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शनिवार, 24 मार्च 2018

'हिचकी' में हेल्थ और एज़ूकेशन के साथ मानसिकता के खिलाफ भी लड़ती है नैना माथुर यानी रानी मुखर्जी

फिल्म समीक्षा
टाइटल - हिचकी
निर्देशक - सिद्धार्थ पी मल्होत्रा
सितारे - रानी मुखर्जी चोपड़ा, नीरज कबी, सुप्रिया पिलगांवकर, इवान रोड्रिग्स
रेटिंग – 3 स्टार

ब्लैक वाली रानी की मर्दानी के बाद एक और दमदार भूमिका
'हिचकी' में रानी मुखर्जी की एक गंभीर मुद्रा

*रवींद्र त्रिपाठी
इस फिल्म का नाम `हिचकी तो सिर्फ एक सहूलियत के लिए है क्योंकि जिस बीमारी के आधार पर इस फिल्म का नाम रखा गया है उसका कोई सहज हिंदी अनुवाद उपलब्ध नहीं है। अंग्रेजी में उस बीमारी का नाम है `टुरेट सिंड्रॉम। ये हिचकी की तरह है लेकिन वही नहीं है। `टुरेट सिंड्रॉमकी वजह से मानसिक तनाव के वक्त गले से कई तरह की आवाजें आती हैं, हिचकी जैसी भी और खांसी जैसी भी। कुछ और तरह की भी। `हिचकी की नायिका नैना माथुर (रानी मुखर्जी) को यही बीमारी है। हालांकि वह पढ़ने में तेज रही है और एमएससी और बीएड है। स्कूल में अध्यापिका बनना चाहती है। लेकिन जिस स्कूल में अध्यापिका के साक्षात्कार के लिए जाती है उसे इसी बीमारी की वजह से अस्वीकृत कर दिया जाता है।
फिल्म की कहानी
ऐसे में नैना क्या करे? क्या हार मान ले और पिता के कहने पर किसी बैंक में काम करना स्वीकार कर ले? नैना बेचेन है। ऐसे कश्मकश में सेंट नोटकर स्कूल से उसे निमंत्रण मिलता है कि वह वहां पढाए। नैना की खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। हालांकि वह इस बात से अनजान है कि इस निमंत्रण में एक पेंच है और इसका पता उसे स्कूल की नौकरी के पहले दिन चलता है। पेंच ये है कि जिस क्लास को उसे पढाना है वह उन बच्चों का है जो समाज के वंचित वर्ग से आते हैं और `शिक्षा का अधिकार कानून के तहत उनको वहां दाखिला मिला है। ये बच्चे उधमी हैं। बेहद गरीब हैं और पढाई में इनका मन नहीं लगता है। ये स्कूल के दूसरे बच्चों के साथ घुलमिल भी नहीं पाते। नैना के साथ तो ये असहयोग आंदोलन जैसा शुरू कर देते हैं। लेकिन उसकी असली परेशानी यही नही है। बड़ी चुनौती है स्कूल के एक दूसरे अध्यापक (नीरज कबी) से जो इन बच्चों को नगरपालिका का कचरा मानते हैं।
फिल्म में स्कूल के गरीब बच्चों के साथ नाचती गाती 'नैना' 

मानसिकता के खिलाफ लड़ाई
इसमें संदेह नहीं कि `हिचकी एक प्रेरणादायी फिल्म है और उस तरह की है जैसे `तारे जमीं पर और `हिंदी मीडियम। एक तरफ ये एक विशिष्ट तरह की अस्वस्थता से ग्रस्त व्यक्ति यानी नैना के गहरे आत्मविश्वास और आत्मसंघर्ष की कहानी है तो दूसरी तरफ निजी स्कूलों के भीतर निहित एक खास तरह की वर्गव्यवस्था की। निजी स्कूलों में दो तरह के वर्ग बन गए हैं – अमीर और गरीब। `शिक्षा का अधिकार कानून की वजह से पब्लिक कहे जानेवाले स्कूलों को गरीब बच्चों को दाखिला देना कानूनी रूप से जरूरी है लेकिन स्कूल की पूरी व्यवस्था उनको नापसंद करती है। नैना को दो तरफ लड़ाई लड़नी है। अपनी बीमारी की वजह से लोगों के उपहास का पात्र बनने से और दूसरे उन बच्चों के खिलाफ स्कूल की मानसिकता से। वह जीतेगी या हारेगी? उसके और बच्चों - दोनों के खिलाफ स्कूल में षडयंत्र चल रहा है। षड्यंत्र सफल होगा या असफल?
रानी की दमदार भूमिका
फिल्म पूरी तरह से रानी मुखर्जी की है जिन्होंने `मर्दानी के बाद एक और औरत केंद्रित भूमिका सफलता के साथ निबाही है। `ब्लैक में भी  रानी ने ऐसा किरदार निभाया था जो देख नहीं सकती। `हिचकी में उनको ऐसा चरित्र निभाया है जो एक तरफ सामाजिक उपहास के कारण हमेशा एक मनोवैज्ञानिक तनाव में जीती है लेकिन इस तनाव से उबर पाने की जिद भी उसके लगातार बरकरार है। हालांकि मन में उथलपुथल है और वह उथलपुथल बखूबी अभिव्यक्त हुआ है।
हॉलीवुड फिल्म से प्रेरित
`हिचकी हॉलीवुड की फिल्म `फ्रंट ऑफ द क्लाससे प्रेरित है ये फिल्म ब्रैड कोहेन नाम के अध्यापक के किताब के आधार पर बनी है। कोहेन खुद इस बीमारी से पीड़ित रहे और अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने लिजा विसोक्की के साथ मिलकर एक किताब लिखी, जिसका नाम है `फ्रंट ऑफ द क्लास: हाउ टूरेट सिंड्रोम मेड मी द टीचर आई नेवर हैड। हॉलीवुड की फिल्म इसी किताब का फिल्मी रूप थी। इसका हिंदी संस्करण  `हिचकी भी एक जिंदगी को सकारात्मकता के साथ जीना सिखानेवाली फिल्म है।
  *(लेखक प्रख्यात कला मर्मज्ञ और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क - 9873196343)

हॉलीवुड की इस फिल्म से प्रेरित है 'हिचकी'

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