विनोद मेहरा ने मालिक से सिफारिश करवाई तो मैंने दो साल उसकी फोटो तक ‘माधुरी’ में नहीं छापी-अरविंद कुमार - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 14 जनवरी 2018

विनोद मेहरा ने मालिक से सिफारिश करवाई तो मैंने दो साल उसकी फोटो तक ‘माधुरी’ में नहीं छापी-अरविंद कुमार

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–तेरह

अरविंद कुमार

टाइम्स में पहले ही दिन मेरी भेंट हुई सहायक प्रबंधक पीठावाला से। पतले, लंबेदिखने में सख्त। बड़ी पैनी निगाह थी उनकी। काम था कंपनी का पैसा बर्बाद होने से रोकना। कोई उन्हें पसंद न आतातो उसकी ख़ैर नहीं होती। दूसरे सहायक प्रबंधक थे राम हिंगोरानी। बड़े हंसमुख। वही मुझे सब विभागाध्यक्षों से मिलाने ले गए थे। टाइम्स के प्रेस में कंपोज़िंग विभाग में मेरे लिए कुछ नया नहीं था। अख़बारों की छपाई रोटरी मशीनों पर होती थीजैसी कि दिल्ली में होती थी। पत्रिकाएं छपती थीं फ़ोटोग्रेव्योर मशीन पर। इस पर intaglio (सही उच्चारण इन्टाल्यो’, अशुद्ध उच्चारण इन्टैग्लियो) विधि का इस्तेमाल होता था। छपने वाला मैटर और तस्वीरें बहुत सूक्ष्म कुओं के रूप में होता है जिनमेँ तरल स्याही भरी जाती है। एक रंग के लिए एक सिलेंडर होता है। 
इस तरह पीलेलाल, नीले और काले रंग के चार सिलेंडर होते थे। वांछित रंग की बेहद पतली स्याही पूरे सिलेंडर को लपेट लेती। फिर एक रबड़ जैसा वाइपर उसे साफ़ करता। परिणाम यह होता कि कुओं में भरी स्याही के अतिरिक्त सारा सिलेंडर साफ़ हो जाता। अब छपने वाले काग़ज़ पर स्याही उलट जाती। तत्काल एक और उपकरण काग़ज़ को तपा कर स्याही सुखा देता। अब वही काग़ज़ दूसरे सिलेंडर के संपर्क में आता। मशीन इतनी तेज़ी से चलती थी कि देखते देखते सैकड़ों प्रतियां छप और जिल्द बंध कर निकल आतीं। जिसे ‘मेकरेडी’ कहते हैं तकनीकी भाषा मेँयानी फ़ाइनल छपाई शुरू करने से पहले की तैयारीउस में ही कई सौ कापियां खप जातीं। ‘माधुरी’ का पहला अंक छपने का तमाशा मैंने स्वयं खड़े होकर देखा था और चमत्कृत रह गया था।

विनोद मेहरा पर गिरी थी सिफ़ारिश कराने की गाज
अकसरकहना चाहिए टाइम्स में प्रधान संपादक तकनीकी विभागों में नहीं जाते थे। मैंने शुरुआत ही छापेख़ाने से की थीतो समझने की कोशिश में मैं हर विभाग में जाता था। ग्रेव्योर विभाग के दो बॉस थे। जर्मनी के नाडिग और गोआ के डैंगो। मेरी रुचि देखकर वह मुझे प्रक्रिया समझाते थे। मेरी कम उम्र भी उन्हें हर क़दम पर सहायता करने को प्रेरित करती थी।
राम हिंगोरानी का एक मित्र था विनोद मेहरा। बाद मेँ वह लोकप्रिय अभिनेता बना, मेरा मित्र पहले ही बन चुका था। यूं तो वह 1958 से बाल कलाकार के रूप में काम करने लगा था पर उसके बाद कुछ साल विलीन सा रहा। 1965 में फ़िल्मफ़ेअर-यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स के टेलेंट कंटैस्ट मेँ राजेश खन्ना चुना गया था। विनोद नंबर दो था। उसकी पहली फ़िल्म आई 1971 में तनुजा के साथ ‘एक थी रीता। उसके बारे में तब से माधुरी कुछ न कुछ छपता ही रहता था। आपको शायद मालूम हो उसकी मतवाली रेखा ने उसके लिए ‘टिक 20’ खा लिया था! बाद में बिंदिया गोस्वामी से उसका घनिष्ठ संबंध रहा।

रेखा से भी थे विनोद मेहरा के नज़दीकी रिश्ते
टाइम्स का जिम्मा जैन परिवार के बड़े बेटे अशोक जैन पर था। छोटे बेटे आलोक जैन फ़िल्मों के ही नहीं जीवन के भी शौक़ीन थे। न जाने कैसे वह मेरे निकट आते गए। अपने दु:ख-दर्द बांटतेअपनी आकांक्षाओँ की बातें करते। कुछ फ़िल्मवालों से अपने संबंध स्पष्ट करते। एक बार उन्होंने विनोद की सिफ़ारिश की। मुझे यह क़त्तई मंज़ूर नहीं था कि मालिकों में से कोई संपादित सामग्री में हस्तक्षेप करे। मैं चुप रहा। विनोद मिला तो मैंने कहा, “तुमने आलोक जी से कहलवाया हैतो दो साल तक तुम्हारा फ़ोटो नहीं छपेगा ‘माधुरी’ में।” वह बेचारा कहता रहा कि उसने आलोक जी से कुछ नहीं कहलवाया था। जो भी हो, दो साल तक वह ‘माधुरी’ में नहीं छपा। विनोद की कुछ प्रसिद्ध फ़िल्में अमर प्रेम’, ‘अनुराग’, ‘अमरदीप’, ‘लाल पत्थर’, ‘बेमिसाल’, ‘अनुरोध’ स्मरणीय हैं।
मई 1978 में जब एक दो दिन बाद मैं बंबई छोड़ रहा था तो सन ऐन सैंड होटल में मीना ब्रोका से विनोद के विवाह पर पार्टी में हमारा पूरा परिवार शामिल हुआ था। तबके कई फ़ोटो मेरे पास हुआ करते थे। पता नहीँ वे कहां हैं। सन् 1990 में पैंतालीस साल की उम्र में विनोद संसार से विदा हुआ। मुझे खेद है कि बंबई छोड़ने के बाद विनोद से संपर्क नहीं रह पाया।
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com

(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

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