‘सुचित्रा’ (माधुरी) देखकर सुनील दत्त, मनोज कुमार, लता, आशा और दादा मुनि ने क्या कहा...? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 4 फ़रवरी 2018

‘सुचित्रा’ (माधुरी) देखकर सुनील दत्त, मनोज कुमार, लता, आशा और दादा मुनि ने क्या कहा...?

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-सोलह
 
                                युवा अरविंद कुमार, 'माधुरी' के दफ्तर में कार्य करते हुए              
सुस्वागतम्  सुचित्रा
जिस दिन छपकर आई उस दिन टाइम्स संस्थान के बोर्ड (निदेशक मंडल) की मीटिंग भी थी। बोर्ड ने एक मत से पत्रिका की और मेरी प्रशंसा की। लंचरूम में सभी सदस्यों ने मुझे व्यक्तिगत रूप से बधाई दी। टाइम्स के सभी समकालीन संपादकोँ और पत्रकारोँ ने भी। दिल्ली से श्री अक्षय कुमार जैन ने फ़ोन पर बधाई दी।
मैंने पत्रिका की ढेर सारी प्रतियां मंगा रखी थीं। संपादन विभाग का हर सदस्य कापियां थामे विभिन्न स्टूडियोओं की ओर चलाजहां जो फ़िल्मवाला मिला उसे एक प्रति भेंट कीऔर उसकी राय मांगी। लता मंगेशकर ने कहा जितनी रूपवती उतनी गुणवती। किसी ने कहा – फ़िल्म उद्योग को मिला वरदान
इसके दो उद्देश्य थे – अधिकाधिक फ़िल्मकार और कलाकार पत्रिका को देख लेंहमारी ओर आकर्षित हों। और फ़िल्म उद्योग मेँ चर्चा का विषय बने।
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इससे आगे इस बार मैं अपने आप कुछ नहीं कहना चाहता। पेश कर रहा हूं उस समय के विनोद तिवारी के संस्मरण जो पिक्चर प्लस के दीवानों के सामने जीती जागती तस्वीर खड़ी कर देंगे—
इंतज़ार चरम सीमा पर पहुंचा हुआ था। `सुचित्राबाज़ार में आने को हैयह चर्चा हर किसी की ज़बान पर थी। फिल्म इंडस्ट्री में यह इंतज़ार कुछ ज़्यादा ही ज़ोर मार रहा था। एक तो टीवी रहित वह ज़माना था ही अच्छी पत्रिकाओं काअच्छे पाठकअच्छे संपादकअच्छी पाठ्य सामग्री को सम्मान देने वालादूसरेटाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप खुद अपनी इंग्लिश फिल्म पत्रिका `फिल्मफेयरके रहतेजिसकी इंडस्ट्री में अच्छी खासी धाक थीहिंदी में फिल्म पत्रिका पेश करने जा रहा था। उत्सुकता तो होनी ही थी-`कैसी होगी'?
सुनील दत्त और नरगिस

इस `कैसी होगीके सबसे पहले दर्शन जिन्हें मेरे हाथों हुएवे थे सुनील दत्त। परेल में तब निर्माता निर्देशक एआर कारदार का कारदार स्टूडियो हुआ करता थाजिन्होंने दिलीप कुमार को लेकर `दिल दिया दर्द लियाइसी स्टूडियो में बनाई थी। मैं अंदर जा रहा था और सुनील दत्त मेकअप-गेटअप के साथ बाहर निकल कर दूसरी किसी शूटिंग में जाने की जल्दी में थे। `सुचित्रा' के आ जाने की बात सुनकर कुछ ठहरे तो फिर काफी देर ठहर गये। मुखपृष्ठ देखकर बोले, `किसी भी फिल्म मैगजीन के फर्स्ट इश्यू के कवर पेज के लिए मीना जी (मीना कुमारीसे ज़्यादा अच्छी कोई चॉइस हो ही नहीं सकती थी। एक्सिलेंट कवर।फिर उन्होंने एक एक पेज इत्मीनान के साथ पलटा और अनायास ही उनके मुंह से निकला, `यह मैगजीन बहुत दूर तक जाएगी। माई गुड विशेज।गाड़ी में बैठते बैठते बोले, `मैगजीन की दो कॉपी मुझे और दे दो। मैं जिस शूटिंग में जा रहा हूंवहां तुम्हारा काम मैं करता रहूंगा...'
मनोज कुमार उन दिनों `नया हीरोमाने जाते थे। सफलता की सी़ढ़ियां तेजी से चढ़ रहे थे। खार में रहते थेफ्लैट में। जुहू में बंगले का प्लॉट ले चुके थे जहां काम शुरू हो चला था। उसी सिलसिले में आर्किटेक्ट के साथ उलझे हुए थे। `सुचित्रादेखी तो जैसे खिल उठे। पढ़ने लिखने के शौकीन थे। कुछ चिढ़ाने के अंदाज में पत्नी को आवाज दी, `शशिदेखोसुचित्रा कितनी सुंदर है!'
शशि शायद किचन में थीं। चौंककर बाहर आईं।  पति पत्नी ने पत्रिका खूब सराही। मैं चलने को हुआ तो मीनाजी वाले कवर को निहारते हुए बोले, `इतनी हाई क्वालिटी मैगजीन के कवर तक पहुंचने के लिए मुझे अभी न जाने कितनी मंजिलें पार करनी होंगी!'
`सुचित्रा',`माधुरीहो गई और मनोज कुमार ने विभिन्न सफलताओं के साथ यह मंजिल अनेक बार पार की।
मनोज कुमार
सुचित्रा की प्रति लेकर आशा भोंसले से मिलने मैं, राम आौरंगाबादकर के साथ गया था क्योंकि आशाजी से मैं इसके पहले मिला नहीं था। ऐसे सभी मौकों पर राम साहब बड़े सहायक सिद्ध होते थे। वे `सिने एडवांसनाम के अंगरेजी फिल्म साप्ताहिक अखबार के लिए काम करते थे और रात को पार्टियों में देर हो जाने पर घर जाने की जगह अक्सर उसी के ऑफिस में मेज पर अखबार बिछा कर सो जाते थे। सुबह जल्दी कहीं जाना हो तो उन्हें वहीं से साथ लेना होता। वे पानी से चेहरा पोंछपांच मिनट में तैयार हो चल पड़ते थे। इसके बावजूद उस दिन आशा जी के घर पहुंचने में देर हो गई  वे रिकॉर्डिंग के लिए निकल चुकी थीं। पता चला, ताड़देव स्थित फेमस रिकॉर्डिंग स्टूडियो गई हैं जो उनके घर से ज़्यादा दूर नहीं था। बसराम साहब वहीं ले गये मुझे। आशाजी की रिहर्सल शुरू हो चुकी थी फिर भी उन्होंने रामजी के आग्रह को नहीं टाला। पत्रिका देखीसराही और फिर कहा,`फिल्म मैगजीन्स हमेशा एक्टर एक्ट्रेसेज के पीछे पड़ी रहती हैं। उम्मीद करती हूं कि आप लोग ऐसा नहीं करोगे और यह याद रखोगे कि म्यूजिक का आर्ट अपने आप में स्टार होता है...'

लता मंगेश्कर और आशा भोंसले

तो क्या वे यह कहना चाह रही थीं कि `सुचित्राका पहला कवर लता मंगेशकर को भी दिया जा सकता थाजो हो लेकिन बाद में, `माधुरीके `स्वरलिपि' स्तंभ को उन्होंने सदा बहुत सराहा जो अपने आप में एक नवीन परिकल्पना थी। संगीत से जुड़े कलाकारों को  `माधुरी ने कितनी ही बार कवर स्टोरी से नवाजा जिनमें कुंदनलाल सहगल की पेंटिंग वाला कवर बेहद सराहा गया।
अशोक कुमार के बारे में यह मशहूर था कि वे ज़्यादा लोगों से मिलना जुलना पसंद नहीं करते - पत्रकारों से भी नहीं। उनके स्टारडम का आतंक सा था तब। `सुचित्राके साथ उनका लगाव किसी प्रशंसा के साथ शुरू नहीं हुआ। वे बेहद अनुभवी थेबेहद शिष्ट और कदाचित गंभीर। मुंबई के फोर्ट एरिया में रहते थेरिद्म हाउस की ऊपरी मंजिलों में। वह जगह अशोक कुमार हाउस ही कहलाती थी। पत्रिका देखीउलटी पलटी और किनारे रख दी। चश्मा उतार कर सवालिया निगाहों के साथ पूछा,`यही स्टैंडर्ड आगे भी मेंटेन कर सकोगे तुमलोगमैंने बहुत सी मैगजीन्स शुरू होते देखी हैं। कुछ दिन ठीक निकलती हैं फिर सिक होकर चलती हैं और फिर उनका पता ही नहीं चलता।'
`हमारी कोशिश इसे बढ़िया से बढ़िया बनाते रहने की होगी,' मैंने धीरे से कहा.
ठहाका मार कर हंसे वे, `वेल सेड!'

विनोद तिवारी, 'माधुरी' के पूर्व संपादक (अरविंद कुमार के बाद)
यहां प्रसंगवश बता दूं - 
`सुचित्राके `माधुरीहो जाने के कुछ ही दिनों बाद उन्होंनेप्रेस से दूर रहने वालेगंभीर अशोक कुमार नेकार्ला केव्स के पास स्थित अपने फार्म हाउस में खेतीबाड़ी करते हुए एक फोटो फीचर `माधुरीके अनुरोध पर सहर्ष करवाया था।
यादें...यादें.... यादें... इन्हें कहीं पर विराम तो देना ही पड़ेगा। चलते चलते बस एक और सुन लीजिये।
सुचित्रा’ का अगला अंक बाजार में `माधुरीनाम से आया। क्यों ? वह एक अलग कहानी है लेकिन नाम बदलने पर हुई प्रतिक्रियाओं में से सिर्फ एक उद्धृत कर देना काफी है जो पूरे फिल्म उद्योग को प्रतिध्वनित कर रही थी--`अच्छा किया जो नाम बदल दिया। सुचित्रायानी सुंदर चित्रों से सजी पत्रिका लेकिन उस नाम में पठनीय सामग्री का महत्व चित्रों के मुकाबले कुछ कम आंका गया लग सकता था। अब ठीक है--सर्वांग रूप से मधुर--माधुरी! ये थे गीतकार पंडित भरत व्यास!(विनोद तिवारी)
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com

(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

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