कैसे बनी संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 18 मार्च 2018

कैसे बनी संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ?


दोस्तीफिल्म में संगीत दिया था लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने लेकिन 
माउथऑर्गन बजाया था आर.डी. बर्मन ने :

माधुरीके संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग - 22

आशा पारेख, ए.के. हंगल और अरविंद कुमार 
सन् 1963 मेँ बाबूभाई मिस्त्री की फ़िल्म पारसमणि के गीत हंसता हुआ नूरानी चेहरा / काली ज़ुल्फ़ें रंग सुनहरा / तेरी जवानी - तौबा रे तौबासे निगाह मेँ आई संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी नेदोस्तीसे शंकर-जयकिशन (संगम) और मदनमोहन (वो कौन थी) जैसे दिग्गजोँ को पछाड़ कर चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे के लिए 1964 का फ़िल्मफ़ेअर का श्रेष्ठ संगीत अवॉर्ड मार लिया और कुल मिला कर 635 फ़िल्मोँ में संगीत दिया।

बचपन : लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से तीन साल बड़ा था। दीवाली (1937) पर जन्म के कारण उसका नाम तो था लक्ष्मीकांत पर बंबई के विले पार्ले (पूर्व) की गंदी बस्ती मेँ रहने वाला उसका परिवार ग़रीबी मेँ डूबा था। संगीत से जुड़े उसके पिता शांताराम कुंडालकर बचपन मेँ ही चले गए। लक्ष्मी की पढ़ाई अधूरी रह गई। पिता के संगीत प्रेमी दोस्त की सलाह पर बड़े भाई के साथ वह भी संगीत सीखने लगा। भाई ने तबला सीखा, लक्ष्मी ने मैंडोलिन। कमाई के लिए वाद्योँ पर शास्त्रीय संगीत के कंसर्ट ऑर्गेनाइज किए। बालमुकुंद इंदौरकर तथा हुस्नलाल भगतराम जोड़ी के हुस्नलाल से मैंडोलिन मेँ विशेषता पाई। 1949 की भक्त पुंडलीक और 1950 की आंखेँ तथा कुछ गुजराती फ़िल्मोँ मेँ बाल कलाकार के रूप मेँ अभिनय भी किया।

लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल
लक्ष्मीकांत गोरा चिट्टा सुंदर था, तो प्यारेलाल कुछ ज़्यादा ही सांवला। सितंबर 1940 मेँ जन्मे प्यारेलाल के पिता रामप्रसाद शर्मा प्रसिद्ध ट्रंप्टियर थे। प्यारेलाल गोआनी एंथनी गोनसाल्विसे वायलिन सीख रहा था (अमर अकबर एंथनी फ़िल्म का गीत माई नेम इज़ एंथनी गोनसाल्वि उन्हीँ का अभिनंदन है)। आठ साल की उम्र से ही वह हर दिन आठ से बारह घंटे रियाज़ करता। उसके बारह साल का होते होते घर की आर्थिक हालत ख़स्ता हो गई। कमाने के लिए रिकार्डिंग स्टूडियोओँ में बजाने लगा।
गोआनी एंथोनी गोल्साल्विस
बचपन मेँ दोनोँ ‘सुरील कला केंद्र’ मेँ मिलेदोस्त बनेदोस्त रहे और काम तलाशते रहे। रिकार्डिंग स्टूडियोओँ के चक्कर लगातेकभी काम मिलताकभी नहीँ। बंबई मेँ बात बनती नज़र नहीँ आई तो मद्रास गएख़ाली हाथ लौट आए। प्यारेला संगीत आदि कलाओँ की राजधानी वियना (स्ट्रिया) जाने को उत्सुक थालक्ष्मी ने रोक लिया। उन दिनोँ उनके कुछ साथी थे – संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा और फ़्ल्यूट वादक हरिप्रसाद चौरसिया। ओ.पी. नैयर और शंकर जयकिशन के अतिरिक्त लगभग सभी संगीत निर्देशकोँ के साथ दोनोँ ने कुछ न कुछ काम किया। पहला नियमित काम मिला कल्याणजी-आनंदजी के सहायक काजो 1953 से 1963 तक चला। अब रास्ते खुलने लगे - शचिनदेव बर्मन के साथ ‘ज़िद्दी’ में और आर.डी. बर्मन के साथ ‘छोटे नवाब’ में म्यूज़िक अरेंजर बने। म्यूज़िक अरेंजर का काम होता है कि गीत की रिकार्डिंग की समय कब कौन सा बाजा बजाया जाएगाउसके स्वर क्या होंगेउसके बाद कौन सा दूसरा बाजा उस का स्वर उठाएगाकब सब एकसाथ कब बजेंगेउनके सामने माइक कितनी दूरी पर रखना ठीक रहेगा...आदि। अच्छा अरेंजर होने का मतलब है हर वाद्य की पूरी जानकारी होनासंगीत की जो तकनीकी स्वरलिपि पढ़ और बना पाना। मतलब पूरी तरह संगीत का जानकार होना।

आर.डी. बर्मन और उनका माउथऑर्गन
आर.डी. बर्मन और लक्ष्मीकांत की दोस्ती हमेशा बनी रही। दोस्तीके दो गानोँ मेँ माउथआर्गन आर.डी. ने ही बजाया था।
दोस्तीमेँ गीत लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी ने, छह गानोँ मेँ से पांच गाए मोहम्मद रफ़ी ने गाए और छठा (गुड़िया हम से रूठी रहोगी) लता मंगेशकर ने।

यह सही है कि अपने कैरियर में इस जोड़ी ने रफ़ी, लता और आशा को प्रथम स्थान दिया। कई बार तो निर्माता की पसंद ठुकरा कर भी रफ़ी से गवाते थे। किशोर कुमार से भी दोनोँ की जमती थी। किशोर ने उनके लिए 402 गीत गाए, जबकि रफ़ी ने लगभग 388, आशा भोँसले ने 485 । आशा का गाया अनहोनी’ (1974) का गीत हंगामा हो गयातो 2014 की क्वीनमेँ एक अतिरिक्त गायक अरिजित सिंह के साथ फिर से रिकॉर्ड किया गया।
आशा भोंसले


1964 की दोस्तीके दो साल बाद एक बार 1966 मेँ जे. ओमप्रकाश की धर्मेंद्र और आशा पारेख की आए दिन बहार केने उनकी लोकप्रियता सिद्ध कर दी। लता मंगेशकर के सुनो सजना’, मोहम्मद रफ़ी के मेरे दुश्मनऔर आशा भोँसले के ख़त लिख देने पता नहीँ क्योँ मुझे लक्ष्मी-प्यारे की सफलता अपनी सफलता लगने लगी थी। शायद इसलिए कि वे दोनों मेरी ही तरह कठिन परिस्थितियों मेँ पले पुसे थे। किसी शादी मेँ सन् 1967 मेँ मैँ दिल्ली गया था। शादियोँ के दिन थे। जगह जगह शादी हो रही थी। हर शादी मेँ मिलनफ़िल्म के गाने सावन का महीना पवन करे सोरकी रिकार्डिंगहो रही थी। बंबई मेँ रिकार्डिंगका मतलब है गाना पूरी तरह तैयार होकर किसी स्टूडियो मेँ रिकार्ड किया जाना। दिल्ली मेँ रिकार्डिंगका मतलब था शादी-ब्याह मेँ या किसी समारोह में लाउड स्पीकर के ज़रिए बजाया जाना। तो हर जगह सावन का महीना पवन करे सोरकी रिकार्डिंगहो रही थी। यह सबूत था कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल उत्तर भारत की सामाजिक पसंद बन चुके थे।  
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक - पिक्चर प्लस)

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