ऐ यार सुन ! ये वो 'अय्यारी' नहीं, जिसके बारे में 'चंद्रकांता' में पढ़ा था... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

ऐ यार सुन ! ये वो 'अय्यारी' नहीं, जिसके बारे में 'चंद्रकांता' में पढ़ा था...

फिल्म समीक्षा
टाइटल-अय्यारी  
निर्देशक-नीरज पांडे 

 ना सुराग, ना सिमसिम; जांबाजी में भी खा गए गच्चा !


सितारे-सिद्धार्थ मल्होत्रा, मनोज वाजपेयी, रकुल प्रीत सिंह, पूजा चोपड़ा, आदिल हुसैन, अनुपम खेर, नसीरुद्दीन शाह आदि।

*रवींद्र त्रिपाठी
इस फिल्म को देखने के बाद जो पहली बात दिमाग में आती है कि वो ये कि ये कहां भटक गई और कैसे भटक गई? बतौर निर्देशक नीरज पांडे अपनी फिल्मों में शुरू से आखिर तक पकड़ बनाए रखते रहे हैं। `ए वेडनेसडे’, `स्पेशल ट्वेंटी सिक्सऔर `बेबीइसके उदाहरण हैं। लेकिन इस फिल्म में वे गच्चा खा गए। इस फिल्म के बारे में प्रचारित ये किया गया था ये मुंबई के आदर्श हाउसिंग सोसाइटी वाले मसले पर बनी है जिसके बारे में आरोप लगे कि सेना की जमीन पर बने इस हाउसिंग सोसाइटी में नेताओं और नौकरशाहों ने फ्लैट लिए। जब ये खबर आई थी (2010 में) तो देश का कलेजा धक्क-सा रह गया था। उस लिहाज ये मौजूं विषय था फिल्म बनाने के लिए। लेकिन नीरज पांडे की इस फिल्म में हथियारों की खरीद फरोख्त अहम मसला है। हालांकि आदर्श हाउसिंग सोसाइटी का घोटाला भी इसमें आता है पर भरती के तौर पर। फिल्म कुछ कुछ बेमेल विवाह की तरह हो गई है। यहीं निर्देशक महोदय गच्चा खा गए। बेहतर होता वे दोनों मसलों के अलग अलग रखते।


फिल्म की कहानी
फिल्म मुख्य रूप से दो किरदारों पर केंद्रित है-एक तो मेजर जय बक्शी (सिद्धार्थ मल्होत्रा) और दूसरा कर्नल अभय सिंह (मनोज वाजपेयी)। दोनों सेना के अधिकारी है और वहां खुफिया विभाग से ताल्लुक है। अभय सिंह एक तरह से जय बक्शी का गुरु है। लेकिन जैसा कि वो कहावत है न कि गुरु गुड़ बना रहता है और चेला चीनी बन जाता है। सो चेला जय बक्शी चीनी बनने की राह पर चल निकलता है। मामला हथियारों की खरीदारी का है। जय बक्शी लंबा हाथ मारना चाहता है। पर कोई गुरु अपने चेला को चीनी बनते तो नहीं देख सकता। सो गुरु अभय सिंह अपने इस मिशन मे लग जाता है कि चेले को अपने मंसूबे में सफल न होने दिया जाए। फिर क्या? चेला आगे आगे और गुरु पीछे पीछे। इसके पीछे कई देशों की यात्रा कर लेता है दर्शक। हॉल में बैठे बैठे। कौन जीतेगा? गुरु या चेला। और किसका असली मकसद क्या है? रहस्यों के आवरण धीरे धीरे खुलते हैं। लेकिन जिस तरह से खुलते हैं उसमें थ्रिल कम और बोरियत अधिक है। 

कमियां कहां कहां रह गईं?
फिल्म एक बहुत अच्छी थ्रिलर हो सकती थी। और रक्षा क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार की तरफ संकेत करनेवाली भी। लेकिन नहीं हो सकी। असल कारण ये है कि निर्देशक ये तय नहीं कर पाया कि क्या बनाया जाए। दूसरा कारण ये है कि सिद्धार्थ मल्होत्रा मनोज वाजपेयी के आगे कमजोर पड़ गए हैं। हालांकि बात सिर्फ अभिनय की नहीं है। फिल्म की पटकथा जिस तरह लिखी गई है उसमें भी मनोज का किरदार अधिक सशक्त है और सिद्धार्थ का कमजोर। वैसे भी सिद्धार्थ मल्होत्रा अपनी पिछली कुछ फिल्मों में जम के उभर नहीं पा रहे हैं। जैसे `ए जेंटलमैन’, `बार बार देखोऔर `इत्तेफाक। और ये मौका भी उनके हाथ से गया। ऐसा लगता है। फिल्म में रोमांटिक पहलू भी है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और रकुल प्रीत सिंह के बीच। पर वो भी ठीक से उभरता नहीं है। फिल्म के गाने भी लोगों के लबों पर चढ़नेवाले नही हैं। हां, फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बहुत अच्छी है और कुछ दृश्य तो बहुत अच्छे फिल्माए गए हैं। नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर और आदिल हुसैन अपनी अपनी जगह जमें हैं। 


अय्यार का मतलब क्या है?
`अय्यारशब्द हिंदी के उस आरंभिक दौर में प्रचलित रहा है जब देवकी नंदन खत्री ने `चंद्रकांताऔर उसकी श्रृंखला के उपन्यास लिखे। नीरज की ये फिल्म उसी की याद दिलाती है। अय्यार जासूस भी था और अपनी तरह का नायक भी। प्रेमी भी। पर वह देवकीनंदन खत्री वाला अय्यार इस फिल्म में नहीं दिखा।
*(लेखक प्रख्यात कला मर्मज्ञ व फिल्म समीक्षक हैं। दिल्ली में निवास।
संपर्क – 9873196343)

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