दीपिका, रणवीर हुये फर्स्ट क्लास से पास लेकिन खुद संजय लीला भंसाली रह गये सेकेंड - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

दीपिका, रणवीर हुये फर्स्ट क्लास से पास लेकिन खुद संजय लीला भंसाली रह गये सेकेंड

रानी पद्मावती की भूमिका में दीपिका पडुकोण
फिल्म समीक्षा
शीर्षक - पद्मावत
निर्देशक - संजय लीला भंसाली
कलाकार- रणवीर सिंह , दीपिका पडुकोण , शाहिद कपूर , अदिति राव हैदरी
*रवीन्द्र त्रिपाठी
बेशक संजय लीला भंसाली की फिल्म `पदमावतमें भव्यता है और थ्री-डी में ये और भी लुभावनी हो गई है। पर इसे देखने के बाद मन में ये खयाल भी आता है कि क्या ये फिल्म कहीं करणी सेना की विचारधारा के प्रचार के लिए तो नहीं बनाई गई है? फिल्म में तथाकथित `राजपूती आन बानपर इतना जोर दिया गया है कि कई बार तो लगता है कि भंसाली ने कहीं करणी सेना के ब्रांड एंबेसडर बनने का सपना तो नहीं पाल लिया? हालांकि ये मजाक है लेकिन कभी कभी मजाक में सच भी रहता है। हर पांच सात मिनटों के बाद इस फिल्म में `राजपूती- गौरव’, `राजपूती-परंपराया `राजपूती- रिवाजका उल्लेख होता है। संभव है कि करणी सेना वाले इस फिल्म को देखने के बाद (चोरी-छिपे तो इसे देखेंगे ही) अपने किए पर झेंपने लगेंगे कि आखिर इसका इतना तगड़ा विरोध क्यों किया? फिल्म में तो भंसाली विचार के स्तर पर वही कह रहे हैं जो वे यानी करणी सेना वाले चाहते हैं।
इसका दूसरा पहलू भी है। आगे से जब करणी सेना वाले किसी और फिल्म का विरोध करेंगे तो लोग ये खुलकर कहेंगे कि वे उसका प्रचार करने के लिए ही ऐसा कर रहे हैं। इसमें संदेह नहीं कि फिल्म को उनके कारण बहुत ब़ड़ी पब्लिसिटी मिली है। करणी सेना अपने किए के जाल में खुद फंस गई है।
`
पदमावतभंसाली की पिछली फिल्म `बाजीराव मस्तानीजैसी उम्दा नहीं है। इसके एक्शन वाले यानी युद्ध के दृश्यों में धांसूपन भी नहीं है जैसा `बाजीराव मस्तानीमें था। फिर भी `बाजीराव मस्तानीवाली एक चीज इसमें है। रणवीर सिंह का जबर्दस्त अभिनय। अलाउद्दीन खिलजी के चऱित्र को भंसाली और रणवीर ने मिलकर जिस तरह पेश किया है उसमें एक दुर्दांतपन है। खिलजी की भूमिका में रणवीर क्रूर, आततायी, लोलुप और अपनी जीत के लिए छल-छद्म में विश्वास करने वाले शख्स के रूप में दिखे हैं। खिलजी की आंख में क्रूरता बसी है और वह शुरू से आखिर तक बसी रहती है। इस तरह के नकारात्मक चेहरा लिए चरित्र की भूमिका के लिए तैयार होना और उसे दमदार तरीके से निभाना एक ऐसी चुनौती को स्वीकार करना है जिससे बड़े बड़े अभिनेता डरते हैं। `शोलेके गब्बर की तरह का कुछ मामला है।
राजा रतन सिंह की भूमिका में शाहिद कपूर

पद्मावतफिल्म की कहानी में क्या है?
फिल्म की कहानी तो बहुप्रचारित है फिर भी ये बताना देना जरूरी होगा कि मध्यकालीन भारत के एक सुल्तान अलाउददीन खिलजी और चित्तौड़ के राजा रतन सिंह की दूसरी पत्नी पद्मावती पर केंद्रित है। रतन सिंह के राज्य में रहनेवाला राघव चेतन नाम का एक तांत्रिक चित्तौड़ से निकाले जाने पर और दिल्ली पहुंचकर अलाउद्दीन खिलजी से पद्मावती के सौंदर्य का ऐसा बखान करता है वह उसे पाने के लिए बेताब हो जाता है। वह चित्तौड़ पर आक्रमण कर देता है। चित्तौड़ जल्द हार नहीं मानता लेकिन चालाकी और धूर्तता से आखिरकर खिलजी रतन सिंह को मार देता है। तब भी उसे पद्मावती नहीं मिलती। वह सामूहिक जौहर करके सती हो जाती है। फिल्म में उसका का सती होना नहीं दिखाया गया है पर उसका संकेत दिया गया है। फिल्म का संगीत पक्ष अच्छा है जैसा कि भंसाली के फिल्म में होता ही है। कई गाने अच्छे हैं। खासकर घूमर नृत्य पर केंद्रित `घूमर घूमरे घूमेके बोल वाला। सिनेमेटोग्राफी बहुत अच्छी है और लोकेशन का चुनाव भी। किलों के भीतर दिखाए गए कई सीन आकर्षक हैं।
फिल्म में दिखाया गया जौहर का सच!
फिल्म में जौहर का संकेत है। हालांकि इतिहास नहीं कहता कि कोई ऐसा जौहर चित्तौड़ में हुआ था। हां, अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ पर आक्रमण किया था ये ऐतिहासिक सच है। पर `पद्मावतीका चरित्र और जौहर का वृतांत मध्यकालीन कवि मलिक मुहम्म्द जायसी की कल्पना है। किंतु ये भी कहना पड़ेगा कि भंसाली ने पूरी तरह जायसी `पद्मावतको नहीं पेश किया है। वह संभव भी नहीं था क्योंकि मूल ग्रंथ काफी बड़ा है। पर कुछ बदलाव वाजिब नहीं लगते। भंसाली ने रतन सेन की पहली पत्नी नागमती की भूमिका को बहुत छोटा कर दिया है। उसके मुकाबले अलाउद्दीन खिलजी की बीवी मेहरून्निसा (अदिति राव हिदारी) की भूमिका बड़ी है। फिर जायसी ने ये लिखा कि रतन सेन हीरामन नाम के तोता से पद्मावती के सौंदर्य की तारीफ सुनकर उसे पाने सिंहल द्वीप जाता है। लेकिन भंसाली ने ये दिखाया है कि रतन सेन अपनी पत्नी नागमती के लिए मोती की खोज में सिंहलदीव जाता है। अगर हीरामन तोते और सिंहलद्वीप वाले प्रसंग को थोड़ा विस्तार में दिखाया होता तो फिल्म में कई अच्छे आयाम जुड़ जाते।
अलाउद्दीन खिलजी की भूमिका में रणवीर सिंह
किस कलाकार का अभिनय सबसे उम्दा?
भंसाली का जोर खिलजी के खलनायक होने पर और पद्मावती की खूबसूरती दिखाने पर इतना अधिक रहा है कि बाकी के कुछ अहम पहलुओं को उन्होंने नजर अंदाज कर दिया है। हां, ये भी सही है कि भंसाली ने दीपिका पडुकोण को जिस तरह पद्मावती और उसकी सुंदरता को पेश किया है उसमें एक मोहकता है। पद्मावती के लंहगे, उसके गहने, खासकर उसकी नथ आने वाले समय में जबर्दस्त फैशन बन जाएंगे। हो सकता है कि शादी- ब्याह में लड़कियां ये मांग करें कि वे पद्मावती की तरह लहंगे और जेवर पहनेंगी।
रतन सिंह की भूमिका में शाहिद कपूर रणवीर सिंह के आगे थोड़े दब गए हैं। और मलिक कफूर (जिसकी भूमिका जिम सर्भ में निभाई है) का चरित्र तो चित्रित किया गया है लेकिन लगता है मानों वह सिर्फ उभयलिंगी होने और अलाउद्दीन खिलजी के साथ समलैंगिक रिश्ता रखने के कारण उसका प्यारा था। वास्तविकता ये है कि कफूर एक बेदर्द आक्रांता और कुशल सेनापति था और अलाउद्दीन खिलजी के मरने के बाद उसने परोक्ष रूप से दिल्ली पर कुछ समय तक शासन भी किया। पर सिर्फ एक महीने के बाद अलाउद्दीन के ही अंगरक्षकों ने उसकी हत्या कर दी। 
निर्देशक संजय लीला भंसाली
फिल्म में इतिहास से हुई छेड़छाड़?
क्या भंसाली ने इतिहास और जायसी की रचना `पद्मावतको तोड़मरोड़ कर पेश किया है? इस तरह के आरोप लगेंगे। पर इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कोई भी फिल्म पूरी तरह इतिहास या उस रचना को पेश नहीं करती जिस पर आधारित होती है। अक्सर आजादियां ली जाती है। आगे भी ली जाती रहेंगीं। इसलिए मूल मुद्दा ये है कि फिल्म कैसी बनी है। इस सिलसिले में भंसाली को पचास फीसदी अंक तो देने पड़ेंगे। फिल्म निर्माण के स्तर पर बेहतर पर विचार के स्तर पर कमजोर। भंसाली फर्स्ट क्लास तो नहीं ला पाए लेकिन अच्छे अच्छे नंबरों से पास हुए हैं। ॉ
(*लेखक प्रख्यात कला मर्मज्ञ और फिल्म समीक्षक हैं ।  संपर्क-9873196343 )

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad