'संगम' की वो 'राधा' वास्तव में किसकी प्रेरणा थी? राजकपूर की या गीतकार हसरत जयपुरी की? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 15 अप्रैल 2018

'संगम' की वो 'राधा' वास्तव में किसकी प्रेरणा थी? राजकपूर की या गीतकार हसरत जयपुरी की?


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग - छब्बीस
 
'संगम' का सबसे चर्चित दृश्य
मेकिंग ऑफ फिल्म संगम- 3
उसका नाम था इक़बाल हुसैनपैदाइश थी जयपुर मेँ 22 अप्रैल 1922इंग्लिश नामचार की पढ़ी थीबाबा फ़िदा हुसैन से उर्दू और फ़ारसी सीखी थीघुंघराले बालोँ और सपने देखती बड़ी बड़ी आंखोँ वाले नौजवान की शक्लसूरत माशूक़ाना थीमिज़ाज आशिक़ाना थाअंदाज शायराना था। बाईसेक साल का हुआ तो बंबई आ गयाकाम मिला बस कंडक्टरी कापगार थी ग्यारह रुपए महीना। मुशायरोँ में हसरत जयपुरी नाम से कलाम पढ़ते पढ़ते मशहूर होने लगा। एक मुशायरे मेँ पढ़ रहा थापारखी पृथ्वीराज कपूर को भा गया। उन्होंने राज से मिलवाया। इस तरह वह बन गया राज कपूर की शंकरजयकिशनशैलेंद्र वाली मस्त गीत-संगीत  चौकड़ी टीम का मैंबरऔर बॉलिवुड का चढ़ता सितारा। उसने हर रंग के सौँकड़ोँ गीत लिखेविद्वत्ता के आडंबर से दूर दिल की बात सीधे दिल तक पहुंचाने वालेजिनकी ज़ुबान भारी भरकम शब्दों से दूर सीधी सादी थी। यही वह क्वालिटी थी जो नौजवान राज कपूर मेँ भी थीऔर जो उसे अपनी फ़िल्मों में चाहिए होती थी।
इस तरह जो शुरुआत हुई सन् 1949 की राज कपूर की फ़िल्म ‘बरसात’ मेँ ‘छोड़ गए बालम हाय साथ हमारा छोड़ गए’, ‘जिया बेक़रार है’, और ‘ज़िंदगी मेँ हर दम रोता ही रहा हूं’ आदि सात गीतोँ से सत्ताइस साल की उम्र मेँ हसरत के फ़िल्मी सफ़र की वह पूरी हुई पूरी आधी सदी के बाद उन के सतत्तरवेँ साल सन् 1999 मेँ निधन से। उनके जाने के पांच साल बाद आई 2004 की ‘हत्या द मर्डर’ उस के गीतोँ वाली आख़री फ़िल्म थी।
अरविंद कुमार
इस लंबे सफ़र मेँ राज कपूर के लिए ‘बरसात’ के अलावा हसरत ने जिन नामचीन फ़िल्मोँ के गीत लिखे उनमें से कुछ हैँ: ‘आवारा’ (1951), ‘बूट पालिश’ (1955), ‘श्री 420’ (1955), ‘अनाड़ी’ (1959) और ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960)
ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर के तुम नाराज़ ना होना’ गीत फ़िल्म ‘संगम’ की धुरी हैजो उस के कथानक को क्लाइमैक्स तक पहुंचाने का आधार है। 
संगम’ की अनोखी कहानी बचपन के तीन दोस्तोँ - गोपाल (राजेंद्र कुमार) और सुंदर (राज कपूर)गोपाल (राजेंद्र कुमार) और राधा (वैजयंती माला) – की है। गोपाल और राधा के बीच जो लगाव था वह सुंदर को पता नहीँ है। वह समझ बैठा था कि राधा उसे चाहती है। वायुसेना मेँ पाइलट बन कर कश्मीर की लड़ाई पर जाते समय सुंदर जाते जाते गोपाल से वादा ले कर गया था कि वह राधा और सुंदर के बीच किसी और को नहीँ आने देगा। कुछ समय बाद समाचार आता है कि दुर्गम पहाड़ोँ और घाटियोँ मेँ भटका सुंदर का जहाज़ खो गया है और सुंदर अब संसार मेँ नहीँ है।
एक बार फिर गोपाल और राधा एक दूसरे के क़रीब आ रहे हैँ। सुंदर वसंती वातावरण है। बाग़ोँ फूल खिले हैँ। संगीत की धुन मतवाली है। घास पर लेटा गोपाल शर्मीला सा झिझकता सा कोमल भावोँ से ओतप्रोत ख़त राधा को लिख रहा है -ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर के तुम नाराज़ ना होना।’ पर दस्तख़त नहीँ कर पाता। दोनोँ का विवाह तय हो जाता है। तभी ख़बर आती है कि सुंदर स्वस्थ हो कर वापस आ रहा है। अब सुंदर और राधा पति-पत्नी बना दिए जाते हैँ - दुनिया भर मेँ सैर सपाटे करते प्रसन्न जीवन बिता रहे हैँ।
कहानी मेँ ट्विस्ट यह है कि एक दिन सुंदर को गोपाल वाला ख़त मिल जाता है। सुंदर जानना चाहता है कि पत्र-लेखक कौन है। मन की उठापटक से वह बेचैन हो जाता है।
इस प्रकार यह ख़त फ़िल्म ‘संगम’ की धुरी हैउस के कथानक को क्लाइमैक्स तक पहुंचाने का आधार है।
फिल्मों में आने के बाद हसरत

इस गीत के पीछे हसरत के जीवन की भी एक कहानी है। आशिक़ाना मिज़ाज वाले हसरत ने कहा है, “जयपुर में मेरी हवेली के सामने बड़ी ख़ूबसरत लड़की रहती थीनाम था राधा। और इश्क़ का मज़हब सेज़ात-पात से कोई ताल्लुक़ नहीँ। किसी से भी हो सकता हैकिसी से भी किया जा सकता है। तो मेरा उन से प्यार हुआ। शायरी की तालीम मैँ ने अपने नाना मरहूम से हासिल कीलेकिन इश्क़ का सबक़ जो है वो राधा ने पढ़ाया कि इश्क़ क्या चीज़ है।
संगम’ की नायिका भी राधा थी। अब यह कहना मुश्किल है कि हसरत ने यह गीत अपनी राधा के नाम लिखा या गोपाल की तरफ़ से उस की राधा के लिए लिखा।


ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर के तुम नाराज ना होना
मेहरबां लिखूंहसीना लिखूंया दिलरुबा लिखूं
हैरान हूं कि आप को इस ख़त मेँ क्या लिखूं

ये मेरा प्रेमपत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ ना होना
के तुम मेरी ज़िंदगी हो के तुम मेरी बंदगी हो

तुझे मैँ चांद कहता थामगर उस मेँ भी दाग है
तुझे सूरज मैँ कहता थामगर उस मेँ भी आग है
तुझे इतना ही कहता हूं के मुझ को तुम से प्यार है    

तुझे गंगा मैँ समझूंगातुझे जमुना मैँ समझूंगा
तू दिल के पास है इतनीतुझे अपना मैँ समझूँगं
अगर मर जाऊं रूह भटकेगी तेरे इंतज़ार मेँ


अंत मेँ एक निजी संस्मरण-

हसरत से जब से मेरी मुलाक़ात हुईकिसी जश्न या पार्टी मेँ मिलते चकल्लस और हँसं मज़ाक़ का सिलसिला शुरू हो जाता। एक बार यह चकल्लस हुई तो हम दोनोँ की कामन दोस्त फ़िल्म पत्रकार भी शामिल हो गई। वह सितारे जड़ी साड़ी पहने वह आई थीवैसी ही जैसी कि हसरत ने लिखी थी अपने के एक गाने मेँ - ‘बदन पे सितारे लपेटे हुएओ जान-ए-तमन्ना किधर जा रही होज़रा पास आओ तो चैन आ जाए।’ हसरत उसे छेड़ने लगेमैँ भी साथ हो लिया। वह तुनकीहसरत ने याद दिलाई अपनी बेगम से उस की दोस्ती और इस बहाने उस का हसरत की साली होने की। मैँ ने भी जड़ दिया कि जीजा का छेड़छाड़ का हक़ तो बनता ही है। पार्टी भूल कर हम तीनोँ यही हंसी मज़ाक़ करते रहे।

सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

3 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन जानकारी .. हसरत जयपुरी के बारे में

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  2. BLUNDERRRRRRR !!!!!!!!!!!

    Ek galati ho gayi aap se bhi........aap ne jo photo prakaashit kee hai........Yuvaa Hasrat Jaipuri ki wah Yuva Shankar ji ki hai............

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