वो चौंसठ साल की उम्र में बने फिल्म अभिनेता, मिला था पद्मभूषण - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 4 मार्च 2018

वो चौंसठ साल की उम्र में बने फिल्म अभिनेता, मिला था पद्मभूषण


 माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-बीस
अरविंद कुमार 
 पिछले रविवार का अपना फ़ीचर मैंने हरींद्रनाथ चट्टोपाध्याय से मुलाक़ात के साथ शुरू किया था और उनके कथन आजकल वक़्त ख़राब चल रहा है से बात फ़िल्म जगत मेँ भाग्यवादिता पर मोड़ दी थी। उनकी साहब बीबी और ग़ुलाम’, ‘तेरे घर के सामनेऔर घरबार (द हाउस होल्डर)का ज़िक्र किया था। पर इतने से उनकी चर्चा को समाप्त नहीँ किया जा सकता। तो इस बार पढ़िए...

हरींद्रनाथ नाम है उस मस्तमौला कवि-नाटककार-सामाजिक कार्यकर्ता-अभिनेता का जिसका जन्म निज़ाम वाले हैदराबाद के मशहूर कुलीन ब्राह्मण चट्टोपाध्याय के घर हुआ। पिता थे भारत के पहले डी.एससी (D.Sc) वैज्ञानिक-दार्शनिक अघोरनाथ चट्टोपाध्याय। उनके प्रयास से खुला था हैदराबाद कालिज जो बाद मेँ निज़ाम कालिज कहलाया। मां थीं गायिका-कवियित्री बरदा सुंदरी देवी। बड़ी बहन थी भारतकोकिलाके नाम से जाने वाली इंग्लिश कवियित्री सरोजिनी नायडू जो कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षा भी रहीं। बड़े भाई थे अंतरराष्ट्रीय स्तर के कम्यूनिस्ट नेता वीरेंद्रनाथ।

'बावर्ची' के 'दादू'
बात हरींद्र की हो रही है, पर उनकी पत्नी कमलादेवी चट्टोपाध्याय की चर्चा करना भी आवश्यक है। कन्नड़ मूल की कमलादेवी के पिता अनंथैया धारेश्वर मैसूर राज्य के महत्वपूर्ण बंदरगाह वाले मंगलौर के कलक्टर थे। कलाओं में सक्रिय मां गिरिजादेवी कर्णाटक के अभिजात्य वर्ग की थीँ।
कमलादेवी को श्रेय जाता है ऑल इंडिया वीमैन्स कॉन्फ्रेंस और इंडियन को-ऑपरेटिव यूनियन (जो बाद मेँ ऑल इंडियन हैंडीक्राफ़्ट्स बोर्ड बना) की स्थापना का। उन्हीं की प्रेरणा से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तथा संगीत नाटक अकादमी बनीँ। नई दिल्ली मेँ होम साइंस के पहले कॉलेज लेडी इर्विन कॉलिज की स्थापना की प्रेरक भी वही थीँ। भारत सरकार ने सन् 1955 मेँ उन्हें पद्मभूषण अवॉर्ड से अलंकृत किया तो पद्मविभूषण से 1987 में। 1966 मेँ उन्हेँ एशिया का गरिमाशाली मैग्सेसे अवॉर्ड मिला और संगीत नाटक अकादमी की फ़ैलोशिप के साथ अकादमी का उच्चतम सम्मान रत्न सदस्य मिला। 1977 मेँ यूनेस्को ने हस्तशिल्प के प्रोन्नयन मेँ उनके योगदान के लिए सम्मानित किया।
'आशीर्वाद' के 'बैजू ढोलकिया'
कमलादेवी 17 साल की उम्र मेँ विधवा हो गई थीं। मद्रास मेँ पढ़ते 20 साल की कमला की मुलाक़ात 22 साल के हरींद्र से हुई। दोनोँ ने विवाह कर लिया। दोनों कला तथा राजनीति के क्षेत्र मेँ सक्रिय रहे। हरींद्र और कमला नाटक लिखते और करते थे। कमला ने कन्नड़ की दो साइलैंट फ़िल्मोँ मेँ काम किया, इनमें से एक शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकमेँ नायिका वसंतसेना बनीँ। 1943 मेँ उन्होँने सहगल वाली तानसेनमेँ एक भूमिका निभाई, बाद मेँ शंकर पार्वती’ 1943 और धन्ना भगत’ 1945 मेँ भी वह परदे पर आईं। कई साल बाद कमला ने हरींद्र को तलाक़ दे दिया। दोनों का एक बेटा भी हुआ। स्वयं हरींद्र को 1973 मेँ पद्मभूषण से अलंकृत किया गया था।
'तेरे घर के सामने' में नूतन के साथ
ऐसी पृष्ठभूमि वाला हरींद्र किसी सांचे मेँ फ़िट न होने वाला बंदा था। फ़िल्मोँ मेँ वह चौँसठ साल की उमर में आया। जिन बीस फ़िल्मोँ मेँ उसने किस भूमिका मेँ काम किया, कालक्रमानुसार वे हैँ:
साहब बीबी और गुलाम’ (घड़ी बाबू), ‘तेरे घर के सामने’ (सेठ करमचंद), ‘घरबारऔर उसका इंग्लिश संस्करण द हाउस होल्डर’ (मिस्टर चड्ढा), ‘सांझ और सवेरा’ (राधा का चाचा), ‘तीन देवियां’ (मिस्टर पिंटो), ‘प्यार मोहब्बत’ (ठाकुर शमशेर सिंह), ‘पिंजरे का पंछी’ (मिस इंडिया का बाप), ‘राज़’ (बाबा), नरगिस वाली रात और दिन’ (मिस्टर डे), ‘नौनिहाल’ (पागल), सत्यजित की बंगाली फ़िल्म गूपी गाइन बाघा बाइन’ (जादूगर), ‘आशीर्वाद’ (बैजू ढोलकिया), बंगाली सीमाबद्ध’ (सर बारेन राय), ‘बावर्ची’ (दादूजी - शिवनाथ शर्मा), बंगाली सोनार किल्ला’ (सिद्धु ज्याथा - अंकल सिद्धु), महेश भट की आशियाना’ (पात्र का नाम याद नहीं), ‘महबूबा’ (रीता का बाप), ‘अंखियोँ के झरोखोँ से’ (मिस्टर रौडरीग्स), ‘घुंघरू की आवाज़’ (नवाब जंग बहादुर), ‘चलती का नाम ज़िंदगी’ (सब को सताने वाला भूत), ‘मालामाल’ (श्री मंगत राम)।
'साहब बीबी और गुलाम' के 'घड़ी बाबू'
स्पष्ट है कि वह अत्यंत सौफ़िस्टिकेटिड ऐरिस्टोक्रैट से लेकर पागल, अछूत मस्त ढोलकिया, भूत, सनकी दादूजी हर तरह के रोल कर सकता था। मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है आशीर्वादका ढोलकिया बैजू और काणों के इक नगर मेँगीत के साथ अशोक और उसकी मस्ती भरी जुगलबंदी। आशीर्वादके दो गीत नाव चलीऔर रेलगाड़ी रेलगाड़ीगीत भी उसी ने लिखे थे। रेलगाड़ी रेलगाड़ीगाने में अशोक कुमार ने जिस तरह ध्वनियां भी पिरोई थीँ वह सिनेमा प्रेमियोँ को अभी तक याद है। भारतीय रेल ने इसे अपने एक विज्ञापन में भी इसका सुंदर उपयोग किया था।
लेकिन वह फ़िल्म जो बावर्चीथी हरींद्रनाथ और राजेश खन्ना पर टिकी थी। इनमें से एक भी कमज़ोर पड़ जाता तो फ़िल्म ठप हो जाती।
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

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