'परी' शब्द के नए प्रतिमान गढ़ती एक फिल्म... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 4 मार्च 2018

'परी' शब्द के नए प्रतिमान गढ़ती एक फिल्म...


फिल्म समीक्षा
टाइटल - परी
निर्देशक - प्रोसित रॉय
सितारे - अनुष्का शर्मा, परमब्रत चटर्जी, रजत कपूर,ऋताभरी चक्रवर्ती
रेटिंग – 2.5 स्टार


*रवींद्र त्रिपाठी
हालांकि इसका नाम `परी’ (पूरा नाम `परी : नॉट ए फेरी टेल’) है लेकिन इसमे परीकथा जैसा कुछ नहीं है। ये एक हॉरर फिल्म है। यानी डरावनी। और सच में कई जगहों पर डराती है। इसमें अनुष्का शर्मा की केंद्रीय भूमिका है। पर साथ ही ये भी जानना जरूरी है कि अनुष्का इसके दो प्रोडयूसरों में एक है। दूसरे प्रॉडयूसर अनुष्का के भाई कर्णेश शर्मा है। यानी अनुष्का ने जानबूझकर एक ऐसी भूमिका निभाई है जिसमें एक बड़ा खतरा रहता है कि ऐसी फिल्म में काम करनेवाली अभिनेत्री की छवि बदल जाए। बॉलीवुड की अभिनेत्रियां ज्यादातर रोमांटिक भूमिकाएं निभाना पंसद करती हैं या एक्शन। लेकिन अनुष्का ने इस धारणा को बदलने की कोशिश की है। इस बात की तो तारीफ करनी ही होगी कि उन्होंने एक जोखम मोल लिया है। वैसे जोखम उठाना कलाकार का धर्म है। पर कितने कलाकार ऐसे धर्म निभाते हैं?
कहानी में क्या है?
अनुष्का ने रूखसाना नाम के जिस किरदार को इस फिल्म में निभाया है वह आम बोलचाल में चुड़ैल जैसी है। कहानी ने इफ्रीत नाम के एक इस्लामी मिथकीय रूह का इस्तेमाल किया गया है। इफ्रीत कहीं दिखाई नहीं देता। सिर्फ उसकी आवाज़ सुनाई देती है। एक तरह से वो निराकार होता है। लेकिन उसकी शैतानी चाहते होती हैं। इफ्रीत खुद अलग सत्ता चाहता है और वह ऐसे बच्चों को संसार में लाता है जिनके अंदर विष भरा होता है और जो खून पीकर ही अपने अंदर के विष को खत्म करते हैं। रूखसाना भी ऐसी ही बच्ची के रूप में जन्मी। ऐसे बच्चों को खत्म करने के लिए क़यामत आंदोलन शुरू किया है जिसका एक प्रोफेसर (रजत कपूर) है। वह कई बरसों से रूखसाना को ढूंढने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं हो पाता। ये प्रोफेसर भी कुछ तांत्रिक किस्म का है। वो उन गर्भस्थ शिशुओं को औरतों के पेट से निकालकर मारता है जो इफ्रीत के दुष्प्रभाव से पैदा होते हैं। क्या रूखसाना बच्चे के साथ भी वो वही सलूक कर पाएगा जो उसके पेट में है और जो अर्नब (परमब्रत चटर्जी) नाम के एक नौजवान के साथ उसके रिश्ते के कारण अस्तित्व में आनेवाला है?


क्यों देखें यह फिल्म?
हालांकि जो हॉरर फिल्मों के शुद्ध किस्म के प्रेमी हैं उनको `परीसे शिकायतें होंगी। वे कहेंगे कि ये हॉरर फिल्मों के प्रतिमान पर खरी नहीं उतरती है और इसमें रोमांस भी डाला गया है। ये भी समझ नहीं आता कि रूखसाना एक पीड़ित है या दूसरों को पीड़ा देती है? इसके बारे में सटीक रूप से कुछ कहा भी नहीं जा सकता है। पर दूसरी तरफ ये भी सही है कि `परी  कुछ जगहों पर एक बेहद डरावनी फिल्म बन जाती है और साथ ही रहस्यात्मक भी। और आखिर तक इस रहस्य का खुलासा नहीं होता कि जिस क़यामत आंदोलन का नेता प्रोफेसर है वो क्या चीज है और कैसे अस्तित्व में आई?
`परीआखिर तक आते ये एक प्रेम कथा भी बन जाती है। दर्शक के मन में ये सवाल उठ सकता है कि आखिर इस चुड़ैल के मन में प्यार की भावना क्या सहज है? फिर भी निर्देशक ने जिस तरह रूखसाना के व्यक्तित्व को उभारा है वह एक कठिन डगर पर चलने जैसा है। रूखसाना के लिए दर्शकों के मन में
सहानुभूति भी होनी चाहिए और उसे डरावनी बनाकर भी पेश करना है। अनुष्का दोनों ही काम कर सकी है। कई जगहों पर कुछ चीजें उटपटांग भी लगती हैं। जैसे ये कि नवजात शिशुओं के शव बरामद होने का क्या मतलब है? लेकिन ह़ॉरर फिल्मों में `क्यों का कुछ खास मतलब नहीं होता। उसमें बहुत सारी चीजें तार्किक नहीं भी होतीं। `परी के बारे में ये सब कहा जा सकता है। इसमें कई अतार्किकताएं है। जैसे इसका नाम ही `परीक्यों है ये समझ में नहीं आता।

*(लेखक प्रख्यात कला मर्मज्ञ और फिल्म समीक्षक हैं। दिल्ली में निवास। संपर्क-9873196343)

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