जानिये कितनी जान है 'नानू की जानू' की कहानी में...? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 21 अप्रैल 2018

जानिये कितनी जान है 'नानू की जानू' की कहानी में...?


फिल्म समीक्षा
टाइटल - नानू की जानू
निर्देशक - फराज हैदर
सितारे - अभय देओल, पत्रलेखा, ब्रिजेंद्र काला, राजेश शर्मा ऋषि, हिमानी शिवपुरी


*रवीन्द्र त्रिपाठी
सन् 2014 में तमिल में एक फिल्म आई थी-`पिसासु।ये फिल्म तेलुगु और कन्नड़ में भी बन चुकी है।`नानू की जानू उसी फिल्म का हिंदी रिमेक है। ये हॉरर-कॉमेडी है यानी थोड़ा-सा डराती है और थोड़ा हंसाती है। जी हां, थोड़ा ही हंसाती है ज्यादा नहीं। फिल्म कुछ कुछ उस तरह की है जैसे कुछ समय पर पहले आई अनुष्का शर्मा की फिल्म `फिल्लौरी बॉलीवुड में हॉरर-कॉमेडी विधा में ज्यादा फिल्में नहीं हैं। इस हिसाब से इसकी अहमियत है।
फिल्म की कहानी
`नानू की जानू में आनंद यानी नानू (अभय देओल) दिल्ली- नोएडा में रहनेवाला एक गुंडा-मवाली किस्म का शख्स है। वह दूसरों की प्रॉपर्टी पर जबरदस्ती कब्जा करता है। खासकर दूसरों का फ्लैट हथियाने में वह माहिर है। इसमें डब्बू (मनु ऋषि) उसकी मदद करता है। दोनों का धंधा आराम से चल रहा है। पर इसी दौरान नानू एक दिन देखता है कि सड़क पर एक लड़ती दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। गोकि नानू गुंडा है लेकिन हर गुंडे के दिल में कुछ अच्छाई तो बची रहती है। है कि नहीं?  सो नानू सीधी (पत्रलेखा) नाम की उस दुर्घटनाग्रस्त लड़की को अस्पताल पहुंचा देता है जहां वह मृत घोषित की जाती है। इसके बाद आता है कहानी में मोड़ क्योंकि वो लड़की भूतनी बनके इसके नानू के फ्लैट में पहुंच जाती है और अजीबोगरीब हरकतें करने लगती हैं। कभी बोतल खोलनेवाला ओपेनर गायब कर देती है तो कभी कुछ और करता है। दर असल वो नानू से इश्क करने लगी है। लेकिन एक भूतनी से इश्क कैसे होगा? यही वो विंदु है जहां से हंसी का माहौल पैदा होने लगता है।
अभिनय और निर्देशन
फिल्म और बेहतर और चुस्त हो सकती थी। लेकिन निर्देशक ने वो संतुलन पैदा नहीं किया है जिसमें हंसी और हॉरर के तत्व किस अनुपात में हों। ये एक अपराध फिल्म के रूप में शुरू होती है और फिर हॉरर की तरफ मुड़ती और कॉमेडी की दिशा में चक्कर लगाने लगती है। फिर भी ये औसत किस्म की फिल्म है और अभय देओल की वजह से दर्शकों को बांधे रखती है। अभय एक संजीदा किस्म के अभिनेता और उनका हास्य भी सूक्ष्म होता है। पत्रलेखा के बारे में क्या कहा जाए? वे दो पाटों के बीच में फंस गई हैं। हंसाना भी है और डराना भी। दोनों काम ठीक से हो नहीं पाया है। लड़की (या भूतनी) के पिता के रूप में राजेश शर्मा का काम अच्छा है।
*लेखक प्रख्यात कला मर्मज्ञ व फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क-9873196343

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