श्रीमद्भागवत गीता के श्लोकों को उर्दू में गा रहा हूं-अनूप जलोटा - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

श्रीमद्भागवत गीता के श्लोकों को उर्दू में गा रहा हूं-अनूप जलोटा


"मेरे भजन पाकिस्तान में भी खूब सुने जाते हैं"

ख़ास मुलाक़ात अनूप जलोटा के साथ 

भजन गायक अनूप जलोटा

भजन गायन के क्षेत्र में उपस्थिति दर्ज़ कराने वाले गायकों की लम्बी फेहरिस्त है, लेकिन अनूप जलोटा का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं। सरहद पार भी इनके प्रशंसक मौजूद हैं। इन्होंने भजन गायन को  नया आयाम दिया है। मुंबई के दादर स्थित उनके आवास पर उनसे एक खास बातचीत की वरिष्ठ पत्रकार संजय सिन्हा ने। पेश हैं मुख्य अंश-

सवाल - आपने भजन -गायन के क्षेत्र में एक लंबा अरसा तय किया है। तब से अब में क्या फ़र्क़ महसूस करते हैं?
जवाब - सही कहा अपने। एक लंबा सफर तय करके मैं यहां तक पहुंचा हूं। जब मैंने भजन गाना शुरू किया था, तब दो तरह से भजन गाये जाते थे-सरलता से और शास्त्रीय रागों के साथ। दोनों शैलियों के अलग-अलग सुनने वाले थे। मेरे पिता, पंडित जसराज आदि शास्त्रीय रागों के साथ गाते थे। तब मैंने एक नया प्रयोग शुरू किया। मैंने दोनों शैलियों के बीच का एक रास्ता निकाला-जिसमे सरलता भी थी और शास्त्रीयता भी। मेरे इस प्रयास को लोगों ने पसंद भी किया। मैंने गाया-'ऐसी लागी लगन,मीरा हो गई मगन...'.इसमें  सरगम भी है,सुंदरता भी है,राग की रवानी है और चंचलता भी। इस भजन को देश-विदेशों में लोगों ने बेहद पसंद किया और इस तरह मेरी यह शैली बहुत लोकप्रिय हुई। मेरे बाद और भी लोगों ने इसी अंदाज़ में गाना शुरू किया। शुरू-शुरू में तो सब कुछ ठीक था लेकिन बाद में भजन के 'शेप' में थोड़ा बदलाव आया। अब तो लोग गाने लगे हैं-'मंदिर के पीछे क्या है...' ऐसे भजनों में तो माधुरी दीक्षित की याद आने लगती है (हंसते हुए), भगवान् कम याद आते हैं। दरअसल भजन-गायन में शुद्धता होनी चाहिए। इसके बिना भजन का कोई मतलब नहीं। राग की ऐसी रवानी हो कि लोग सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाएं।

सवाल - आपको ऐसा नहीं लगता कि भजन के कद्रदानों में कमी आती जा रही है? लोग-बाग़ वेस्टर्न कल्चर की तरफ झुकते जा रहे हैं?
जवाब - ऐसी बात नहीं है। सच तो ये है कि भजन सुनने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। दर्जनों धार्मिक टीवी चैनल्स खुल गए हैं,जिनमे दिन-रात कीर्तन और भजनों के कार्यक्रम चल रहे हैं,कथाएं हो रहीं हैं। इन दिनों तो गांव-गांव में कथाएं हो रहीं हैं, कीर्तन हो रहे हैं। भजनों की इतनी लोकप्रियता की मैंने कल्पना भी नहीं की थी। कुछ महीने पहले मैं पकिस्तान गया था। वहां लगभग पचास हज़ार लोग मुझे सुनने आ गए। मुझे यह देखकर हैरत हुई कि पकिस्तान में भी भजनों के इतने श्रोता हैं। वहां मुझसे लोग फरमाइशें करने लगे कि 'ऐसी लागी लगन...' और 'मइया मोरी मैं नहीं माखन खायो...' सुनाइए। मैं दंग रह गया। मुझे ख़ुशी भी हुई और मैंने पूरे मन से गाया।

सवाल- मैं विशेषकर नई पीढ़ी के लोगों की बात कर रहा था। चालीस और पचास के ऊपर वाले तो भजन के मुरीद हैं ही। इस पर आप क्या कहेंगे?
जवाब- आपका ये सोचना गलत है। नई पीढ़ी में भी भजनों का क्रेज है। वह भजन सुनना चाहते हैं, गाना चाहते हैं। मेरे घर पर भजन सीखने आने वाले लोगों में ज़्यादातर किशोर और युवा हैं। पंद्रह से लेकर अट्ठारह-उन्नीस साल के युवक और युवतियां तो हैं ही, इससे कम उम्र के भी छात्र-छात्राएं हैं। भजन का मतलब सिर्फ 'हरे रामा हरे कृष्णा' गाना ही नहीं है। संतों की वाणी, कथाएं तो हैं हीं, साथ ही भजनों के माध्यम से 'लाइफ' को 'अपलिफ्ट' किया जाता है। भजनों के बहुत सारे पार्ट्स हैं। मनुष्य के उत्थान के लिए जिन-जिन चीज़ों की ज़रूरत है, उन चीज़ों को भजन के माध्यम से सिखाया जा सकता है। मेरे पास बहुत सारे डॉक्टर्स आते हैं। कहते हैं कि सर्जरी के दौरान आपका भजन लगाने से एकाग्रता बढ़ती है और ऑपरेशन सफल होता है। कुछ स्टूडेंट्स आते हैं, जो बोलते हैं कि अध्ययन के समय आपका भजन लगाने से मन को शक्ति मिलती है और एकाग्रता में इज़ाफ़ा होता है। कुछ साल पहले कोलकता में धनञ्जय को फांसी हो रही थी। मेरे पास खबर आई कि उसने अपनी अंतिम इच्छा मेरा भजन 'ऐसी लागी लगन' सुनने की जताई। फिर कैसेट की व्यवस्था की गई और उसे सुनाया गया।
भजन गायक अनूप जलोटा के साथ संजय सिन्हा
सवाल - आपकी नज़र में भजन की परिभाषा क्या है?
जवाब - भजन में जीवन का सार छुपा हुोता है। इसमें बहुत कुछ है। इसको मन से महसूस करने की ज़रूरत है। आमतौर पर कुछ लोग ये सोचते हैं कि जीवन के अंतिम क्षणों में भजन सुनना चाहिए, लेकिन ऐसी कोई बात नहीं। जीवन के हर पड़ाव पर भजन का आनंद लेना चाहिए। जीवन में एकाग्रता भजन सुनने से बढ़ती है। डीजे सुनकर मन एकाग्र नहीं हो सकता।

सवाल - फुर्सत के क्षणों में आप क्या करते हैं?
जवाब - जब भी फुर्सत में होता हूं, अच्छी भजनें सुनता हूं, ग़ज़लें सुनता हूं। मुझे गुलाम अली, मेहंदी हसन और बेगम अख्तर बहुत पसंद हैं। इनकी ग़ज़लें मैं बहुत चाव से सुनता हूं। कभी कभी मैं सोचता हूं कि भगवान् की आवाज़ कैसी, फिर कल्पना करता हूं कि-जगजीत सिंह जैसी होगी, जिसमें एक गहराव है, फीलिंग है। मैंने भी बहुत सारी ग़ज़लें गायीं हैं। उन ग़ज़लों को भी सुनता हूं। भजन और ग़ज़ल गायन ने मुझे बहुत कुछ दिया है। इस उम्र में भी फिट हूं। चौंसठ का हो गाया हूं, लेकिन मुझे सौ वर्षों तक जीना है (मुस्कुराते हुए)। 

सवाल - उन नवोदित कलाकारों के लिए क्या कहना चाहेंगे, जो भजन और ग़ज़ल गायन के क्षेत्र में आना चाहते हैं?
जवाब - शास्त्रीय संगीत में रुचि रखें। इसे सुनें और सीखें। इससे भजन गायन में कशिश पैदा होगी। एक जादू आएगा। शॉर्टकट रास्ते की तरफ न जाकर सीढ़ी-दर-सीढ़ी आगे बढ़ें। आजकल रियलिटी शोज का ज़माना है, लेकिन रियलिटी शोज के ज़रिये सामने आने वाले कलाकार जल्दी ही दम तोड़ देते हैं। शॉर्टकट बाद में शॉर्ट सर्किट बन जाता है।

सवाल - इन दिनों नया क्या कर रहे हैं आप?
जवाब एक बहुत ही सुन्दर कार्य हो रहा है। श्रीमदभागवत गीता के सात सौ संस्कृत के श्लोकों को मैं सत्रह सौ उर्दू शेरों में गा रहा हूं। इसे लखनऊ के एक शायर अनवर जलालवी ने लिखा है। पिछले दिनों उनका निधन भी हो गया, मगर रिकॉर्डिंग का काम चल रहा है। अब तक लगभग एक हज़ार शेरों को मैं गा चुका हूं। जल्द ही यह प्रोजेक्ट पूरा होगा। अल्बम आते ही प्रधानमंत्री से मिलने की योजना बन रही है। मैं कुछ माह पहले पकिस्तान गाया था तो मैंने वहां श्रीमदभागवत गीता को उर्दू में गाया, जिसे लोगों ने बेहद पसंद किया। अनवर साहब ने उर्दू में बहुत ही खूबसूरत तरीके से शेरों को लिखा है। बतौर बानगी- 'धृतराष्ट्र आंखों से महदूद थे, ये न समझो कि मासूम थे....'। संस्कृत के श्लोकों को उर्दू में गाकर असीम आनंद मिला। 

सवाल - अपने प्रशंसकों को और क्या सन्देश देना चाहेंगे?
जवाब - यही कि जीवन को सुन्दर बनाएं। जीवन जीने की कला यानी 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' आप ज़रूर सीखें, मगर इसके साथ ही 'आर्ट ऑफ़ लीविंग' यानी अनावश्यक चीज़ों को छोड़ने की कला भी सीखनी चाहिए।

(संजय सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार और अभिनेता भी हैं। कोलकाता में निवास।
संपर्क - picctureplus2016@gmail.com)

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