हिंदी सिनेमा का दूसरा 'गब्बर सिंह' बन सकता था यह 'ख़िलजी' अगर...! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 27 जनवरी 2018

हिंदी सिनेमा का दूसरा 'गब्बर सिंह' बन सकता था यह 'ख़िलजी' अगर...!

रणवीर सिंह से होता है 'पद्मावत' देखने का पैसा वसूल
 
रणवीर सिंह को अलाउद्दीन खिलजी की भूमिका में मिल रही है प्रशंसा  
सिनेमा की बात
अजय ब्रह्मात्मज/ संजीव श्रीवास्तव

संजीव श्रीवास्तव – अजय जी, मीडिया में पद्मावत फिल्म की समीक्षा की भरमार देखने को मिल रही है इसलिये हमलोग यहां फिल्म की समीक्षा नहीं करेंगे, बल्कि किरदार और उनके अभिनय पक्ष की बात करते हैं। आपकी नज़रों में इस फिल्म के तीनों प्रमुख कलाकारों के अभिनय में पहले, दूसरे या तीसरे स्तर का प्रदर्शन किसका रहा?

अजय ब्रह्मात्मज – इस तरह से किसी फिल्म में कलाकारों के प्रदर्शन को क्रम देना जरा मुश्किल होता है, क्योंकि यहां तीनों के अलग अलग कैरेक्टर्स थे। उनमें कोई रेस नहीं थी। हां, जो किरदार उनको दिया गया उनमें वो कितना जंचे, उस हिसाब से अगर बात करें तो शाहिद कमजोर दिखाई देते हैं, तीसरे नंबर पर रहेंगे; उसके बाद दूसरे नंबर पर दीपिका और पहले नंबर पर रणवीर सिंह दिखाई देते हैं।      

संजीव श्रीवास्तव – तो फिर पहले बात रणवीर सिंह या उनके किरदार की ही कर लेते हैं। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि फिल्मकार का अधिक ज़ोर खिलजी के चरित्र को उभारने पर रहा है? ऊपर से रणवीर सिंह की लाउड या कहें कि ओवर एक्टिंग परफॉर्मेंस ने फिल्म को पद्मावती वर्सेस खिलजी बना दिया?  

अजय ब्रह्मात्मज – देखिये होता ये है कि किसी विशेष कैरेक्टर का लुक और उसकी प्रेजेंटेशन को पहले से ही तय कर लिया जाता है। यहां भी भंसाली ने पहले से ही खिलजी का चरित्र तैयार करके रखा था कि उसे उसी रूप में दिखाना है। यहां खिलजी का किरदार शुद्ध रूप से ग्रे नहीं बल्कि एकदम ब्लैक है। खिलजी में अपनी जिंदगी में कुछ अच्छे काम भी किये हैं लेकिन यहां उसका स्वभाव, उसकी प्रतिक्रियाएं, उसकी मुद्रायें सबकुछ को बहुत ही निगेटिव बनाकर रखा गया है। फिल्मी भाषा में कहें तो उसके खलनायकत्व को बहुत ही गाढ़ा बनाया गया है। चूंकि रणवीर सिंह की पर्सनाल्टी में लाउडनेस पहले से है, कुछ लोग उसे एनर्जी भी कहते हैं। वो अपने रोल को इसी एनर्जी के साथ करते हैं। खासतौर पर खली बली...गाने में तो यह एनर्जी बखूबी नजर आती है। गाने को जिस तरह से कोरियोग्राफ किया गया है उसमें रणवीर सिंह की खूबियों का उपयोग हुआ है। खलनायक में जो एनर्जी और गति होनी चाहिये, उसमें साफ दिखती है। इसीलिये रणवीर इस फिल्म में सबसे अलग दिखाई देते हैं। रणवीर सिंह से ही दर्शकों का पैसा वसूल होता है।
 
क्रूरता केवल दिखने में, लेकिन आवाज़ में रुआब नहीं!
संजीव श्रीवास्तव – हाल के सालों में हिंदी फिल्मों में खलनायक का इतना दमदार किरदार नहीं देखा गया। रणवीर सिंह को देखकर गुजरे जमाने के मशहूर खलनायकों मसलन, गब्बर सिंह, शाकाल, मोगैम्बो आदि की याद आती है। यानी हिंदी सिनेमा का एक और अमर खलनायक? ऐसा कह सकते हैं?

अजय ब्रह्मात्मज – हां, बिल्कुल ऐसा कह सकते हैं। रणवीर सिंह ने ऐसा किरदार निभाया है जो दर्शकों के दिलों दिमाग में लंबे समय तक रहने वाला है। हालांकि जिन मशहूर खलनायकों की बात आपने कही, उन सबके नाम के साथ एक-एक पोपुलर डायलॉग भी चस्पां है; जैसे कि गब्बर सिंह कहता है-कितने आदमी थे तो मोगैम्बो कहता था-मोगैम्बो खुश हुआ। लेकिन यहां खिलजी की जुबान पर ऐसा कोई डायलॉग नहीं है जिसे दर्शक याद रख सके। अगर रणवीर सिंह को भी ऐसा कोई डायलॉग मिलता तो यह खलनायक निश्चय ही अमर हो जाता। हां, एक नई बात जरूर देखने को मिली है कि इस फिल्म में खलनायक भी गाना गाता है।  

संजीव श्रीवास्तव – आप खलनायक के पोपुलर डायलॉग की बात कह रहे थे मुझे तो पूरी फिल्म में भी कोई ऐसा संवाद नहीं दिखाई देता। जबकि एक कॉस्ट्यूम-पीरियड ड्रामा में डायलॉग की भरपूर गूंजाइश होती है।
 
अजय ब्रह्मात्मज
अजय ब्रह्मात्मज – बिल्कुल सही कह रहे हैं। फिल्म का संवाद बहुत ही कमजोर है। कोई चुटीला या मारक डायलॉग नहीं है। दरअसल मुद्दा यह भी है होता है कि वह संवाद कौन एक्टर बोल रहा है। जब राजकुमार या अमिताभ बच्चन बोलते हैं तो उसका मायने बदल जाता है। लेकिन अब तो किसी एक्टर के पास उनकी पहचान स्थापित करने वाली आवाज ही नहीं है। जैसे खिलजी को जितना क्रूर दिखाया गया है, वैसी उसकी आवाज भी होनी चाहिये लेकिन चूंकि उस किरदार को निभाने वाले रणवीर सिंह की आवाज में दम ही नहीं है इसलिये संवाद का पता ही नहीं चलता। फिल्म में ना तो डायलॉग है ना डिलीवरी है और ना ही डिक्शन है।

संजीव श्रीवास्तव – दूसरी तरफ शाहिद के चेहरे पर वो राजपुताना रुआब नहीं आ रहा है, जिसकी शान की बखान बार–बार फिल्म में की जाती है।

अजय ब्रह्मात्मज – बिल्कुल सही कह रहे हैं। वह पहले सीन से ही बहुत थका हुआ दिख रहा है। दूसरी बात कि फिल्म में भाषा का बिल्कुल ही ख्याल नहीं रखा गया है। फिल्म की कहानी सिंहल से लेकर दिल्ली तक चलती है लेकिन किरदारों की भाषा में उनकी जातीय पहचान नहीं है। दीपिका और शाहिद गाना गाते हैं तो उसमें उर्दू अल्फाज का इस्तेमाल हो रहा है। यहां तक कि रतन सिंह के संवाद में भी। मैं हिंदी-उर्दू की बात नहीं कर रहा लेकिन किरदारों की पहचान के मुताबिक तो भाषा होनी चाहिये। वहीं फिल्म में गीत भी वैसे नहीं हैं जो यादगार रह सकें। ऐसा शायद इसलिये कि आजकल संवाद लेखकों और गीतकारों के पास अब शब्दों की कमी हो गई है।  
संजीव श्रीवास्तव

संजीव श्रीवास्तव – कुल मिलाकर आपको क्या लगता है भंसाली अपनी पहले की फिल्मों की क्वालिटी के ग्राफ को आगे बढ़ाते हुये दिखाई देते हैं?

अजय ब्रह्मात्मज - नहीं, बिल्कुल नहीं। ये उनकी सबसे कमजोर फिल्म है। हंगामे के दवाब के चलते भंसाली ने फिल्म में कई बदलाव किये हैं वो साफ-साफ दिखाई देते हैं और इसी कारण फिल्म कमजोर साबित हुई है। विरोध के पहले भंसाली इस फिल्म में जो कहना चाह रहे होंगे, निश्चय ही  उसे बाद में काट दिया गया होगा। फिल्म के किरदारों के मिजाज का वो ठीक से निर्वाह नहीं कर सके हैं।

*अजय ब्रह्मात्मज वरिष्ठ फिल्म पत्रकार और विश्लेषक हैं। इन्होंने सिनेमा पर कई किताबें लिखी हैं। मुंबई में निवास। संपर्क – 09820240504
संजीव श्रीवास्तव पिक्चर प्लस के संपादक हैं। दिल्ली में निवास।
संपर्क -pictureplus2016@gmail.com 

1 टिप्पणी:

  1. Ab vo log nahi rahe jo acche dialog likha karte the ,geet bhi pahle film ke aadhar par hua karti thi,kher Ek rajasthani bhavta ke liye film acchi he

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