता है हिंदी में सिनेमा पर अच्छी किताबों की कमी की वजह प्रकाशकों का रवैया है। हिंदी के प्रकाशक सिनेमा पर अध्ययन प्रकाशित नहीं करना चाहते। अगर मैं कहूं कि हिंदी सिनेमा के स्वर्णयुग पर कोई किताब लिखना चाहता हूं तो वो उसको प्रकाशित नहीं करना चाहेंगे। वो कहेंगे -ऐसी किताबें बिकती नहीं। उसके बदले वो किसी फिल्म पर्सनाल्टी पर किताब लिखने को कहेंगे जबकि मैं कहता हूं कि प्रकाशक अगर कैसे बनता है सिनेमा?’-जैसी किताबें प्रकाशित करें तो वह काफी बिकेगी। क्योंकि देश में बहुत से युवा फिल्म मेकर भी बनना चाहते हैं। 

सिनेमा पर अध्ययन को बढ़ावा देने तथा प्रामाणिक लेखन को प्रकाशित करने के लिए इससे जुड़ी सरकारी संस्थाओं मसलन, केंद्रीय फिल्म निदेशालय, एनएफडीसी, पुणे फिल्म संग्रहालय आदि को आगे आना चाहिये। स्वतंत्र लेखकों को लेखन वृत्ति देनी चाहिये ताकि वो इस पर अच्छा काम कर सकें।

इतिहास अक्सर ऐसे लोग लिखते हैं जो कहीं ना कहीं प्राध्यापक के तौर पर सम्बद्ध होते हैं और उसका प्रकाशन भी सरकारी या प्रतिष्ठित संस्थान से होता है। लेकिन सिनेमा में वैसी व्यवस्था नहीं है। इस विषय पर ज्यादातर पत्रकार ही लिखने के लिए आगे आते हैं लेकिन उनकी आर्थिक समस्या को पूरी करने के लिए कोई आगे नहीं आता ताकि वह पूरी स्थिरता के साथ सिनेमा पर गंभीर कार्य कर सके। हैरत तो इस बात पर भी है कि मुझे आज ऐसी कोई बेवसाइट या कोई और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म भी नहीं दिखता जहां सिनेमा से जुड़ी जानकारियां एक ही जगह पर विस्तार से उपलब्ध हो। इस दिशा में भी काम करने की जरूरत है। यहां तक कि मीडिया अध्ययन संस्थानों में भी इस विषय पर ठीक से काम नहीं हो रहा है। एक बार मैंने एक मीडिया संस्थान को कहा कि आपलोग सेमिनार करने में दस-बीस लाख रुपये खर्च कर देते हैं लेकिन एक लेखक का चुनाव कर और उसको पांच लाख रुपये देकर क्यों नहीं अच्छी किताब लिखवाना चाहते हैं? ताकि वह किताब छात्रों के लिए सालों साल तक उपयोगी साबित हो सके। लेकिन वो ऐसा नहीं करना चाहते। क्योंकि इससे उनको कमाई नहीं होती।
इन हालात को देखते हुये हम जैसे लोगों को एक समूह बनाकर मेहनत करनी होगी या उम्मीद करें कि सरकार में कभी कोई ऐसा समझदार व्यक्ति पहुंचे जो इस विषय में शोध, अध्ययन के लिए फंड की व्यवस्था करें ताकि इस गंभीर काम को जमीनी स्तर पर मूर्त रूप दिया जा सके।
 000
* अजय ब्रह्मात्मज वरिष्ठ फिल्म समीक्षक तथा चिंतक हैं। इन्होंने सिनेमा पर कई किताबें लिखी हैं। देशभर में अनेक विश्वविद्यालयों में सिनेमा पर व्याख्यान देते हैं। मुंबई में निवास। संपर्क – 09820240504
(नोट - पिक्चर प्लस से वार्ता के आधार पर यह टिप्पणी तैयार की गई है। इसका पुनर्प्रकाशन पूर्वानुमति के पश्चात् ही किया जा सकता है - संपादक।

संपर्क – pictureplus2016@gmail.com)

2 टिप्‍पणियां:

  1. ब्रह्मात्मज जी बहुत ही सार्थक और चुनौतीपूर्ण बातें कही हैं।-सत्येन्द्र प्रकाश (Google)

    उत्तर देंहटाएं
  2. टी सीरीज की मैगज़ीन फिल्मोनिया [प्रिया ] , फिल्मफेयर हिंदी , जी स्टार और नया सिनेमा में छपे ब्लॉग भी पाठकों के सामने शेयर करने की कोशिश करें

    उत्तर देंहटाएं

Post Bottom Ad