‘माधुरी’ कैसे बनी मां-बेटे और बाप-बेटी की मनपसंद फ़िल्म पत्रिका? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 18 फ़रवरी 2018

‘माधुरी’ कैसे बनी मां-बेटे और बाप-बेटी की मनपसंद फ़िल्म पत्रिका?

पत्रिका को लोकप्रिय बानने के लिए इसकी 
विज्ञापन सामग्री मैंने खुद लिखी
                                        आशा पारेख और एके हंगल के साथ अरविंद कुमार                फो.सौ.:अरविंद कुमार
माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-अट्ठारह 
पहला अंक निकला। दफ़्तर के बाद शामोँ को बंबई लोकल के चर्चगेट स्टेशन चला जाता। कुछ दूर खड़ा बुक स्टॉल पर आने-जाने वालोँ को रुकते देखता।
सुचित्रा’ पोस्टर नुमायां था। लोग घर पहुंचने की जल्दी में होते थे। कभी कोई रुकता, पोस्टर पर मीना कुमारी की मोहक तस्वीर को देखता। सोचता कहीँ कोई नई फ़िल्म तो नहीं। कोई पास ही रखी ‘सुचित्रा’ उठा लेतापन्ने पलटताबारह आने देकर ख़रीद लेता। मेरा चेहरा खिल उठता। उसका व्यक्तित्व समझने की कोशिश करता। कभी मैँ टाइम्स के स्थानीय वितरक पारसी सज्जन श्री बुकबाइंडर के सुझाव सुनता। बंबई मेँ अपने परिचितोँ दोस्तोँ की प्रतिक्रिया सुनता। जो नए लोग मिलते उन के सुझाव भी सुनता।
सर्जेई आईजेंसटाइन, रूसी फिल्मकार
मेरे अपने दिल्ली और मेरठ मेँ पारंपरिक समाज मेँ फ़िल्म देखना अच्छा नहीं समझा जाता था। पिताजी तो आधुनिक थेपर ख़ानदान पुरातनपंथी। मेरे एक किशोर चचा फ़िल्मी गाने ज़ोर ज़ोर से गाते तो बदचलन समझे जाते थे। नौजवान बच्चोँ का फ़िल्म पत्रिका पढ़ना घोर पतन का सबूत मानी जाती धी। मेरा लक्ष्य था ऐसे ही परिवारोँ के हर सदस्य की प्रिय पत्रिका बनाना। अपनी पत्रिका के द्वारा सिनेमा की समझ बढ़ाना।
इसके लिए मैंने कुछ विज्ञापन अपने आप लिखे। केवल टैक्स्ट। कोई तस्वीर नहीँ। शीर्षक कुछ इस तरह के थे – “मां बेटे की फ़िल्म पत्रिका  “बाप बेटी की फ़िल्म पत्रिका। यानी घर के हर सदस्य के योग्य पत्रिका। शीर्षक के नीचे मैटर लगभग एक सा होता। सिनेमा बीसवीँ सदी की श्रेष्ठ कला है। अपने बच्चोँ को गुमराह होने से बचाइएअच्छी फ़िल्म पत्रिका ‘सुचित्रा’ पढ़वाइए।
ये सामान्य हिंदी पत्र-पत्रिकाओँ मेँ छपे हीमैंने सभी राजनीतिक पार्टियोँ के मुखपत्रोँ मेँ भी छपवाए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साप्ताहिक ‘पाञ्चजन्य’ में भी तो कम्युनिस्ट पार्टी के साप्ताहिक मेँ भी। साहित्यिक पत्रिकाओँ मेँ भी। उद्देश्य था वैचारिक तौर पर जाग्रत लोगोँ को भी ‘सुचित्रा’ की ओर आकर्षित करना। यह स्ट्रैटेजी कारगर सिद्ध हुई।
आम दर्शक की तरह मैं भी नहीं जानता था कि फ़िल्म कैसे बनती हैँमनोरंजन से बढ़ कर वे कला भी क्योँ हैँ। तो मैंने यह जानकारी हासिल की कई फ़िल्मोँ की शूटिंग देख करसर्जेई आईजैंस्टाइन (1898–1948)  और फ्सेवोलोड पुडोवकिन (1893–1953) जैसे रूसी फ़िल्मकार और थ्योरिटिशियनोँ की किताबें पढ़ करतब बहुचर्चित फ़्रांसीसी फ़िल्मकारों की जानकरी पाकरकलात्मक फ़िल्म आंदोलनों के इंग्लिश के ‘फ़िल्म्स ऐंड फ़िल्मिंग’, ‘साइट ऐंड साउंड’, ‘काहीर दु सिनेमा’ जैसे, और अमरीका के लोकप्रिय फ़िल्म ‘वैराइटी’ जैसी पत्रिकाओँ का टाइम्स की लाइब्रेरी की ओर से निरंतर मंगवा कर।
फ्सेवोलोड पुडोवकिन, रूसी फिल्मकार

उन्हीं दिनोँ मेरा संपर्क हुआ बंबई मेँ कला फ़िल्मोँ की पैरवी करने वाले अरुण कौल जैसे सक्रिय नौजवानोँ से। यही नहीँबंबइया फ़िल्मोँ के तौर तरीक़ोँ से ही नहीँउससे जुड़े पत्रकारोँ के जो पैमाने होते थेवह भी मेरे लिए अपरिचित थे। मसलन वे हर आने वाली फ़िल्म को उस की स्टार वैल्यू के हिसाब से देखते थे। मैँ हर फ़िल्म को उसके कन्टैन्ट से देखता था। अच्छी फ़िल्म वह जो अच्छी लगे – स्टार छोटे हैँ या बड़े यह मेरे लिए उस की गुणवत्ता का कोई पैमाना नहीँ था।
इस सबसे मुझे ‘सुचित्रा’ और बाद मेँ ‘माधुरी’ की सामग्री को रूप देने मेँ पूरी सहायता मिली।
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com

(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

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