मीना कुमारी के बांये हाथ की कटी उंगलियां देख मैं घबरा गया...उफ्! वो ’दास्तान-ए-दर्द...!!’ - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 28 जनवरी 2018

मीना कुमारी के बांये हाथ की कटी उंगलियां देख मैं घबरा गया...उफ्! वो ’दास्तान-ए-दर्द...!!’

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–पंद्रह
मशहूर फिल्म पत्रिका 'माधुरी' पहले 'सुचित्रा' नाम से प्रकाशित हुई थी
सुचित्रा के पहले अंक पर तारीख़ थी 30 जनवरी 1964; बाज़ार में आया था 23 जनवरी को गणतंत्र दिवस से तीन दिन पहले। इस बार पढ़िए उसके कवर पेज का क़िस्सा और दास्ताने दर्द-मीना कुमारी की पहली क़िस्त।

भाग-9 (17 दिसंबर – रविवार)। मैंने लिखा था-किशन चंदर जी की पैनी नज़र ने हमारी पत्रिका के माथे पर कलंक का काला टीका लगने से बचाया था। वह प्रसंग मैं गणतंत्र दिवस पर जो हमारा पहला अंक निकलाउस वाली क़िस्त में बताऊंगा। किशन चंदर जी की उस कृपा की कृतज्ञता का भार मैं मरते दम तक नहीँ चुका पाऊंगा। अब वह बताने का सही समय आ गया है।
लेकिन शुरुआत करता हूं मैं अपने से।
सन् 1953; तेईस साल के मैंने नई दिल्ली के रीगल सिनेमा में बिमल रॉय की फ़िल्म परिणीता देखी। शरतचंद के उपन्यास पर आधारित। नायिका थी बीस साल की भोली कली मीना कुमारी। उसने मेरा ही नहीं सबका मन मोह लिया था। पहली बार बेहिचक मैं कहना चाहता हूं। मैंने मीना जी के नाम एक पोस्टकार्ड लिखा था। मेरे जीवन का पहली और आख़री फ़ैन मेलवह परिणीता के लिए अधिक थामीना के लिए कम
यह मेरा सौभाग्य था कि माधुरी’ के पहले अंक के मुखपृष्ठ पर मीना जी को छापने का अवसर मिला। उनका फ़ोटो अपनी देख-रेख में फ़िल्म पूर्णिमा के सैट पर खिंचवाया था। मैं पहले भी बता चुका हूं कि मीना जी ने पूछा था कि फ़ोटो में उनका कितना अंश दिखाया जाएगा. फ़ोटोग्राफ़र ने कहा था बस्ट bust यानी आवक्ष. मूर्तिचित्र और फ़ोटोग्राफ़ मेँ इसका मतलब है सिर से वक्ष तक मानव शरीर का चित्रण। इसमें गोदी का अंश शामिल नहीँ होता। इसी समझ के अनुसार मीना जी अपने दोनोँ हाथ गोद मेँ रख कर बैठ गईं – निश्चिंत, बेफ़िक्र. पर फ़ोटो तो गोदी तक था!
मीना कुमारी की विभिन्न मुद्राएं
मैं पहले अंक के सोलहों रंगीन पेजोँ का मेज़ पर रखा प्रिंटआउट देख कर ख़ुश हो रहा था। सौभाग्यवश किशन चंदर तभी आ पहुंचे। देखते ही चौंकेबोले, क्या ज़ुल्म ढा रहे हो। मैँ चौँकापूछा, क्या? उन्होंने मीना जी की गोदी मेँ रखा बायां हाथ दिखाया और दिखाईं कटी उंगलियां… दौड़ा दौड़ा मैं फ़ोटोग्रेव्योर डिपार्टमैंट पहुंचा। नाडिग और डैंगो मदद को आगे बढ़े। चारोँ रंगोँ के सिलंडर फिर से बनाए गए। पत्रिका और मैं छीछालेदर से बच गए।
धन्यवाद नाडिग और डैंगो!
धन्यवाद किशन चंदरजी!
आप तीनोँ अब संसार मेँ नहीँ हैँपर मेरी यादों मेँ हैं।
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दास्ताने दर्द – मीना कुमारी (1)
हमारा पहला अंक छपे बस एक महीना बीता था। 5 मार्च 1964पिंजरे के पंछी फ़िल्म का महूरत। मीना कुमारी मेकअप रूम में नवोदित गीतकार गुलज़ार को बुलाने की ज़िद कर रही थी। पति कमाल अमरोही का कारिंदा बाक़र इनकार कर रहा था। मीना की ज़िद पर ग़ुस्साए बाक़र ने मीना को तमाचा जड़ दिया।
आंसू बहाती तमतमाई मीना तेज़ी से स्टूडियो के बाहर निकल आई. बोली, कमाल साहब से कह देना मैँ घर नहीँ लौटूंगी।
सारी घटना सस्ते पत्रकारोँ को चटपटा मसाला थी। मैँने अपने हाथों लिख कर बस एक पैरा छापा – कोरी जानकारी का। मीना जी कमाल का घर छोड़ कर गुलज़ार के घर चली गईं।
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अशोक कुमार व मीना कुमारी फिल्म 'परिणीता' में
1951तमाशा फ़िल्म की शूटिंग अभिनेता अशोक कुमार ने निर्माता कमाल से मीना का परिचय कराया था। कमाल ने अनारकली फ़िल्म में काम करने का प्रस्ताव रखा। 13 मार्च 1951 को कांट्रैक्ट पर हस्ताक्षर हुए। महाबलेश्वर से इसकी शूटिंग से लौटते समय कार का ऐक्सीडैंट हुआ था। मीना के बाएं हाथ पर भारी चोटेँ आईं। जान ख़तरे मेँ थी। कमाल अमरोही नित प्रति देखने और दिलासा देने आते रहे। मिलना न होता तो दोनोँ ख़तोकिताबत करते। पर वह अनारकली पूरी नहीं हो पाई। इस बीच 1953 की नंदलाल जसवंतलाल निर्देशित प्रदीप कुमारबीना राय वाली अनारकली आ गई।
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टैगोर वंश से संबंध बरास्ता मेरठ-
कभी बहुत पहले। महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर के छोटे भाई की बेटी हेमसुंदरी ठाकुर बाल विधवा हो गई। जैसाकि बंगाली परिवारोँ में चलन था उसके तमाम अधिकार छीन कर परित्यक्त कर दिया गया। वह मेरठ पहुंची जहां अनेक बंगाली परिवार बहुत पहले से बसे थे। (टिप्पणीअरुणा आसफ़ अली मेरठ के एक बंगाली डाक्टर की बेटी थीं) वहां हेम सुंदरी नर्स बन गई प्यारेलाल शंकरी मेरठी उर्दू पत्रकार थे और नए ईसाई बने थे. हेमसुंदरी ने उनसे शादी कर ली।
प्यारेलाल-हेमसुंदरी की दूसरी बेटी नर्तकी प्रभावती (इक़बाल बेगम) बंबई में नाटकों मेँ काम करती थी। मंच पर नाम था कामिनी। वह सुन्नी मुसलमान अल्लाबख़्श की दूसरी बीवी थी। पंजाब के भेड़ा (अब पाकिस्तान) से आ बसे अल्ला बख़्श बंबई में पारसी थिएटरों में छोटे-मोटे काम करते थेजैसे हारमोनियम बजाना, संगीत सिखानाशायरी करना। ईद का चांद फ़िल्म मेँ अभिनय भी किया था, ‘शाही लुटेरा’ फ़िल्म का संगीत निर्देशन भी। निर्धन परिवार दादर में रूपतारा स्टूडियो के पास रहता था।
अरविंद कुमार
अगस्त 1933;  मीना का जन्म। अल्लाबख़्श के पास डिलीवरी कराने वाले डॉक्टर गर्दे की फ़ीस के पैसे नहीँ थे। वह बच्ची को एक इस्लामी यतीमख़ाने के दर पर छोड़ आए। कुछ देर बाद आए तो देखा बच्ची के शरीर पर चींटियां रेग रही हैं। इस दृश्य का विश्लेषण प्रसिद्ध पत्रकार विनोद मेहता ने मीना पर किताब मेँ इस तरह किया है-
मुझे लगता है कि वह क्षण मीना के अवचेतन मेँ कहीं गहरे पैठ गया था। मीना त्रासदिक भावनाओं से ग्रस्त आत्मा थी। वह कभी प्रसन्न रह ही नहीं सकती थी। ज़िंदगी ने दु:ख-दर्द और ग़म उसके नाम कर दिए थे। उसे जो रोल मिले वे भी उसकी मानसिकता के अनुरूप ही थे...
बच्ची का नाम रखा गया महज़बीँ। कहते सब उसे मुन्ना थे। चार साल की मुन्ना और बच्चोँ की तरह स्कूल जाना चाहती थीपर फ़िल्मोँ मेँ बाल कलाकार बना दी गई। निर्देशक विजय भट ने लैदरफ़ेस नाम की फ़िल्म मेँ एक दिन काम के पच्चीस रुपए दिए। महज़बीँ विजय भट को इतनी पसंद आई कि वह उसके गुरु बन गए। सन् 1940 की एक ही भूल में उन्होंने उसका नाम बेबी मीना कर दिया। तेरह साल की उम्र में रमणीक प्रोडक्शंस की फ़िल्म बच्चों का खेल मेँ वह हीरोइन मीना कुमारी बन गई। यहीं से शुरू होती है मीना कुमारी की कहानी।
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दास्ताने दर्द-मीना कुमारी’ बहुत लंबी है। इसे बढ़ाने के बहुतेरे मौक़े मिलेंगे। मैँ इसे आगे बढ़ाता भी रहूंगायह वादा रहा।
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सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com

(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

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