ऋषि कपूर ने ‘किस’ पर प्रभाव जमाने के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड खरीदा था? बड़ा खुलासा... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

ऋषि कपूर ने ‘किस’ पर प्रभाव जमाने के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड खरीदा था? बड़ा खुलासा...

वैलेंटाइन डे पर अवॉर्ड कांड का पूरा सच!

अवॉर्डनामा बिल्कुल खुल्लमखुला....

 
            'बॉबी' में ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया              सभी फोटो : नेट से साभार
-अरविंद कुमार

अथ अवॉर्डनामा हर किसिम के अवॉर्ड, सम्मान, उपाधि​, ख़िताब, पुरस्कार, पारितोषिक प्रदाताओँ को शत शत नमन और अष्टांग प्रणाम कर के आरंभ करता हूं अवार्डनामा बिल्कुल खुल्लमखुला। 
इस अवर्डनामे का आरंभ विस्फोटक है सर्वज्ञात है कि यह विस्फोट किया है अभिनेता ऋषि कपूर ने साफ़ साफ़, खुले आम, कुछ छिपाए बिना, बीच बाज़ार, बेधड़क, बेहिचक, सरे आम, सरे बाज़ार, सीधे सीधे और खुल्लमखुल्ला भारी बम फोड़ कर अपनी किताब खुल्लमखुल्ला मेँ छपवा दिया कि मैने 1973 की फ़िल्म बी के लिए सन 1974 का श्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्मफ़ेअर अवर्ड उस ने तीस हज़ार मेँ ख़रीदा था उसका कहना है कि मेरी पहली फ़िल्म थी सफल थी मेरे पास नया नया पैसा था तीस हज़ार उड़ा डाले। 
(उनका दावा सचमुच सच भी हो सकता है–इस पर विवेचना मैँ काफ़ी बाद मे करूगा उन सब बड़े लोगोँ के नाम दे कर जो उस साल श्रेष्ठ अभिनेता अवर्ड के लिए नामांकित थे, और नहीँ चुने गए)
जो होना था हुआटीवी चैनलोँ पर गरमागरम चर्चाएं छिड़ गईं फ़िल्मावार्डप्रदाताओं के कलेजे कंपायमान हो गए सब चुप्पी साध कर बैठ गए साप सूघ गया और इंडिया टुडे चैनल पर राजदीप सरदेसाई ने सवाल दागा: अगर 1974 मेँ तीस हज़ार मेँ अवर्ड मिल गया था, तो आज सा अवर्ड क्या छह लाख मेँ भी मिल सकता है? आख़िर आज फ़िल्मोँ से कमाई नभ के पार अंतरिक्ष तक पहुंच रही है
और मैं सच कहता हूं, चाहे जिस किताब पर हाथ रखवा लेँ, सच, केवल सच और पूरा सच कहूंगा किताब मैं ने पढ़ी नहीँ है, न पढ़ने का टाइम है. पर मैँ गवाह हूं उन दिनोँ देने वालोँ के लिए–यानी कि फ़िल्मफ़ेअर के प्रकाशकोँ के लिए–तब अवर्ड बिज़नैस नहीँ थे, पत्रिका को बहुचर्चित बनाने का साधन थे हां, उन के कारिंदोँ मेँ किस के लिए यह पैसा कमाऊ बिज़नैस हो सकता था. था या नहीं, था तो किस किस के लिए था, किस ने तीस हज़ार मेँ से कितने कमाए होँगे – यह कहना मेरे लिए निश्चय ही संभव नहीँ है
हं, पानेवालोँ के लिए, फ़िल्मवालोँ के लिए अवॉर्ड बिज़नेस थे अवॉर्ड का मतलब था अगली फ़िल्मोँ के लिए उन की क़ीमत बढ़ जाना अवॉर्ड बिज़नैस थे उन चालाक, काइयां, छुटभैया दलालोँ के लिए जो पत्थर मेँ से भी तेल निकालने की कला मेँ माहिर होते हैँ

मैँ बंबई 1963 के अंतिम दिनोँ पहुचा था माधुरी (पहले पांच अंकोँ का नाम –सुचित्रा) का पहला अंक गणतंत्र दिवस 1964 को आया था तब से ही फ़िल्मफ़ेअर अवर्डोँ मेँ घपलोँ की बात सुनने मेँ आती रहती थी किस ने किस को किस जुगत से अवर्ड दिलाया, किस का कटवाया – यह कानोँकान नहीँ खुल्लम खुल्ला बखाना जाता था शान बघारी जाती थी
पुरस्कारोँ की प्रक्रिया दोहरी थी पहले तो पत्रिका एक फॉर्म छाप पर पाठकों से कई कोटियोँ के नामोँ का प्रस्ताव मागती थी यह फॉर्म कई अंकोँ मेँ छपता था उन अंकोँ की बिक्री बहुत बढ़ जाती थी यह प्रकाशकोँ के लिए बिज़नेस था
नामांकन फॉर्म छपा, दलालों का काम शुरू फ़िल्मवालोँ से पैसे ले कर ये दलाल शहर शहर अपने एजेंटोँ से अपने ग्राहक के समर्थन मेँ फॉर्म भरवा कर मंगवाते थे। शहर शहर से आए फॉर्मों का अंबार टाइम्स कार्यालय मेँ लगने लगता सब फॉर्मोँ का आकलन कर के हर कोटि मेँ सब से ज़्यादा मत पाने वालोँ के तीन (कभी कभी चार या पांच भी) नाम प्रकाशित किए जाते थे अवॉर्ड इन मेँ से किसी एक को दिए जाते थे निर्णायक मंडल का कोई भी सदस्य अपनी पसंद के किसी अतिरिक्त व्यक्ति को भी चर्चित नामोँ मेँ शामिल करवा सकता था (उन दिनोँ और मेरे वहां से आने के बाद कई साल तक टाइम्स के मालिकोँ के लिए अवर्डोँ से पैसा कमाने का सवाल ही नहीँ उठता था) निर्णायकोँ के पास प्रत्याशियोँ की तरफ़ से सिफ़ारिशेँ आने लगतीं उन्हेँ ललचाया भी जाता
एक और तरह के चतुरसुजान इन के भी उस्ताद थे! एक थे तारकनाथ गांधी – गहरे सांवले, पतले दुबले, चालाकी की जीती जागती मूरत अपनी उस्तादी के क़िस्से शान से बघारते. मैँ उन से कहता, जिस तरह ईसा के उद्भव की सूचना देने एक पैग़ंबर आया था, उसी तरह आप से पहले अवतरित संदेशवाहक पैग़ंबर थे- महात्मा गांधी तारकनाथ इस का बुरा नहीँ मानते थे मुस्कराते विहंसते से अपनी कारस्तानियोँ और जुगतोँ की लनतरानियां खुल्लमखुला बखानते रहते उन का रास्ता सीधा सादा, सपाट और सुगम था वह सभी नामांकितोँ के पास जाते अपनी सकत के, पहुंच के गुणगान करते. बताते-अरे फ़लाना, उसे तो मैँ ने अमुक अवॉर्ड दिलवाया था अवॉर्ड अपने हाथ आया समझिए बस इतनी रक़म मुझे दीजिए अवॉर्ड न मिला तो पूरी रक़म वापस!!!’ सबसे एक सी रक़म ले आते. नतीज़ा आते ही असफलोँ की रक़म वापस, सफल की रक़मजेब मेँ!!! कैसी रही!!!
अवॉर्ड दिलवाने या कटवाने के लिए कई अनोखी चालेँ चली जाती थीँ कमाल की एक सुप्रसिद्ध जुगत का मुलाहजा फ़रमाइए शंकर जयकिशन अपने संगीत के लिए हमेशा लोकप्रिय थे उन का नाम सफलता की निशानी बन गया था पर अवॉर्ड की प्यास हर साल लगी रहती
सन् 1961 के फ़िल्मफ़ेअर अवॉर्डोँ की बात है मुक़ाबला था मुग़ले आज़म के संगीत के लिए नौशाद और दिल अपना और प्रीत पराई के लिए शंकर जयकिशन के बीच। चयनकर्ता समिति के अध्यक्ष थे ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के लिए जाने वाले जस्टिस ऐम.सी. छागला वह लालच मेँ आएंगे? तौबा तौबा!!! पर वह छले गए उन के पास एक सिफ़ारिशी ख़त पहुंचा लिखा था कि आप से तवक्को है कि एक मुसलमान का ख़याल रखेँगे। लिखने वाले का नाम था – नौशाद.
जस्टिस साहब भड़क गए तय कर लिया कि संगीत का अवॉर्ड भाड़ मेँ जाए या समंदर मेँ, नौशाद को नहीँ मिलेगा नतीज़ा सब जानते हैँ पराई प्रीत जीत गई
बात शुरू हुई थी सन् 1973 के अवॉर्ड से एक तीसरे पहर हम कुछ लोग फ़िल्म्स डिवीज़न के प्रीव्यू थिएटर मेँ कोई नई बहुचर्चित आगामी फ़िल्म देख रहे थे ताज़ा समाचार लेकर आए किसी ने हांक लगाई-संगीत का अवॉर्ड बेईमान को एक पल को हैरत भरी चुप्पी छा गई, जिसे तोड़ते दर्शकोँ मेँ वी.पी. साठे ने बेईमान फ़िल्म के गीतका मुखड़ा नारे की तरह दागा जय बोलो बेईमान की !!!


यहां वी.पी. साठे का परिचय करना बेहद ज़रूरी है ख़्वाजा अहमद अब्बास और साठे राज कपूर तथा कई अन्योँ की कई फ़िल्मोँ के सह लेखक थे, जैसे आवारा, श्री चार सौ बीस। इसके साथ ही उनकी कंपनी अपने क्लायंटोँ की फ़िल्मोँ की प्रचार सामग्री तथा विज्ञापन समाचार पत्रोँ मेँ प्रकाशनार्थ जारी करते थे वह फ़िल्मोँ की चलती फिरती नसाइक्लोपीडिया थे अच्छी फ़िल्मोँ के प्रबल समर्थक थे यह जो नारा था जय बोलो बेईमान की बंबई फ़िल्म उद्योग के हर सदस्य के मन में था
उन दिनोँ का एक वाक़या बयान किए बिना मुझे चैन नहीं मिलेगा कई टिप्पणियां मैँ बीच बीच मेँ करता रहूंगा
राज कपूर ने बड़े शौक़ से, बड़ी मेहनत से, बनाई थी –मेरा नाम जोकर। एक तरह से यह उन के अपने जीवन का निचोड़ थी। जितना धन, जितना मन, उन्होँने इस पर सर्फ़ किया, वह उन के लिए अभूतपूर्व था यह बनते बनते उन के कविराज शैलेँद्र चले गए। फ़िल्म रिलीज़ हुई, और पिट गई (वह और गुरुदत्त की काग़ज़ के फूल क्योँ पिट गईं इस पर मैँ कभी एक विवेचनापूर्ण लेख लिखना चाहता हूं. क्योँ दर्शक ऐसी तकनीकी कौशल से भरपूर अच्छी फ़िल्म को ठुकरा देते हैं – इस के पीछे कथानक के मूल कथ्य का डिएंस की कई चीज़ोँ को न पचा पाना है)
तो मेरा नाम जोकर पिट गई। राज कपूर और आर.के. फ़िल्म्स लगभग दीवालिया हो गए पूरा परिवार हीनता भाव से ग्रस्त हो गया पर राज कपूर ने हिम्मत नहीं हारी थी...
उन्हीँ दिनोँ की एक अधरात का सच्चा क़िस्सा है यह (एक अधरात का वाक़या बाद मेँ पढ़ेँगे आप)
बंबई के जूहू होटल मेँ बेईमान के निर्माता सोहनलाल कंवर ने बड़े पैमाने पर शराब से लबरेज़ डिनर आयोजित किया - अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट को धन्यवाद देने के लिए (स्पष्ट है कि उस फ़िल्म के लेखे जोखे मेँ अकाउंटेंट साहब ने काफ़ी कमाल दिखाया होगा) मुझे भी जाना था गीतकार विट्ठल भाई के निवास वाल्केश्वर रोड से जुहू जाना हो तो नेपियन सी रोड पर मेरा घर रास्ते मेँ पड़ता था मेरे कहने पर विट्ठल भाई मुझे भी अपनी गाड़ी मेँ ले गए पता नहीँ 1973 से चवालीस साल बाद अब वह कैसा है! समुद्र तट के नज़दीक होने पर वह ऊंची कुर्सी पर (प्लिंथ पर) बनाया गया था उसकी तरफ़ मुंह कर के खड़े हो तो बाईँ ओर वाली दीवार के उस तरफ़ एक पतली सी गली समुद्र तट पर जा रही थी होटल के प्रवेश हाल तक पहुंचने के गोलाई मेँ नीचे सब से लंबी पायदान से सब से ऊंची पायदान छोटी होती जाती थी अब आप कल्पना करेँ तो ऊपर खडे हो कर लगता है कि आप किसी मंच पर खड़े हैँ (आगे के घटना क्रम से लिए यह ब्योरा यहीँ देना ज़रूरी था)
पार्टी पहली मंज़िल पर जिस हाल मेँ थी वहां तक जाने के लिए कोई दस बारह फ़ुट चौड़ी बाल्कनी सी थी हम लोग पहुंचे तो लगभग दस बजे होँगे। पार्टी पूरे जोश मेँ थी। क़हक़हे गूंज रहे थे दौर पर दौर चल रहे थे। मस्ती का आलम था कोई एक घंटे बाद राज कपूर आए मुझ से पूछा –आप दिल्ली जा रहे हैँ (उन के मन वह ख़बर थी कि अंतोगत्वा मैँ माधुरी छोड़कर अपने काम से वापस घर जाने वाला हूं शायद माधुरी के जैनेंद्र जैन ने बताया होगा, जो उन के साथ बौबी फ़िल्म पर काम कर रहा था। पर मैं समझा नहीं मैने कहा, नहीँ) इधर उधर की बातेँ होने लगीँ हम तीनोँ के बीच, राज ने काफ़ी पी यह उन की आदत थी इधर उधर जा कर वह औरों से बातेँ करने लगे। सोहनलाल के पास गए, नाराज़ से लौट आए चलने का समय हो आया
इत्तफ़ाक से राज, विट्ठलभाई और मैँ एक साथ बाल्कनी मेँ आए राज कपूर का मन कड़वाहट से भरा था वह सोहनलाल को बुरा भला कहने लगे जोकर क्या फ़ेल हो गई मुझे चीफ़ गैस्ट से मिलवाने के क़ाबिल नहीँ समझा राज का बयान ज़ारी था…(पता नहीं कब विट्ठल भाई एक तरफ़ चले गए) अब मैँ और राज गलबहियां डाले बाहर की ओर चलने लगे अधबीच संगमरमर की बेंच पर प्रेमनाथ पूरे मूड मेँ थे मुझे खीँचा, चुम्मी ली ऐसे मेँ मैँ जस का तस जवाब देता था मैँने प्रेमनाथ की चुम्मी ली राज का वही राग चल रहा था--लोग क्या समझते हैं, जोकर पिट गई तो मैँ पिट गया...
अब डोर प्रेमनाथ ने पकड़ ली-पापे, फ़िकर न कर। बौबी आने दे आर.के. की ईंटें तक सोने की हो जाएगी यह जुमला मुझे अभी तक याद है वह राज को ढारस बंधा रहा था कुछ देर टिक कर हम फिर चले राज का ध्यान बेईमान को मिले अवॉर्डों पर चला गया अब राज की धुन बदल गई
तब तक हम होटल के बाहर नीचे जाती सीढ़ियोँ की सब से ऊंची पायदान पर थे राज के लिए यह किसी थिएटर का मंच बन गया नीचे कोई नहीँ था ऊपर राज का हाथ मेरे गले मेँ वह शेक्सपीरियन अभिनेता की मानिंद लंबा एकल संवाद उच्चार रहा था- यह साला मादर..., बहन...करंजिया (फ़िल्मफ़ेअऱ संपादक) पैसे खाता है, बेईमान है, वग़ैरा वग़ैरा... कोई श्रोता नज़र नहीँ आ रहा था राज की गाड़ी आई वह चला गया पता नहीँ कहां से विट्ठलभाई अपनी गाड़ी के साथ नमूदार हुए
अगले दिन सुबह मैँ दफ़्तर पहुंचा तो मेज़ पर दैनिक पेपरोँ के आकार का एक फ़िल्मी साप्ताहिक रखा था सात कॉलम का बड़ा बैनर सनसनीख़ेज़ शीर्षक था, राज कपूर का फ़िल्मफ़ेअर अवॉर्डों पर आरोप समाचार मेँ मेरा नाम भी था यह आरोप राज कपूर ने माधुरी संपादक अरविंद कुमार की मौजूदगी मेँ लगाया हुआ यह होगा कि इस समाचार पत्र के संपादक सीसोदिया (पूरा नाम मुझे अब याद नहीं, पर वह मेरे सुपरचित थेवह पास वाली गली मेँ रहे होँगे
कुछ क्षण के लिए मैँ निस्तब्ध। मैँने एक नोट लगा कर वह अख़बार मैनेजिंग डायरेक्टर डॉक्टर राम तरनेजा के पास भेज दिया। लिखा –जब राज ने यह आरोप लगाया तो वह नशे मेँ थे उनकी बात काटना या बहस करना ठीक नहीँ रहता
बात आई गई हो गई लेकिन मामला नहीँ पूरे फ़िल्म उद्योग मेँ यह चर्चा से आगे बढ़ कर आक्रोश का रूप ले चुका था अभिनेता प्राण ने टाइम्स प्रकाशक कंपनी बैनेट कोलमैन के निदेशकोँ को निजी पत्र लिखा हलचल परिवर्तन मेँ बदल गई पूरे फ़िल्म उद्योग और पत्रकारोँ मेँ मैँ और मेरी पत्रिका माधुरी ईमानदारी और भ्रष्टाचार से दूरी का उपनाम बन चुके थे सब को भरोसा था टाइम्स संस्थान को भी तो मुझे भी अवार्ड समिति का सदस्य बना दिया गया अब मैँ चयन प्रक्रिया को अंदर से देख रहा था पूरा सिस्टम फ़ूलप्रूफ़ था कहीँ कोई चूक नज़र नहीँ आती थी हां, एक नया विभाग और जोड़ा गया – क्रिटिक्स अवॉर्ड (समालोचकीय अवॉर्ड) इस का उद्देश्य था बॉक्स फ़िस पर सफल फ़िल्मोँ से हट कर बनी कलात्मक फ़िल्मोँ को अवॉर्ड देना
मैँ प्रक्रिया का विवरण देने की कोशिश कर रहा हूं – याददाश्त के आधार पर जब सारे नामांकन आ जाते, तो तकनीकी अवॉर्ड (फ़ोटोग्राफ़ी, डिटिंग आदि) उन विभागोँ की ऐसोसिशन को सौँप दिए जाते उन पर कोई ग़लत टिप्पणी सुनने मेँ नहीँ आती थी जो लोकप्रिय विभाग थे, जिन में आम आदमी को रुचि होती है – श्रेष्ठ फ़िल्म, अभिनेता, अभिनेत्री, संगीत, गीत, गायक... आदि, वे निर्णायक समिति के ज़िम्मे थे सभी नामांकित फ़िल्मेँ समिति के सदस्य देखते थे कोई पचासेक दर्शकोँ की सीटोँ वाला एक डिटोरियम था उस मेँ निर्णायकोँ के परिवार जन, टाइम्स संस्थान के उच्चस्थ अधिकारी, कुछ आमंत्रित जन आते थे मुझे याद है एक बार सुरैया आईं थी पूरा बदन ज़ेवरोँ से लदा एक अनोखा आत्मविश्वास वह आजन्म अविवाहित रहीँ उनके चाहने वाले मैरीन ड्राइव पर उनके घर वाली के बाहर समुद्र तट पर बैठे मिलते थे

यह दौर पूरा हो जाने पर शुरू होती थी निर्णय प्रक्रिया हर विभाग के लिए तीन-चार सदस्योँ की उप समितियाँ बन जातीँ उनके सदस्योँ को यह पता नहीँ चलता था कि अन्य समितियोँ ने किसे चुना एक बार जानबूझ कर मैँ ग़लत निर्णय का साझीदार बना. बाद मेँ अशोक जैन ने मुझ से असहमति प्रकट की, मुझे ग़लत भी बताया गुलज़ार की फ़िल्म आंधी सन् 1975 मेँ आई थी एक तरह से वह श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रेम प्रकरण पर बनी थी मुझे पता है कि इस में अभिनय करने से पहले नायिका सुचित्रा सेन को फ़िल्म्स डिवीज़न मेँ इंदिरा जी की बहुत सारी फ़ुटेज दिखलवाई गई थी (प्रकरणवश aside: फ़िल्म के लेखक के तौर पर मेरे मित्र कमलेश्वर का नाम था पर उनकी मृत्यु के जब उन की लिखित फ़िल्मोँ मेँ आँधी का नाम आया तो गुलज़ार ने बयान दिया था कि उसमेँ कमलेश्वर ने कुछ नहीँ किया था - फ़िल्म सोसिएशनोँ के नियमोँ के अनुसार जिससे अनुबंध किया जाता है उनका उल्लेख नामावली मेँ दिया ही जाना चाहिए – तो गुलज़ार ने यह भी कहा कि यह नाम उस नियम के अधीन ही दिया गया था)
जो भी हो फ़िल्म सिनेमा हालोँ मेँ चल रही थी तब आपात्काल घोषित हो गया फ़िल्म पर प्रतिबंध लग गया तत्कालीन संबद्ध केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल अपने दो उच्चस्थ सचिवोँ द्वारा फ़िल्म उद्योग और समाचारपत्रोँ पर नकेल कसने मेँ लगे थे. मैँने कहीँ और कभी लिखा भी है – एक अधरात मेरे पास निर्माता-निर्देशक बी. आर. चोपड़ा के घर से फ़ोन आया वह बोले, आप को देर रात जगाने के लिए मुझे खेद है आप इन से बात कर लीजिए जो सज्जन फ़ोन पर आए वह उन दो सचिवोँ मेँ से एक थे शायद प्रसाद उन्होने धमकाया कि अगर यह (एक और विषय) यह नहीँ किया गया तो आप के संस्थान के सभी प्रकाशनोँ का काग़ज़ बंद कर दिया जाएगा मैने यह धमकी मैनेजिंग डायरैक्टर डक्टर तरनेजा को बता दी. उन्होने आगे क्या किया मुझे पता नहीं
तो जब आंधी का सवाल आया तो अंतिम निर्णय तो उसे श्रेष्ठ अभिनेता संजीव कुमार और समीक्षकोँ का श्रेष्ठ फ़िल्म अवॉर्ड मिले, लेकिन श्रेष्ठ फ़िल्म, निर्देशक, अभिनेत्री आदि ख़ाली रहे अशोक जी ने मुझ से जवाब तलब किया तो मैंने सफ़ाई मेँ वह धमकी सुना दी इस पर अशोक जी ने कहा आप संपादक हो, आप को डरने की ज़रूरत नहीं। मैनेजमैँट की समस्याए सुलझाने के लिए मैं हूं
जो भी हो, इस से यह सिद्ध ज़रूर हो जाता है कि समितियों का कोई सदस्य दूसरोँ को प्रभावित कर सकता है।...तो अंतिम निर्णय प्रबल सदस्योँ से प्रभावित हुआ होता है
जिस साल ऋषि कपूर को श्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला, उस साल मुक़ाबिले में थे ज़ंजीरके लिए अमिताभ बच्चन, यादोँ की बारात के लिए धर्मेंद्र, दाग़ के लिए राजेश खन्ना, कोशिश के लिए संजीव कुमार सभी अच्छी फ़िल्मेँ थीँ, सभी मेँ अन्य नामांकितोँ ने बेहतरीन अभिनय किया था!
जिस साल बेईमान को सात अवॉर्ड मिले उस साल मुक़ाबले में थीँ – श्रेष्ठ फ़िल्म बेईमान (विजयी) तथा अनुभव और पाकीज़ा श्रेष्ठ निर्देशक विजेता सोहनलाल कवर, अन्य कमाल अमरोही (पाकीज़ा), मनोज कुमार (शोर). श्रेष्ठ अभिनेता विजेता मनोज कुमार (बेईमान), अन्य राजेश खन्ना (अमर प्रेम), राजेश खन्ना (दुश्मन). श्रेष्ठ संगीत विजेता शंकर जयकिशन, अन्य ग़ुलाम मोहम्मद (पाकीज़ा), लक्ष्मीकांत प्यारेलाल (शोर). श्रेष्ठ गीत विजेता वर्मा मलिक (जय बोलो बेईमान की), अन्य आनंद बख़्शी (अमर प्रेम, चिंगारी कोई भड़के), संतोष आनंद (शोर, इक प्यार का नग़मा है). पार्श्व गायक विजेता मुकेश (बेईमान, जय बोलो बेईमान की), अन्य किशोर कुमार (अमर प्रेम, चिंगारी कोई भड़के) और मुकेश (शोर, इक प्यार का नग़मा है)
अपने ज़माने के अवर्डोँ की बात मैं यहां समाप्त करता हूं और वर्तमान पर आता हूंसरकारी दादा फाल्के अवॉर्डोँ के अतिरिक्त आज अनेक फ़िल्म पत्रिकाओं, टीवी चैनलोँ के और संस्थानोँ के अवॉर्ड्स हैँ स्वयं टाइम्स की बात लें तो फ़िल्मफ़ेअर अवॉर्ड तो है ही, टाइम्स फ़ इंडिया अवॉर्ड भी है आप ग़ौर करेँ वहां की पत्रिकाओं मेँ अब फ़िल्मफ़ेअर और फ़ैमिना ही चल रही हैँ ये दोनोँ खुलेआम बिज़नैस हैँ एक के अवॉर्ड और उन के समारोह हैँ, दूसरी के ब्यूटी कंटैस्ट हैँ और शो हैँ इन सब से करोड़ोँ की आमदनी होती है प्रायोजकोँ के बल पर। टिकटों की बिक्री से अंत मेँ इन तमाशोँ के टीवी प्रदर्शन अधिकारोँ से हम कह सकते हैँ तब ये प्रकाशकोँ के लिए बिज़नैस नहीँ थे, अब हैँ
आज पेड न्यूज़ के ज़माने मेँ प्रकाशकों के लिए पेड अवर्ड बिग-बिग-बिज़नैस हैँ, करोड़ोँ अरबोँ खरबोँ की बिग-बिग-महाबिग बिज़नैस हैँ

अरविंद कुमार


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