गीतकार शैलेंद्र राजकपूर के 'पुश्किन' थे... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 22 अप्रैल 2018

गीतकार शैलेंद्र राजकपूर के 'पुश्किन' थे...


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-27
 
'माधुरी' के दफ्तर में काम करते अरविंद कुमार
मेकिंग ऑफ फिल्म संगम- 4
दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना रहा /
ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहाऐतबार ना रहा /
अमानतें मैं प्यार की गया था जिस को सौंप कर वो मेरे दोस्त तुम ही थे तुम्हीं तो थे जो ज़िंदगी की राह मेँ बने थे मेरे हमसफ़र वो मेरे दोस्त तुम ही थे तुम्हीं तो थे सारे भेद खुल गए राज़दार ना रहा /
ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहाऐतबार ना रहा दोस्त दोस्त ना रहा ...
सफ़र के वक़्त में पलक पे मोतियों को तौलती वो तुम ना थी तो कौन था तुम्हीं तो थी नशे की रात ढल गयी अब खुमार ना रहा
ज़िंदगी हमें तेरा / ऐतबार ना रहाऐतबार ना रहा दोस्त दोस्त ना रहा...
 अगर हसरत का गीत  यह मेरा प्रेमपत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ न होना’ ‘संगम’ की धुरी थातो ‘दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना रहा’ ‘संगम’ के तीनोँ पात्रोँ सुंदर (राज कपूर)गोपाल (राजेंद्र कुमार) और राधा (वैजयंती माला) की आत्मा की कचोट काउनकी पीड़ा का और गोपाल के शिकवे का दर्पण था। सारा क्लाइमैक्स इसी पर टिका था।
फ़िल्म के लगभग दो तिहाई बीत जाने पर ये तीनोँ एक सैनिक के अंत की कहानी सुनते हैँ जिसकी प्रिय पत्नी ने उसके प्यार को धोखा दिया था। तीनोँ एक साथ बैठे हैँ। द्रवित सुंदर प्यानो पर गाना शुरू करता है ‘दोस्त दोस्त ना रहा। एक तरफ़ गोपाल है और दूसरी ओर राधा। सुंदर पियोना बजाता गा रहा है ‘दोस्त दोस्त ना रहा। हम प्रतिक्रिया गोपाल और राधा पर देख रहे हैँ। हलके बादलोँ वाले आसमान मेँ गोपाल की बड़ी बड़ी आंखेँहवाई अड्डाआसमान मेँ गोपाल का चेहरे का क्लोज़अपआंखेँमन मेँ कचोट उड़ता भटकता छोटा सा जहाज़राधा का कुछ वैसा ही चेहरापर ग्लानिआसमान की पृष्ठभूमि पर राधा का चेहराआंखेँसुंदर को विदा करते राधा और गोपाल।
बीच बीच मेँ सुंदर पियानो परकभी मुड़कर गोपाल को देखता हैकभी राधा को...यह जो शोक है इन तीनोँ के संदर्भ मेँ विराट और व्यापक और गोपाल और राधा का निजी हो गया है।
 
फिल्म 'संगम' का एक भावुक दृश्य
इसके बाद लगभग अंत के निकट सुंदर का यह शोक निजी दर्द और शिकवा हो जाता है। उसे गोपाल का प्रेमपत्र राधा की अलमारी मेँ मिल गया है। पत्र पर लिखने वाले का नाम नहीँ है। सुंदर के सिर पर भूत सवार हो जाता है। राधा को पत्र लिखने वाला यह कौन है। गोपाल हो सकता हैयह उसके दिमाग़ से परे है। सुंदर और राधा की ज़िंदगी नरक बन जाती है। राधा की निष्ठा का ज़िक्र आने पर सुंदर के चेहरे पर कड़वा व्यंग्य छा जाता है। वह फिर गा रहा हैगीत का अंतिम अंतरा-
सफ़र के वक़्त में पलक पे मोतियों को तौलती वो तुम ना थी तो कौन था तुम्हीं तो थी नशे की रात ढल गयी अब खुमार ना रहा
ज़िंदगी हमें तेरा  / ऐतबार ना रहाऐतबार ना रहा दोस्त दोस्त ना रहा...
बार बार सुंदर पिस्तौल से खेल रहा है। राधा सह नहीँ पाती तो गोपाल के घर चली जाती है। पिस्तौल थामे परेशान सुंदर भी गोपाल के पास आता है। वही ख़त की बात होती है। गोपाल भेद खोलता है। सुंदर, “एक बार मुझे बता तो देतेमैँ रास्ते से हट जाता।” पर गोपाल...
3 अगस्त 1923 को रावलपिंडी मेँ जन्मे शैलेंद्र (मृत्यु14 दिसंबर 1966) कुल 43 साल जिए और इन चार दशकोँ मेँ से जिन कुल सतरह (17) साल फ़िल्म गीत लिख कर वह हिंदी वह एक भरा पूरा गीत साहित्य रच गएजिसने उभरते स्वतंत्र भारत की मानसिकता का विविध मर्मस्पर्शी वर्णन किया। राज कपूर के लिए वह कविराज और पुश्किन थे। सच कहा जाए तो वह राज कपूर की आत्मा थे।
अन्य कवियोँ और गीतकारोँ से बिल्कुल अलग तरह का होने के पीछे था उन का भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) से सक्रिय संबंध। इस संबंध वाले और भी लोग फ़िल्मोँ मेँ गीतकार बनेजैसे कैफ़ी आज़मी। मैँ दोनोँ की तुलना अगले हफ्ते करुंगा। 
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

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