फिल्मों में अब इस तरह 'स्पेस' तलाश रही हैं नायिकाएं... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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गुरुवार, 8 मार्च 2018

फिल्मों में अब इस तरह 'स्पेस' तलाश रही हैं नायिकाएं...


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष
आज के सिनेमा में महिला और महिलाओं का सिनेमा

सिनेमा की बात
*अजय ब्रह्मात्मज / संजीव श्रीवास्तव


संजीव श्रीवास्तव - अजय जी आपको क्या लगता है सिनेमा में महिलाओं को लेकर सोच में अब कितना बड़ा बदलाव आया है?
अजय ब्रह्मात्मज देखिए सिनेमा एक व्यावसायिक माध्यम है निर्माताओं को जब लगता है कि महिला प्रधान फिल्में बनाने से फायदा होगा तो वह उस तरह की फिल्में बनाते हैं। लेकिन यह सबकुछ इस बात पर निर्भर करता है कि समाज में महिलाओं की स्थिति क्या है, दर्शकों के बीच महिलाओं कस्थिति क्या है? पहले का समय कुछ और था। पहले के जमाने में विचार के स्तर पर महिलाओं का चित्रण होता था। उसमें दमित, शोषित स्त्रियों को दिखाया जाता था। लेकिन आज की फिल्मों में महिलाओं के उल्लास, उनकी उपलब्धियों को अधिक दिखाया जा रहा है। ये बड़ा अंतर आया है।

संजीव श्रीवास्तव आपने बहुत ही अच्छी तस्वीर की तरफ ध्यान दिलाया है। पहले की महिला प्रधान फिल्मों में नायिकाएं गुस्सैल और बदला लेने वाली होती थीं लेकिन अब उसमें उल्लास या कहें अंग प्रदर्शन का चलन भी काफी बढ़ा है। आपको क्या लगता है ये प्रवृतियां बाजार के दवाब में हुई हैं या इसे आजादी की नई चेतना कहें ?
अजय ब्रह्मात्मज – देखिए अंग प्रदर्शन करना या दर्शकों को उत्तेजित करना अलग बात है लेकिन तुम्हारी सुलु या क्वीन जैसी फिल्में अलग किस्म की सोच के साथ सामने आती हैं। इन फिल्मों में लड़कियां या महिलाएं अपना स्पेस खुद बनाती हुई दिखाई देती हैं। अब की फिल्मों में महिलाओं को दमित, शोषित या पीड़ित बनाकर नहीं पेश किया जाता है। आप तुम्हारी सुलु को देखिए-उसमें वह कहीं से भी शोषित या दमित नहीं है। वह एक ऐसी मध्यवर्गीय महिला है जिसे घर के लोग ही इंफीरियटी कांप्लेक्स में डालते हैं लेकिन वह उससे उबरती है। इसी तरह से क्वीन या सिमरन भी अपने स्पेस की लड़ाई लड़ती हैं। इनका पुरुषों से कोई झगड़ा नहीं हैं। पहले की फिल्मों में पुरुषों से झगड़ा दिखाई देता था। लेकिन अब वैसा नहीं होता। वास्तव में ये स्त्री-पुरुष की लड़ाई नहीं है। सोच बदलने की लड़ाई है। हमारे घर या आस-पास भी देखें तो महिलाएं जिस तरह से हर काम काज में आगे आ रही हैं, वही फिल्मों में भी दिखाई दे रहा है। मुझे लगता है किसी फिल्म को नायिका प्रधान तब कहेंगे जब उन फिल्मों में नायिका की हैसियत के मुताबिक पुरुष कलाकार  हों। जैसे कि तुम्हारी सुलु में मानव कौल की जगह क्या आमिर खान हो सकते थे? क्या हम ये कल्पना कर सकते हैं? शायद नहीं! अगर नहीं, तो फिर कैसे उसे नायिका प्रधान फिल्म कहें? पुरुष प्रधान फिल्मों में हीरोइनें नायक की समकक्ष रहती हैं लेकिन महिला प्रधान फिल्मों में नायक उसके समकक्ष क्यों नहीं होते? हां, इस दृष्टिकोण से पद्मावत को नायिका प्रधान फिल्म कह सकते हैं जहां दीपिका के साथ दो बड़े पुरुष कलाकार भी हैं। इसके अलावा मैं इस मौके पर एक बात को और खासतौर पर उल्लेख करना चाहूंगा कि अब फिल्मों में महिलाओं की पोजीशनिंग पहले से काफी बढ़ गई है। अनुष्का शर्मा तो प्रोड्यूसर भी बन गईं लेकिन पर्दे के पीछे देखें तो सहायक निर्देशक, कैमरा पर्सन या एडिटिंग या अन्य तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका काफी बढ़ी है जो कि काफी अच्छी बात है।
 

संजीव श्रीवास्तव – एक सवाल गीतों को लेकर भी है। अब वैसे गीत भी नहीं लिखे जा रहे जो नायिका की वीरता या उसके उल्लास, उपलब्धि को उजागर कर सके। ब्लैक एंड ह्वाइट के ज़माने में भी हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपट्टा मलमल का...जैसा गीत लिखा गया-बाद में भी आज मैं ऊपर आसमां नीचे…’ आदि...जोकि स्त्री की आजाद चेतना को दर्शाते हैं।
अजय ब्रह्मात्मज – इस मामले में इरशाद कामिल ने कई अच्छे गीत लिखे हैं महिलाओं को लेकर, जहां उनकी आजादी या प्रेम का वर्णन हुआ है। लेकिन हां, यह सही है कि सिचुएशनल फिल्मों में इसकी संख्या या कहें कि दरकार कम हो गई है। आज फिर जीने की तमन्ना है आज फिर मरने का इरादा है’…ऐसी भावना को व्यक्त करने वाली नायिकाएं भी अब नहीं रह गई हैं। शायद उनकी जरूरत भी नहीं रही। वैसे ये बिल्कुल सही है कि गीतों की क्वालिटी गिरी है, उनकी शायरी कम हुई है।  

*(अजय ब्रह्मात्मज वरिष्ठ फिल्म समीक्षक हैं। इन्होंने सिनेमा पर कई पुस्तकें लिखी हैं। विश्वविद्यालयों में सिनेमा पर व्याख्यान देते हैं। मुंबई में निवास।
संपर्क -9820240504 ;
संजीव श्रीवास्तव पिक्चर प्लस के संपादक हैं। दिल्ली में निवास। संपर्क- pictureplus2016@gmail.com)

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